रमेश प्रजापति की रचनाएँ

नंगी पीठ पर

पहाड़ की नंगी पीठ पर
बिखर जाते हैं टकराकर
धरती पर मौसम
तालाब की नंगी पीठ पर
मौज़-मस्ती करते हैं जलपाखी
सड़क की लपलपाती नंगी पीठ पर
मिल जाते हैं बिखरे
प्रतिदिन लहू के ताज़ा धब्बे
नंगी पीठ वाला चरवाहा
बैठकर पहाड़ की चोटी पर
बादलों को भरकर खुरखुरी मुट्ठी में
निचोड़ देता है अँगोछे-सा
अपने निर्जन में
सिर पर चढ़कर
बैठ जाता है तमतमाता सूरज
निकल जाती है रास्ता बदलकर
चुपके से हवा
सिमट जाती है परछाईं
मज़दूर ढोते हुए अपनी नंगी पीठ पर
घर की ज़रूरतों का बोझ
बीड़ी के धुएँ से उड़ देता है थकान
धरती की कोख में
दबाते हुए उम्मीद के बीज
किसान की नंगी पीठ पर
पसीने की बूँदों में मुस्कुराता है सूरज
पीपल की छाँव में बैठे
फड़फड़ाते फेफड़ों में भरते
आॅक्सीजन वाले
मरियल बूढ़े की नंगी पीठ पर
वक्त के कुशल चित्रकार ने
टाँक दिए हैं अनुभवों के रेखाचित्र
चाँद
ढोता है रात को
अपनी नंगी पीठ पर
आज भी हरदम
तैयार रहती है नंगी पीठ
ढोने को
दुनियादारी का कोई भी बोझ।

बड़े-बूढ़े

उपेक्षित, लाचार
अपने ही भीतर की खाई में
दम घोटते
अपनी छोटी-छोटी इच्छाओं का
समय को काटते ताश के पत्तों से
पार्क में बख़ानते
एक-दूसरे से अपना दुःख
बर्राते हुए देखते रहते हैं
रिश्तों का
काँच की तरह टूटकर बिखरना
घूम आते हैं हुक्का गुड़गुड़ाते
बीते दिनों की राग-रंग से भरी गलियों में

हमारे बुज़ुर्ग
घर में होते हुए भी
घर के नहीं होते
बाँटते हुए स्मृतियों की रस्सी
जकड़े रहते हैं विवशता की बेड़ी में,
लटके रहते है उनके सपने
थरथराते उजाड़ घोंसलों में
वक़्त के ठँूठ पेड़ की टहनियों पर,
अब नहीं गुदगुदाती उनको
पुराने मित्र की कोई चिट्ठी
हमारे बड़े-बुढ़े
बाज़ार के चमचमाते नये बर्तनों में
पड़े रहते हैं घर के किसी कोने में
ख़ाली कटोरे की तरह
अपने अनुभवों, और
समय की धूल में लिपटे
उपभोक्तावाद के इस कठिन दौर में
होने-न-होने के बीच
जीवन के शून्य भँवर में फँसे
अनछुए, अभिशप्त
सुबह काम पर निकला
घर का कोई भी सदस्य
यदि लौटता नहीं ठीक समय
तो इनकी डबडबाती घुच्ची आँखों में
तैरती रहती है
किसी अनिष्ट की चिंता

ज़रा-सी आहट से ही
सबसे पहले पहुँचते हैं दरवाज़े पर
इनके कान, इनकी आँख
उनकी उत्सुकता, और
हृदय का तेज़ स्पन्दन
अपने दुखों में डूबते, उतराते
हमारे बुज़ुर्ग फिर भी
चिंतित रहते हैं प्रतिदिन

