राजेश्वर वशिष्ठ की रचनाएँ

समय के सिरहाने

किसी बच्चे की तरह बैठा हूँ
स्कूल की सीढ़ियों पर
पलट रहा हूँ नोटबुक के पन्ने
जिसमें लिखी हैं
दुःख और विस्मय की
अनुभूत परिभाषाएँ ।

वर्षों में सीख पाया हूँ बस इतना ही ।

कुछ नया सीखने की अब
कोई सम्भावना नहीं
कुछ नहीं बदलता
जीवन के स्थाई भाव में ।

पता नहीं कब बजेगी
छुट्टी की घंटी ?
बहुत उचाट है मन !

धीमे धीमे मुस्कुरा रही है माँ

उसने उगते सूरज को देखा
आसमान में छितरे बादलों के बीच से,
उषा के कँगूरे पर
लाल चुनरिया ओढ़ कर
धीमे-धीमे मुस्कुरा रही थी माँ !

उसने हरे पेड़ को देखा
असंख्य पीले फूलों से लदे
बरस रही थी मादक सुगन्ध,
समय की सलाइयों पर
वसन्त बुन रही थी माँ !

उसने बहती नदी को देखा
दोनों हाथ फैला कर दौड़ते हुए
बेचैन और उद्विग्न,
बिटिया का रोना सुन कर
नंगे पाँव भाग रही थी माँ !

मैंने देखा
पल-पल आँसू पोंछ कर भी
समय और भाग्य से जूझते हुए,
अनुशासन और संस्कार की कलम से
बेटे का भविष्य लिख रही है माँ !

तुम्हारी खनकती हँसी में
बस गई है माँ
तुम्हारी निस्स्वार्थ करुणा में
रम गई है माँ
तुम्हारी हर भंगिमा से
मूर्त हो रही है माँ !

सुनो, यहीं है माँ
सूरज में, फूलों में,
सुगन्ध में और नदी में
देखो चाँद में भी !

भरोसा रखो
माँ रोज़ झाँकेगी
उगते हुए सूरज की आँख से
हमारी धरती पर
स्नेह रश्मि बिखेरने के लिए !

चक्रव्यूह में स्त्री

वे स्त्रियाँ हैं
उन्होंने अपने आँसुओं से बहुत सारी
दुखान्त कविताएँ लिखीं हैं।

वे कविताएँ नहीं
उनकी उस गुलाबी नोटबुक के पन्नों में
दबाकर रखीं गईं तितलियाँ
और सूखे हुए फूल हैं
जो उन की स्मृतियों में
विषाद बन कर
अभी तक चिपके हैं
और धीरे-धीरे पी रहे हैं
सपनों का ख़ून
किसी जोंक की तरह ।

यह इतिहास है
कि उन्हें छलते ही रहे हैं पुरुष !

पिता बन कर
सामाजिक प्रतिष्ठा बचाने के उपक्रम में
संस्कारों का हवाला देकर ।

प्रेमी बन कर
कँवारी बहनों और माँ-बाप की
ख़ुशी की भीख माँग कर ।

पति बन कर
अपने दायित्व रहित व्यवहार
और हीनता बोध के चलते ।

अब सब कुछ हार कर
वे समाधिस्थ बैठी हैं ऊँचे पहाड़ पर
किसी पौराणिक देवी की तरह
उन्हें लगता है
बस एक यही विकल्प है स्त्री के पास ।

मैं उनसे असहमत हूँ
और असहमत हूँ
सारी दुनिया की स्त्रियों से
जो सोचती हैं
कि हमारी सामाजिक मान्यताएं ही
बचा रही हैं मनुष्यों को पशु होने से ।

क्या पशुओं के समाज में
आपने देखा है
इस तरह का शोषण ?

वे क्यों भूल जाती हैं
स्त्री के सोच में
यह संस्कार हम पुरुषों ने ही भरा था
ताकि हम उन्हें काटतें रहें
फसलों की तरह
मौसम दर मौसम ।

उनकी धरती पर
बोते रहें अपना बीज
वे उसे पालें अपनी कोख में
और चलता रहे हमारा नाम
पीढ़ी दर पीढ़ी ।

हम मिल कर भोगें उन्हें
निखालिस साम्यवादियों की तरह ।

हर साल स्त्री दिवस पर
वे लिखती हैं मार्मिक कविताएँ
जलाती हैं मोमबत्तियाँ
किसी निर्भया, ज्योति या कमला की याद में
पर क्यों नहीं पढ़ पातीं
लकड़बग्घे का अलिखित संविधान !

स्त्रियो
किसी विभीषण की तरह
आगाह कर रहा हूँ तुम्हें,
यह पुरुष का चक्रव्यूह है
इसे पराक्रम से नहीं विवेक से बेधना होगा !

बस, आज रोना मत दोस्त !

तुम्हारी ही तरह सो नहीं पाता हुसैन सागर

कोहरे से ढ़का है हुसैन सागर इतनी देर तक
लगता है उसे भी तुम्हारी ही तरह
रात बहुत कम नींद आई ।

एक अजीब तरह की उदासी
बिखरी है इन दरख़्तों पर
बहुत कम हरितिमा
चिपकी है इनके पत्तों पर
लगता है तुम्हारी ही तरह
रातों में जागते रहते हैं ये दरख़्त ।

ख़ामोशी से देख रहा हूँ
झील की आँखों में
पर समझ नहीं पा रहा हूँ उसका मन
वैसे ही थक कर बैठ जाता हूँ
किसी असफल तैराक-सा
तुम्हारी झील-सी आँखों के
काजल सने कोरों पर ।

दोस्त, ये बादल, ये दरख़्त,
सूरज और झील
तुम्हारी ही तरह इतनी बेरुखी से
क्यों पेश आते हैं मेरे साथ ?

अपने धड़कते दिल से
बार-बार पूछता हूँ यह सवाल।

कहीं तुम्हारी ही तरह
मैं इन्हें भी प्यार तो नहीं करने लगा ?

मुलाक़ात

उसकी प्रतीक्षा में
जब मैं बुदबुदा रहा था एक प्रार्थना
किसी अनजान देवता के लिए
उसी क्षण
वह किसी स्वप्न सी अवतरित हुई !

दोपहर के उजास में
वह दमक रही थी
रजनीगन्धा के फूलों की तरह
जो जड़ों से कटकर भी घण्टों मुस्कुरा लेते हैं !

मेरी साँसों तक पहुँच रही थी
एक ऐसी जादुई गन्ध
जो मिलती नहीं
हमारी दुनिया के फूलों में
वह कस्तूरी की तरह बसती है
किसी निश्छल आत्मा में !

उस दिन भी विंड चाइम की तरह
खनक रही थी उसकी हँसी
वह काँप-काँप जाती थी
फूलों के बोझ से लदी
डाली की तरह — पल-पल
उन क्षणों में ज़रूर
अधीर हो गया होगा वसन्त !

वह अपनी सारी उदासी
और दुखों को
सफ़ेद साड़ी में
कस कर जकड़े हुए थी
जो फिर भी झाँक-झाँक जाते थे
साड़ी के गहरे नीले बॉर्डर से
आँखों के काजल से
और शब्दों के स्फोट से !

उन क्षणों में
वह एक ऐसी प्रेम कविता थी
जिसे मैं लिख रहा था अपने हृदय पर
और वह अनमनी सी चमक रही थी
मेरे हर शब्द में
ध्रुव तारे की तरह !

कभी-कभी हम
कविता से भी मिलते हैं !

 

 

विदा, नैमिषारण्य

नैमिषारण्य में ऋषि नहीं थे
वे ऋचाएँ भी नहीं थीं
जिन्हें कभी सुनाया गया था
समस्त जम्बू द्वीप से आए
अट्ठासी हज़ार ऋषियों को !

