रवीन्द्र स्वप्निल प्रजापति की रचनाएँ

मेरे आसमान में

कौन देखता है जागकर दुनिया
देखकर कौन रोता है

मेरे आसमां में कौन रहता है
मेरे आसमाँ में कौन रोता है

धरती की चादर गीली होती है
ये किसके आँसू बरसते हैं

कौन आँसुओं में भीगता है
किसकी आँखों में झिलमिलाती है रात

रात को कौन देखता है दुनिया
देखकर कौन रोता है

आज भी प्यार

प्यार है आज भी प्यार सा
किनारे आज भी किनारे हैं
वक़्त कुछ नहीं बदलता
समुंदर भी कुछ नहीं बदलता

गाँव है आज भी गाँव सा
इंसान आज भी इंसान है
शहर कुछ नहीं बदलता
ज़माना भी कुछ नहीं बदलता

दर्द आज भी दर्द सा है
दवा आज भी दवा है
वक़्त कुछ नहीं बालता
वक़्त कुछ भी नहीं बदलता

राह आज भी राह है
सफ़र आज भी सफ़र है

मैं इक तारा जलता हूँ

प्यार भरी आवाज़ों का
मैं इक घूँघरू आवारा
अपनी आग से जगमग
मैं जलता तारा आवारा

स्वर नहीं मिलते मेरे
मैं एक अकेला आवारा
पलकों पर जीवन अपना
मैं लेकर चलता आवारा

बीत गया जो जीवन
मैं दुख सहता आवारा
सुरत-निहारी करते करते
मैं आँख मलता आवारा

क्या कहें हम

हमें छोड़ दिया अकेला
दुनिया रंगीन है मेला

आँख फ़ाड़ कर देख चला मन अलबेला
तलाश रहा है मनोरम बेला
हार-हार कर जीत लिया
हमने जीवन मेला

मुस्कुरा रहे हैं पेड़ पत्थरों को देखकर
दुनिया ने हमें अकेला छोड़ दिया तो क्या

जो चले गए छोड़कर कारों में बैठकर
वो भी थे ज़रूरत / ज़िन्दगी के हमसफ़र

देर तक सोना चाहता हूँ

पापा मत कहो कि सुबह हो गई है
मुझे देर तक सोना है
खिड़कियाँ खोल दो और चले जाओ
मुझे स्कूल की याद मत दिलाओ

हवा आएगी और मेरे कान पकडे़गी
किरणें बिस्तर में आकर गुदगुदाएंगी
मैं जाग जाऊंगा
माँ मुझे दुबका रहने दो

स्कूल की बेल बजे तो खिड़की मे क़िताब रख देना
हवा पढ़ लेगी और मैं सुन लूंगा अपना पाठ
मुझे कोई भी जल्दी मत जगाना
आज मैं देर तक सोना चाहता हूँ

लड़का जाग रहा है

धीरे-धीरे लड़का जाग रहा है
धीरे-धीरे लड़का देख रहा है
लड़का सूरज जैसा है
लाल-लाल हँसते अंगारों जैसा

तिरछी आँखों से देख रहा है
कड़वा मुँह लेकर दाँतों में ओठ दबाए है
लड़का जाग रहा है
अकेला-अकेला घूम रहा है
इस शहर की एक गली मे है
गुस्से से भरा हुआ
अपने ही हाथों की नीली नसों मे सिमट रहा है

अपने पैरों को ठोक रहा है
टूट रहा है चटक रहा है
खाली हाथों को कमरे की दीवारों पर मार रहा है
यह लड़का तड़प रहा है
यह भारत का लड़का है

तुम उससे प्यार करना चाहती हो

लड़की क्या देख रही हो गोल पृथ्वी पर
इतनी भीड़ के बीच
सब खो रहा है इसमें

पृथ्वी की हरी वादियों और मैदानों में
तुम किसे खोजना चाहती हो

शायद वह लम्बे बालों वाला लड़का
जो क्रान्ति की लाल शर्ट पहने है
जिसके कंधों पर शताब्दी बंधी है
जो बेरोज़गारी के साथ डांस कर रहा है

