रंजीता सिंह फ़लक की रचनाएँ

तुम्हारा इन्तज़ार

कई
प्रतिक्षाएँ
होती हैं अन्धी
अन्तहीन सुरँग-सी,
जिनमें
आँख की कोर से
प्यार के मौसम में खिले ढेर सारे ख़्वाबों के फूल
और
ख़्वाहिशों के दस्तावेज़
गिर जाते हैं,
ऐसे कि
फिर कभी नज़र नहीं आते

और
बरसों बाद
जब
बरसता है याद का कोई सिरा
जब
डूबने लगता है सारा अस्तित्व
तब
कहीं अचानक
उस गहरी
अन्तहीन सुरँग के
मुहाने पर दिखते हैं
मुरझाए ख़्वाबों के फूल
और
आधी-अधूरी इबारत वाली
ख़्वाहिशों के दस्तावेज़
जिन्हें,
जैसे ही
वक़्त की नाज़ुक उँगलियाँ
सहेजना चाहती हैं
वे
हो जाते हैं चिन्दी चिन्दी

झड़ जाती है
उस फूल की हर सूखी पँखुड़ी
पर
कुछ ख़ुशबू
कुछ स्याही बची रहती है
एक
प्रमाण-पत्र की तरह
कि
कभी किया था
मैंने तुम्हारा इन्तज़ार
उतनी ही शिद्दतों से ।

बिसराई गई बहनें और भुलाई गई बेटियाँ 

बिसराई गईं बहनें
और भुलाई गई बेटियाँ
नहीं बिसार पातीं मायके की देहरी

हालाँकि जानती हैं
इस गोधन में नहीं गाए जाएँगे
उनके नाम से भैया के गीत
फिर भी
अपने आँगन में
कूटती हैं गोधन, गाती हैं गीत
अशीषती हैं बाप भाई जिला-जवार को
और देती हैं
लम्बी उम्र की दुआएँ

बिसराई गईं बहनें
और भुलाई गई बेटियाँ
हर साल लगन के मौसम में
जोहती हैं
न्योते का सन्देश
जो वर्षों से नहीं आए उनके दरवाज़े
फिर भी
मायके की किसी पुरानी सखी से
चुपचाप बतिया कर
जान लेती हैं
कौन से
भाई-भतीजे का
तिलक-छेंका होना है ?

कौन-सी बहन-भतीजी की
सगाई होनी है ?

गाँव-मोहल्ले की
कौन-सी नई बहू सबसे सुन्दर है
और कौन सी बिटिया
किस गाँव ब्याही गई है ?

बिसराई गईं बहनें
और भुलाई गई बेटियाँ
कभी-कभी
भरे बाज़ार में ठिठकती हैं,
देखती हैं बार-बार
मुड़कर
मुस्कुराना चाहती हैं
पर
एक उदास ख़ामोशी लिए
चुपचाप
घर की ओर चल देती हैं,
जब
दूर का कोई भाई-भतीजा
मिलकर भी फेर लेता है नज़र,

बिसराई गई बहनें
और भुलाई गई बेटियाँ
अपने बच्चों को
ख़ूब सुनाना चाहतीं हैं
नाना-नानी, मामा-मौसी के क़िस्से
पर
फिर सम्भल कर बदल देतीं हैं बात
और सुनाने लगतीं हैं
परियों और दैत्यों की कहानियाँ।

मन की स्लेट

औरतों के दुख
बड़े अशुभ होते हैं,
और उनका रोना
बड़ा ही अपशकुन,

दादी शाम को
घर के आँगन में
लगी मजलिस में,
बैठी तमाम बुआ, चाची, दीदी, भाभी
और बाई से लेकर हजामिन तक की
पूरी की पूरी टोली को बताती
औरतों के सुख और दुख का इतिहास

समझाती सबर करना
अपने भाग्य पर
विधि का लेखा कौन टाले
जो होता है अच्छे के लिए होता है

सुनी थी उसने अपने मायके में कभी
भगवत- कथा
थोड़ा-बहुत पढ़ा रामायण और गीता भी
फिर पढ़ने से ज़्यादा सुनने लगी
क्योंकि ज़्यादा पढ़ लेने से
बुद्धि ख़राब हो जाती है
मर्दों की नहीँ पर औरतों की