अब गेरुए कपडों में लपेट कर
शीशे की अल्मारियों में
रख दी गई हैं वे पुस्तकें
जिन्हें वेद, पुराण
और संहिताओं के नाम से जाना जाता है
अनेक विद्वानों ने कालान्तर में
जिन्हें संकलित किया
और गीताप्रेस गोरखपुर ने छापा
अब उन्हीं से सजे हैं
वेद मन्दिर और व्यास गद्दी !

यहाँ कुछ भी नहीं मिला वैसा ऐतिहासिक
जो कम से कम कुछ हज़ार वर्ष पीछे तो जाए
बस एक चक्रतीर्थ के जल-स्रोत को
आप चाहे जितना पुराना मान सकते हैं
फिर भी चकित कर देने वाली कथाएँ तो हैं!

इसी नैराश्य को मन पर लादें
हम सोच रहे थे उस आस्था के बारे में
जिसे लेकर आज भी
यहाँ कितने ही लोग करते हैं
चौरासी कोस की परिक्रमा
यह निश्चित करते हुए
कि इस परिक्रमा के बीच का क्षेत्र ही
रहा होगा समस्त श्रुतियों के
गुंजरित होने का पुण्यक्षेत्र,
जहाँ बचे खुचे अरण्यों पर
व्यावसायिकता की खाद से
आज भी आस्था की फ़सल लहलहाती है!

मैं जानता हूँ,
मैं आस्था या विश्वास के बल पर
मोक्ष की कामना लिए नहीं आया यहाँ,
मुझे तो एक खोजी का मन ले आया यहाँ;
पर नतमस्तक हूँ उन देशवासियों के प्रति
जिनका विश्वास ही आज तक पोषण कर रहा है
मानव सभ्यता के प्राचीनतम धर्म,
सनातन धर्म का !

इसीलिए देश के हर हिस्से से
यहाँ वर्ष भर आते हैं लोग
इस संकल्प को पूरा करने के लिए,
एकदा नैमीषारण्ये !

ऋषि दधीचि के आश्रम में

वृहद जलाशय पर झुका है
एक संन्यासी-सा पेड़
जिसे सूरज देख रहा है टेढ़ी आँख से
यही है मिश्रिख में
ऋषि दधीचि का आश्रम !

अनेक मन्दिरों और आश्रमों के बीच
इसी जलाशय में इन्द्र लेकर आए थे
जम्बू द्वीप की समस्त पवित्र नदियों का जल
ऋषि दधीचि के स्नान के लिए
अद्भुत प्रसंग है
यहाँ देवराज इन्द्र लेते हैं दान
एक तपस्वी ब्राह्मण से !

उसी तालाब की सीढ़ियों पर बैठा हूँ ध्यानस्थ
जिनके ऊपर बना है ऋषि मन्दिर
जहाँ अभी भी बचे है कुछ पुराने अवशेष
जो याद दिलाते हैं
इतिहास में बिखरी कई कहानियाँ !

ब्रह्मा के पुत्र थे भृगु ऋषि
जिन्हें अथर्ववेद का श्रवण करने के कारण
इतिहास जानता है अथर्वन के नाम से
उनके पुत्र थे दधीचि
जिन्होंने प्रसिद्ध नैमिषारण्य क्षेत्र में
मिश्रिख को बनाया अपनी कर्म भूमि !

मधुविद्या के ज्ञाता थे दधीचि
जिसके उपयोग से प्राणी हो सकते थे अमर
कहते हैं इन्द्र ने दी थी उन्हें यह विद्या
इस शर्त पर
कि इसे सिखाएँगे नहीं किसी शिष्य को !

जब अश्वनीकुमारों ने विद्या सीखने के लिए
किया ऋषि से अनुरोध
सदाशयता के कारण
मना नहीं कर पाए दधीचि
यह जानते हुए भी
कि इन्द्र काट लेगा उनका शीश तत्काल !

अपने शरीर पर
घोड़े का शीश लगाकर ऋषि ने दी शिक्षा
जिसे काट लिया गया इन्द्र के द्वारा
पर अश्वनी कुमारों ने
पुनः स्थापित किया ऋषि का संरक्षित शीश
मानव कल्याण के लिए,
परोपकार की प्रतिमूर्ति थे दधीचि !

एक बार इन्द्र के तुल्य ही
बलवान हुआ एक असुर -– वृत्रासुर
जिसके भय से डोल गया इन्द्र का सिंहासन
भाग खड़े हुए समस्त देवता
और उन्होंने जाकर कहा — त्राहि माम,
विष्णु के दरबार में !

वृत्रासुर का वध नहीं है आसान
जानते थे विष्णु
न धातु से मरेगा वह
न काष्ठ से
उसकी मृत्यु होगी उस वज्र से
जो संचित है ऋषि दधीचि की हड्डियों में !

बहुत निर्लज्ज थे इन्द्र
आ पहुँचे हड्डियाँ माँगने
दधीचि आश्रम की सीढियों पर !

दधीचि प्रसन्न हुए
कि काम आएगा उनका शरीर
असुरों के विनाश के लिए
और तीनों लोक मुक्त हो पाएँगे
असुरों के सन्ताप से,
उन्हीं के स्नान के लिए बनाया गया था यह कुण्ड
आज जिसकी सीढ़ियों पर
सरस्वती के आदेश से
मैं खोज रहा हूँ इतिहास के बिखरे हुए सूत्र !

स्नान कर ऋषि ने समाधिस्थ हो
त्याग दिया अपना मानव-शरीर
जिसे चाट-चाट कर हड्डियों में बदला
कामधेनु के बछड़ों ने !

उनके मेरुदण्ड से बना वज्रायुध
जिससे मृत्यु को प्राप्त हुआ वृत्रासुर
अन्य अस्थियों से बने गाण्डीव, पिनाक और सारंग
जिनका उपयोग हुआ रामायण, महाभारत काल में !

दधीचि कुण्ड के जल में
काँप रही है मेरी परछाई
जो बोध करा रही है
मेरी भययुक्त मानवता का
जिसे असुरों से बचाने के लिए
आज फिर एक वज्रायुध की आवश्यकता है !

पर दुर्भाग्य से
कलियुग में पैदा नहीं होते दधीचि !

दधीचि आश्रम के बाद
और कुछ भी नही है पाथेय
मिश्रिख के इस जन-अरण्य में,
सम्मान के भाव से नतमस्तक
हम बारम्बार प्रणाम करते हैं
ऋषियों की इस तपस्थली को !

एकदा नैमिषारण्ये !

एकदा नैमिषारण्ये /

वाल्मीकि रामायण का
उत्तर-काण्ड पढ़ रहा हूँ !
कथा कुछ इस प्रकार की है
सतयुग चल रहा है,
नैमिषारण्य क्षेत्र में पहुँच गए हैं राम
और ऋषि वाल्मीकि के आश्रम में
पहली बार सुनते हैं रामायण !

अभिभूत हो जाते हैं राम
और आदेश देते हैं
अट्ठारह हज़ार स्वर्ण-मुद्राएँ दी जाएँ
इन बालकों को
जो तेज और प्रतिभा से ओतप्रोत हैं !

तुमुल-ध्वनि से
मण्डप गुंजरित कर देते हैं दर्शक
पर लव-कुश ठुकरा देते हैं
समस्त स्वर्ण-मुद्राएँ और गर्व से कहते हैं
रामायण अप्रतिम कृति है महर्षि वाल्मीकि की
जिसे गाया करते हैं
वनचारी बालक स्वेच्छा से
राजन! वन में व्यर्थ हो जाता है
स्वर्ण और शक्ति का दर्प
बस कन्द-मूल-फल ही काम आते हैं !

