मह लक़ा ‘चंदा’ की रचनाएँ

आलम तेरी निगह से है सरशार देखना

आलम तेरी निगह से है सरशार देखना
मेरी तरफ़ भी टुक तो भला यार देखना

नादाँ से उक उम्र रहा मुझ को रब्त-ए-इश्क़
दाना से अब पड़ा है सरोकार देखना

गर्दिश से तेरी चश्म के मुद्दत से हूँ ख़राब
तिसपर करे है मुझ से ये इक़रार देखना

नासेह अबस करे है मना मुझ को इश्क़ से
आ जाए वो नज़र तो फिर इंकार देखना

‘चंदा’ को तुम से चश्म से है या अली के हो
ख़ाक-ए-नजफ़ को सुरमा-ए-अबसार देखना

 

दिल हो गया है ग़म से तेरे दाग़-दार ख़ूब

दिल हो गया है ग़म से तेरे दाग़-दार ख़ूब
फूला है क्या ही जोश से ये लाला-ज़ार ख़ूब

कब तक रहूँ हिजाब में महरूम वस्ल से
जी में है कीजिए प्यार से बोस-ओ-किनार ख़ूब

साक़ी लगा के बर्फ़ में मय की सुराही ला
आँखों में छा रहा है नशे का ख़ुमार ख़ूब

आया न एक दिन भी तू वादा पे रात को
अच्छा किया सुलूक तग़ाफु़र-शिआर ख़ूब

ऐसी हवा बँधी रहे ‘चंदा’ की या अली
बा-सद-बहार देखे जहाँ की बहार ख़ूब

दिल में मेरे फिर ख़याल आता है आज

दिल में मेरे फिर ख़याल आता है आज
कोई दिल-बर बे-मिसाल आता है आज

क्यूँ पड़ा बे-होश उठ हातिफ़ से अब
है निदा साहब-ए-जमाल आता है आज

संग-ए-रह हूँ एक ठोकर के लिए
तिस-वे वो दामन सँभाल आता है आज

मुश्तरी ओ ज़ोहरा बाहम साद हैं
इस लिए अब्रू हिलाल आता है आज

तुम सिवा ‘चंदा’ के दिल में या अली
किस की अज़मत का जलाल आता है आज

गरचे गुल की सेज हो तिस पर भी उड़ जाती है नींद

गरचे गुल की सेज हो तिस पर भी उड़ जाती है नींद
सर रखूँ कदमों पे जब तेरे मुझे आती है नींद

देख सकता ही नहीं आँखों से टुक आँखें मिला
मुंतज़िर से मिस्ल-ए-नर्गिस तेरे शरमाती है नींद

जब से ये मिज़गाँ हुए दर पर तेरे जारूब-कश
रू-ब-रू तब से मेरी आँखों के टल जाती है नींद

ध्यान में गुल-रू के चैन आता नहीं अफ़साना-गर
ले सबा से गाह बू-ए-यार बहलाती है नींद

अश्क तो इतने बहे ‘चंदा’ के चश्म-ए-ख़ल्क़ से
क़ुर्रत-उ

हुए जनाब में अब तक न मेरे हम गुस्ताख़

हुए जनाब में अब तक न मेरे हम गुस्ताख़
ख़ुदा के वास्ते हम से न हो सनम गुस्ताख़

छुपाया राज़-ए-मोहब्बत को दिल में पर हैहात
करे है नाम मेरा बद ये चश्म-ए-नम-गुस्ताख़

जो आवे जी में सो कह ले मैं हूँ वो ऐ प्यारे
रहूँ हज़ार हुज़ूरी में पर हूँ कम गुस्ताख़

कहा गले से लगा ले तू इल्तिफ़ात नहीं
कहे है तिस-पे मुझे क्यूँ तू दम-ब-दम गुस्ताख़

यही उम्मीद है ‘चंदा’ को ख़ूब-रूयों में
रखे हमेशा तेरा या अली करम गुस्ताख़

ल-ऐन-ए-अली के ग़म

न गुल से है ग़रज तेरे न है गुलज़ार से मतलब

न गुल से है ग़रज तेरे न है गुलज़ार से मतलब
रखा चश्म-ए-नज़र शबनम में अपने यार से मतलब

ये दिल दाम-ए-निगह में तर्क के बस जा ही अटका है
बर आवे किस तरह अल्लाह अब ख़ूँ-ख़्वार से मतलब

ब-जुज़ हक़ के नहीं है ग़ैर से हरगिज़ तवक़्क़ो कुछ
मगर दुनिया से लोगों में मुझे है प्यार से मतलब

न समझा हम को तू ने यार ऐसी जाँ-फ़िशानी पर
भला पावेंगे ऐ नादाँ किसी हुश्यार से मतलब

न ‘चंदा’ को तमा जन्नत की नै ख़ौफ़-ए-जहन्नम है
रहे है दो-जहाँ में हैदर-ए-कर्रार से मतलब

में बह जाती है नींद

रहे रक़ीब से बाहम वो सीम-बर महज़ूज़ 

रहे रक़ीब से बाहम वो सीम-बर महज़ूज़
हुआ न आह का अपने कभी असर महज़ूज़

दरेग़ चश्म-ए-करम से न रख के ऐ ज़ालिम
करे है दिल को मेरे तेरी यक नज़र महज़ूज़

न बार बार हवस को नबात की मुझ को
रखे जो एक ही बोसा में लब-ए-शकर महज़ूज़

तमाशा एक ख़ुदाई का हम दिखाते हैं
तो कीजिए बंदा-नवाजी हुए हो मगर महज़ूज़

यही दुआ है कि ‘चंदा’ का दिल अली वली
तेरे करम से रहे शाम औ

रखते हैं मेरे अश्त से ये दीदा-ए-तर फ़ैज़

रखते हैं मेरे अश्त से ये दीदा-ए-तर फ़ैज़
दामन में लिया आपने है दरिया ने गोहर फ़ैज

पुर-नूर अजब क्या है करे मुझ को करम से
रखती है दो आलम पे तेरी एक नज़र फै़ज़

इक जाम पे बख़्शे है यहाँ रूतबा जिस्म को
किस की निगह-ए-मस्त से रखता है ख़ुमर फ़ैज़

महरूम नहीं कोई तेरे ख़्वान-ए-करम से
है हस्त्र ख़ुदाई का ही तुझ पे मगर फै़ज़

‘चंदा’ रहे परवत से तेरे या अली रौशन
ख़ुर्शीद को है दर से तेरे शाम ओ सहर फै़ज

र सहर महज़ूज

 

 

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