राधावल्लभ पाण्डेय की रचनाएँ

दोहा / भाग 1

जन्म भूमि सेवत सुजन, धरम जाय बरु छूटि।
सुरन संवारी सुरपुरी, रतना कर को लूटि।।1।।

बन्धु न स्वर्गहु में सुलभ, जन्म भूमि को स्वाद।
तब तो लक्षिमी ताहि तजि, किये सिंधु आबाद।।2।।

बार बार रवि करन गहि, नभ पर धरत उठाय।
गिरि-गिरि, बहि-बहिबारि तउ, बन्धु सिंधु में जाय।।3।।

जनम-भूमि को प्रेम तो, माटिहु माहिं लखाय।
ढेला फेंको गगन में, गिरत भूमि पर आय।।4।।

बिजय सबल की होत है, नित्य निबल की हार।
सबल गठित भई जब प्रजा, नस्यो सदल बल जार।।5।।

तपो वली गुनि शाप भय, भूपन पूजे पाँय।
वेई द्विज अब सूद से, बल बिन धक्के खाँय।।6।।

होत निबलता में कबहु, जो कछु तारन जोग।
तौ को पूछत गाय को, अजा पुजावत लोग।।7।।

निबल सिद्ध करि आप को, हनत न रावण कंस।
राम कृष्ण को नाम तौ, होत न आज प्रशंस।।8।।

चलत न कछु बल निबल को, बनत सबल को कौर।
चूहा कबहुँ न धरि सकत, बिकट म्याउँ को ठौर।।9।।

खुद न बने जो ताहि को, सकत गुलाम बनाय।
चढ़ि ले कोऊ सिंह पै, भला लगाम लगाय।।10।।

दोहा / भाग 2

सब बिधि सब सों है बड़ो, होत यहै मृगराज।
जो न बड़प्पन बोरतो, बनि गुलाब गजराज।।11।।

नहिं पर हाथन अन्न जल, नहिं कौरन पर हार।
ग्राम सिंह सो तो भले, सहज स्वतन्त्र सियार।।12।।

ज्ञान बघारे कौन फल, पाँव परो जो काठ।
बन्दी शुक मुक्ति न लहत, राम नाम के पाठ।।13।।

बल बिन बन्धु न बनि सकत, दीन बन्धु भगवान।
बनि नृसिंह प्रह्लाद के, राखि सके प्रभु प्रान।।14।।

बन्धु निबल जो करि सकत, कहूँ सबलन को जेरे।
तौ हुइहैं बस मृगन के, कबहू मृग पति शेर।।15।।

निबलहुँ की लहि सबल बल, बन्धु हवा बँधि जाय।
मुई खाल परि मनुज कर, सार देत भसमाय।।16।।

जनम भरत बँधवाय गर, सत-सरवस्व दुहाय।
पूजा गो पूजा सरिस, चाहै बन्ध बलाय।।17।।

शासित होते सबल यदि, होत निबल सिरताज।
बँधत सिंह तौ रजक घर, गधे बनत मृगराज।।18।।

होत प्रलय में निबल अणु, छिन भिन्न लाचार।
सबल बनत जब मिलि बहुरि, प्रगटावत संसार।।19।।

सुर असुरन सो बन्धु तब, जीति सकै संग्राम।
प्रकटे जब पशुबल सहित, हरि पूरण बलधाम।।20।।

दोहा / भाग 3

जो कराल नरसिंह बन, प्रकटत नहि भगवान।
तौ न बचत प्रह्लाद, नहिं होत असुर अवसान।।21।।

निज दूधहु निज बच्छ कौ, गाय न सकति बचाय।
सिंहिनि पालति पूत निज, पर को रकत पियाय।।22।।

बन्धु सबल की पहुँच भर, निबल मिटाये जाहिं।
बड़े बड़े की छाँह लौं, पौदे पनपत नाहिं।।23।।

निबल पशुन के दूध सों, घर घर माखन होइ।
दुही जाति कहुँ सिंहनी, बन्धु न देखी कोइ।।24।।

सबै सतावत निबल को, सबलन को भय खात।
बकरन की बलि देत सब, बाघ निकट को जात।।25।।

सबल लेत हर निबल को, जन्म सिद्ध अधिकार।
बन्धु बचत कब अंग पर, भोरि भेड़ि के बार।।26।।

सबलहिं मग देवों परत, निबलन को झख मार।
पैदल इक्का लखो या, इक्का मोटर कार।।27।।

बन्धु निरबल को रुदन, कबहु करत नहिं कान।
सबल चुनौती देत जब, तब चौंकन भगवान।।28।।

सबलन जनमत जो जगत, मिटत ईश को नाम।
भये कृष्ण कब कंस बिन, कब रावण बिन राम।।29।।

करत दीनता दीन की, रखवारी बरजोर।
भूलिहु फटकत निकट न

दोहा / भाग 4

का छति राजा राव सासें, जो राखत बिलगाय।
दीन बन्धु सों दीनता, दीनहिं देत मिलाय।।31।।