००

नैमिषारण्य में पहुँच चुके हैं
अट्ठासी हज़ार धर्मरक्षक
अक्षय-वट के पास सुशोभित है व्यासपीठ
अमृत बिखेर रही है सूत उग्रश्रवस की वाणी
जो लोमहर्षण के सुपुत्र हैं
और वेद व्यास के शिष्य !

वह उच्चरित कर रहे हैं
भागवत पुराण, हरिवंश पुराण, पद्मपुराण
फिर आरम्भ करते हैं महाभारत,
शौनक जी की उपस्थिति में
जिसमें कथा है वैशम्पायन से लेकर
कुरुराज जनमेजय तक
और संजय कुरुक्षेत्र का वृतान्त सुनाते हैं
अन्धे कुरुराज धृतराष्ट्र को !

कहानियों में कहानियाँ सुनकर
चकित हो जाते हैं
नैमिषारण्य में आए सभी ऋषि-मुनिगण
जो यहाँ आए हैं मोक्ष की कामना से !

अक्षयवट पर ठहर जाते हैं
शुकादि पक्षियों के समूह
शायद उन्होंने भी सुन रखा हो ऐसा ही कुछ,
मोक्ष मनुष्यों की ही कामना तो नहीं !

००

एकदा ऋषि-मुनि प्रार्थना करते हैं
प्रथम पुरुष ब्रह्मा से
धरती पर बताइए कोई ऐसा स्थान
जहाँ कलियुग का प्रभाव न हो
और पूजा-अर्चना से मिले वांछित फल !

बहुत विचार कर ब्रह्मा ने
अपने हृदय से उत्पन्न किया एक चक्र
और कहा –- तथास्तु,
जहाँ भी इस चक्र का केन्द्र-नेमि जाकर लेगा विश्राम
वही क्षेत्र हो जाएगा फलदायी और परम पवित्र !

और इस तरह प्रादुर्भाव हुआ
इस चौरासी कोस में फैले
सुरम्य वन नैमिषारण्य का
जहाँ अट्ठासी हज़ार ऋषियों ने
पूजा अर्चना की
और श्रुतियों का पावन श्रवण किया !

यहीं चक्र-तीर्थ के वलयित कुण्ड से फूटता है
पवित्र जल का स्रोत
जिसमें स्नान कर पवित्र हुए थे ऋषिगण
और जिसे धारण कर गोमती कहलाती है,
गोमती गंगा !

००

उसी नैमिषारण्य में,
उसी कलियुग में
मैं खोजने आया हूँ थोड़ी-सी शान्ति
खोजना चाहता हूँ उन ऋषियों के
जीर्ण-शीर्ण आवास
और ब्रह्मा का वह आशीर्वाद
जो कलियुग से रख सकता था
इस स्थल को अप्रभावित
मुझे याद आती है प्रसिद्ध सत्यनारायण कथा -–

व्यास उवाच — एकदा नैमिषारण्ये ऋषयः शौनकादयः
प्रपच्छुर्मुनयः सर्वे सूतं पौराणिकं खलु
ऋषय उवाच — व्रतेन तपसा किं वा प्राप्यते वांछितं फलम्‌
तत्सर्वं श्रोतुमिच्छामः कथयस्व महामुने
सूत उवाच — नारदेनैव संपृष्टो भगवान्कमलापतिः
सुरर्षये यथैवाह तच्छृणुध्वं समाहिताः![1]

पर यहाँ कुछ भी नहीं है ऐसा !

कलियुग के प्राणियों की बस्ती ने
लील लिया है समूचा क्षेत्र
स्थापित हो गए हैं कितने ही देवता
जो कमाई का साधन हैं हमारे लिए ।

चारों ओर लगे हैं गन्दगी के ढेर
सड़कों पर घूम रही हैं भूखी गायें,
देश के विभिन्न भागों से आए
मुझ जैसे सैलानी शायद निराश भी होंगे
इस आधुनिक नीमसार को देख कर !

क्या कलियुग में
एक और नया कलियुग रच लिया है हमने
जिसके लिए अब कुछ नहीं कर पाएँगे ब्रह्मा !

भारी मन से छोड़ता हूँ नीमसार
मैं जानता हूँ मेरा कलियुग अभिशप्त है
धूल, धुएँ और लिप्सा के संसार में जीने के लिए !

फिर भी – एकदा नैमिषारण्ये !

इलियास धनियावाला उर्फ़

नैमिषारण्य की निराशा बटोरे
सड़क के किनारे रुके हैं हम
पीली सरसों को आँख भर निहारने के लिए!
सीपी कहते हैं –- चलो चलते हैं
यहीं इस पतली सड़क से भीतर जाकर
सुदामा-चरित वाले
महाकवि नरोत्तम दास जी का स्थान है
बाड़ी गाँव में !

आँखों के सामने तैर जाता है
एक दीन-हीन, कंगाल ब्राह्मण
जिसने बगल में दबाई है
चावलों की छोटी-सी पोटली
और द्वारका नगरी के महल अट्टालिकाओं में
खोज रहा है अपने गुरु भाई कृष्ण को !

मुझे याद आती हैं वर्षों पहले पढ़ीं
सुदामा चरित की कुछ पंक्तियाँ —
सीस पगा न झँगा तन में,
प्रभु ! जानै को आहि बसे केहि ग्रामा
धोती फटी-सी लटी-दुपटी अरु,
पांय उपानह की नहिं सामा
द्वार खरो द्विज दुर्बल एक,
रह्यो चकि सो बसुधा अभिरामा
पूछत दीन दयाल को धाम,
बतावत अपनो नाम सुदामा ।

जब कथा क्रम में कृष्ण आँसुओं से
धोते हैं सुदामा के पाँव
बचपन में विह्वल हो कर
रो लिया करता था मैं भी !

थोड़े से भटकाव,
पतली और टेढ़ी-मेढ़ी सड़क से होकर
हम पहुँचते हैं बाड़ी ग्राम में कवि के घर !

विशाल आँगन है
जिसमें बनी हैं दो तीन कोठरियाँ
एक दालाननुमा कमरे में लगी है
कवि की प्रतिमा
हिन्दी सभा सीतापुर की विज्ञप्ति के साथ
कि 30 नवम्बर, 1953 को
इस स्मारक का उद्घाटन किया
आचार्य हज़ारी प्रसाद द्विवेदी ने
बस इतने ही नरोत्तम दास बचे हैं
इस जीर्ण-शीर्ण स्मारक में !

आस-पास कोई व्यक्ति नहीं है
पीछे तालाब की ओर झाँकते हुए
हमें मिलता है इलियास
एक पतला-दुबला लड़का जिसके हाथों में है
बिलकुल ताज़ा महकता हुआ धनिया !

सीपी पूछते हैं -– यहीं रहते हो भय्ये?
कवि नरोत्तमदास से परिचित हो?
थोड़ा लजाता है इलियास, बताता है
बस नाम सुने हैं साहेब, हम तो अनपढ़ हैं
पीछे धनिया तोड़ने गए थे !

आप कैसे आए हैं बाबू साहेब?
मैं धीरे से कहता हूँ, कवि को खोजने…..
इलियास हैरान होकर
आसमान की तरफ देखने लगता है,
फिर कहता है — यहाँ एक बाबाजी रहते हैं
जिन्होंने पेट भरने के लिए
हनुमान जी सहित कई देवताओं को
तैनात कर लिया है इस कवि-स्थली पर
फिर भी भूखे ही रह जाते हैं
आज भाग्य से कहीं जीमने गए होंगे !

