राग़िब अख़्तर की रचनाएँ

बहुत दुश्वार है अब आईने से गुफ़्तुगू करना

बहुत दुश्वार है अब आईने से गुफ़्तुगू करना
सज़ा से कम नहीं है ख़ुद को अपने रू-ब-रू करना

अजब सीमाबियत है इन दिनों अपनी तबीअत में
कि जिस ने बात की हँस कर उसी की आरज़ू करना

इबादत के ततहीर-ए-दिल की भी ज़रूरत है
वज़ू के बाद फिर अश्क-ए-निदामत से वज़ू करना

ये वस्फ़-ए-ख़ास है कुछ आप से बा-वस्फ़ लोगों का
हमें आता नहीं है आप को लम्हे में तू करना

तिरी फ़ितरत में यूँ मुसबत इशारे ढूँढता हूँ मैं
किस सहरा को जेसे चाहता हूँ आबजू करना

चौंक उट्ठा हूँ तिरे लम्स के एहसास के साथ

चौंक उट्ठा हूँ तिरे लम्स के एहसास के साथ
आ गया हूँ किसी सहरा में नई प्यास के साथ

तब भी मसरूफ़-ए-सफ़र था मैं अभी की मानिंद
ये अलग बात कि चलता था किसी आस के साथ

ढूँढता हूँ मैं कोई तर्क-ए-तअल्लुक़ का जवाज़
अब गुज़ारा नहीं मुमकिन दिल-ए-हस्सास के साथ

हो रहा है असर-अंदाज़ मिरी ख़ुशियों पर
उम्र का रिश्ता-ए-देरीना जो है यास के साथ

जिस्म के शीश-महल की है यही उम्र जनाब
जब तलक निभती रहे तेशा-ए-अनफ़ास के साथ

गाँव में अब गाँव जैसी बात भी बाक़ी नहीं

गाँव में अब गाँव जैसी बात भी बाक़ी नहीं
यानी गुज़रे वक़्त की सौग़ात भी बाक़ी नहीं

तितलियों से हल्के फुल्के दिन न जाने क्या हुए
जुगनुओं से टिमटिमाती रात भी बाक़ी नहीं

मुस्कुराहट जेब में रक्खी थी कैसे खो गई
हैफ़ अब अश्कों की वो बरसात भी बाक़ी नहीं

बुत-परस्ती शेवा-ए-दिल हो तो कोई क्या करे
अब तो काबे में हुबल और लात भी बाक़ी नहीं

छत पे जाना चाँद को तकना किसी की याद में
वक़्त के दामन में वो औक़ात भी बाक़ी नहीं

कातिब-ए-तक़दीर मेरे हक़ में कुछ तहरीर हो

कातिब-ए-तक़दीर मेरे हक़ में कुछ तहरीर हो
रंज हो या शादमानी कुछ तो दामन-गीर हो

आब-रूद-ए-ज़ीस्त के कुछ घूँट ज़हरीले भी हों
मैं ने कब चाहा था हर क़तरा मुझे इक्सीर हो

अहद-ए-आज़ादी से बेहतर क़ैद-ए-ज़िंदाँ हो तो फिर
तोड़ देने की क़फ़स को क्यूँ कोई तदबीर हो

तेज़ लहरें आ ही जाती हैं मिटाने के लिए
जब लब-ए-साहिल घरोंदा रेत का तामीर हो

ग़म रहे पिन्हाँ दर ओ दीवार दिल के दरमियाँ
क्या ज़रूरी है कि कर्ब-ए-ज़ीस्त की तशहीर हो

थकन को जाम करें आरज़ू को बादा करें

थकन को जाम करें आरज़ू को बादा करें
सुकून-ए-दिल के लिए दर्द का इआदा करें

उभरती डूबती साँसों पे मुंकशिफ़ हो जाएँ
सुलगती गर्म निगाहों को फिर लबादा करें

बिछाएँ दश्त-नवर्दी जुनूँ की राहों में
फ़िराक़ शहर-ए-रिफ़ाक़त में ईस्तादा करें

तुम्हारे शहर के आदाब भी अजीब से हैं
कि दर्द कम हो मगर आह कुछ ज़ियादा करें

ये सर्द रात निगल लेगी साअतों का वजूद
जलाएँ शाख़-ए-बदन और इस्तिफ़ादा करें

हुनर-ए-ज़ख़्म-नुमाई भी नहीं

हुनर-ए-ज़ख़्म-नुमाई भी नहीं
सिला-ए-आबला-पाई भी नहीं

दर्द-ए-सर अब तिरे होने का सबब
अब तो वो दस्त-ए-हिनाई भी नहीं

मैं ने हर रंग समेटा उस का
और तस्वीर बनाई भी नहीं

बंदगी भी न मुझे रास आई
और पिंदार-ए-ख़ुदाई भी नहीं

जल गया जिस में मिरा सारा वजूद
तू ने वो आग लगाई भी नहीं

ऐ ख़ुदा बख़्त-सिकंदर मत दे
और कश्कोल-ए-गदाई भी नहीं

कुछ बादल कुछ चाँद से प्यारे प्यारे लोग

कुछ बादल कुछ चाँद से प्यारे प्यारे लोग
डूब गए जितने थे आँख के तारे लोग

कुछ पाने कुछ खो देने का धोका है
शहर में जो फिरतें हैं मारे मारे लोग

शहर-ए-बदन बस रैन-बसेरा जैसा है
मंज़िल पर कब रूकते हैं बंजारे लोग

रोज़ तमाशा मेरे डूबते रहने का
देख रहे हैं बैठे ख़्वाब किनारे लोग

ये कर्ब ये तसलसुल-ए-बे-ख़्वाब शब तो है

ये कर्ब ये तसलसुल-ए-बे-ख़्वाब शब तो है
गोया तुम्हारी याद का कोई सबब तो है

अंजाम जो भी हो मिरा रज़्म-गाह में
मंसूब तेरे नाम से जश्न-ए-तरब तो है

सरमाया-ए-हयात मिरे पास कम नहीं
ज़ख़्म-ए-जिगर फ़रेब-ए-नज़र दर्द सब तो है

मिलने में उज्र तर्ज़-ए-तकल्लुम बुझा बुझा
पहले न थी ये बात मगर ख़ैर अब तो है

ऐ बहर-ए-इम्बिसात कि तू ला-ज़वाल है
अब भी तिरे क़रीब कोई तिश्ना-लब तो है

 

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