राजकुमार कुंभज की रचनाएँ

अभिभूति

स्कूली दिनों में स्कूल नहीं गया
दफ़्तरी दिनों में कभी भी गया नहीं दफ़्तर
घंटाघर के पीछे आँखमिचौली करते हुए खेलता रहा कंचे
या कि फिर खुले मैदान में उड़ाता रहा पतंग
और लड़ाता रहा पेंच-दर-पेंच
निठल्ली हवाओं में खो जाने वाला वह निठल्ला वक़्त
सचमुच करता है कितना अभिभूत?

शतरंज खेलो और प्रेम करो

एक मिनिट में आता हूँ
कहते हुए जाऊंगा और फिर कभी नहीं आऊंगा
ज़माना देखता रहेगा हरे पत्तों का हिलना
हरे पत्ते हिलेंगे, हिलते रहेंगे, हम फिर-फिर मिलेंगे कहते हुए
ऎसा ही कुछ कहते हुए जाऊंगा मैं भी और फिर कभी नहीं मिलूंगा
पुकारेगा पीछे से कोई प्रियतम की तरह
और मैं अनसुनी करते हुए चला जाऊंगा
देख लेना एक दिन यही करूंगा मैं
कि एक मिनिट में आता हूँ
कहते हुए जाऊंगा और फिर कभी नहीं आऊंगा
फिर-फिर कहूंगा तो कहूंगा यही-यही सबके लिए
कि शतरंज खेलो और प्रेम करो।

बुद्धूराम 

एक दिन एक विचार आया
कि कैसे होता है परमात्मा देखा जाए
मैंने देखी एक गर्भवती स्त्री
और मैं अनूठे रोमांच से भर गया यकीनन
मैंने देखी एक अधखिली कली
और मैं अनूठे रोमांच से भर गया यकीनन
मैंने देखी एक पकती रोटी
और मैं अनूठे रोमांच से भर गया यकीनन
एक दिन एक विचर आय
कि अगर मैं विचार करना बंद कर दूँ तो क्या होगा?
कहा उस एक लड़की ने जो दूर खड़ी खिलखिला रही थी
बुद्धुराम कुछ नहीं होगा।

आकांक्षा-पूर्ति के लिए

ग्रीष्म की साँय-साँय दोपहर
विचार की हार और धार तलवार प्यास
किसी बहती नदी में डूब मरने का इरादा है
झरते झरने में नहाने से अब बात बनती नहीं
अकाल-इच्छा, अकाल मृत्यु
अपनी आंकाक्षा-पूर्ति के लिए दरअसल
सरकारी नल का कब तक भरोसा करूँ?
मैं तो डूब मरना चाहता हूँ बहती नदी में
बहती नदी

ये नहीं है सही वक़्त 

एक खिला
बुझ गया दूसरा उसी वक़्त
सही वक़्त वही, जिसमें खिलें सब
बुझे नहीं कोई भी
गर्भस्थ शिशु परमात्मा है
और एक ग़रीब आदमी उससे भी ज़्याद
मैंने देखा नहीं है कभी परमात्मा
लेकिन देखा है ग़रीब
ग़रीबी भी देखी है बहुत क़रीब से
ग़रीबी में ही पला-बढ़ा, बड़ा हुआ हूँ
शायद इसलिए
इस-उस आरोह-अवरोह का
धुंध भरा गुनाह हुआ हूँ
मैं कैसे लिख सकता हूँ प्रस्तावना प्रेम-गीत की
मेरे पास तो, न रोटी है, न नमक
मेरे पास रोटी-नमक की चिंता है बड़ी
जो सबके लिए
एक खिला
दूसरा बुझ गया उसी वक़्त
इसे मत कहॊ सही वक़्त
ये नहीं है सही वक़्त

गर आग की जगह पानी /

ग़र आग की जगह पानी
और पानी की जगह आग रख दी जाए
तो मेरी नींद में तुम्हारे सपने होंगे
और तुम्हारे सपनों में मेरी नींद
यदा-कदा ऎसा भी होता है दरअसल
कि जब चीज़ों की जगह बदल जाती है
तो उनके मतलब भी बदल जाते हैं
जैसे कि मैंने कहा कि सुअर
और तत्काल एक मंत्री हवाई जहाज में उड़ता हुआ दिखाई दिया
जैसे कि मैंने कहा कि नागरिक
और तत्काल एक मच्छर तड़फता हुआ मिला नाली में
जैसे कि मैंने कहा कि प्रेम
और तत्काल पता मिला सुंदरतम क्लोन…
ग़र आदमी की जगह रख दिया जाए
एक गुलाब, एक गुलाब जामुन
और एक गुलाब-गुलाम
तो तमाम उस्तरे का संस्कार गया
समझो कि अतिक्रमण विरुद्ध बुलडोज़र में
मैं थक गया हूँ सच कहते-कहते
मुझे झूठ बोलने के लिए मज़बूर मत करो
आम आदमी के पास मत ले चलो मुझे
मैं डरने लगा हूँ उसके सामने जाने से
आख़िर मैंने किया ही क्या उसके लिए?
लिखी कविताएँ और सो रहा दड़बे में
भटका दर-दर और पाया नहीं कुछ भी
लटका, बिजली के तारों पर भी लटका
मगर हारा हर हाल
जैसे मनुष्य विरुद्ध मवेशी
ग़र आग की जगह पानी
गर पानी की जगह आग रख दी जाए
तो बहुत संभव है कि चीज़ों के अर्थ बदल जाएंगे
तब ठंडे पानी में भी कुछ हो जाएगा।