ओह तुम उसे प्यार करना चाहती हो

इक्कीस वर्ष होते होते 

हमें अपने घर से टूट जाना चाहिए
टहनी पर खिले गुलाब की तरह इच्छित होकर
किसी पके फल की तरह स्वतः
या चिड़िया के बच्चों की तरह
हमें अपने घोंसलों से उड़ जाना चाहिए

जब हमारे माँ-बाप यह देखने लगे कि
हमारे बाजुओं की पेशियाँ फूल आईं हैं
और हमारी बहनों के उभार खाते दूध
तो हमारी बहनों को पड़ोसी से प्यार करना चाहिए
या चले जाना चाहिए दोपहरी भर किसी आफ़िस में

हमारे थके-मांदे बुढ़ाते बाप जिनकी नसें धनुष की प्रत्यंचा-सी टूट गई हैं
‌और मस्तक पर की सफ़ेद बर्फ़ उग आई हो
न सम्हाल सकें अपना वासनातुर मन और पुराने विचारों का जाल न समेंट पाएँ
तो हमें इक्कीस वर्ष होते-होते अपना घर छोड़ देना चाहिए

आसमाँ

मैं आसमाँ ले के आया था
तुमने बाहों को फैलाया ही नहीं

मैं रातभर सितारे बनता रहा
तुमने पलकों को उठाया ही नहीं

क्या शिकायत कि शाम नहीं देखी
तुमने खिड़की का परदा हटाया ही नहीं

कोई चेहरा मायूस नहीं था यहाँ
तुमने किसी के लिए मुस्कुराया ही नहीं

सर तो हजार झुके थे शहर में
किसी सर को तुमने झुका समझा ही नहीं

चाय

तुम चुप थीं और मैं भी चुप था
हमारे बीच चाय का कप था
धूप का सुनहरा रंग लिए
उसकी सुनहरी किनार पर
तुम्हारी आँखें चमक रही थीं

बहुत देर तक चाय
ज़िन्दगी की उपेक्षा में ठंडी होती रही
फिर तुमने उंगली से चाय पर जमी परत हटा दी
मैंने कप को उठा कर ओंठों से लगा लिया

आधा बिस्किट

तुम्हारे हाथों से तोड़ा आधा बिस्किट
संसार का सबसे खूबसूरत हिस्सा है
जहाँ कहीं भी आधा बिस्किट है
हमारा ही प्यार है वहाँ

तुम कहाँ-कहाँ रख देती हो अपना प्यार
बिस्किटों के साथ चाय के सुनहरेपन में
पानी के गिलास और विदा की सौंफ में

तुमने दुनिया के कोने में रख दिया है प्यार
हर कहीं मिल जाता है तुम्हारा आधा बिस्किट

इंतज़ार का शाल

तुम इंतज़ार का शाल लपेट कर शाम की ग़ज़ल सुनती हो
अकेले छत पर बैठ कर सुहानी हवाओं में क्या सुनती हो

अपनी उंगलियों में छुपाए हुए रोशनी के फूल खोलो
बहुत जादुई हैं उंगलियाँ इनमें क्या राज गुनती हो

चेहरे में रोशनी भरी मुस्कान की इंतहा चमक है
क्या अपनी उंगलियों से रोशनी के कन चुनती हो

क्यों अकेले खड़ी हो खिड़कियों में अंधेरे आ चुके हैं
बल्ब की मद्विम रोशनी में कौन सा अहसास बुनती हो

हम दिन और रात को अपना बना के रखते हैं
तुम अपनी ज़िन्दगी को क्यों पल-पल रूनती हो

इस शहर में

इस शहर में बहुत रोशनियाँ हैं चलो अंधेरे में चांद देखेंगे
किसी पुल पे बैठ कर चांदनी के शहर का ख्वाब देखेंगे