पिता की छतरी

पिता के सफ़र में
जरूरी हिस्सा थी छतरी
दुःख-सुख की साथी
सावन की बूँदाबाँदी में
जीवन की अन्तिम यात्रा में
मरघट तक विदा करके पिता को
एक तरफ कोने में बैठी
स्ुाबकती रही मेरे साथ
रस्म-पगड़ी के बाद
मेरे साथ आई शहर तक
पिता का हाथ थामे चुपचाप
रास्ते भर सींचकर
मस्तिष्क की भुरभुरी मिट्टी
अंकुरित करती रही स्मृतियों के
अनगिनत बीज
भादों की तेज बारिश में
छोटे बच्चे-सा दुबका लेती है गोद में
फिर भी पसीज जाता है मन
छत पर अतरती सीलन-सा
तपती धूप में
बैठकर मेरे कँधे पर
चिढ़ाती है अंगूठा दिखाकर
तमतमाते सूरज का मुँह
जब होता हूँ आहत
दुनियादारी के दुःखों से
अनेक पैबन्द लगी पिता की छतरी
रखती है मेरे सिर पर
आशीर्वाद भरे हाथ

करवट बदलते समय में
मौसम पहनाता है जिस तरह
पतझड़ के बाद नई पोशाक
मैंने ओढ़ाई छतरी को
आधुनिकता की चमचमाती चादर
छतरी की जड़
मजबूती से पकड़े हुए है मेरे अंदर
पिता के आदर्शों की मिट्टी
पेड़ की जड़-सी
अब इसकी शाखाओं पर
फूट रही है नई कोंपलें।

पिता के बाद

कुछ दिन
छत पर उतरे परिनदे
गिलहारी की उदास पनियाली आँखें
डबडबाती रही घर के सूनेपन में
पेड़ से टपके गूलर
सूखते रहे आँगन में
माँ की सूनी कलाइयों में
खनकता रहा चूड़ियों का खालीपन
पिता के बाद
छोटी बेटी की वीरान आँखें ढूँढती रही
कँधों का झूला
चाक से उतरकर आँगन में चहकती रही
खिलौनों की खिलखिलाहट
खाट के पास खड़ा हुक्का
त्रसता
पिता के बाद
मुँडेर पर बैठी गौरैयाँ
पुकारती रही पिता को
आँगन में टहलती रही
पिता की चिंतामग्न चहलकदमी
पृथ्वी-सा टिका चाक
अपनी घुरी पर
एकटक निहारता रहा मुँह लटकाए
ध्रुव तारे को
चितकबरी गाय
अपने नथूनों से स्ूँाघती रही सानी में
पिता की उँगलियों का स्पर्श
पिता के बाद
लचीला हो गया घर का कायदा-कानून
कपूर-से उड़े मेरे बेवक्त
घर लौटने के डर के बावजूद
दौड़ता है मेरी रगों में
पिता के उसूलों का रक्त
जो बचाए रखता है आज भी
मेरे अंदर पिता का होना।

पहली ऋतु का फूल

धरती की पहली ऋतु का
पहला फूल है सूरज
उमंग से खिलता
उम्मीद के रंगों से झिलमिलाता
अँधेरे के मुँह पर चपत लगाता
निस्तब्धता तोड़ता
चिड़ियों के गान पर मुस्कुराता
और किसान की चिकनी पीठ पर चमचमाता
चमगादड़ की आँखों में
अँधेरा भरकर
उतर आता है जीवन के बीहड़ में
उदासी को गुदगुदाता
सूरज के आगमन से
बदल जाता है ऋतुओं का मिज़ाज
निखर जाता है-
अवसाद की राख में लिपटा
रात का चेहरा
झिलमिलाने लगता है
डर से भरा जंगल
सूरज की सतरंगी उँगलियों से
चैकड़ी भरने लगते हैं हिरण शावक
पूरे आवेग से बहती शांत नदी में
अर्पित कर रहे हैं हम, सूरज को
अपने प्रियजनों के फूल
और जीवन के वे क्षण
जिनकी स्मृतियाँ
बरसों तक कौंधती रहंेगी हमारे अंतस् में
पूरब के किवाड़ पर
दस्तक के साथ ही
बेताब हो जाती है पूरी दुनिया
खुलने को हमारी तरफ़
अभी अँधेरा है बहुत
मेरी बेटी छुपाकर सूरज को
किताब के पन्नों के बीच
पूरी तन्मयता और
बहुत तेज़ कदमों से
माँ का हाथ पकड़े
जा रही है स्कूल बस ही ओर।

