राम मेश्राम की रचनाएँ

 

मैं महान हूँ, तू महान है

मैं महान हूँ, तू महान है
नूरा-कुश्ती[1] का बयान है

अपने मुँह से कौन कहेगा
किस में कितना बियाबान है

आरक्षण के महादेश में
हम सबको अवसर समान है

ट्रेड मार्क दुष्यन्त हो गए
आज ग़ज़ल चलती दुकान है

जय भूखों की, जय नंगों की
अपने सिर पर आसमान है

जनता पीसे कुत्ते खाएँ
यह सच्चा हिंदोस्तान है

नज़र के सामने सत्कार बढ़िया

नज़र के सामने सत्कार बढ़िया
पलटकर ठीक पीछे वार बढ़िया

वो लय-ही-लय में मारे डालती है
कथक के रक्स की तत्कार[1] बढ़िया

इसे जमघट कहें, पचमेल कह लें
हमारी चल रही सरकार बढ़िया

मैं गाहक हूँ न सौदागर तो काहे
मुझे ललचा रहा बाज़ार बढ़िया

बयाँ कर दें दड़ेग़म[2] वक़्त का सच
कहाँ है एक भी अख़बार बढ़िया

बड़ी राहत मिली विश्वास-मत से
भले संसद हुई मिस्मार बढ़िया

फ़क़त उपदेश के फ़न के धुरंधर
हमारे देश के फ़नकार बढ़िया

मैं नंगाई[3] का दर्शन रच रहा हूँ
सजाकर तर्क के हथियार बढ़िया

ये भारत है

नई हर शै पे ऐसे आशना है

नई हर शै पे ऐसे आशना है
नई औरत पे जैसे दिल फ़िदा है

वो इक अल्सेशियन है बॉस का जो
रकीबों को लपक कर काटता है

कयामत है कि बारिश है, हमें क्या
कि किस बस्ती का क्या-क्या बह गया है

मियाँ हम ही तो हैं वो सर्वहारा
जिन्हें हमदर्द लीडर ने ठगा है

खदेड़ा था जिसे जन्नत से इक दिन
वही दिल आज सम्मानित हुआ है

वो इन्टरनेट, ये टी०वी० के चैनल
जवाँ मन ईडियट-सा देखता है

वो साधु है तो क्यूँ गाहे-बगाहे
तराने औरतों के छेडता है ?

ये अय्याशी, ये दारू और रिश्वत
यही तो जीनियस का रास्ता है !

लिए तलवार टूटी हाथ में, दिल
समूचे आस्माँ से लड रहा है

कि पॉलीथिन की जन्नत
अमर कूड़े का हाहाकार बढ़िया

 

 

तारीक बेबसी से गुज़रना पडेगा, यार!

तारीक-ए-बेबसी से गुज़रना पडेगा, यार !
बिल्कुल नहीं के पार उतरना पडेगा, यार !

अम्बेडकर की ज़िंदगी जीने की शर्त है
तुमको हज़ार हादसे मरना पडेगा, यार !

कोरे दलित-विमर्श के फैशन में झूमती
शोहरत की ख़्वाहिशों से मुकरना पडेगा, यार !

अम्बेडकर के बुत की इबादत को छोडकर
बन्दानवाज़ियों से उबरना पडेगा, यार !

सत्ता का सुख निहारती नेतागिरी को भूल
ख़ालिस लहूलुहान निखरना पडेगा, यार !

जल्दी अमीर होने की अंधी उडान का
बेताब पर हमें ही कतरना पडेगा, यार !

दलितों में हम दलित हैं, कुलीनों में हम कुलीन
हमको समाज-सच पे ठहरना पडेगा, यार !

आएँगे रोज़-रोज़ कहाँ ज्योतिबा फुले
हमने किया, हमीं को सुधरना पडेगा, यार !

हिर्सो-हवस में सड़ रहे हिंसक समाज की
मिट्टी में बीज ब

सच है कि फरिश्तों में तो गिनती नहीं होती

सच है कि फरिश्तों में तो गिनती नहीं होती
मैं वो हूँ कि जिससे कभी ग़लती नहीं होती

हँस-हँस के फरिश्तों के गुनाहों को बताना
दिलचस्प, मगर ये हँसी सस्ती नहीं होती

कुदरत की तराजू में बराबर हैं सभी लोग
महसूस अलग से कोई हस्ती नहीं होती

विरसे से या तक़दीर से मिल जाती है सत्ता
भारत में कहीं कुनबापरस्ती नहीं होती

हँसने को तो हँसता है हँसी ख़ूब ज़माना
क्या बात, हँसी में कोई मस्ती नहीं होती

दर्दी है यहाँ कौन किसी और के गम का
लोगों की बसाहट से ही बस्ती नहीं होती

कानून की बैसाखियाँ सेठों को मुबारक
दौलत के हों अपराध तो सख़्ती नहीं होती

कुछ सीख सबक नामवरों से भी कबीरा
हर घर में तेरे नाम की तख़्ती नहीं होती

न के बिखरना पडेगा, यार !

