राधेश्याम प्रगल्भ की रचनाएँ

बच्चे की चाह

बच्चे की चाह

सपने में चाहा नदी बनूँ
बन गया नदी,
कोई भी नाव डुबोई मैंने
नहीं कभी।
मैंने चाहा मैं बनूँ फूल,
बन गया फूल,
बन गया सदा मुस्काना ही
मेरा उसूल।
मैंने चाहा मैं मेंह बनूँ,
बन गया मेंह,
बूँद-बूँद मेरी बरसाती
रही नेह।

मैंने चाहा मैं छाँह बनूँ,
बन गया छाँह,
बन गया पथिक हारे को
मैं आरामगाह।
मैंने चाहा मैं व्यक्ति बनूँ
सीधा-सच्चा,
खुल गईं आँख, मैंने पाया
मैं

मझधार क्या

सँघर्ष पथ पर चल दिया
फिर सोच और विचार क्या !

जो भी मिले स्वीकार है
वह जीत क्या, वह हार क्या !

संसार है सागर अगर
इस पार क्या, उस पार क्या !

पानी जहाँ गहरा वहीं
गोता लगाना है मुझे —

तुम तीर को तरसा करो
मेरे लिए मझधार क्या !

था बच्चा।

 

शूल और फूल

शूल से एक रोज़ यों बोला सुमन —
“लोग बिसराते न क्यों तेरी चुभन ?
सोच रह-रहकर मुझे होता यही —
उम्र मेरी याद की क्यों चार दिन ?”

शूल चुप से कान में यह कह गया —
“जो मिला गड़कर उसी के रह गया ।
फूल, भोले ही रहे तुम सर्वथा
गन्ध बाँटी और बिखरे ही सदा ।
जो बिखरते हैं,
उन्हें सब भूल जाते हैं,
और, जो चुभते-कसकते
याद आते हैं ।”

ऋतुराज

ललित ललामी है रवि की,
सुखद सलामी है छवि की,
दुरित गुलामी है पवि की ।
गेरत लाज चिरी पै गाज,
गहराबत,
आबत,
ऋतुराज ।

सौंधी-सौंधी बहे समीर,
चहकत चिरियाँ पिक अस्र् कीर,
कुँज-कुँज भौरन की भीर ।
छलकत छवि फूलन ते आज,
मुसकाबत,
आबत,
ऋतुराज ।

तरु बन्दहि सोभा सम्पन्न,
नाहिं बिपिन हैं आज विपन्न,
प्रकृति नटी है परम प्रसन्न ।
मनहु मनोज सनेह सुराज,
गहराबत,
आबत,
ऋतुराज ।

नव किसलय नव कलिका फूल,
नवल लता नव धरा दुकूल,
कूजित कुँज कलिन्दी कूल ।
छिति छोरन छायो सुखसाज,
हरसाबत,
आबत,
ऋतुराज ।

आमन-आमन लागे बौर,
अँकुअन माहीं लागे मौर,
कोकिल कू कै ठौरहि ठौर ।
साजत है सँगीत समाज,
उमगाबत,
आबत,
ऋतुराज ।

निर्मल नीर, अकास अमल,
बन पलास, सर खिले कमल,
जड़ जँगम जग जीव नवल ।
रूप मनोहर घारे आज,
इतराबत
आबत,
ऋतुराज ।

अँग-अँग आभा झलकन्त,
दरसत रूप अनूप बसन्त,
जानै कित कूँ गयौ हिमन्त ।
सुख सरसावत सन्त समाज,
उमगाबत,
आबत,
ऋतुराज ।

मही रही द्युति हरस समेत,
भए बसन्ती सरसों खेत,
नवल जमन जल जमुना रेत ।
सीस धरे केसरिया ताज,
इठलाबत,
आबत,
ऋतुराज ।

 

उजेरा-अन्धेरा

दिन के उजेरे में
न करो कोई ऐसा काम,
नींद जो न आए तुम्हें
रात के अन्धेरे में ।

और

रात के अन्धेरे में
न करो कोई ऐसा काम
मुँह जो तुम छिपाते फिरो
दिन के उजेरे में ।

सोया हुआ हिन्दुस्तान तड़पकर जगे तो

क्यों जी, आग लग गई?
हाँ, दमकल का शोर तो है ।
समय पर पहुँच पाएगी ?
राम जाने !
आग बुझा पाएगी ?
इसे भी राम जाने !

अरे, तुम भी कुछ जानते हो
या सब कुछ राम जाने?

मैं तो जानता हूँ
एक और आग को
जो लगी है हिन्दुस्तान के कोने-कोने में,
जिसको बुझाने में व्यस्त हैं
कोटि-कोटि नयन
अनेक वर्षों से रोने में।

आग बुझी ?
नहीं तो ।
लगता है, ये आग किसी पानी से
नहीं बुझ पाएगी,
इसे बुझाने के लिए
एक और आग चाहिए ।

काश़ !
वह आग
सूखी ठठरियों के कलेजों में लगे तो,
सोया हुआ हिन्दुस्तान तड़पकर जगे तो !

सिपाही देश के मेरे

यह कविता अधूरी है, आपके पास हो तो पूरी कर दें

कफ़न को बाँधकर सर से,
चले हो आज जब घर से,
बवण्डर की तरह उमड़ो,
घटाओं की तरह घुमड़ो,
गरजते घन सरीखे तुम,
कि बिजली से भी तीखे तुम,
शत्रु के वक्ष में पैठो,
न क्षण भर सोच में बैठो,
न तिल भर भी बढ़े आगे,
प्राण की भीख ही माँगे,
अगर कोई नज़र टेढ़ी हमारी भूमि को हेरे !
सिपाही देश के मेरे !

हमारे युद्ध की ‘कविता’
सदा ‘आशा’ लुटाती है,
मरण ही है यहाँ जीवन,
ये परिभाषा बताती है ।
कहो ललकार दुश्मन से
भला वह चाहता है तो,
लगाए अब नहीं फिर से,
कभी सीमान्त पर डेरे !
सिपाही देश की मेरे!

 

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