राजेश शर्मा की रचनाएँ

अक्षत,हल्दी छूकर सपने

अक्षत,हल्दी छूकर सपने, द्वारे-द्वारे जाएंगे
शायद कुछ लौटे आमंत्रण,अब स्वीकारे जाएँगे

जबसे कोई मौन ,दृगों पर, होकर एकाकार बँटा,
मन के भीतर जाने क्या-क्या,जाने कितनी बार बँटा
गीतों के घर , मुझसे पहले, ये बँटवारे जाएँगे

पूछे दो बूंदों का सागर, पनघट रीत कहाँ बैठा है,
दिखतीं जहाँ परिधियाँ केवल, मेरा मीत वहां बैठा है
नहीं पहुचती जहाँ कल्पना,क्या हरकारे जाएँगे

पलक- पाँवडों की पीड़ा ने, विकल किया फिरसे तन-मन,
बाहर खुशबू , भीतर-भीतर,एक सुलगता चन्दन वन
कैसे अंगारों पर चलकर ,दिन, पखवारे जाएँगे

काँधों पर सूरज को ढ़ोया, आँखों में बरसात कटी,
आते-जाते दिन बीता और,गाते-गाते रात कटी
लेकर सजल उनींदी आँखें ,हम भिनसारे जाएँगे

फिर लहर तट छू गयी इस बार

फिर लहर तट छू गयी इसबार,नदिया क्या करे.
सामने थी प्यास की मनुहार, नदिया क्या करे.

हिम-शिखर के बाद छूटी हिम-नदी जैसी सहेली.
देवदारों में उछलती, कूदती फिरती अकेली.
एक हिरनी ले गयी आकार नदिया क्या करे.

उलझनों ने भी सिखाया,खीझकर राहें बदलना.
था कठिन कलुषित वनों के बीच से बचकर निकलना.
पाहनों ने रोक ली थी धार, नदिया क्या करे.

याद है वो पेड़,जिसने बाढ़ में,तन-मन छुआ .
तब लगा ऐसा दहकती आग ने मधुवन छुआ .
स्वप्न तो होते नहीं साकार, नदिया क्या करे.

बांध ने बंदी बनाया, कस लिया तटबंध ने .
सीस से तल में उतारा सिन्धु की सौगंध ने.
रस-प्रिया को रेत का आधार,नदिया क्या करे.

क्यों छुएँ हम दौड़ कर

क्यों छुएँ हम दौड़ कर,कुछ पल नए, जबकि हर इक पल हमारे साथ है.
खोजतीं पीछे फिरेंगी मंजिलें ,कौन सा संबल हमारे साथ है.

बस तनिक सा और चलकर आदमी,बैठ कर बातें करेगा मातमी,
राह के मीठे कुंए चुक जाएँगे ,तुम बचा रखना कहीं अपनी नमी.
प्यास मरुथल की सताएगी हमें ,और थोड़ा जल हमारे साथ है.

खूब भर जाए दिशाओं में ज़हर,आँधियों का कोप हो आठों पहर,
जो घरोंदा हो किसी पीड़ा तले, छू नहीं सकती उसे कोई लहर.
क्या उड़ाएगी हमें बहकी हवा,गीत विन्ध्याचल हमारे साथ है.

पारदर्शी छतरियाँ हैं धूप में ,दाग़ तो कोई लगेगा रूप में,
वो, कि यायावर जिसे जीवन मिला, जी नहीं सकता किसी प्रारूप में.
हम ऋणी हें धूप के, बरसात के,जन्म से बादल हमारे साथहै.

भर आए परदेशी छालों से पाँव

भर आए परदेशी छालों से पाँव, चलो लौट चलें.
दुखियारे तन-मन से गीतों के गाँव, चलो लौट चलें.

मितवा रह जाएगा,पाँखों को भींच कहीं,
उड़ता है क्यों मनवा,आँखों को मीच कहीं.
भीतर तक बींध गया,मरुथल का पैनापन,
अपने ही बिरवा को,आँसू से सींच कहीं.
रेतीले टीलों पर,क्या देखें छाँव,चलो लौट चलें.

फिर सागर नयनों में,खारापन छोड़ गया,
धरती को अम्बर तक,लहरों से जोड़ गया.
मौसम की साजिश पर,ऐसे मतभेद हुए ,
जाते-जाते माझी,पतवारें तोड़ गया.
फिर से तूफानों में,घिर आई नाव,चलो लौट चलें.

पलकों की सुधियों से जाने क्या बात हुई,
तन-मन सब भीग गया,ऐसी बरसात हुई.
सूरज के बदली से टूटे अनुबंध सभी,
कांधों पर दिन निकला,आँखों में रात हुई.
कब तक अंधियारों में भटकेंगे पाँव,चलो लौट चलें.

चलते-चलते बंजारों को

चलते-चलते बंजारों को,बात अधूरी कह जाने दो,
टुकड़ा-टुकड़ा,दर्द अनपिया,आंसू बनकर बह जाने दो.