मेरे शब्द

पक रहे हैं मेरे शब्द-
झरबेरी में
बाजरे की जड़ों में
धान की बालियों में
चूल्हे की कोख में
बच्चे की आँखों में
चहक रहे हैं मेरे शब्द-
कास की झाड़ियों में
बाँसों के झुरमुट में
आँगन के पेड़ पर
गाँव की गलियों में
और लड़कियों की चुहलों में
पूस की रात में
ठिठुरती झोंपड़ी में
घर की चिंता में डूबे
गुड़गुड़ाते हैं हुक्का
और लोहार के हथौड़े से
ढल रहे हैं औज़ारों में
भविष्य को करने सुरक्षित
समय की चाक पर
कुम्हार के हाथों शब्द
बदल रहे हैं दीयों में
लड़ने के लिए अँधेरे के खि़लाफ़
गुनगुना रहे हैं-
दूध बिलोती माँ की हाँड़ी में
मेरे शब्द
एक दिन उड़ जाएँगे मुक्त गगन में
अहसास के पंछी बनकर
तिरती रहेगी हवा में
उनकी सुगबुगाहट।

तुम्हारे बिन

तुम्हारे बिन
सूरज को सूरज की तरह और
चाँद को चाँद की तरह नहीं देख पाता
अँधेरी गुफा-सी रात
घनी अँधेरी हो गई है
क्षितिज के उस पार
पहाड़ से लुढ़की
लाल गेंद को
अथक, बच्चे-सा समय
रोज़ उठाकर फेंक देता है
समुद्र के पश्चिमी छोर पर
जिसे उठा लाती हो तुम
मुँह-अँधेरे पनघट से
भरे घड़े-सा, और
उड़ेल देती जीवन के कृष्णपक्ष में
सफेद फूल-सा
उलझकर रात के जूड़े में
छटपटाता रहता है चाँद
टूटती रहती हैं उसकी पंखु़िड़याँ
घुलता जाता हैं
आकाशगंगाओं के अंतस् में उदासी का जल
गीली हो रही हैं पत्तियों की नोक
और घीरे-धीरे ….
साँझ पर गिर रहा है अँधेरा
तुम्हारे बिन
सबके होंठों पर बिखर रहा हूँ शब्दों की तरह
अर्थ
वसंती हवाओं के साथ फूलों के देश में,
उड़ रहे हैं तितलियों संग

समय के पेड़ से
उदासी के पतझड़ में बिखर गए
यादों के हरे पत्ते,
जिन पर सूरज की किरणों ने
लिखे थे खुशियों के गीत
घृणा भरे इस समय की आस्तीन में छिपे
साँपों के बीच
और कीचड़ में धँसे इस शहर में
जायज नहीं है प्रेम की कल्पना भी
तुम्हारे बिन
अब वे दरख़्त भी हो गए हैं ठूँठ
जिन्हें सींचा था रिश्तों के लहू से
तुम्हारे बिन
बहुत सूने और कठोर हो गये हैं
नदी के किनारे।

अरी लकड़ी

अरी लकड़ी!
बनकर सहारा दिखाना सही रास्ता
भटके अंधे बूढ़े को
बीहड़ लोगों के जंगल में,
मूसल बनकर धान कूटना
उछल-उछलकर माँ के हाथों में
बनकर टेक लगे रहना
भोली के छप्पर में
मत बनकर आना लट्ठ
मुच्छड़ पहलवान के हाथों में
अरी लकड़ी!
कुम्हार का थापा बनकर
मुझे ढालना ऐसे साँचे में
जो झेल सकूँ वक़्त के थपेड़ों की मार
मेहड़ा बनकर मत फिरना
मेरे मीठे सपनों की फ़सलों पर
अरी लकड़ी!
काठी बनना,
घोड़ा बनना,
लट्टू बनना,
बच्चों के खेलों की बनना कठपुतली
बनकर नाव पार उतारना हमें
दुनिया के उफनते समुद्र से
अरी लकड़ी!
मत बनना बिगड़ैल हाथी
मत बनना
ज़्ाालिम राजा की कुर्सी।

