रामकृष्ण पांडेय की रचनाएँ

पांव पैदल और कितनी दूर

पाँव-पैदल और कितनी दूर
थक गई है देह थक कर चूर

थक गए हैं
चाँद-तारे और बादल
पेड़-पौधे,वन-पत्तियाँ,
नदी, सागर
थक गई धरती
समय भी थक गया भरपूर

नहीं कोई गाँव,
कोई ठाँव,कोई छाँव
थक गई है
ज़िंदगी बेदाँव
और उस पर
धूप,गर्मी,शीत,वर्षा क्रूर

पाँव-पैदल और कितनी दूर …

 

समय होता है निरंतर प्रवहमान

समय की गति रोकना चाहते हैं वे लोग
जिनके खिलाफ होता है समय
फिर भी समय बढता ही चला जाता है
जैसे बढती चली जाती है नदी
अपने उदगम से सागर तक
बाधाओं को तोडती-फोडती
चीरती हुयी धरती का सीना
नदी की तरह ही होता है समय
निरंतर प्रवहमान
नदी की तरह ही सबको सुकून देता है
कभी – कभी समय
आपका हाथ पकडकर
घुमाने ले जाता है
अतीत की गलियों में
फिर वह आपको खडा कर देता है
वर्तमान के आईने के सामने
क्‍या आप
अपना बदला हुआ चेहरा देखकर
भयभीत नहीं होते
समय भयभीत करना नहीं चाहता
वह आपके साथ होना चाहता है
हर वक्‍त,हर समय
ताकि, समय की आहट सुनते हुए
आप महसूस कर सकें
उसका संगीत …

 

बच्चे डरते हैं

खो नहीं जाएँ पापा
बच्चे डरते हैं

बच्चे डरते हैं
इसीलिए वे प्रार्थनाएँ करते हैं
“गॉड सेव माय पापा”
“भगवान, मेरे पिता की रक्षा करना”

किन्तु भगवान उनकी रक्षा नहीं करता
भगवान बच्चों की नहीं सुनता
रोज़ सुबह घर से निकलते हैं उनके पापा
कभी नहीं लौटने के लिए

बच्चे डरते हैं
खो नहीं जाएँ पापा

बच्चे पूछते हैं
” पापा, आप खो जाएँगे पापा”
पापा कुछ नहीं बोलते

बच्चे पूछते हैं
“पापा, कौन लाएगा हमारे लिए चाकलेट ?”
“कौन हमको घुमाने ले जाएगा, पापा ?
पापा कुछ नहीं बोलते

“पापा, हमें प्यार कौन करेगा पापा”
बच्चे पूछते हैं
पापा कुछ नहीं बोलते

“आप बाहर क्यों जाते हैं, पापा ?”
“चुन्नू के पापा भी खो गए, पापा”
“चुन्नू की मम्मी बहुत रो रही थीं, पापा”
“चुन्नू बता रहा था
अब नहीं लौटेंगे उसके पापा”

बच्चे पूछते हैं
“आप खो जाएँगे, पापा”
पापा कुछ नहीं बोलते

ऐसे इस समय में

ऐसे इस समय में
जीवन का अर्थ ही हो गया है मृत्यु

अच्छे लोग
अच्छी ज़िन्दगी की नही
अच्छी मौत की तलाश करते हैं

जीवन के लिए
आजीवन लड़ते-लड़ते
मर जाना ही
सबसे बड़ी उपलब्ध्हि है
ऐसे इस समय में

ऐसे इस मौसम में

किसी फूल का खिलना
सबसे बड़ा चमत्कार है
ऐसे इस मौसम में

जैसे किसी पत्ते का हरा दिखना
जैसे छत पर
किसी चिड़िया का चहकना
जैसे किसी छोटे बच्चे का
मुस्कराना, रोना
जैसे किसी साधारण आदमी का
ख़ुश होना

चमत्कार

भाई, राम‍आसरे
एक दिन और बीत गया

न झुके, न टूटे
मेहनत की, मज़दूरी ली
अब आ रही है सुगन्ध
चूल्हे पर पकती रोटी की

सब प्रभु की माया है
उसका ही चमत्कार है
ज़िन्दगी से आदमी जीत गया

भाई, राम‍आसरे
एक दिन और बीत गया

और जैसे सहज ही
किसी दिन का गुज़र जाना

 

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