रवि सिन्हा की रचनाएँ

अब उस फ़लक पे चान्द सजाता है कोई और

अब उस फ़लक[1] पे चान्द सजाता है कोई और
उनके शहर के नाज़ उठाता है कोई और

रुख़्सत हुए कहीं से बुलाता है कोई और
गो आगही[2] के छोर से आता है कोई और

हमने सहर[3] से बस उफ़क़[4] को सुर्ख़-लब किया
शोला ये तुन्द[5] सर पे चढ़ाता है कोई और

इस रिज़्क़[6] से रिहा तो हुए मुद्दतों के बाद
पतझड़ में फूल आज खिलाता है कोई और

इक भीड़ सी मची है मिरे क़स्रे-हाफ़िज़ा[7]
आवाज़ दूँ किसी को तो आता है कोई और

क़ाबू में है शुऊर[8] तो तहतुश-शुऊर[9] से
वहशत[10] की फ़स्ल अब वो उगाता है कोई और

रहबर वो जब थे राह थी सीधी सी इक लकीर
तारीख़ को अब राह दिखाता है कोई और

है ज़ेरे-पा[11] ये ख़ल्क़[12] तो तसख़ीर[13] के लिए
आलम[14] ख़ला[15] में अब वो बनाता है कोई और

वो रौशनी के बुर्ज हुए ग़र्क़े-बह्रे-ख़ल्क़[16]
साहिल[17] पे इक मशाल जलाता है कोई और

अब तबस्सुम भी कहाँ हुस्न का इज़हार लगे

अब तबस्सुम[1] भी कहाँ हुस्न का इज़हार[2] लगे
शाहिद[3]-ए-गुल कह दे बाग़ ये बाज़ार लगे

ग़र्क़े[4]-दरिया थे तहे-आब[5] सफ़र होना था
जो उधर ज़ीस्त[6] में डूबे तो इधर पार लगे

हाँ तग़ाफ़ुल[7] तो है उम्मीद मगर बाक़ी है
अपना होना भी न होना भी याँ दुश्वार लगे

रश्के[8]-फ़िरदौस[9] मुअ’ल्लक़[10] है तसव्वुर में जहान
जो उतर आए तो फिर रोज़ का संसार लगे

लड़खड़ाती सी चले है ये सरे-राहे-जदीद[11]
क़ौम ये अपनी क़दामत[12] से ही सरशार[13] लगे

ये ज़मीं ज़हर पिलाती है यहाँ पौधों को
और हैरत है तुम्हें बाग़ ये बीमार लगे

क़त्ल मासूम हुए तख़्त-नशीं है क़ातिल
मुझको ये मुल्क समूचा ही गुनहगार लगे

गो ज़लाज़िल[14] को गिराने थे मकानात सभी
क़स्र[15] जो एक खड़ा है वही मिस्मार[16] लगे

फ़िक्र का रंग तग़ज़्ज़ुल[17] में मिलाया जाये
अर्ज़े-उल्फ़त[18] भी उन्हें जग से सरोकार लगे

अब लकीरों की तसव्वुर से ठना करती है 

अब लकीरों की तसव्वुर[1] से ठना करती है ।
अब बमुश्किल तिरी तस्वीर बना करती है ।

साँस लौटी है थके जिस्म की ख़बरें लेकर
काँपती लौ भी अँधेरे की सना[2] करती है ।

रौशनी बन के तिरी याद तो आती है मगर
हाफ़िज़े[3] में मिरे कोहरे से छना करती है ।

पेड़ बूढ़े थे तो दमभर न रुकी थी आँधी
सब्ज़ मौसम से उलझने को मना करती है ।

रूह रूपोश[4] हुई दैर[5] से कुछ शह पाकर
अब इबादत के सभी काम अना[6] करती है ।

शब्दार्थ
  1. ऊपर जायें कल्पना (imagination)
  2. ऊपर जायें प्रशंसा (praise)
  3. ऊपर जायें स्मरण-शक्ति (memory, capacity to remember)
  4. ऊपर जायें अदृश्य, फ़रार (hidden, absconding)
  5. ऊपर जायें पूजागृह (temple, place of worship)
  6. ऊपर जायें स्व, ख़ुदी (self, ego)

