राजनारायण चौधरी की रचनाएँ

मेरे घर आना

परी! कभी मेरे घर आना!
आना अपनी पाँखें खोले
उड़ती-उड़ती हौले-हौले,
आ मुझसे घुल-मिल बतियाना!

सुघड़ दूधिया गोटे वाली
जिसमें कढ़ी हुई हो जाली-
चूनर वहतन पर लहराना!

इंद्रधनुष के रंग चुराकर
दे जाना धरती पर आकर,
तितली जैसे तुम इठलाना!

सैर करेंगे हम उपवन की
बातें होंगी दूर गगन की,
मैं नाचूँगा, तुम कुछ गाना!

रात ढले चाँदनी झरे जब
कोई आँखों नींद भरे जब-
लोरी गाकर मुझे सुलाना!

-साभार: नंदन, अप्रेल 97

बिस्कुट के पेड़

होते जो बिस्कुट के पेड़!
दौड़-दौड़कर जाते हम सब
तोड़-तोड़कर खाते,
मम्मी-पापा की खातिर
जेबों में भर लाते।

करते नहीं जरा भी देर!
होते जो बिस्कुट के पेड़!

अगर लताओं में टॉफी के
गुच्छे लटके होते,
मम्मी से पैसे न माँगते
और नहीं हम रोते।

लेते तोड़ पाँच-छः सेर!
होते जो बिस्कुट के पेड़।

लड्डू-पेड़े बरफी-चमचम
की जो होती खेती,
दादी माँ चोरी-चोरी नित
झोले में भर देती!

होता घर में इनका ढेर!
होते जो बिस्कुट के पेड़।

-साभार: नंदन, फरवरी, 1993

मने जन्मदिन

मने जन्म-दिन मेरा!
फूलों से मह-मह-मह करते
हैं घर-आँगन सारे,
नीले-पीले लाल, बैंगनी
लटक रहे गुब्बारे।

जगमग-जगमग करे रोशनी,
भागा दूर अँधेरा!

नए-नए कपड़ों में नन्हा
राजकुंवर मैं लगता,
दिल में रह-रहकर खुशियों का
जलतरंग है बजता।

लगे आज घर-आँगन ने भी
मधुर-मधुर स्वर छेड़ा!

कुंकुम-रोली का टीका
मेरे माथे पर सोहे,
रंग-बिरंगी लटकी झालर
सबके मन को मोहे।

दे-दे मुझे बधाई सबने
चूमा माथा मेरा!

मोमबत्तियाँ और केक
लेकर पापा हैं आए,
मिठाइयों से भर-भरकर
मम्मी ने थाल सजाए।

कलाकंद, बरफी, चमचम हैं
है रसगुल्ला-पेड़ा!

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