पूछा था उसने भी कभी अपनी दादी से
की ज़्यादा पढ़ के ख़ाली औरतों की
बुद्धि ही क्यों ख़राब होती है ?
मर्दों की काहे नहीं
तभी डपट के खींचे गए कान
और फूँका गया था
एक मन्त्र
औरतों को नहीँ पूछने चाहिए
कोई सवाल
ज़िन्दगी ख़राब होती है
नहीँ पूछने चाहिए कहाँ से शुरू होता
कोई भी प्रश्न
जैसे
क्यों गए ?
कहाँ गए  ?
क्यो नहीँ बताया ?
कब आओगे ?

ऐसे हर सवाल से लगती है
अच्छे-भले घर में आग
औरत को मुँह बन्द और
दिमाग ख़ाली रखना चाहिए
इससे होती है बरकत
बसता है सुखी संसार
आते हैं देव
विराजती है लक्ष्मी

दिमाग के साँकल बन्द रखो
सारे सवाल मन के ताल में ड़ूबा दो
सारी शिकायतें दिमाग की देहरी पर छोड़ दो
और हाँ मन की कुण्डी भी लगा लिया करो ज़ोर से

ना सुनना कभी सपनों की कोई आहट
सफ़ेद रखो मन की स्लेट
ना गढ़ो कोई तस्वीर
और किसी अभागी रात जो देख लो
कौई चेहरा तो तुरन्त मिटा दो
औरतों के मन की स्लेट हमेशा कोरी रहनी चाहिए ।

देवता

मैंने
तुम्हारी मनुष्यता
से प्रेम किया,
और तुम
मुझे देव से लगने लगे
मेरे प्रेम ने की
तुम्हारी आराधना ।

और तुम
ख़ुद को देवता मान
आजमाने लगे
मुझ ही पर
सर्जना और विनाश के नियम ।

प्रेम 

गीली आँखों
और सूखी प्रार्थनाओं के बीच
एक समन्दर
एक सहरा और एक जज़ीरा है

प्रार्थनाएँ तपते सहरा-सी हैं
बरसों-बरस
चुपचाप
तपती रेत पर चलते हुए
मुरादों के पाँव आबला हुए जाते हैं
और
फिर सब्र का छाला फूटता है,
रिसती है
हिज्र की एक नदी
और उमड़ता है आँखों से
एक सैलाब

सब कुछ डूबने लगता है
बची रहती हैं
दो आँखें

नहीं डूबतीं
किसी नदी,
किसी समन्दर,
किसी दरिया में
वो
तैरती रहती हैं लाश की मानिन्द
और आ पहुँचती है
उस जज़ीरे पर
जहाँ प्रेम है ।

सच और झूठ

वो अपने हिस्से का झूठ
रोज़ बेच लेता है
ठीक वैसे
या शायद उससे बेहतर
जैसे की कुछ लोग
बेच लेते हैं
आधा सच
आधा झूठ

और मैं देखती हूँ
एक उदास-निराश भीड़
जो रोज़ सच, खाँटी सच लिए
खड़ी रहती है
पहरों -पहर और फिर भी नहीं
बेच पाती एक भी
पूरा का पूरा सच

वो अपने हिस्से का झूठ
रोज़ बेच लेता है
ठीक वैसे
या शायद उससे बेहतर
जैसे की कुछ लोग
बेच लेते हैं
आधा सच
आधा झूठ

और मैं देखती हूँ
एक उदास-निराश भीड़
जो रोज़ सच, खाँटी सच लिए
खड़ी रहती है
पहरों -पहर और फिर भी नहीं
बेच पाती एक भी
पूरा का पूरा सच

प्रेम की दुनिया 

मुझे लगा था कि
चान्द ज़मीन पर नहीं आता
सितारे जुल्फों में टाँके नहीं जाते
रात का तिलिस्म नहीं होता
ख़्वाब जादू नहीं जगाते

बादलों के पार से
कोई चल के नहीं आता,
मन के आँगन में
गुलमोहर नहीं गिरते

मुझे लगा था
कि प्रेम की दुनिया
बस, किताबों और
ख़्वाबों तक ही होती है

पर अब जाकर
मैंने जाना है कि
किताबों का प्रेम
महज एक फ़लसफ़ा नहीं

प्रेम
ऐसे भी अचानक
दबे पाँव
जीवन में आ जाता है
कि हम उसे देखकर
हैरत में पड़ जाते हैं