लाभ मोटाई सो कहा, कहा तोंद सों काम।
हिये बसावति दीनता, दीन बन्धु बस जाम।।32।।

परे रहैं लाले भले, पेट भरन के हेत।
बलि बलि तोकों दीनता, दीठि न बिगरन देत।।33।।

सविनय सेवा सों सुभग, जग में धर्म न अन्य।
देति तासु तौफीक तैं, तोहिं दीनता धन्य।।34।।

घृनित बातहू धनिक की, सरहत सब स उमंग।
लछिमी-पति के पाँव की, धोवन पुजती गंग।।35।।

परधन लूटे बिनु बनत, कोउ न धनिक महान।
लूटि सिन्धु हरि हू बने, लछिमी पति भगवान।।37।।

पावन बनत अछूत हू, घनी गहै जग जौन।
लछिमी-पति यदि गहत नहिं, छुवत शंख को कौन।।38।।

पढ़े लिखे हो कैसहू, धन बिन मान न होय।
लछिमी-पति को भजत जग, सरसुति-पतिहिं न कोय।।38।।

ठगी किये हू धनिक को, बन्धु घटत नहिं मान।
लछिमी-पति ने बलि छल्यो, तऊ बने भगवान।।39।।

गनैं न औरन कछु धनी, नंगन सो भय खाहिं।
लछिमी-पति तजि रुद्र को, भक्त काहु के नाहिं।।40।।

हिं, भटकट डाकू चोर।।30।।

 

दोहा / भाग 5

धनिक-रीझ हित करत नर, पतित करम पति खोइ।
पंचामृत कहि पित्रत सब, लछिमी-पति-पद धोइ।।41।।

बड़े-बड़े हू बड़ेन के, गनत न कोउ गुनाह।
लक्ष्मी पितु लूट्यो सुरन, तऊ स्वर्ग के साह।।42।।

सहस चखन ताकत यहै, निशि बासर अमरेन्द्र।
बन्धु सवाँ असुमेघ तो, करत न कोउ नरेन्द्र।।43।।

छोटन की धन लूटि सों, सजत बड़न के भौन।
सिन्धु रतन तजि स्वर्ग में, बन्धु पदारथ कौन।।44।।

पापहु फलत बड़ेन को, चलत न हरि को चक्र।
चोरी-छल-व्यभिचार करि, सहस-नयन को सक्र।।45।।

स्वारथ हित लघुता गहत, बड़े बड़े तजि मान।
बौना भिक्षुक बनन में, लजे नहीं भगवान।।46।।

नाथ तोरि फेकत जुआ, गहत और ही गैल।
बन्धु गऊ को पूत जो, हो तो निरो न बैल।।47।।

वंश बड़ो है बल बड़ो, बन्धु चलत बड़ि चाल।
तऊ कहावत बैल क्यों, कामधेनु को लाल।।48।।

पराधीन बनि दिन भरत, गुनत न निज अधिकार।
नान्दी बन्धुहिं कस न फिर, बैल कहै संसार।।49।।

केतहु बैल कमाय अरू, बन्धु करै अनुराग।
पै भूसा तजि अन्न में, देहै मनुज न भाग।।50।।

दोहा / भाग 6

अजब न बन्धु किसान जो, बैलन मुक्ति न देत।
गाड़ी कौन चलाइहै, कौन जोतिहै खेत।।51।।

नाक छिदी गरदन बँधी, कन्धा जुआ धरि गौन।
बन्धु कमाऊ पूत बनि, लाभ बैल को कौन।।52।।

पूजा को गरजो रहै, अरजी करै न कान।
निज मरजी ही पर मरै, सो फरजी भगवान।।53।।

होउ अलग जो दै सकत, नहिं अनाथ को साथ।
भगवन्! है भगवान पन, बैं न तुम्हारे हाथ।।54।।

बिन कानन के सेस पर, सोवै पैर पसार।
वा श्री पति भगवान की, बन्धु न अब दरकार।।55।।

जाको माया के बिना, बन्धु चलत नहिं काम।
मेरो वा भगवान को, दूरहिं सो परनाम।।56।।

पापी द्विज टेरत सुतहिं, तेहि निज सुमिरन मान।
मुक्ति देत जो गावदी, सों भोंदू भगवान।।57।।

बन्धु न रुचि भगवान की, अब सेवक दरकार।
वे दासन सासन करैं, ये सवैं करि प्यार।।58।।

रीझत जो भगवान बस, देखि सुखसामद अन्ध।
जुरै न वासो नेकहूँ, कबहुँ बन्धु सम्बन्ध।।।59।।