हताशा की नदी

फागुन की टहनियों पर
खिलखिलाते असंख्य सूरज-से
झर रहे हैं धरती के आँचल में
सेमल के फूल,
पीपल के कोमल पत्तों पर
बिखर गई ताँबई हँसी
गेहूँ की बालियों में दबे पाँव
उड़ेल गया कोई
धूप का सुनहरापन
बूढ़ी-सी उदास रातें
हाँफ रही हैं बैठी गाँव के सिवान पर
मज़दूरों के हाथों में हँसने लगे हँसिए
लौट आए प्रवासी परिंदों-से
सिलहारियों के वैभवशाली दिन
चाँद-सा दमक उठा
खलिहान का मुँह,
मोती-से चमक उठे
किसानों के श्रमकण,
साहूकार ने उठा लिए बही-खाते
आधे पेट कटेंगी रातें
हताशा की नदी में
हताहत सोन पंछी के पंख-से
बिखर जाएँगे हरिया के सपने।

उदासी के फूल 

ढलते ही साँझ
घुल जाता है झील की नीली आँख में
उदासी का काला जल
ख़ाली हाथ मेले से लौटता बच्चा
रास्तेभर भरता है चुपचाप,
नन्हे हाथों से जेबों की उदासी में
खिलौने और आकाश का सूनापन
माँ की उदास आँखों में
आज भी टहलते रहते हैं पिता
कंधे पर अंगोछा डाले,
बीड़ी फूँकते और मुझे डाँटते-फटकारते
मेरी उदासी में तैरती हैं-
कालाहाँडी की प्यास,
गुजरात की ख़ौफ़नाक चीख़ें
बाज़ के आतंक से
चिड़ियों के मधुर वार्तालाप का टूटना
सिंगुर की माटी से उठी से’ज की दुर्गंध
क़र्ज़ में डूबे किसान परिवारों की आत्महत्याएँ
जो भुनायी जाती हैं अनेक ढंग से
अलग-अलग जुबानों की भट्टी पर
टूटता है जब
मन की अतल गहराई में
बहुत कुछ एक साथ,
तब झरते हैं मेरे निर्जन में उदासी के फूल।

शेष है अभी

छिटककर बालियों से
कट चुके खेत की मिट्टी में
गुनगुनाते दाने
चमक रहे हैं मोती-से
शेष है अभी
नदी के कंठ में आर्द्रता
वायु में शीतलता
मौसम में उदारता
सच्चाई में द`ढ़ता
लुंज-पुंज शरीर में उत्कंठा
धरती की कोख में
उम्मीद की हरियाली
जीवन में रंगत
और शब्दों में कविता
उसने अंधे बूढे़ को सड़क पार कराई
उसने रामदीन की छान चढ़वाई
उसने अपनी ख़ुशी ज़रूरतमंदों में बँटवाई
उसने धरती पर बचाए रंग
उसने सच को सच कहा
इस विकट समय में
यही क्या कम है कि
अभी समूल नष्ट नहीं हुई
हमारी सभ्यता
मानवता की सुगंध से
गमक रही है आज भी यह धरती।

सीलमपुर की झुग्गियाँ

दिल्ली की छाती पर खरपतवार-सी उगीं
जीवन के बीहड़ में
ढूँढ़ ही लेती हैं पंरिदों की तरह
अपने हिस्से का दाना-पानी सीलमपुर की झुग्गियाँ

सीलमपुर की डेढ़ गज ज़मीन पर
भिनभिनाते गंदे नाले के किनारे बसी
‘अनेकता में एकता’ से भरी इन झुग्गियों में
जाति-धर्म के खौफ़नाक टोने-टोटकों से परे
खुलती है पूरी दुनिया

कुलाँचे भरता है भाईचारे का खरगोश
इनकी दमघोटू तंग गलियों में
ज़ुबान पर तैरती है अपनेपन की मिठास
यहाँ एक का दुख है दूसरे का
और भूले-भटके आए सुख में सब की हिस्सेदारी
एक झुग्गी में टूटी प्याली की खनक से
हिल उठती है आख़िरी झुग्गी तक

