रचना त्यागी ‘आभा’ की रचनाएँ

क्रांति

असहिष्णुता और आक्रोश की
अवैध सन्तान हैं
क्रांतियाँ
आक्रोश के वीर्य से जन्मी
असहिष्णुता के गर्भ में पली
उसके रक्तपान से पोषित!
क्रूर तानाशाहों की
वासनामयी गिद्ध दृष्टि से
बचा, छिपाकर
इन्हें सहेजा जाता है
युवा होने तक
परिपक्व होने तक!
फिर वे नहीं रुक पातीं
फूट पड़ती हैं
ज्वालामुखी सी!

महानता

महानता के इस
महाकुम्भ में
सब हैं तैयार
गोते लगाने को
पर यह नदी बहुत है छोटी
इतने सारे
महानों के लिए!
केवल अधिकार है उन्हीं को
जिन्होंने खरीदे हैं तट
या फिर पानी
या फिर उन्हें,
कि जिन्हें कुछ पीढ़ियों से
पहचानते हैं तट
और पानी
आखिर महानता भी
विरासत है

अग्नि-परीक्षा

इतने युग, इतने वर्षों से
पावक तपीं इतनी सीताएँ
देने को विविध परीक्षाएँ
अपने चरित्र की, दृढ़ता की
कि गंध भी उनकी देह की अब
अग्नियों को है लगती परिचित
सो प्रेम से वह अपना लेती।
जिस दिवस परीक्षा लेगा काल
शौर्यवान औ धैर्यवान
औ निष्कलंक किसी राम की
अग्नि भी न पहचानेगी
उस नव विचित्र आगन्तुक को
न करेगी उसका आलिंगन,
न होगा उसका दहन!
तब भूल यह तुम न करना,
उसे मानने की पावन,
क्योंकि अग्नि तो है निर्मल
अपनाएगी केवल निश्छल
पर तिरस्कार वह कर देगी,
जिसमें पायेगी तनिक भी छल,
जिसमें न होगा सत्य का बल!
और हो जायेगा वह असफल!!

धूप का दुपट्टा 

धूप हौले-हौले उतार रही है
अपना पीला दुपट्टा
और दिखने लगे हैं
उसके श्यामल केश
संध्या के रूप में!
हवा से हिलते पत्ते
मानो आसमां की बालियाँ!
कुछ ही देर में
श्यामल केश खुल जायेंगे पूरे
और लेंगे रूप निशा का!
पूरी रात अपने
लम्बे काले केश फैलाये
निशा देगी
थपकियाँ धरती को…
फिर सुबह इक दस्तक से
सूरज की
टूटेगी निद्रा धरती की!!

चुनाव प्रचार

नरभक्षियों की
सबसे ख़तरनाक जमात
सक्रिय है इन दिनों…!
सबसे नरमदिल
को चुनना है
अपना शिकार करवाने
के लिए!
उसे, जो धीरे-धीरे
हलाल करे हमें
बिना दर्द का
अहसास कराए….
तो ध्यान रखें
हर पंजे का…
हर खुर का
पंजा दिखे, न दिखे
है सबके पास…
किसी का प्रत्यक्ष
किसी का अप्रत्यक्ष …!!

गिरमिटिया

सृष्टि के प्रारंभ से
आज तक
एक प्रजाति
है गिरमिटिया…!
समाज के सब
कायदे-कानून
रस्में रवायतें
हैं दमनकारी
उसके प्रति…!
बिना किसी सदस्यता प्रपत्र,
बनी हुई है वह गिरमिट
एक अनंत अवधि के लिए …
स्वामी समुदाय पुरुष का है
गिरमिटिया नारी जाति का..
लिखा पुरुष ने गिरमिट में
अपनी सशक्त भुजाओं से
दलन सहस्र विधाओं से,
फिर ली गई छाप अस्तित्व की
अँगूठे का काम न था…।
लिखवा लीं उसकी
मुस्कानें, सब उमंग और
सब की सब
वैचारिक उड़ानें…
पर
सीख गई अब गिरमिटिया
पढ़ना वह सारे अक्षर
जो लिखे हुए हैं
आँखों में,
लिखे दंभी मुस्कानों में,
लिखे सशक्त भुजाओं में…
अब बैठी है तैयार वह
फाड़ डालने को गिरमिट
लेने को अपनी अमानतें
अपनी छिनी हुई मुस्कानें,
कुचला हुआ आत्म सम्मान,
रौंदा हुआ आत्म विश्वास…
नहीं रहेगी गिरमिटिया..!
अब नहीं रहेगी गिरमिटिया…!!