आइने पे इताब कौन करे / रवि सिन्हा

आइने पे इताब[1] कौन करे
इस अना[2] को शराब कौन करे

कब तग़ाफ़ुल[3] तो कब नवाज़िश[4] थी
ज़िन्दगी से हिसाब कौन करे

ख़्वाब तक खींच ला हक़ीक़त को
नींद अपनी ख़राब कौन करे

आइना है तो सच दिखाएगा
उनकी जानिब[5] जनाब कौन करे

ख़्वाहिशे-क़ौसे-क़ुज़ह[6] सूरज को
ये समन्दर हबाब[7] कौन करे

धूल तारों की थी कभी दुनिया
अब यहाँ पा-तुराब[8] कौन करे

हाले-दिल क्यूँ बयाँ हो आँखों से
एक आतिश को आब कौन करे

दीदवर[9] भी तो एक पैदा हो
ख़ुश्क सहरा[10] सराब[11] कौन करे

सफ़र कट जाए बस जिसे पढ़ते
ख़ुद को ऐसी किताब कौन करे

शब्दार्थ
  1. ग़ुस्सा (anger)
  2.  अहं (self)
  3. कृपा (kindness)
  4.  तरफ़ (towards)
  5.  इन्द्रधनुष की ख़्वाहिश (desire for rainbow)
  6. बुलबुला (water bubble)
  7. मिट्टी सने पैर (soiled feet)
  8. पारखी, देखने वाला (connoisseur, observer)
  9.  सूखा रेगिस्तान (dry desert)
  10.  मृगमरीचिका (mirage)

आज़माया है समन्दर ने यहाँ आने तक

आज़माया है समन्दर ने यहाँ आने तक ।
ज़िन्दगी तैर के पहुँचा हूँ इस ठिकाने तक ।

एक क़तरा है कि दरिया में फ़ना[1] हो जाए
एक क़तरा जो बहे बहर[2] तक ज़माने तक ।

इक फ़साने को हक़ीक़त में बदल देना था
इक हक़ीक़त का असर है मगर फ़साने तक ।

बेपरोबाल[3] नहीं थे मगर कशिश कि जुनून
रह गए हो के हदफ़[4] तीर के चल जाने तक ।

पूछते क्या हो मुझे पीरो-मुफ़क्किर[5] तो हूँ
गो मुग़न्नी[6] भी तिरे दिल के बहल जाने तक ।

 

आज हर क़तरे को अपने आप में दरिया किया / रवि सिन्हा

आज हर क़तरे को अपने आप में दरिया किया
आपको इतनी तरह सोचा कि इक मजमा किया

गो क़रीने से सजीं थीं घर में यादें आपकी
साफ़ कुछ शीशे किए कुछ ख़ुद को भी उम्दा किया

इस ख़ला-ए-सर्द में जीने को सूरज का अलाव
और जल मरने को आतिश दिल में लो पैदा किया

एक मुस्तक़्बिल[1] था अपने पास इक माज़ी[2] भी था
छिन गए दोनों तो बस इमरोज़[3] को दुनिया किया

बारहा ख़ुद की बुनावट दी अनासिर[4] तक उधेड़
औ’ बुना वापिस तो कोई अजनबी उभरा किया

ख़ल्क़[5] में ख़ल्वतनशीनी[6] और बातिन[7] में हुजूम
ऐ ग़मे-दिल देख ख़ुद का हाल ये कैसा किया

डूबते सूरज से रौशन है नगर का ये हिसार[8]
सोचकर कुछ हमने रुख़ अब जानिबे-साया किया

ये सहर ज़ुल्मत[9] की बेटी है इसे ये तो न पूछ
क्या मिला विरसे में उसपर नाज़ भी कितना किया

क्या हुआ जो क़ैद हैं अदने से सैयारे[10] पे हम
नाप ली ज़र्फ़े-निहानी[11] आसमाँ को वा[12] किया

आप का आधा-सा कुछ वादा रहा

आप का आधा-सा कुछ वादा रहा
और मैं कुछ मुतमइन[1] ज़्यादा रहा

बज़्म में हर एक पे तेरी नज़र
और मैं बस तुझ पे आमादा रहा

अंजुमन[2] में तो हुआ था एहतिराम[3]
उम्र भर वो शख़्स उफ़्तादा[4] रहा

दामने-तहज़ीब पे धब्बे हैं यूँ
बारहा मैं महफ़िले-आदा[5] रहा

एक तू था और इक तेरा वज़ीर
मैं तुम्हारे खेल में प्यादा रहा

आप के आने के चर्चे शहर में
और मैं रस्ते में इस्तादा[6] रहा

रूह की चालाकियों के फ़लसफ़े
जिस्म का रद्दे-अमल[7] सादा रहा

 

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