यहां लड़कियाँ चांद और सूरज की किरनों से बनी हैं
चलो उस गली में कोई वाह देखेंगे

इस शहर में भटकने के लिए बहुत मोड़ हैं
हम हर मोड़ पर खड़े होकर नई राह देखेंगे

इस शहर की दुनिया में कोई बात वाला है ज़रूर
हमें मिले न मिले वो हम हर शख़्स में शाह देखेंगे

तुम मोड़ लो अपना चेहरा किसी अजनबी जैसे
देखना हमको है हम रोज़ तुममें नई चाह देखेंगे

एक दृश्य

धूप के खूबसूरत टुकड़े पिघलने के लिए
कोई भी जगह हो सकती है
उसके तन पर एक जगह है
जहाँ रखे जा सकते हैं ओंठ
जहाँ रखे जा सकते हैं कुछ लफ्ज़
एक सुंदर तस्वीर की तरह
सूरज डूब रहा है-
गहरे सुनहरे हो रहे हैं मन के रंग
किरणें रंग रही हैं हर चीज़

तस्वीर में एक लड़की बैठी है
अकेली निरंतर किसी तेज़ सफ़र में
शांति और गति का संगम है
उसका चेहरा दुनिया का अकेला सूर्यमुखी है

विशाल पलकें फूल खिलने की तरह उठती हैं
जीवन के सूर्योदय जैसी गतिविधियाँ
उसके ओंठ धरती के रसों को सम्हाले
उसकी लालिमा जैसे शताब्दियों के सूर्योदय
मेरी धरती का दृश्य
और मैं चल रहा हूँ।

कोई आशा

मैं रात का मुसाफिर हूँ
मेरा सफ़र रात का सफ़र
तू आती है बनती है किरण

गुज़रती है आधी रात
तू सितारे की चमक बन कर
वक्त के चेहरे में नज़र आती है

मेरे सफ़र में उतरती है
जैसे उतरती है धरती पर सुबह की धूप
दिन तू तारे के पास से गुज़ारती है
जैसे ज़िंदगी स्वर्ग जाती है फिर जन्म लेने

संसार का शोर भरा दिन गुज़रता है
तू सूरज की किरणों में छुप कर देखती है
मेरे दुखों को, मेरे सुखों को

मैं सफ़र शुरू करता हूँ
तू फिर आती है फिर बनती है किरण

तू रौशनी की तरह

तू खिड़की में आई मैं जाने क्या सोचता रहा
तू मेरे हाथों में आई और मैं न जाने कहाँ रहा
तू मेरे आँगन में बिखर गई
और मैं दौड़ाता रहा दिन भर बाइक

तू रोशनी की तरह मेरे पीछे आती रही
और मैं शहर की सी हडबडी में कुछ न देख पाया
धोखे से मैं जिस पेड़ के नीचे ठहरा था
तू उसी क्षण छाँव बन गई थी

मैं टेबल पर था तू छोटा-सा काग़ज़ बनी
जिस पर मैंने ज़रूरी नम्बर लिखा था
जब पेन की स्याही ख़त्म हुई
तू मेरे हस्ताक्षर के लिए थोड़ी स्याही बनी

विदा का समय आ गया
तू जहाँ जहाँ मेरे साथ थी
तेरे कदम रोशनी से दमक रहे हैं

पाँच छोटी कविताएँ

एक उदास लड़की और मैं

कल मैं ही था उस उदास लड़की के साथ
मैंने ही उसे कहा था-
तुम्हारी उदासियाँ इस मॉल की रोशनियाँ हैं
कुछ क्षण रुक कर उसने कहा-
मैं अपने दोस्त को एक गिफ्ट छू कर आई हूँ
तब मेरी उँगलियों में बहुत उदासी थी
इसीलिए तो सारी लाइटें उदास हो गईं

चलो मैं अपन पर्स देखता हूँ मैं ज़रा-सा हँसा
और तुम भी अपना पर्स देखो
फिर कुछ दिनों तक मॉल की रोशनियाँ
हमारी आँखों में चमकती रहीं थीं