हम चमत्कृत हो जाते हैं इलियास की बुद्धि पर
उसे अपने साथ बिठा कर लेते हैं कई सारे चित्र
इलियास चकित और अभिभूत हो जाता है
उसके धनिए की गन्ध हमें याद दिलाती है
अन्नपूर्णा की रसोई !

इलियास हमें विदा करते हुए
हमारी ओर बढाता है
हरे धनिए का एक बड़ा सा गुच्छा
जिसे हम नहीं-नहीं कहते हुए भी
सँभाल कर रख लेते हैं अपनी कार में !

कवि नरोत्तमदास नहीं मिलते
हमें अपने घर में
फिर भी हमें
रह-रह कर याद आता है सुदामा चरित्र
बस अब सुदामा का स्थान
इलियास ने ले लिया है,
जो चलते हुए कहता है
साहब, मेरा नाम इलियास धनियावाला नहीं
इलियास बिजलीवाला है,
कोई काम हो तो ज़रूर बताना
बाड़ी गाँव में सब जानते हैं मुझे !

इलियास हाथ हिला रहा था
और हम कवि-द्वार से निकल चुके थे ।

हम सुदामा से मिल कर लौट रहे थे !

 

मत्स्य कन्या का जादू

उस सुबह रोज़ की तरह
आसमान से झाँक रहा था सूरज
हल्के बादल ज़रूर थे पर हवा तेज़ नहीं थी
फिर भी समुद्र में कल्लोल करने के लिए
इठला रही थीं किनारे पर बंधी नावें
पीटर और पोनम्मा सम्भाल रहे थे
अपना नायलोन से बना
मछली पकड़ने का जाल
वे हर रोज़ निकलते हैं इसी व्यवसाय-यात्रा पर !

अद्भुत कहानी है पीटर और पोनम्मा की
जिसे मैंने कल रात
सेण्ट जोसफ चर्च के पादरी से सुना
चलिए आपको भी सुनाता हूँ ।

मछुआरों के बच्चे नहीं खेलते गिल्ली-डण्डा
उन्हें पसन्द नहीं फुटबॉल या हॉकी
वे तो बस चलना सीखते ही
उतर पड़ते हैं समुद्र में
किशोर होते ही सिलने लगते हैं
नायलोन का फटा जाल
जिसे रोज़ घायल कर देती हैं
शैतान मछलियाँ
वयस्क होते ही मछुआरों के बच्चे
समुद्र पर दौड़ाने लगते हैं नावें
जैसे अमीरों के बच्चे
खुली सड़कों पर दौड़ाते हैं स्पोर्ट्स बाइक
वे भयभीत नहीं होते
काले, हरे, नीले उछलते जल से
वे जल से प्रेम करने लगते हैं ।

बाईस साल का था फिलिप,
लम्बा, सुते हुए शरीर का काला नौजवान
जिस पर मरती थीं
दर्जनों मछुआरों की अंगड़ाईयाँ तोड़ती बेटियाँ
पर उसे सिर्फ़ और सिर्फ़ समुद्र से प्रेम था ।

सूर्योदय के साथ ही अपने दोस्त माईकेल को लेकर
वह निकल जाता था दूर गहरे समुद्र में
जहाँ अक्सर नहीं जाती थीं दूसरी नावें
समुद्र में फेंक कर जाल वह रोज़ बजाने लगता था
मैडम लुई से मिला माउथ-ऑर्गन
जिससे निकलती थीं नई-नई अनोखी धुनें ।

दहाड़ते समुद्र पर फेन की तरह ही
लिपट जाती थीं स्वर लहरियाँ
दसों दिशाओं से
लौट-लौट आती थीं स्वर-लहरियाँ
माईकेल बताता है
उनके जाल में दूर-दूर से
चली आती थीं मछलियाँ
जिन्हें वे उड़ेलते रहते थे अपनी नाव में
पर फिलिप बजाता ही रहता था माउथ-ऑर्गन
असल में उसे समुद्र पर नाचतीं
माउथ-ऑर्गन से निकली
जादुई धुनों से हो गया था प्यार ।

एक दिन फिलिप मस्त होकर बजा रहा था माउथ-ऑर्गन
माईकेल समेट रहा था मछलियों से भरा जाल
अचानक समुद्र से निकली
किसी अप्सरा-सी सुन्दर एक मत्स्य-कन्या
जिसने झाँका फिलिप की आँखों में
कुछ देर के लिए शरमा कर सूर्य छुप गया बादलों में
और वे दोनों किसी प्रेमी युगल की तरह
गायब हो गए उत्ताल समुद्र में ।

कितना चिल्लाया माईकेल पर लौटा नहीं फिलिप
उसे ही लौटना पड़ा
तपती दोपहरी में फिलिप के बिना ही ।

किसी ने विश्वास नहीं किया माईकेल पर
यहाँ तक की चर्च के पादरी ने भी,
कन्याकुमारी मन्दिर के पण्डों ने भी नहीं किया
जो अक्सर उन्हें मत्स्य-कन्याओं और जल-परियों की
कहानियाँ सुनाया करते थे ।

एक दिन चर्च के हॉल की खिड़की से झाँकते हुए
दोपहर की आँखें चौंधिया देने वाली चमक में
पोनम्मा ने देखी समुद्र पर नाचती एक जल-परी
जिसके साथ था
माउथ-ऑर्गन बजाता उसका साँवला-सा फिलिप।

बस उस दिन से पीटर और पोनम्मा
रोज़ सुबह-सुबह निकल पड़ते है अपना जाल लेकर
वे पकड़ना चाहते हैं उस मत्स्य-कन्या को
जिसने अपने प्रेम में
फिलिप को बन्दी बना लिया है ।

अगर मैं पोनम्मा के कहे पर विश्वास करूँ तो
वहाँ दूर समुद्र में
अब भी बज रहा है माउथ-ऑर्गन
बस फिलिप को छुपा लिया है
उस ख़ूबसूरत जादूगरनी ने !

 

शिखण्डिनी का प्रतिशोध-1

शर-शैया पर लेटे हैं देवव्रत भीष्म
हारे हुए जुआरी की तरह शिथिल होकर
दक्षिणायन हो रहे हैं सूर्य !

रुक गया है दसवें दिन का युद्ध
सभी योद्धा भूल कर अपने घाव
पंक्तिबद्ध खड़े हैं पितामह के चारों ओर !

भीष्म मृत्यु का वरण नहीं करेंगे
बूढ़े सूरज की साक्षी में
उन्हें जीवित रहना होगा
जब तक सूर्य नहीं आएगा उत्तरायण में
अभी तो धर्म किसी झुकी पताका पर लटका हुआ
खोज रहा है अपनी नई परिभाषाएँ !

बाणों से बिन्धा शरीर दे रहा है
अथाह दर्द की अनुभूति
क्षत्रिय हो कर भी कराह रहे हैं भीष्म
क्या मृत्यु से पूर्व बदल जाता है मनुष्य का वर्ण और स्वभाव ?

वह देखते हैं अर्जुन की ओर
कहते हैं –- लटक रहा है मेरा शीश धनंजय,
इसे सहारा दो !

जानते हैं अर्जुन मृत्यु से पूर्व इस अवस्था में
धरती नहीं सह पाएगी उनके शीश का बोझ
फिर से कैसे चलाएँ पितामह पर तीर ?

गरजती है पितामह की वाणी
अब सीधी नहीं टिक पा रही मेरी गर्दन
मुझे कष्ट मुक्त करो अर्जुन !

अर्जुन उनके चरणों में प्रणाम कर
शीश को बेध
लगा देते हैं तीरों का तकिया
आशीष दे पुलकित हो जाते हैं देवव्रत
अब वह रात्रि से संवाद करना चाहते हैं !

