राजेश शर्मा ‘बेक़दरा’

बेचैनी

न शब्द कागज़ पर,
न दिल शरीर में,
उड़ रहे हैं दोनों,
बेठिकाना…

न कागज पर कविता,
न दिल में चैन,
बेसबब उड़ान भरते,
दो परिंदे,
पर कटवाने को बैचेन…

तैयारी

तैयारी
उड़ने से पहले,
परिंदे मजबूत कर लेते है,
अपने परों को

हम भी,
मजबूत कर लेते है खुद को,
कुछ रिश्ते छोड़ने से पहले…

शर्त

यह देह,
साक्षी है,
त्याग क़ी,
इंतज़ार क़ी…

तुम पढ़ना,
ज़रूर पढ़ना,
पढ़ पाओ तो,
पढ़ ही लोगे,
यदि प्रेम है..

बेक़दरा

जब तक रहा
सिर्फ बेक़दरा रहा
अब जब वो जाने लगा
सिर्फ धुँआ-धुँआ
नजर आने लगा
जैसे ही वो गया
सब कहने लगे
लो जी ये गया
वो गया
इधर गया
उधर गया
हां!
अच्छा था
सच्चा था
अब गया तो गया
क्या कीजिये
लाख समझाया था
फिर भी
कहाँ माना था
खुद की प्यास में
शामिल करना
चाहता था
ले मिटा ले अबअपनी अतृप्ति!,
कोई क्यों चले साथ तुम्हारे?
समाज,
मर्यादा,
दुनियादारी,
कुछ होती है कि नहीं?
बड़ा आया था
बड़ी बड़ी बाते करने,
इतना भी नहीं सोचा
यहाँ पत्थर में,
देवता नहीं मिलते,
ये चला था इंसानोमें देवता ढूंढने
लो अब मर गया न?
हो गयी न तस्सली
बस अब पड़ा रह
इस मिट्टी मेँ अकेला
बहुत चला था
प्रेम!
समर्पण!
बड़ी बड़ी बातें करने

जब तक रहा
सिर्फ बेक़दरा रहा…

मैं मिलूँगा

रह रह कर याद आएंगे…
ये क्षण…
रूठना मनाना…
हँसना हँसाना…
मैं मिलूँगा…
जरूर मिलूँगा
नम आँखों में
भीगे रूमालों में

भाग्य

बीज खुद में समेटे हैं पूरा वृक्ष
तना,
पत्ते,
फल,
बीज,
छाया,
अंकुरण उसका भाग्य
तुम में भी बिखेरे हैं
मैने प्रेम बीज
प्रेम,
प्रतीक्षा,
आलिंगन…
मेरा भाग्य

 

.

यूँ ही

क्या सोचते हो?
यूँही ख़त्म हो जायेगा?
सूर्य का ओज
चन्द्रमा की चांदनी
धरती की प्यास
समुन्दर का जल
और मेरा प्रेम

 

प्रेमालिंगन

वो खड़ा रहा चट्टान की भाँति
स्वयं पर गर्वित
वो आलिंगन करती गुजरती रही नदी की भाँति
वो फिर भी खड़ा रहा चट्टान की भाँति
फिर यकायक
वो बालू नदी के साथ चल पड़ी
आलिंगन करती प्रेम करती…

नियति

मैं
जाने कितने रिश्तो में विभाजित
खण्डित…

मगर
उसकी उपस्थिति
जोड़ने लगती है
और फिर
जुड़ने लगता हूँ
दौड़ने लगता हूँ
उसकी ओर
मुक्त होने के लिए

लेकिन…
शनै: शनै:
वो भी टूटने लगी है
मेरी तरह
कई हिस्सों में

और दूर खड़ी नियति
सिर्फ अट्टहास करती रहती है…

ज़िन्दगी

पलके बंद करके सोचता हूँ
जिंदगी को ढो रहा हूँ
सिर पर,
जैसे मजदूर ढोता है
सर पर
बोरा भर रेत,
दुनिया के लिए
यह रेत भर है
लेकिन मजदूर के लिए
बच्चो के खिलौने है
परिवार के लिए अन्न के टुकड़े हैं

लेकिन मैरे बच्चे के पास खिलौने
और परिवार के पेट में अन्न हैं

फिर क्यों ढो रहा हूँ
जिंदगी को रेत की तरह
और टूट रहा हूँ

मजदूर की झुकती कमर की तरह
शायद मेरे सर पर
रखे बोरेमें
उम्मीदे दबी हैं
उम्मीदों का पेड़
यूँही नहीं उग आया
कुकरमुत्ते की तरह
इसमें अनजाने में बोये गये थे
एहसास के कुछ बीज
जो किसी
शाब्दिक परिभाषाओं से
मुक्त थे
वो बीज बिखर गए
इधर उधर यूँही अचानक
वही बीज फूटने लगते है
यही बीज सबके अपने अपने होते हैं
जो मजबूर करते रहते हैं
जिंदगी को ढोने के लिए
बोरे भर रेत की तरह…

चुन लेना या तज देना

मै नहीं पहुँचूँगा
तुम तक
पहुचेंगे मेरे एहसास
कुछ शब्द बनकर…
और बिखर जाएंगे
तुम्हारे इर्दगिर्द
चुन लेना उनको
फ़ूल समझकर
या तज देना
काँटे समझकर

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