मुझे मृत्यु से डर कैसा? 

मुझे मेरी मृत्यु से डर कैसा?
मृत्यु तो मेरा एक और नया घर होगा भाई
आओ अभी थोड़ा आराम करें यहीं इसी घर में
फिर चलेंगे उधर कुछ देर बाद मिलने उस मिट्टी से
खेला करते थे जिस मिट्टी से बचपन में
जिस मिट्टी में पले, बढ़े, बड़े हुए
उस मिट्टी से फिर परहेज़ कैसा?
थोड़ी बारिश हो जाए, तो चलूँ
थोड़ी धूप खिल जाए, तो चलूँ
थोड़ी तुतलाहट मिल जाए, तो चलूँ
मुझे मृत्यु से डर कैसा?
मृत्यु तो एक और नया घर है मेरा, कागज़ की नाव जैसा
काँच के गिलास जैसा, दर्पण की किसी मूल जैसा
मगर इस बीच मैं छूना चाहता हूँ आत्मा की चींटी
मगर इस बीच मैं पीना चाहता हूँ दो-चार पैग़ और
मगर इस बीच मैं छेड़ना चाहता हूँ कुछ और लड़कियाँ
कुछ देर तो रुको यार
चलते हैं, उस घर भी चलते हैं
पहले कुछ तालियाँ तो बजा लूँ जम कर
पहले कुछ हँस तो लूँ खुल कर हा, हा, हा
पहले कुछ उदर-पोषण तो कर लूँ नहा-धोकर
इस-उस को थोड़े बहुत धप्पे तो लगा लूँ बेमतलब
भूलता नहीं हूँ
कि ज़िन्दगी भर फेंटता रहा पत्ते-दर-पत्ते
किंतु अब कुछ करना चाहता हूँ डरने से पहले
भूलता नहीं हूँ
कि ज़िन्दगी भर फेंकता रहा खाली-खाली अद्धे-दर-अद्धे
किंतु अब कुछ करना चाहता हूँ मरने से पहले
भूलता नहीं हूँ
कि ज़िन्दगी भर लिखता रहा कविताएँ कारणरहित
किंतु अब कुछ करना चाहता हूँ लिखने से पहले
पता नहीं मैं ऎसा कुछ कर पाऊंगा या नहीं?
देखो, देखो, वे सुन्दर स्त्रियाँ कैसे चढ़ रही हैं चट्टानें?
देखो, देखो, वे अपढ़ बच्चे कैसे जीत रहे हैं जंग?
देखो, देखो, वे मेरे ही बंधु-बांधव कैसे उठा रहे हैं मेरा मेला?
इससे पहले कि मेरे बच्चे थूकें मुझ पर
मैं सम्भल जाना चाहता हूँ और बदल जाना चाहता हूँ थोड़ा
बदल जाना ही नया संस्कार है, तो बदलता हूँ मैं
मुझे मेरी मृत्यु से डर कैसा?
मृत्यु तो मेरा एक और नया घर होगा भाई
क्या तुम अपना घर नहीं बदलोगे?
शायद डरते हो घर बदलने से, नए घर में जाने से
मैं तो फिर-फिर बदल लूंगा अपना घर से
मुझे मेरी मृत्यु से डर कैसा?

सिर्फ़ एक दिन का जीवन

एक दिन मैं ऎनक भूल जाता हूँ
एक दिन मैं भूल जाता हूँ अपनी दो आँखें
और एक दिन तो हद ही हो जाती है सचमुच
कि मैं पतलून पहनना ही भूल जाता हूँ
ऎसा सिरे से होना चाहिए मगर नहीं होता है
एक दिन मैं भूल जाना चाहता हूँ सरकार
एक दिन मैं भूल जाना चाहता हूँ कानून-क़ायदे सब
एक दिन मैं मूत देना चाहता हूँ सरे-बाज़ार
मैं सिर्फ़ एक दिन की छूट चाहता हूँ
और सिर्फ़ एक दिन का जीवन

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