मर्द बनो 

आओ दरिन्दों
मुझे लूटो, खसोटो, नोचो!
ग़ौर से देखो
एक नारी हूँ मैं
ब्रहा द्वारा तैयार
तुम्हारे ऐशो आराम का सामान,
तुम्हारी ऐय्याशी का सामान,
तुम्हारी पाश्विक, घिनौनी और नरपैशाचिक
ज़रूरतों को पूरा करने का सामान!
चिथड़े-चिथड़े कर दो
वो झूठी अस्मिता
जो बचपन से मैं
साथ लेकर जी रही थी!
दिल दहला देने वाली मर्दानगी दिखा दो
सारी दुनिया को!
अरे, मर्द हो!
कोई मज़ाक है क्या?
ऐसी दुर्गति कर दो
मेरी आत्मा और शरीर की,
कि पूरी औरत जमात
सात पीढ़ियों तक काँपे,
औरत होने के लिये!!
डरो मत!!
अधिक कुछ नहीं होगा!
तुम्हारी तलाश, और कुछ
सजा के बाद सब ठीक हो जायेगा तुम्हारा,
धीरे-धीरे!
मैं शायद न बचूँ
अपने जऩ्मदाताओं की
जीवन पर्यन्त यातना देखने,
और मुझ पर चल रही
टी वी चैनलों की प्राईम टाईम बहस देखने
और वे तमाम धरने और प्रदर्शन देखने,
जो इस तुम्हारे क्षणिक सुख से उपजे!!
पर वो सब बाद की बातें हैं!
शायद इतनी आबादी में
सब भूल भी जायें!
पर तुम तो अपना कर्म करो,
जिसके लिये तुम्हे
देवतुल्य पुरुष जीवन मिला है!!
मर्द बनो!! निडर होकर!!!

मीरा

राधा बनने के स्वप्न दिखाए
मीरा भी न रहने दिया
मेरे प्रेम-प्रगाढ़ का तुमने
प्रियतम कैसा फल ये दिया!
तुम तो कृष्ण थे, कृष्ण रहे
लीलाओं में मग्न रहे
किन्तु उन घावों का क्या
जो तुम्हें पाने को मैने सहे?
पूरा जीवन कर डाला
भस्म प्रेम की ज्वाला में
निः संकोच हो किया पान
छब देख तुम्हारी हाला में
तुम कठोर तब भी न पिघले
निष्ठुर थे, निष्ठुर ही रहे!
किन्तु उन घावों का क्या
जो तुम्हें पाने को मैने सहे?
देते थे उपदेश जगत को
न करना फल की अभिलाषा
मैं मूढमति तब समझ न पाई
गूढ़ तुम्हारी यह भाषा
प्रेम-तपस्या विफल हुई
जल-प्रपात नयनों से बहे!
बोलो उन घावों का क्या
जो तुम्हें पाने को मैने सहे?
यह जन्म गँवा चुकी तो क्या
सौ जन्म पुनः फिर ले लूँगी
प्रेम-मुरलिया अधर लगाकर
वृन्दावन में खेलूंगी!
तभी भरेंगे घाव सभी
जो तुम्हें पाने को मैने सहे
और कह पाऊँगी गर्व से फिर
तुम मेरे थे, मेरे ही रहे!!

अहसासों की यात्रा

अहसासों को तुम तक
पोटली में बाँधकर
लाने के जतन में
कई शब्द जो भारी थे,
कहीं पथ में ही गिर गये

और तुम तक पहुँचे
केवल हल्के शब्द
जताने हल्के अहसास …
और तुम रह गये वंचित
मेरी सम्पूर्ण सम्प्रेषणा से,
सम्पूर्ण भावनाओं से…
और जाना केवल आधा हृदय।
प्रतिकृत भी किया
असम्पूर्ण तुमने,
ठीक उसी अनुपात में
जिसमें गिरे थे शब्द
और जिसमें पहुँचे तुम तक…

पुरुष

वाह पुरुष, क्या जीव है तू
स्वप्न में बजते मृदंग!
झूमता ऐसे नशे में
ज्यों लहू में बहती भंग!

अनगिनत हैं रूप तेरे,
अनगिनत तेरे हैं रंग
तू किसी को देव है, तो
है किसी को तू भुजंग!

हृष्ट-पुष्ट है देह, तो क्या?
मानसिकता पर अपंग!
संशय की भीतर ही भीतर
खुद रही गहरी सुरंग!

अट्टहास है लब्धियों पर
अपनी करता ज्यों मलंग
पीड़ की सरिता में डूबी,
जो बंधी है तेरे संग!

काटना चाहे उसे तू
उड़ना चाहे जो पतंग
बावरे क्या कर रहा तू
ऐसे मरती क्या उमंग?

आ धरा पर सहजता की
कर दे अपना मोहभंग
वो है वामांगी तेरी,
शत्रु नहीं, फिर क्यों ये जंग ?

खोल कर तो देख द्वारे
उर के, रह जायेगा दंग
प्रेम और विश्वास कर
मन की गलियाँ रख न तंग !!

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