क्या कोई मृत्यु की प्रतीक्षा में
नींद ले पाता होगा ?
मुझे लगता है नहीं,
भीष्म भी सो नहीं सकते शर-शैया पर
कई रातें बीतेगी स्वप्नों की तरह
इस दीर्घ शापित जीवन की
अद्भुत इच्छा मृत्यु की प्रतीक्षा में !

शिखण्डिनी का प्रतिशोध-2

आसमान में छाए हैं घने बादल
कहीं ऐरावत के शीश पर सिर रख कर
रो रहा होगा चाँद
स्मृतियाँ तैर रहीं हैं भीष्म के मन में
जैसे समुद्र में तैरता है
कोई तूफ़ान में नष्ट हुआ जहाज़
बहुत लम्बी होगी
जीवन की यह अन्तिम-यात्रा !

भीष्म के कान सुनते हैं
अपने आसपास हंसों की चहल-कदमी,
ये ऋषिगण हैं जिन्हें भेजा है माँ गंगा ने
इस रूप में
अपने धर्म स्वरूप पुत्र की
प्रदक्षिणा करने के लिए
हिमालय पुत्री गंगा
अब धरती पर लौट नहीं सकती
अपने पुत्र का सिर स्पर्श करने के लिए !

भीष्म की बन्द पलकों में
झाँकती है माँ गंगे
अब भी वे उसी तरह पकड़े हैं माँ का आँचल
जैसे कभी उन्हें सौंपा था
स्वर्ग लौटती गंगा ने महाराज शान्तनु को !

वह सोचते हैं
काश, इन क्षणों में
माँ, तुम होती मेरे पास
मैं खोलता हृदय की एक-एक गाँठ
मृत्यु का क्या है, पिता के वरदान से
वह तो सदा ही मेरे अधीन है
मुझे तो उसकी प्रतीक्षा करनी ही होगी
सूर्य के उत्तरायण में आने तक !

माँ, धर्म स्वरूप भीष्म ने भी
कई बार किया धर्म का तिरस्कार
उसे देनी चाही नई परिभाषा
पर माँ, वह तो मेरा अहम् था
उससे कैसे पारिभाषित होता धर्म ?

माँ सत्यवती की प्रसन्नता के लिए
भाई विचित्रवीर्य के गृहस्थ के लिए
मैंने किया काशी नरेश की तीन पुत्रियों का
स्वयंवर से अपहरण
अपने राजमद में चूर होकर
क्या यह न्यायोचित था ?

मंत्रियों ने और ब्राह्मणों ने यह कह कर
सदा की तरह ही बोला था
एक ऐतिहासिक झूठ
कि भीष्म तुम तो धर्म के अवतार हो
अधर्म कर ही नहीं सकते !

रथ में बैठी हुई
अम्बा, अम्बिका और अम्बालिका
की आँखों में छलक रहा था
भय और अपमान का सागर
वे नहीं जानती थीं
कि मैं उन्हें सौंपना चाहता हूँ
एक ऐसे पुरुष को
जिसमें अपना निज पौरुष है ही नहीं,
पौरुष होता तो वह स्वयं
उपस्थित हो सकता था स्वयंवर में !

मैं शाल्व आदि समस्त राजाओं को पराजित कर
आख़िर क्यों उठा लाया था
काशीराज की तीन कन्याओं को,
माँ, तब क्यों नहीं उद्वेलित हुआ धर्म
क्यों नहीं देवताओं ने पकड़ा भीष्म का हाथ
जब ब्रह्मचारी होकर भी
वह कर रहा था
इन कन्याओं का अपहरण ?

माँ, मृत्यु सभी को आती है
किसी न किसी कारण के साथ
मृत्युजित भीष्म के लिए भी
यह अपवाद नहीं है;
भीष्म मृत्युपर्यन्त दोषी रहेगा
अम्बा के अनुचित अपहरण का
जिसने नहीं किया स्वीकार विचित्रवीर्य को
कैसे भूलूँ
समय के इस दुखद काल क्रम को !

अतीत की स्मृतियों की
गहरी परछाईयों में खो गए हैं भीष्म
उन्हें रह-रह कर याद आ रही है
एक बार-बार घायल होती
स्त्री की कहानी
इतिहास जिसे अम्बा,
शिखण्डिनी या शिखण्डी के नाम से जानता है !

आओ सुनते हैं
अम्बा की यह अद्भुत कहानी !

शिखण्डिनी का प्रतिशोध-3

स्त्री का भाग्य हर युग में
लिखते ही रहे हैं पुरुष
चाहे वह राजपुत्री हो या ग़रीब भिखारिन
आख़िर है तो चल-सम्पत्ति ही !

हम गढ़ते हैं उन्हें प्यालों की तरह
जिनमें पी सकें जीवन का अमृत
जब चाहे तोड़ कर उठा लें, फिर नया
और वे रंगीन चमकते प्याले
रह जाएँ सदा के लिए प्यासे और अतृप्त !

जिसे हम मानव सभ्यता कहते हैं
उसमें इससे अधिक असभ्य
और क्या होगा भला
कि आप जिसे माँ कहते हैं
वह आपके वंश की क्रूरता सह कर ही
पहुँचती है इस सम्मान तक ?
और आपने ही बताया है उन्हें
कि हमारी क्रूरता भी सम्मान ही है
चूँकि समाज के विधान का नियमन
हम ही करते हैं !

सत्यवती के चरणों में बैठी हैं
तीनों अपहृत कन्याएँ
जिनका विवाह किया जाना है
हस्तिनापुर के राजा विचित्रवीर्य से !

पुरोहित कर रहे हैं
विवाह कर्म की तैयारियाँ
सत्यवती प्रसन्न है भीष्म के बाहुबल पर
गंगा-पुत्र यदि अपहरण न करते
काशीराज की कन्याओं का
तो क्या होता बेचारे विचित्रवीर्य का ?
पुरुष जैसा भी हो छल या बल से
पा ही लेता है सुन्दर-सुशील स्त्रियाँ
ऐसे ही बनाया है
हमने अपना समाज !

अम्बा धैर्य जुटा कर कहती हैं भीष्म से,
मैं प्रेम करती हूँ राजा शाल्व से
और मन से उसे मान चुकी हूँ अपना वर
कुरुवंश में आकर भी
मैं मन से नहीं हो पाऊँगी इस वंश की
आपके भाई से मेरा विवाह
धर्म-सम्मत नहीं होगा देवव्रत !

तत्काल पुरोहितों और न्यायविदों से
परामर्श लेते हैं भीष्म और सत्यवती
निर्णय लिया जाता है
कि वृद्ध ब्राह्मणों और धात्रियों के साथ
अम्बा को विदा किया जाए
राजा शाल्व के नगर के लिए !

प्रेम की यात्रा पर
हस्तिनापुर छोड़ कर
बढ़ चली है अम्बा
उसके मन में है आशाओं और आकाँक्षाओं
का डोलता समुद्र
तेज़ी से धड़क रहा है हृदय
जिसमें धीमे-धीमे बज रहा है जलतरंग
आगे बढ़ते घोड़ों की टापों के साथ !

सोच रही है अम्बा
पता नहीं पुरुषों को चाहिए अपना प्रेम
या सामाजिक मूल्यों की आदर्श परिणिति ?

स्त्रियाँ सदा ही झूलती रहीं हैं
इस तलवार की धार पर !

शिखण्डिनी का प्रतिशोध-4

इतिहास का सबसे निष्ठुर प्रकरण है
स्त्री का प्रेम माँगने जाना
किसी पुरुष के पास
उसे याद दिलाना
कि वह समर्पण कर चुकी है
उसके पौरुष के समक्ष
और उसका संसार सीमित होकर रह गया है
मात्र उस पुरुष तक ही;
अम्बा भी गुज़र रही है इस निर्दय क्षण से
वह पहुँच गई है, राजा शाल्व के द्वार पर !