और
अपनी पूरी चेतना को
टटोलने लगते हैं

शायद एक भ्रम-सा
शायद एक स्वप्न-सा
शायद एक चान्द-सा
उतर आता है
मन के कोरे आँगन में
और जगमगा उठती है
तमाम मन की दिशाएँ

ओह,
ये अनुभव भी
कितना सुन्दर
कितना सपनीला है,

कितना ख़ूबसूरत है
प्रेम को पाना
और समेट लेना
सदा के लिए ।

अभी ज़ख़्म-ए-दिल को दिखाया नहीं है

अभी ज़ख़्म-ए-दिल को दिखाया नहीं है ।
जो बीती है हम पर बताया नहीं है ।

सितारों को इसका शिकवा बहुत है,
कि जुगनू को उसने छिपाया नहीं है ।

मेरी दस्तरस में तो सब कुछ है लेकिन
तुम्हें चाहिए क्या, बताया नहीं है ।

मेरी दास्ताँ आईने की तरह है,
किसी से भी मैंने छिपाया नहीं है ।

कई राज़ हैं मेरे सीने में लेकिन
ज़माने को क़िस्सा सुनाया नहीं है ।

बहुत होता रहता है नुक़सान मेरा,
मैं ख़ुद्दार हूँ, ये भुलाया नहीं है ।

मुझे जिसने रुसवा किया है मुसलसल
वो अपना है मेरा, पराया नहीं है ।

अधूरे सफ़र को मुकम्मल तो कर लो,
मुझे हमसफ़र क्यों बनाया नहीं है ।

पलटकर मैं आती तेरे दर पर लेकिन
तबीयत से तुमने बुलाया नहीं है ।

तेरी आस्ताँ पे जबीं जब झुकाई,
झुकाकर उसे फिर उठाया नहीं है ।

‘फ़लक’ की दुआ है, कभी रद न होगी,
यक़ीनन किसी को रुलाया नहीं है ।

हमारी जान बसती है वतन के इन तरानों में

हमारी जान बसती है वतन के इन तरानों में ।
जिन्हे लिक्खा गया है हिन्द की हर जुबानों में ।

हमारी हस्ती ऐसी है, मिटा सकता नहीं कोई,
हमारा नाम आता है शहीदों के घरानों में ।

सुना करते हैं हम ख़ुद को, पढ़ा करते हैं हम खुद को
कभी कीर्तन-अजानों में, कभी गीता-कुरानों में ।

ज़माना सुन रहा है शौके-नाजो-फ़क्र से हमको
हमारी शोहरतों के चरचे हैं अब आसमानों में ।

वतन के वास्ते जो मिट गए बेखौफ़ होकर के
है उनका नाम रोशन अब शहादत के फ़सानों में ।

हमारे हौसले से है पलट जाता हवा का रुख़,
कोई क्या आजमाएगा हमें अब इम्तिहानों में ।

हमें लहरों को मुट्ठी में जकड़ना खूब आता है
हमें देखा है दुनिया ने समन्दर के उफ़ानों में ।

बन्द रखी है ज़ुबान हमने लिफ़ाफ़ों की तरह। 

बन्द रखी है ज़ुबान हमने लिफ़ाफ़ों की तरह ।
बोलती हैं मगर आँखें किताबों की तरह ।

वो तो बस देख के मुझको चला जाता है मगर
सुर्ख़ हो जाती हूँ मैं जैसे गुलाबों की तरह ।

उससे मिलना भी कहाँ मुमकिन हो पाता है मेरा
पेश आती हैं हज़ार रस्में हिजाबों की तरह ।

किसने देखा है मोहब्बत में सुकूँ का कोई पल
हरेक लम्हा है यहाँ जैसे अजाबों की तरह ।

ज़िन्दगी इतना उलझा दिया है तूने मुझे
बीती जाती है मेरी उम्र हिसाबों की तरह ।

उसको माना है ख़ुदा उसकी अकीदत की है
इश्क़ मेरा है जैसे की नमाजों की तरह ।

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