 

तर्कों की बौछार में हँसता घाघ शिकारीपन का सच

तर्कों की बौछार में हँसता घाघ शिकारीपन का सच
बूढा हंस कहे सुन प्यारी, तेरा-मेरा-उसका सच

वह खलनायक जिसे नायिका खुद अपने को पेश करे
साफ हक़ीक़त भी है गोया फ़िल्मी क़िस्सों जैसा सच

मुफलिस मौत मरे भुवनेश्वर, शहर-बदर हो जाए शरद
जिसे उछाले खेमा अपना वही असल रचना का सच

दारूबाज़ी, औरतबाज़ी, शोहरतबाज़ी से होकर
खिलता महाजीनियस तेरी प्रगतिशील कविता का सच

दिखलाती है रोज़ वकालत पेशेवर सच्चाई को
करती है इन्साफ़ अदालत, आता हाथ अधूरा सच

एक तरफ़ है सारी दुनिया, एक तरफ़ है मेरा मैं
ठोस अना में तना हुआ है सबका अपना-अपना सच

कौन नहीं है वाकिफ़ मन के काले-उजले चेहरे से
किसकी हिम्मत है सुनने की अपने मुँह पर कड़ुवा सच

नंगी आँखों से जो दिखता होता वह भी सत्य कहाँ
अख़बारों के अपने चेहरे, दीवारों का अपना सच

काँधे अरथी और जुबाँ पर नारा सत्यमेव जयते
आज सत्य की मय्यत में भी जीत रहा है झूठा सच

यारो किसी गिरगिट का किरदार जिया करना

यारो किसी गिरगिट का किरदार जिया करना
दुनिया में अगर ख़ुद को ख़ुद्दार कहा करना

हर रोज़ गढा करना फैशन के नए फ़ित्ने
हर बार तनाजों का संसार रचा करना

चुन-चुन के दफ़ा करना सच बोलने वालों को
चमचों के कसीदों का दरबार सजा रखना

इन्सान की फ़ितरत में जीने से तो बेहतर है
इस दौर में दिल्ली का बाज़ार हुआ करना

हम आलिमो-दानिश की औक़ात है बस इतनी
दौलत के इशारों पर सौ बार बिका करना

पैसों के लिए पाग़ल होती हुई दुनिया में
मत बोलिए, ईमाँ का मेयार बचा रखना

दौलत से, सियासत से जारी है लडाई तो
हर वक़्त शहादत को तैयार रहा करना

आँसू से, पसीने से, कुछ ख़ून की बूँदों से
सूखी हुई कविता का संसार हरा रखना

इतना क्यूँ तू मिमियाता है?

इतना क्यूँ तू मिमियाता है?
तू तो आदम का बच्चा है

भाग्य-लक्ष्मी दासी जिसकी
तू भी तो उसका चमचा है

मेरा बातूनी मन मुझसे
हर-हर लम्हा बतियाता है

दिल का कुआँ सदा देते ही
जीवन-सरगम घुन्नाता है

राजनीति का डॉन हमेशा
लोकतंत्र को गरियाता है

आला अफ़सर रोज़ धड़ाधड़
कविता पर कविता लिखता है

राजनीति का भूत, न पूछो
मार-मार कर सहलाता है

तेरे-मेरे सबके भीतर
एक नदी है, वह कविता है

गाता जा रे, मत घबरा रे
भीड़ बहुत है, तू तनहा है

हर हक़ीक़त दबाई जाती है

हर हक़ीक़त दबाई जाती है
जब सफ़ाई दिखाई जाती है

झूठ को सच करार देने को
सरपरस्ती निभाई जाती है

आग लगती नहीं है उड़-उड़कर
आग प्यारे लगाई जाती है

आने वाले ख़ुदा का रस्ता साफ़
हर निशानी मिटाई जाती है

सुन उसूलों की ज़िंदगी तेरी
रोज खिल्ली उड़ाई जाती है

बाप तक से मियाँ सियासत में
साँस अपनी छिपाई जाती है

देवता शाद, देवियाँ आबाद
भेंट क्या-क्या चढ़ाई जाती है

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