सब जगह तुम

रोज़ काम से कमरे पर लौटता हूँ
अक्सर शाम तुम आसपास होती हो

मैं एक रंग से भर जाता हूँ
तुम शाम का रंग हो जाती हो
और मुझे शाम का रंग अच्छा लगता है
मेरी आँखों में फूलों की तरह खिलता है

मेरी आँखें फूलों की तरह दुनिया देखती हैं
और तुम सब जगह मुझे दिखाई देती हो।

आधा बिस्किट

तुम्हारे हाथों से तोड़ा आधा बिस्किट
संसार का सबसे खूबसूरत हिस्सा है
जहाँ कहीं भी आधा बिस्किट है

तुम कहाँ-कहाँ रख देती हो अपना प्यार
बिस्किटों में चारा के सुनहरे पन में
पानी के गिलास और विदा की सौंफ में

तुमने कोने कोने में रख दिया है
हर कहीं मिल जाता है तुम्हारा प्यार

जीत -१

मुझे डर था एक दिन मैं हार जाऊँगा
उस दिन से मैं हारना शुरू हो गया
फिर मैं खुद मैं वापस आया
अपने जेहन को स्वीमिंग पूल की तरह देखा
उसमें कूदना मेरा सौभाग्य हो गया
एक लहर उठी और मेरी जीत बन गई।

जीत -२

कुछ लोग आए मेरे सामने से दौड़ गए
कुछ लोगों ने कहा वे दौड़ रहे हैं
तो मुझे भी दौड़ना चाहिए मैंने पूछा
ज़रूर उन्होंने कहा और मुझे देखने लगे

थोड़ी देर में सब धूमकेतु बन गए
पृथ्वी की कक्षा से क्षितिज से गुज़रते हुए
पूरी दुनिया उन्हें देख रही थी
वे पृथ्वी की कक्षा से बाहर हो गए।

यों हमने प्यार किया

मेरे शहर में अंधेरा पुल और जंगल था
मेरी तरफ़ अंधेरा और जंगल था
और तुम्हारी तरफ़ पुल और शहर था

मैं अंधेरे में एक कदम चला
और तुम शहर से पुल के पास आ गईं
चाँदनी रात में वक्त का पानी था
जैसे संसार की हर गति का प्रतिबिम्ब था
फिर मैंने पानी में अपना कदम रखा
और फिर तुम बेतवा बन गईं

हम नदी के साथ थे
मैं पुल का पिलर और तुम लहर थीं
वक्त का पानी बहता रहा हमें छूकर
क्यों हमने प्यार किया और वक्त के गवाह बने
आज लाखों साल बाद
राह पानी हमारे बीच बह रहा है
चारा

तुम चुप थीं और मैं भी चुप था
हमारे बीच चारा का कप था
धूप का सुनहरा रंग लिए
उसकी सुनहरी किनार पर
तुम्हारी आँखें चमक रही थीं

बहुत देर तक चारा एक
ज़िंदगी की उपेक्षा में ठंडी होती रही
फिर तुमने उँगली से चारा पर जमी परत हटा दी
मैंने कप को उठा कर ओंठों से लगा लिया

आज़ादी

सबसे कठिन है आज़ाद होने की घोषणा करना
आज़ाद हो जाना आदमी की सबसे बड़ी ज़िम्मेदारी है
आज़ादी माँगना सबसे बड़े भय का सामना करना है
जब हवाएँ सबको एक तरफ़ बहा ले जा रही हो

लोग प्रयत्नों के तिनके छोड़ कर
अपने खाली हाथों को लहराने लगें
तब कठिन हो जाता है आज़ादी की पलांध बताना
जब गुलामी को आज़ादी का नाम दिया जा चुका हो
ज़रूरत होती है आज़ादी को पहचानना

अपनी आज़ादी की घोषणा
दुनिया की सबसे बड़ी कीमत चुकाने की शुरुआत है
ये शुरुआत किसी भी क्षण की जा सकती है

 

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