सुबह का सूरज छीलकर शाम की उदासी
मुस्कराता है इनके मटियाले चेहरों पर
कबाड़ी की मज़दूरी करते
तलाशती हैं झुग्गियों की कामगार लड़कियाँ
अपने हिस्से के रंग और
इस मेट्रो शहर के हाथ से छिटकी खुशियाँ
बिगड़े सांड़ जैसे वक़्त की बेरहम उदासी ने
छीन लिए उमंग के सारे रंग
कन्नी काटकर निकल जाते हैं मीठे सपने
आरामतलब रातों की तरफ़

यमुना के पानी की टिमटिमाती रोशनी में
सीझती रहती हैं इनकी रातें
कभी-कभी इतनी ज़िद्दी हो जाती हैं
सीलमपुर की लड़कियाँ
कि शुष्क दिनों में भी
पतझड़ के चंगुल से छीनकर मुट्ठी-भर बसंत
उड़ा देती हैं उमंगों की तितलियों के पंखों पर
इनके मन की थाह
बमुश्किल ही खोज पाए
यहाँ टूटती हैं भ्रम की सारी गाँठें
यहां धँसक जाती है बीड़ी-गुटके की दलदल में
दुखों-भरी हाँपती-खाँसती रातें

बासी रोटी-सा टूट जाता है
इनकी खुरदरी हथेली पर रखा दिन
कड़वे अनुभवों से भरे मटमैले धब्बों का इतिहास
पढ़ा जा सकता है मकड़ी के जाले से बुने
इनके झुर्रीदारे चेहरों पर
इनकी फटी जेबों में नहीं गिरता बाज़ार का जादू

आश्वासनों के कल्पवृक्ष पर लटका
कभी नहीं लुढ़कता इनकी खपरैलों पर
राष्ट्रीय योजनाओं का मीठा-द्रव्य
इनकी झोली में झरने से पहले ही
सुख के सितारे चिपक जाते हैं अचानक टूटकर
तेज़ दौड़ती सड़क की छाती पर
जेठ की लू-भरी दुपहर में
जब सूरज होता है अपने पूरे शबाब पर
तब अमलतास के फूलों-सी खिलखिलाती
सूखी टहनियों के पीछे
छुपा होता है इनकी घुच्ची आँखों में टूटने का डर

फुसफुसाते ही सफ़ेद गलियारों के
इनकी लपटों से जलने लगती हैं आसमान की भौंहें
जब कोई सरकारी मुलाजिम
लादकर योजनाओं से भरा झोला
गुज़रता है इनकी बदबूदार गलियों से
बड़ी तेज़ी से खड़कते हैं इनके कान

ज़रा-से ताप में ही
पिघलने लगता है मोमबत्ती-सा
इनकी आत्मा में बैठा डर
और हल्के-से हवा के झोंके में ही
काँप उठता सारंगी-सा इनका मन
अचानक बुरे दिनों का बाज़
नोंच डालता है झपट्टा मारकर
कबूतर की चोंच में झूलते तिनके-सी
इनके अच्छे दिनों की चिट्ठी

विश्वग्राम की परछाईं से दूर
कवि की स्मृतियों में
कौंध उठता है काँस के जंगल-सा
धरती के दूसरे छोर पर बसा
गाँव का भोलापन
आकाशगंगाओं में नहाती इस ग़ालिब की दिल्ली में
हरदम चमगादड़-सी चिपकी इनके जहन में
झुग्गियों के टूटने के बरक्स
कोई मायने नहीं रखती पेट की चिंता

जब देश के कोचवान से
छूटने लगती है सत्ता के घोड़े की लगाम
तब अपने हाथों की माँसपेशियाँ
मज़बूत करने की याद आती हैं उसे
महानगरों के चमचमाते गालों पर
मुँहासे के धब्बे-सी फैलीं
सीलमपुर जैसी ये झुग्गियाँ

सच कहूँ दोस्त ! तुम्हें नहीं लगता कि
जितना आगे बढ़ रहे हैं हम
उतने ही पीछे छूटते जा रहे हैं हमारे रिश्ते
घुन लगी काठ हो गई हमारी
जब रिश्ते तुलने लगे हों बाज़ार के तराजू पर
ऐसे में हर संवेदनाहीन महानगर की छाती पर
उगनी ही चाहिए सीलमपुर जैसी ये झुग्गियाँ
जिनमें बसता है हमारे सपनों का भारत

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