जग का खारापन पीते हें,लहरों सा जीवन जीते हें,
स्वाति-बूँद की लिए प्रतीक्षा,सीप हुए पल-छिन बीते हें.
सागर की तह के अभिलाषी,तिनके के सँग बह जाने दो.

इमली,जामुन,बेर,करौंदे, पागल मन के नेह घरोंदे
एक सांत्वना दे जाते हें, तूफानों ने जब-जब रोंदे.
स्वप्न-महल के वासी हो तुम,माटी के घर,ढह जाने दो.

तृष्णा ने दिन भर भटकाया,खुद से भागा,खुद तक आया,
सम्मोहन ने जाल बुने हें,सूरज डूबा, तम गहराया .
मन के पंछी लौट चले हें,साँझ हुई अब घर जाने दो.

किंचित कभी हवा पगलाए,घायल संवेदन सहलाए ,
बिरह की मारी, कोइ बदरिया,नयनों में सावन भर लाए.
कोई मीत

आँख भर आई सुरों की

आँख भर आई सुरों की,याद आई है कहानी ,
आज फिर सोने न देगा,रेत को नदिया का पानी.

आज देना ही पड़ेंगे, आँधियों को भी जवाब,
फिर सवालों पर,उतर आए,किताबों के गुलाब.
जिन गुलाबों से लिपट कर,खूब रोई रातरानी.

युग हुए पदचिन्ह धोए,फासलों के दर्द ने,
मील के पत्थर भी डूबे,काफ़िलों की गर्द में,
और चला है एक पागल,ढूंढने खोई निशानी.

बस धरे रह जाएँगे तब, बांध के छल-छंद सारे,
ये नदी बह जाएगी फिर,तोड़ कर तटबंध सारे,
जब घटाओं से गिरेगा,टूटकर बरखा का पानी.

आँख में जब तक है सागर,और अधर पर प्यास है,
साँस में सदियों से बिछुड़े,गीत का आभास है,
देखना तब तक रहेगी, बांसुरी की जिंदगानी .

लिपट कर रोए ,गीत यहीं पर रह जाने दो.

 

अबकी बार कहाँ ले जाएँ

अबकी बार कहाँ ले जाएँ ,ये व्यापार कहाँ ले जाएँ,
ढाई आखर लुटे यहाँ भी,बन्दनवार कहाँ ले जाएं .

साथ किनारों ने छोड़ा है,तूफानों ने,भ्रम तोड़ा है.
लहरों का आमंत्रण तो है,पर पीड़ा है, जल थोडा है.
बिन पतवारों की नौका को,बिन मझधार कहाँ ले जाएं.

हिमगिरी को गलने की पीड़ा,नदियों को चलने की पीड़ा.
खारापन भी दे जाता है, सागर में मिलने की पीड़ा .
सागर की पीड़ा कहती है, ये विस्तार कहाँ ले जाएं.

यादों ने तन, मन को बांटा , खुशबू ने चन्दन को बांटा.
हमने बांटे गीत तभी जब,साँसों ने धड़कन को बांटा.
सारा आँगन बाँट दिया है, हरसिंगार कहाँ ले जाएं.

दरवाजे से वापस हो ली, गीतों के कांधों की डोली .
चौक, सांतिये मेंटे जग ने,तुमने भी पोंछी रंगोली.
देहरी तक तो ले आए हैं ,और कहार कहाँ ले जाएं.

पाँवों से घर-द्वार बंधा है, हाथों से व्यापार बंधा है,
मन से कोई आस बंधी है, सांसों से संसार बंधा है.
जब इतने बंधन स्वीकारे, कुछ प्रतिकार कहाँ ले जाएं.

शामिल

पावन दृष्टि संजो कर देखो

पावन दृष्टि संजो कर देखो,आनन-आनन दरपन है,
कण-कण कान्हा ,राधा तृण-तृण, कानन-कानन मधुबन है.

प्रकट करे मन की अभिलाषा ,संकेती लिपि मौन की भाषा.
नमन विदाई का नयनों में, पुनर्मिलन की किंचित आशा.
साँझ की सुरतें कब लौटेंगी, प्रश्न नहीं आमंत्रण है.

मन प्यासा, नयनों में पानी,सावन की कैसी मनमानी.
बंदनवारी मनुहारों से, गीले आँचल की अगवानी.
नेह के पनघट पर बरसे जो वो सावन ही सावन है.

पुलक ,प्रेरणा भोर की लाली ,छंद-छंद पूजा की थाली.
आखर-आखर,रोली अक्षत ,संकल्पी क्षण मन भूचाली.
अंजुलियों में गंगा जल है, मन प्राणों का तर्पण है.

