रामस्वरूप ‘सिन्दूर’की रचनाएँ

चाहूँ या कि न चाहूँ

चाहूँ या कि न चाहूँ बहना ही होगा,
स्वर्ण तरी जब उतर गयी मझधार में!

एक खीझ ने पतवारों को फेका फेनिल नीर में,
आकृति-भर का भेद रह गया नैया और शारीर में;
गति पूरे यौवन पर, लेकिन यति का होता बोध है,
कैसी मेरी प्रगति, कि जिसमें ऐसा रोध-विरोध है;

मेरा क्या अपराध विधाता जो तूने,
मुझे चुन दिया लहराती दीवार में!

मेरे ओ’ मेरे भविष्य के बीच सूर्य का तेज है,
क्या जाने आगे शर-शैया या सुमनों की सेज है;
लहरों ने दृग बांध दिए हैं चकाचोंध के चीर से,
सारी संसृति घिरी हुई है दर्पण की प्राचीर से;

दृष्टि चतुर्दिक देखे कुछ ऐसे, जैसे,
अभी-अभी जन्मी हो इस संसार में!

मैं गत-आगत भूल अनागत के रंगों में लीन हूँ,
राजकुंवर-सा दिवा-स्वप्न के स्यन्दन पर आसीन हूँ;
मनचाहा यह सपना टूटे, या-तो फिर साकार हो,
जो कुछ होता है, हो, लेकिन ज्वारों का अवतार हो;

छूटे सब अपने, सपने पर जीना है,
जन्म कैद जो बहते कारागार में!

तू है जहाँ, वहाँ आ पाना

तू है जहाँ, वहाँ आ पाना
तन के वश की बात नहीं है,
इस तन से नाता टूटे तो
तुझसे मिलना हो सकता है!

आँखों में तैरती उदासी, लहराती आँसू की छाया,
ऐसा लगे, कि मेरी काया में तेरी उतरी है तेरी काया;
दर्पण ने इस विह्वलता को
सहज योग का नाम दिया है,
दर्पण से नाता टूटे तो
तुझसे मिलना हो सकता है!

गन्ध बने उच्छ्वास, प्राण का गुह्य द्वार बरबस खुल जाये,
तेरे साये से लगते हैं, मुझको मेरे-अपने साये;
उपवन ने इस दिवा-स्वप्न को
महामिलन तक कह डाला है,
उपवन से नाता टूटे तो
तुझसे मिलना हो सकता है!

मैं जागूँ तो नींद सताये, ओ’ सौऊ तो नींद न आये,
मंदिर में उदास हो जाऊँ, मैखाने में जी घबराये;
यह मन मेरी इस गति को ही
दुर्लभ गति कहलाता है,
इस मन से नाता टूटे तो
तुझसे मिलना हो सकता है!

बेसुध कर जाती हैं सुधियाँ, चेतन कर जाती मदहोशी,
मैं विदेह की तृषा, तृप्ति की नजरों में करुणा का दोषी;
दर्शन मेरे चिर यौवन को
काल-सिद्धि कह कर छलता है,
दर्शन से नाता टूटे तो
तुझसे मिलना हो सकता है!

मधुर दिन बीते

मधुर दिन बीते-अनबीते!
वर्तमान में नहीं, इन्हीं दोनों में हम जीते!

यादों के सरगम से ऊबे,
सपनों के आसव में डूबे,
आँखें रस पीती हैं, लेकिन होंठ अश्रु पीते!
मधुर दिन बीते-अनबीते!
वर्तमान में नहीं, इन्हीं दोनों में हम जीते!

आतप ने झुठलाई काया,
सर पर बादल-भर की छाया,
सूखी पौद हरी कर देंगें, क्या कपड़े तीते!
मधुर दिन बीते-अनबीते!
वर्तमान में नहीं, इन्हीं दोनों में हम जीते!

हम पनघट की राहें भूले,
मृग मरीचिकाओं में फूले,
कन्धों के घट पड़े हुये हैं, रीते के रीते!
मधुर दिन बीते-अनबीते!
वर्तमान में नहीं, इन्हीं दोनों में हम जीते!

आज रात बीती

आज रात बीती तेरी तस्वीर बनाने में!
तस्वीर बनाने में, कि एक जंजीर बनाने में!

चितवन में भर दिये रंग
गहरे सम्मोहन के,
अधरों पर धर दिये गीत
पूरे अपने मन के,
मन न लगा चंचल यौवन, गम्भीर बनाने में!
गम्भीर बनाने में, कि झील का नीर बनाने में!

केशों में गुम्फित कर दीं
उँगलियाँ कला-वाली,
तन्मयता ने चुम्बन-वाली
माल गले डाली,
तन कांपा भाल पर एक शमशीर बनाने में!
शमशीर बनाने में, कि एक तूणीर बनाने में!

कानों में घोल दी प्यार-
की मुखर-मौन वाणी,
हाथों की रेखाओं में
की अंकित नादानी,
साथ रहे तारे तेरी तक़दीर बनाने में!
तक़दीर बनाने में, कि अदृश प्राचीर बनाने में!

मन पर खींची सकल सृष्टि-
व्यापी संयोग-कथा,
प्राणों पर लिख दी संवेदन-
वाली करुण व्यथा,
कलरव जाग उठा तेरी जागीर बनाने में!
जागीर बनाने में, कि आदि

एक तरफ कुहरा

एक तरफ कुहरा ही कुहरा, एक तरफ़ हैं हम!
अंतर्मन सूरज-सूरज, आँखें शबनम-शबनम!

