राजा शिवप्रसाद सितारे-हिन्द की रचनाएँ

चौतुक्का-1 \

घोड़े पर अपने चढ़के जो आता हूँ मैं
क़रतब जो हैं सो सब दिखाता हूँ मैं,
उस चाहने वाले ने जो चाहा तो अभी,
कहता जो कुछ हूँ कर दिखाता हूँ मैं।

चौतुक्का-2

पौदों ने रंगा के सूहे जोड़े पहने।
सब पाँव में डालियों ने तोड़े पहने।
बूटे-बूटे ने फूल-फल के गहने,
जो बहुत न थे तो थोड़े-थोड़े पहने।

धुन

रानी को बहुत सी बेकली थी
कब सूझती कुछ भली-बुरी थी?
चुपके-चुपके कराहती थी।
जीना अपना न चाहती थी।
कहती थी कभी अरी मदन वान!
है आठ पहर मुझे यही ध्यान।
यहाँ प्यास किसे भला भूख?
देखूँ हूँ वही हरे-हरे रूख।
टपके का डर है अब यह कहिए।
चाहत का घर है अब यह कहिए।
अमर‍इयों में उनका वह उतरना,
और रात का साइं-साइं करना,
और चुपके से उठके मेरा जाना,
और तेरा वह चाह का जताना,
उनकी वह उतार अंगूठी लेनी,
और अपनी अंगूठी उन को देनी,
आँखों में मेरे वह फिर रही है।
जी का जो रूप था वही है।
क्यॊंकर उन्हें भूलूँ क्या करूँ मैं?
कब तक माँ-बाप से डरूँ मैं?
अब मैंने सुना है ऐ मदन वान।
वन-वन के हिरन हुए उदय भान।
चरते होंगे हरी-हरी दूब।
कुछ तू भी पसीज सोच में डूब।
मैं अपनी गई हूँ चौकड़ी भूल।
मत मुझको सुंघा यह डहे-डहे फूल।
फूलों को उठा के यहाँ से ले जा।
सौ टुकड़े हुए मेरा कलेजा।
बिखरे जी को न कर इकट्ठा।
एक घास का ला के रख दे गट्टा।
हरयाली उसी की देख लूँ मैं।
कुछ और तो तुझको क्या कहूँ मैं?
इन आँखों में है भड़क हिरन की।
पलकें हुईं जैसे घास बन की।
जब देखिए डब-डबा हरी हैं।
ओसें आँसू की छा रही हैं।
यह बात जो जी में गड़ गई है।
एक ओस सी मुझ पै पड़ गई है।

दोहा

छा गई ठण्डी साँस झाड़ों में।
पड़ गई कूक-सी पहाड़ों में।

हम नहीं हँसने से रोकते जिसका जी चाहे हँसे।
है वही अपनी कहावत आपसे जी आ फँसे।
अब तो सारा अपने पीछे झगड़ा-झाँटा लग गया।
पाँव में क्या ढूंढ़ती है? जी में काँटा लग गया।

दोहे-1

यों तु देखो, बाछड़े, जी बाछड़े, जी बाछड़े,
हमसे अब आने लगी हैं आप यह मुहरे कड़े।

छान मारे बन के थे अपने जिनके लिए,
वह हिरन जोबन के मद में हैं बन दुल्हा खड़े।

तुम न जाओ देखने को जो उन्हें कुछ बात है,
झाँकने के ध्यान में हैं उनके सब छोटे-बड़े।

है कहावत जी को भावे योंहि पर मुण्डिया हिलाए,
ले चलेंगे आपको हम हैं इसी धुन पर अड़े।

साँस ठंडी भर के रानी केतकी बोली य’ मच,
सब तो अच्छा कुछ हुआ पर अब बखेड़े में पड़े।

दोहे-2

अब उदय भान और रानी केतकी दोनों मिले।
आस के जो फूल कुम्हलाये हुए थे फिर खिले।

चैन होता ही न था जिस एक आसन एक बिन,
रहने-सहने से लगे आपस में अपने रात-दिन।

ऐ खिलाड़ी, यह बहुत था कुछ नहीं थोड़ा हुआ,
आन कर आपस में जो दोनों के गठजोड़ा हुआ।

चाह के डूबे हुए, ऐ मेरे दाता, सब तिरें,
दिन फिरे जैसे इन्हीं के वैसे अपने दिन फिरें।

दोहे-3

घर बसा दिन-रात उन का तब मदन वान उस घड़ी,
कह गई दुल्ह-दुल्हिन को ऐसी सौ बातें कड़ी।

बास पाकर केवड़े की केतकी का जी खुला।
सच है, इन दोनों जनों को अब किसकी क्या पड़ी?

क्या न आई लाज कुछ अपने पराए की? अजी!
थी अभी इस बात की ऐसी अभी क्या हड़बड़ी?

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