शाल्व बैठे हैं अपने मंत्रणाकक्ष में
भीष्म से मिली करारी हार
और शरीर पर लगे घावों का
उपचार कराने के लिए
चिकित्सकों और मन्त्रियों के बीच;
वहाँ उपस्थित होकर कहती है अम्बा -–
महाबाहो ! मैं आपकी सेवा में उपस्थित हूँ !

कुटिल मुस्कुराहट आती है शाल्व के चेहरे पर
अम्बा की आँखों में देखकर कहता है शाल्व —
सुन्दरी, अब मेरा तुमसे कोई सम्बन्ध नहीं
तुम्हें छू चुका है भीष्म,
बलात् ले जा चुका है हस्तिनापुर के महलों में
मैं तुम्हें नहीं स्वीकार कर सकता पत्नी के रूप में !

कातर स्वर में बोलती है अम्बा –-
राजन, मैं पवित्र हूँ किसी कन्या की तरह
मेरे मन में बस आप ही आए थे
पति रूप में,
आपकी छवि सहेज कर मैं नहीं कर सकती थी
भीष्म के भ्राता से विवाह
मैं नहीं करना चाहती थी अपने प्रेम का अपमान
इसलिए लौट कर आई हूँ
अपने प्रियतम के निमित्त !

मैं भले ही पराजित और अपमानित क्षत्रिय हूँ
पर राजधर्म से बंधा हूँ
मेरी प्रजा मेरे मूल्यों का अनुकरण करती है
मैं तुम्हें त्याज्य मानता हूँ, अम्बा,
जाकर उस भीष्म से विवाह करो
जो किसी वर की तरह तुम्हें उठा ले गया था
स्वयंवर से बाँह पकड़ कर !

शाल्व हाथ जोड़ कर उठ खड़े हुए हैं
किसी अपरिचित की तरह
अम्बा को विदा देने के लिए !

सूर्य छिपा लेना चाहता था
अपना शर्म से लाल हुआ चेहरा,
इन आतताई क्षणों में अम्बा ठहर गई थी
पर्वत से उतरी किसी नदी की तरह
जो अब बहते हुए आ गई थी
किसी रेगिस्तान में
स्त्रियों का सम्मान और अस्मिता
शायद इसीलिए हमें आज भी मिलते हैं
इतिहास की पुस्तकों में
लुप्त हुई नदियों की तरह !

इतिहास में अम्बा का रुदन अलग नहीं था
यह रुदन एक स्त्री का भी नहीं था
यह स्त्री होने की नियति का रुदन था ।

शिखण्डिनी का प्रतिशोध-5

तिरस्कृत स्त्री की आँखों में
नहीं होते आँसू
भस्म हो चुके होते हैं उसके सारे स्वप्न
हृदय में खौलता है गरम लावा
और वह फट जाना चाहती है
किसी ज्वालमुखी की तरह !

किसी अदृश्य चौराहे पर खड़ी है अम्बा
जहाँ से कोई रास्ता नहीं जाता
भविष्य और जीवन की ओर;
पर वह नहीं कर सकती मृत्यु का वरण
क्योंकि वह समय के हाथों
छली गई है,
हारी नहीं है !

वह जानती है, शाल्व की तरह ही
अब उसे स्वीकार नहीं करेंगे
उसके बन्धु-बान्धव,
और राजा विचित्रवीर्य भी
सत्य है, ओस की एक बून्द
फूल से टपकते ही
बन जाती है कीचड़ का हिस्सा !

ढलती साँझ में, अम्बा शरण लेती है
तपस्वियों के आश्रम में
जिनका सुझाव है —
स्त्री के दो ही आश्रय होते हैं
पिता या पति !

अम्बा नहीं लौटना चाहती काशी
और अब उसे प्रतीत होता है
पति तो उसके भाग्य में,
है ही नहीं,
पर वह क्षमा नहीं कर सकती
अपने अपहर्ता भीष्म को !

आश्रम में अम्बा मिलती है
अपने नाना ऋषि होत्रवाहन से
जो उसे मिलवाते हैं
जमद्ग्निनंदन परशुराम से,
सम्भव है भीष्म के गुरु परशुराम
कर सकें भीष्म को विवश
किसी सम्मानजनक व्यवस्था के लिए !

अम्बा की व्यथा से
द्रवित होते हैं परशुराम
करते हैं घोषणा –-
मैं भीष्म को आज्ञा दूँगा
कि वह तुम्हें स्वीकारे कुरुवंश में
अन्यथा उसे भस्म कर दूँगा मन्त्रियों सहित !

परशुराम, अम्बा और अनेक ब्रह्मज्ञानी ऋषि
भीष्म से मिलने सरस्वती के किनारे
पहुँचे हैं कुरुक्षेत्र !

भीष्म आदर के साथ करते हैं
गुरुदेव का स्वागत और चरण-वन्दना
आशीष देते हैं परशुराम
और बताते हैं अपने आगमन का निमित्त !

भीष्म, ब्रह्मचारी होकर भी तुमने स्पर्श किया है
काशी नरेश की पुत्री अम्बा को;
अतः नष्ट हो गया इसका स्त्री-धर्म
इसी आधार पर शाल्व ने किया है इसका तिरस्कार
अब अग्नि की साक्षी में
तुम करो इसे ग्रहण
या करे तुम्हारा भाई विचित्रवीर्य !

गुरुदेव, मैं तो आजन्म ब्रह्मचारी ही रहूँगा
आप जानते हैं मैंने लिया है यह व्रत
और अब विवाह तो विचित्रवीर्य से भी
सम्भव नहीं अम्बा का
क्योंकि इसका रहा है राजा शाल्व से प्रेम,
हस्तिनापुर का राजमहल नहीं स्वीकार कर सकता
ऐसे चरित्र की किसी स्त्री को अपने वंश में,
क्षमा करें गुरुदेव !

एक बार फिर द्ग्ध हुई
काशी कुमारी अम्बा !
और क्रुद्ध होकर परशुराम ने भीष्म को ललकारा
कुरुक्षेत्र के मैदान में
द्वंद्व-युद्ध के लिए !

कई दिन चलता रहा
एक स्त्री के सम्मान के निमित्त
भीष्म और परशुराम का यह युद्ध
बिना हार-जीत के !

वसु-देवताओं ने विश्वास दिलाया भीष्म को
कि परशुराम से पराजित नहीं होगे तुम
पर पराजित नहीं होंगे परशुराम भी,
तो क्या सृष्टि के अन्त तक चलेगा यह युद्ध ?

यह लो प्रस्वाप नाम का अस्त्र
और इसका सन्धान करो परशुराम पर
वह मूर्छित हो जाएँगे लम्बी अवधि के लिए
और तुम हो जाओगे विजयी !

युद्ध के मैदान में भीष्म परशुराम पर
साधना ही चाहते थे प्रस्वाप
कि नारद जी प्रकट हो गए —
अपने गुरु पर इसका प्रयोग मत करो भीष्म
उनका सम्मान करो !

भीष्म ने रोक लिया प्रस्वाप
और प्रसन्नता से परशुराम ने
उन्हें लगा लिया गले से !

स्त्री की मर्यादा लौटाने के लिए लड़ा गया युद्ध
समाप्त हुआ इस सन्धि के साथ
कि लड़ना तो क्षत्रिय का ही धर्म है
ब्राह्मण का धर्म तो स्वाध्याय और व्रतचर्या ही है
स्त्रियों का क्या वे तो भूमि की तरह हैं
जिन्हें हल की नोंक से
रौंदा ही जाता है अच्छी फ़सल के लिए !