नहीं निरापद कोई कोना, व्यर्थ हुआ बनवासी होना.
पल-पल दिखलाती है तृष्णा, कंचन मृग का नन्हा छोना.
विवश हुई लक्ष्मण -रेखाएं ,मन सीता ,मन रावन है.

होकर ,

 

छोड़ दूंगा द्वार तक

छोड़ दूंगा द्वार तक, कुछ देर तो ठहरो अभी,
हे सुवासित वायु,मेरी पीर को छू कर जाना .
शब्द में बिखरी हुई जागीर को छू कर जाना.

एक मरणासन्न, सम्वेदन किसी का है अभी,
नेह भीगा याद, सम्बोधन किसी का है अभी.
मन बंधा इस छोर से उस छोर तक जिस बन्ध से,
हे विभाजित,वायु उस ज़ंजीर को छू कर जाना.

एक बिन बरसी घटा को,बांध रखना है अभी,
एक रसवंती व्यथा का, मान रखना है अभी.
मान-सुमन की पंखुरी की,कोर से छलका है जो,
हे प्रफुल्लित वायु,पावन नीर को छू कर जाना.

आज फिर अवसाद,तिल-तिल कर कटा है रात भर,
आज फिर प्रासाद,सपनों में बना है रात भर.
मत ठहरना कल्पना के रंगमहलों में कभी.
हे समाहित वायु,बस प्राचीर को छू कर जाना.

चार वेदों में भरा आभास,लेकर जाइये ,
क्रोंच-वध के बाद का इतिहास, लेकर जाइये.
साथ में रसखान, तुलसी, सूर, मीरा, जायसी.
हे निनादित वायु ग़ालिब, मीर को छू कर जाना.

धड़कनों के बीच कस्तूरी लिए

धड़कनों के बीच कस्तूरी लिए ,
प्रश्न ये है गंध को कैसे जियें ,
अब किसी आनंद को कैसे जियें,

ज़िन्दगी ने सीखलीं भरना कुलांचें,
मन नहीं करता कि अब इतिहास बाँचें.
घुंघरुओं में बांधकर चारों दिशाएँ,
हम बिना सुर-ताल के निर्बाध नाचें.

जब अकेले ही विचरने हृदय हो,
झुण्ड के अनुबंध को कैसे जियें.

एक भटके लक्ष्य पर,सौ-सौ शिकारी,
हर शिकारी की हवाओं पर सवारी.
जब नहीं हो पेड़- पौधा शेष कोई,
तब बचेगी ज़िन्दगी कैसे हमारी.

फूल ओढ़े आवरण पर आवरण हैं ,
प्रस्फुटित मकरंद को कैसे जियें.

हम नहीं हें सिर्फ, इकलौते अभागे,
जो बहारों के शिखर से कूद भागे.
और भी हैं , बंधुवर, मेरे तुम्हारे ,
जो रहे हैं दौड़ में हरबार आगे.

रास्ते पहुचे कसैली खाइयों में ,
चिर-रसीले छंद को कैसे जियें

कुछ चले हें,कुछ बढ़े हें

 कुछ चले हैं, कुछ बढ़े हैं, कुछ चढ़े हैं हाँ मगर
आख़िरी सोपान तक ,पहुंचे नहीं हैं हम अभी.
बांटते हैं रोज लाखों लाख खुशियाँ , हाँ मगर,
आख़िरी इन्सान तक पहुंचे नहीं हैं हम अभी.

कौन समझाए हमें, ये है हमारी त्रासदी,
जागने भर में, अभी तक खर्च दी आधी सदी
योजनायें हैं ,बड़ी परियोजनाएं, हाँ मगर ,
बस सही अनुमान तक पहुंचे नहीं हैं हम अभी.

श्वेत हो या हरित हो, ये क्रांति भी तो क्रांति है,
पर दिलों में आज भी, कुछ रूढ़ियों की भ्रान्ति है,
सौ सुयोजन हैं,प्रयोजन हैं, नियोजन ,हाँ मगर,
एक ही संतान तक ,पहुंचे नहीं हैं हम अभी .

भावनाएं हैं बहुत, गौरव कथाएँ याद हैं,
पर न जाने भीड़ में ये कौन सा उन्माद है,
प्रार्थना हैं,अजानें, आरतीं हैं, हाँ मगर,
देश के यश गान तक,पहुंचे नहीं हैं हम अभी.

स्वर्ण-चिड़िया की, कभी क्या आन थी क्या शान थी,
विश्व में सबसे अलग एसबसे बड़ी पहचान थी,
ज्ञात हैं, विज्ञात हैं, विख्यात भी हैं, हाँ मगर,
फिर उसी सम्मान तक, पहुंचे नहीं हैं हम अभी.

ये हमारे देश के, निर्माण का मजमून है,
कुछ पसीना भी हमारा है, हमारा खून है,
खूब श्रम है, और उपक्रम है, पराक्रम, हाँ मगर,
क्यों स्वयं जी-जान तक, पहुंचे नहीं हैं हम अभी.

 

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