जा कर सीधी हृदय में, लगती बाण समान।
‘बन्धु’ बिपक्षी वृन्द की, व्यंग्य भरी मुसकान।।60।।

दोहा / भाग 7 

अनुचित उचित न सोचती, हरती है सम्मान।
भरी जवानी ताकतीं, काम भरी मुसकान।।61।।

जाल बिछाती फाँसती, करके यत्न महान।
ठगती भोले ‘बन्धु’ को, मतलब की मुसकान।।62।।

असमय समय न देखती, तनती अपनी तान।
रस में दै विष घोलती, नीघस की मुसकान।।63।।

सरसाती स्वर्गींय सुख, सबको ‘बन्धु’ समान।
शिशुओं की सुन्दर सहज, सुधा-सनी मुसकान।।64।।

शौल और संकोच का, बन्धु ठान कर ठान।
मन्द मधुर मधु घोलती, लज्जामय मुसकान।।65।।

ले लेतीं बे मोल है, तन-मन मोल समान।
चलता जादू डालती, प्रेम भरी मुसकान।।66।।

लक्ष्मी को बस में किये, भोगि रह्यो विज्ञान।
याही लाजन हैं छिपे, परदे में भगवान।।67।।

दलति नहीं दुखी करि दया, दीन-दयाल कहाय।
दीनन को भगवान मुँह, कैसे सकत दिखाय।।68।।

थाहे गुण्डन की चलनि, क्यों किसान बेताब।
सब के समुहें आइ कै, देवो परै जवाब।।69।।

भेद खुलन को भय भये, समुहे वाद-विवाद।
मूँदी निबही जाति है, परदे में मरजाद।।70।।

 

दोहा / भाग 8

देइ उड़ाइ न धज्जियाँ, करि कुतर्क विज्ञान।
डरन छिपाये मुँह परे, परदे में भगवान।।71।।

साँचे को कुछ डर नहीं, कोऊ लेय बयान।
कछु काला है दाल में, प्रकटत नहिं भगवान।।72।।

कियो जलन्धर बधन हित, छल वृन्दा के साथ।
याही डरन फरार है, मिलत न लक्ष्मी नाथ।।73।।

समुहै आवत कौन, छिपि सबै दिखावत हाथ।
मुँदे मुँदे माया करत, खुलत न माया नाथ।।74।।

रोटी हित संसार में, बढ़ो जुलुम को जोर।
बढ़-बड़े ‘दाना’ पिसत, चक्की में उठि भोर।।75।।

सहत ओखरिन मूड़ दै, मूमर मार अनीव।
‘दानन’ के बलिदान पर, रोटी की है नीव।।76।।

गाँधी, बोस, पटेल, अरु खान, जवाहरलाल।
हल करने में पचि रहे, रोटी कठिन सवाल।।77।।

चखत हवस को टोप दै, परि चक्कर की गैल।
रोटी हित भरमत मनुज, बनि कोल्हू को बैल।।78।।

लेत उसासें धौकनी, रन्दा रगरत नाक।
रोटी को सिक्का लखे, चक्कर में है चाक।।79।।

रोटी हित अकरम करम, करत न कोउ बिचार।
बड़े-बड़े मानी धनी, पीसत बीच बजार।।80।।

दोहा / भाग 9

पूछयों पानी खोय क्यौं, डारी लज्जा धोय।
रोटी रोटी कहि उठी, सदा सुहागिन रोय।।81।।

मगन गन को दान दै, दानी पावत मान।
मानी मरतो मान पर, मुयहु न माँगत दान।।82।।

मान पाइबै हेतु ही, दानी देतो दान।
दान माँगि कै बन्धु पै, मानी देत न मान।।83।।

दानी सरबस दान दे, चाहत है जो मान।
खोवत सोई मान क्यों, रे मंगन लै दान।।84।।

‘बन्धु’ चहै जो दुनी में, दानी साँचो मान।
तो मनाय मानी मनहिं, बिन माँगै दे दान।।85।।

दानी सों कछ माँगि कै, ‘बन्धु’ पाइबो दान।
अपनो वाको दुहुन को, करना है अपमान।।86।।

जाहि साध कछु देन कौं, ‘बन्धु’ आपु दे दान।
माँगन को पथ देखि के, ब्यर्थ न खोवे मान।।87।।

न्याय तुला पर तौलिए, लखिए कौन महान।
दान दानि को ‘बन्धु’ वर, या मानी को मान।।88।।

नीरसता बरसति निरी, रह्यी न रस को नेम।
भेद नीनि जिमि राष्ट्र में, हरत आपुसी प्रेम।।89।।

बड़ी राति बहु हिममयी, लहि हिमन्त को फेर।
अन्यायो के राज में, यथा बढ़त अन्धेर।।90।।

 

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