एक बार फिर हतप्रभ थी अम्बा
उसके हृदय का लावा
धधकते हुए खौल रहा था
भीष्म को समूल भस्म करने के लिए !

इतिहास साक्षी है
स्त्रियाँ छली गई हैं,
वे हारी कभी नहीं !

शिखण्डिनी का प्रतिशोध-6

कुरुक्षेत्र के मैदान में
अब सिर्फ़ धूल ही बची है
जैसे अम्बा के हृदय में बस गया है
दुःख और विषाद !

परशुराम गर्दन झुका कर चले गए हैं
महेन्द्र पर्वत की ओर
और भीष्म दल-बल सहित
वापस लौट रहे हैं हस्तिनापुर !

अम्बा जान गई, स्त्री के लिए न्याय,
समानता और सम्मान
आचार्यों के प्रवचनों का ही विषय हैं
अम्बा इन्हें खोज नहीं पाई
पुरुषों की दुनिया में,
इसलिए अब उसे चाहिए
केवल भीष्म की मृत्यु !

अम्बा ने कुरुक्षेत्र से निकल कर
राह ली श्यामवर्णा यमुना की
जिसके तट पर
उसने आरम्भ किया अलौकिक तप !

बारह वर्ष तक
केवल वायु और पत्रादि का भक्षण करते हुए
सूख कर काँटा हो चली थी अम्बा
पर भरी थी उसके भीतर बदले की आग
जैसे काष्ठ में रहती है अग्नि !

तप के प्रभाव से
उसका आधा शरीर बन गया,
अम्बा नाम की एक नदी
और आधे शरीर से वह बनी
वत्सराज की कन्या,
आश्चर्य, उसे अब भी याद था
अपना अभीष्ट !

इस जन्म में भी
अम्बा करती ही रही तपस्या
हार कर प्रकट हुए भोलेनाथ !
प्रसन्न होकर शिव ने पूछा –-
क्या चाहिए तुझे, पुत्री ?
भीष्म का नाश,
इसके सिवाय
मुझे कुछ नहीं चाहिए, त्रिपुरारी !

तथास्तु, शिव ने कहा,
पर संशय में पड़ गई अम्बा !
प्रभो, मैं स्त्री होकर
कैसे कर पाऊँगी भीष्म का नाश ?

तुम्हारा जन्म होगा राजा द्रुपद के घर
कन्या रूप में ही
तुम स्त्री देह और मन के साथ भी
अवश्य ही प्राप्त करोगी पुरुषत्व
और यह घटनाक्रम याद रहेगा
तुम्हें और भीष्म को भी !

तुरन्त चिता बना कर
भस्म हो गई अम्बा
उसे तो जल्दी थी
भीष्म की मृत्यु बनने की !

इतिहास साक्षी है
स्त्रियाँ कभी नहीं जी पाईं
सिर्फ़ अपने लिए,
वे या तो जीवित रहीं प्रेम में
या उन्होंने किया मृत्यु का वरण
उनके लिए जीवन और मृत्यु
सदा रहे दिन-रात की तरह
एक दूसरे में समाहित
और एक दूसरे से अलग !

शिखण्डिनी का प्रतिशोध-7

 सृष्टि को चलाती हैं स्त्रियाँ
पुरुष के अवदान से
जैसे उपजते हैं अन्न, फलदार पेड़
भूमि के गर्भ से
पर किसान सदा चिन्तित रहता है
अच्छे बीज के लिए
वह अक्सर भूल जाता है उस धरती को
जिस पर लहलहाती है फ़सल
ऐसा ही होता है हमारे समाज में
स्त्रियों के साथ !

वे बढ़ाती हैं हमारी वंश-बेल
पर उनके जन्म की
कोई नहीं करता कामना
वे आती हैं अयाचित और विदा लेती हैं
किसी भिक्षु की तरह;
भूमि का अंश
अन्ततः मिल जाता है भूमि में ही,
मिट्टी होकर !

सन्तान पाने के लिए ही
तपस्या करते हैं पांचाल देश के राजा द्रुपद
और माँगते हैं शिव से एक पुत्र,
प्रसन्न होते हैं शिव और कहते हैं —
द्रुपद देता हूँ तुम्हें वरदान सन्तान प्राप्ति का
पर होगी यह कन्या !

धर्म कहता है
दूसरे का वंश चलाती हैं कन्याएँ
कैसे सन्तुष्ट होते राजा द्रुपद
पुनः प्रार्थना और अर्चना की जाती है पुत्र के लिए ।
मैं बदल नहीं सकता अपना वरदान
पर देता हूँ यह वरदान भी
कि दैव इच्छा से
एक दिन पुरुष बन जाएगी तेरी बेटी !

व्यथित राजा ने कन्या के जन्म को
इस तरह प्रचारित किया लोक में
मानो पुत्र ही जन्मा हो रानी के गर्भ से !

सुन्दर और सुशील थी
राजा द्रुपद की ज्येष्ठ सन्तान
उसके केश थे घने और बहुत लम्बे
जिन्हें वह लपेटे रहती थी सिर के ऊपर
इस शिखा के कारण ही
वह कहलाई शिखण्डिनी !

पर राजा के छल ने
लोक में उसका पुरुषवाची नामकरण किया
शिखण्डी – द्रुपद का कन्या-सा कोमल, पुत्र
जिसके पुरुष बन जाने की
सदैव प्रतीक्षा थी राजा को
झूठा तो नहीं होगा शिव का वरदान !

शिखण्डी करता रहा
अनेक विद्याओं का अध्ययन
आचार्य द्रोण तथा
अन्य गुरुओं के मार्गदर्शन में
अग्नि-कुण्ड से मिले
अपने भाई धृष्टद्युम्न
और बहन द्रौपदी के साथ !

कालान्तर में शिखण्डी का विवाह हुआ
दशार्णराज हिरण्यवर्मा की
सुन्दरी कन्या अनामिका से
जिसने सुहागरात में उत्पात मचा
ले ली पितृगृह की राह
और सूचित किया अपने पिता को
कि शिखण्डी स्त्री है
और यह विवाह हुआ है धोखे से !

दशार्णराज हिरण्यवर्मा ने क्रुद्ध होकर
सन्देश भेजा राजा द्रुपद को
कि वह सप्ताह भर में करे
इस कृत्य का निस्तारण
अन्यथा पूरे दल-बल के साथ
नष्ट-भ्रष्ट कर दिया जाएगा पांचाल देश !

यह अभूतपूर्व लज्जा का समय था
शिखण्डिनी के लिए
राजा द्रुपद के लिए
और भगवान शिव के लिए भी !

शिखण्डिनी शिव से रुष्ट होकर
प्राण त्यागने के लिए
निकल पड़ी वन क्षेत्र में
और लीन हो गई कठिन तपस्या में !

शिखण्डिनी पर अन्ततः दया आई
स्थूणाकर्ण नामक यक्ष को
और उसने कुछ दिन के लिए
शिखण्डिनी को दे दिया अपना पुरुषत्व
वापस लौटा जाने की शर्त पर,
और इस बार शिखण्डिनी वन से लौटी
राजकुमार शिखण्डी बन कर !

दशार्णराज हिरण्यवर्मा की नगरवधुओं ने
शिखण्डी को दिया पुरुष होने का प्रमाण-पत्र
और इस तरह एक यक्ष की कृपा से
अपमानित होने से बच गया पांचाल देश !

वन में स्थूणाकर्ण यक्ष भोग रहा था स्त्रीत्व
और इसी बीच वहाँ उसे खोजते हुए आए कुबेर
जो उसकी स्वर्ग में
लम्बी अनुपस्थिति से बहुत नाराज़ थे,
जब उन्होंने उसे स्त्री रूप में देखा
तो कुपित हो कर शाप दिया —
अधम बहुरूपिए तू अब
जीवन भर स्त्री ही रह !