घाटी के तल से अम्बर तक
जल के रंग भरे,
ज्यों समुद्र मारे उछाल
शिखरों को पार करे,
एक तरफ़ जग गूंगा-बहरा, एक तरफ़ सरगम!
अंतर्मन सूरज-सूरज, आँखें शबनम-शबनम!

तन निर्झरी राह पर बहके
फिसल-फिसल सँभले,
तप्त देह पर मेघ-बसे
क्षण के फेनिल हमले,
एक तरफ़ तम दुहरा-तिहरा, एक तरफ़ पूनम!
अंतर्मन सूरज-सूरज, आँखें शबनम-शबनम!

झील डूब चेतन में
उभरी है अवचेतन में,
गत के साथ अनागत झाँका
स्वप्निल दर्पण में,
एक तरफ़ सब ठहरा-ठहरा, एक तरफ़ उदगम
अंतर्मन सूरज-सूरज, आँखें शबनम-शबनम!

कश्मीर बनाने में!

वह घड़ी भी याद आये

वह घड़ी भी याद आये!
मैं कुहू के कुंज में, जब कंठ था तुझको लगाये!

नैन तेरे रस रहे थे,
स्निग्ध बेला की लरों से
देह मेरी कस रहे थे,
इन दृगों ने मोतियों से केश थे तेरे सजाये!
वह घड़ी भी याद आये!

होंठ गुम-सुम हो गये थे,
श्याम सिजिया पर तनिक-
सी देर को ये सो गये थे,
इन करों ने अश्रु अपने उन लटों से थे सुखाये!
वह घड़ी भी याद आये!

इन कपोलों पर, चिबुक पर,
बन गये थे चित्र अनगिन
माँग से सिन्दूर लग कर,2
जो-कि तेरे नील अंचल ने, सवेरे थे मिटाये!
वह घड़ी भी याद आये!

 

एक शूल

एक शूल
और चुभा पाँव में!

मंजिल है पास, बहुत दूर नहीं,
तन भी तो बहुत चूर-चूर नहीं,
फूलों से निकलेंगे कांटे, उस गाँव में!
एक शूल
और चुभा पाँव में!

रुकने से कसकन बढ़ जायेगी,
खोई गति हाथ नहीं आयेगी,
चले-चलो बादल की चलती इस छांव में!
एक शूल
और चुभा पाँव में!

थोड़ा पथ चलना, फिर पानी है,
नदी खूब जानी-पहचानी है,
हारा सब

जिन राहों पर

जिन राहों पर चलना है,
तू उन राहों पर चल!
कहाँ नहीं सूरज की किरणे, तूफ़ानी बादल!

मन की चेतनता पथ का अँधियारा हर लेगी,
मंजिल की कामना प्रलय को वश में कर लेगी,
जिस बेला में चलना है,
तू उस बेला में चल!
यात्रा का हर पल होता है क़िस्मत-वाला पल!

सपनों का रस मरुथल को भी मधुवन कर देगा,
हारी-थकी देह में नूतन जीवन भर देगा,
जिस मौसम में चलना है,
तू उस मौसम में चल!
भीतर के संयम की दासी, बाहर की हलचल!

उठे कदम की खबर ज़माने को हो जाती है,
अगवानी के लोकगीत हर दूरी गाती है,
जिस गति से भी चलना है,
तू उस गति से ही चल,
निर्झर जैसा बह न सके, तो हिम की तरह पिघल!

जीतोगे, अंतिम इस दाँव में!
एक शूल
और चुभा पाँव में!

सब कुछ भूला

सब कुछ भूला, किन्तु न भूले वे लोचन अभिराम!
तुम्हारे लोचन ललित-ललाम!

चितवन में सपनों की छाया,
मृग-मरीचिकाओं की माया,
इन्द्रधनुष- धारे पलकों में छिपे रहें घनश्याम!
तुम्हारे लोचन ललित-ललाम!

बात न जो अधरों तक आये,
दृष्टि सहज में ही कह जाये,
वे दृग, संकेतों से ले-लें कैसे-कैसे काम!
तुम्हारे लोचन ललित-ललाम!

कब की उठी मधुर मधुशाला,
पर न अभी तक उतरी हाला
कभी-कभी मैं हस्ताक्षर में, लिख जाऊँ खैयाम!
तुम्हारे लोचन ललित-ललाम!

वचन हारने लगो

वचन हारने लगो, याद जय के क्षण कर लेना!
सामने दर्पण धर लेना!

ताजमहल की सेजों पर हम-तुम थे शीश धरे,
और, दृगों में थे यमुना का निर्मल नीर भरे,
संकल्पों में बंधे याद वे बंधन कर लेना!
सामने दर्पण धर लेना!

चिश्ती के मज़ार पर बाँधें साथ-साथ धागे,
सदा साथ रहने-वाले दिन हाथ जोड़ माँगे,
किया हर्ष में दान, याद वह कंगन कर लेना!
सामने दर्पण धर लेना!

मन-कामेश्वर के मंदिर में ज्योतित दीप जले,
मुखर व्रतों को दीप्त शिखाओं ने आशीष दिये,
स्वप्न, सत्य-सा दिया याद वह दर्शन कर लेना!
सामने दर्पण धर लेना!

 

 

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