गिड़गिड़ाता रहा स्थूणाकर्ण
तब जाकर पिंघले कुबेर
उन्होंने कहा तुम फिर हो जाओगे पुरुष
शिखण्डी की मृत्यु के बाद,
यही है शिव की और मेरी इच्छा !

कुछ दिनों बाद उधार का पुरुषत्व
लौटाने के लिए स्थूणाकर्ण के द्वार पर
उपस्थित थे शिखण्डी
पर कुबेर के शाप के कारण
उसे ग्रहण नहीं कर सकता था यक्ष !

द्रुपद प्रसन्न थे
शिखण्डी के पुरुष बन जाने पर
पूरा पांचाल प्रदेश कर रहा था
शिव की जय जयकार !

एक बार फिर गम्भीरता से
शिखण्डी ने दोणाचार्य से सीखी
अदम्य धनुर्विद्या उसके चारों अंगों
ग्रहण, धारण, प्रयोग और प्रतिकार के साथ
अब वह धृष्टद्युम्न से पीछे नहीं थे
पर उनके शरीर का लोच
विज्ञजनों को किसी कमनीय स्त्री का स्मरण
अवश्य कराता था !

शिखण्डी के पुरुष शरीर
और स्त्री आत्मा में
अब भी धधक रही थी आग
और उसे प्रतीक्षा थी
उस भीष्म की जिसे सामान्यजन
धर्मावतार कहते थे !

उसे इस अवतार की
मुक्ति के लिए ही
निमित्त बना दिया गया था
अम्बा, शिखण्डिनी
और शिखण्डी जैसे नामों के साथ;
उसे तो मालूम भी नहीं था
कि वह त्रिदेवों की चौपड़ की
एक कमज़ोर गोटी भर है !

शिखण्डिनी का प्रतिशोध-8 

शीत से काँप रही है रात
आसमान में कोहरा छाया है
सैन्य कुटीरों में आराम कर रहे हैं
थके हारे, घायल और बीमार सैनिक
मानवता के विरुद्ध
युद्ध आता है किसी आपदा की तरह !

शर-शैया पर अधजगे हैं भीष्म
वायु में अटका है उनका शरीर
पर मन कब अटकता है ?
उनकी स्मृति में बार-बार तैर रहे हैं
जीवन के अनेक चल-चित्र !

वह कर रहे हैं स्वगत वार्तालाप —
बहुत हुआ भीष्म,
तुमने अच्छा नहीं किया
इतनी लम्बी आयु तक जीवित रह कर,
जो प्रकृति के विरुद्ध है
वह धर्म-सम्मत कैसे होता ?

जीवन और मृत्यु के मानक-चक्र में
तुम्हें नहीं पड़ना चाहिए था देवव्रत,
पाण्डवों और कौरवों का
अपना भाग्य भी तो होगा उनके साथ
क्या आवश्यकता थी तुम्हें उनके लिए
अपवाद बन कर जीने की ?

इस युद्ध में अर्जुन को मारना
असम्भव नहीं था मेरे लिए
पर मैं बंधा हूँ अपने चिन्तन
और संस्कारों के साथ,
माँ सत्यवती के पौत्र
क्यों मारे जाएँ मेरे अस्त्र-शस्त्र से !

सोचते हैं भीष्म,
कृष्ण को भी समझना
आसान नहीं है किसी के लिए,
योगेश्वर जानते थे शिखण्डी के समक्ष
हथियार डाल दूँगा मैं
फिर भी कल रात पाण्डवों को लेकर
उपस्थित हुए मेरे समक्ष
इस प्रार्थना के साथ
कि मैं अब कर लूँ मृत्यु का वरण ।

आज सुबह मैं अपने शिविर से निकला था
माँ गंगा के स्मरण के साथ
चारों ओर बज रहे थे भेरी, मृदंग और नगाड़े
पाण्डव सेना में सबसे आगे था शिखण्डी
और उसके साथ थे
भीमसेन, अर्जुन और अभिमन्यु
तथा पाण्डव पक्ष के अगणित महारथी
और समस्त कौरव सेना खड़ी थी मेरे पीछे !

आज निर्णायक युद्ध का पाठ
पढ़ा कर लाए थे कृष्ण अर्जुन को,
पूरे जोश के साथ लड़ रही थीं दोनों सेनाएँ
बुरी तरह परास्त हो रहे थे कौरव
पर मेरे जीवित होने का अर्थ तो अभी शेष था
और मैं अपनी पूरी शक्ति से
तहस-नहस करने लगा पाण्डव-सेना को
अपनी प्रतिज्ञा के अनुसार
मैं आज भी वध कर चुका था
दस हज़ार महाबली क्षत्रियों का
बाल-बाल बचे थे अर्जुन
क्योंकि मैं उन्हें मारना नहीं चाहता था !

और अचानक मेरे सामने आ गया शिखण्डी
उसने तीन बाण मारे मेरी छाती में
ज़्यादा कुछ नहीं हुआ मुझे !

शिखण्डी ने ललकारा मुझे –-
धनुष क्यों त्याग रहे हो भीष्म, मुझसे लड़ो
मैं तुम्हारा काल बन कर आया हूँ !

चाहे जितने बाण या अन्य अस्त्र चलाओ मुझ पर
मैं तुमसे युद्ध नहीं कर सकता शिखण्डिनी,
तुम उधार के पुरुष शरीर में
अब भी आत्मा से नारी ही हो
और भीष्म किसी नारी से युद्ध नहीं कर सकता
मैं जानता हूँ तुम अम्बा ही हो
चोट खाई नागिन-सी फुफकारती !

पाण्डवों के अस्त्र-प्रहार से
कट गई थी मेरे रथ की ध्वजा
और शिखण्डी लगातार अपने तीरों से
बेधे जा रहा था मेरा शरीर
मुझे लगा अब मृत्यु का आह्वान कर लेना ही
धर्म के हित में होगा
और इस बीच शिखण्डी की आड़ से अर्जुन ने
अपने तीरों से मेरा रोम-रोम बेध ड़ाला !

मैं रथ से नीचे गिर रहा था तीरों से आबिद्ध
और सूर्य क्षितिज पर लुढ़क रहा था
किसी मृत सैनिक की तरह !

किसी ने कहा –-
लो मृत्यु को प्राप्त हुए भीष्म !
वह नहीं जानता, मेरी इच्छा के विरुद्ध
मृत्यु आ भी नहीं सकती मेरे समीप
मृत्यु को मेरी प्रतीक्षा करनी होगी
अभी कुछ दिनों तक
जब तक सूर्य आ नहीं जाते उत्तरायण में !

शरों में उलझा है मेरा शरीर
युद्ध के रात्रि-विराम के बीच
मेरे आस-पास खड़े हैं सभी योद्धा
प्यास से सूख रहा है मेरा कण्ठ
मैं देखता हूँ अर्जुन की ओर
धरती को बेध कर तीर से
अर्जुन प्रस्फुटित करते हैं शीतल जलधार
और जल से तृप्त होती है मेरी आत्मा
मुँह से अनायास ही निकलता है — विजयी भव !

मैं नहीं जानता
इस समय कहाँ होगा शिखण्डी
सम्भव है वह मना रहा हो कोई उत्सव !

मेरी मृत्यु के लिए
जितना श्रम किया अम्बा ने
इतिहास जानेगा उसे
शिखण्डी के माध्यम से !

धर्म यदि धर्म है
तो उसका कारण भीष्म नहीं है
उसका कारण निहित है
अम्बा के प्रतिशोध में
जिसने मुझे मृत्यु देकर
धर्म की ध्वजा को
पुनर्स्थापित किया है !

 

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