रेणु हुसैन की रचनाएँ

बहुत से

बहुत से सवालों के
जवाब गुम हैं
बहुत से जवाबों के
सवाल गुम हैं

बहुत सी
हथेलियों की गुम हैं रेखाएँ
बहुत सी
रेखाओं के हाल गुम हैं

वो जो रिस रहा है दर्द का टुकड़ा

मैं इस आग को बुझने ना दूँ
या इसे बुझने से पहले
वो जो रिस रहा है दर्द का टुकड़ा
बहुत अँदर,
जो दिमाग तक पहुँच जाता है
एक ख़याल बनकर,
मुझे सोने नहीं देता
जो आँखों की नमी के नीचे
आँसू की शक्ल लेना चाहता
इन पहाड़ों के बीच कृत्रिम झील के किनारे
ठंडी सर्द हवाओं में भी
जिला रहा है, सता रहा है
किनारों के गीले पत्थरों से टकराकर
लौट-लौट रहा है लहरों की तरह

एकांत अलग-थलग पड़े तन्हा समंदर में।

मैं भी लौट रही हूँ
या लौटा दी गई हूँ
जंगली हवाओं की तरह
पेड़ों-पहाड़ों से टकराती,
सूने मंदिर में नाद करती
अपने देवता की मूरत को फिर से ज़िन्दा करती
पागलों की तरह बेतहाशा बेमानी हँसी हँसती

इस दर्द का क्या करूँ?
जो कभी मुहब्बत बनकर पिघल रहा है
और कभी विद्रोही की ज्वाला-सा लाल हो रहा है
उस दर्द को
धुएँ में उड़ा दूँ
आँखों से बहा दूँ
या होठों पे सजा लूँ

इस पुरानी पड़ चुकी आग को
बुझने से पहले
कुछ और

हादसे कुछ इस कदर गुज़र गए हैं

हादसे कुछ इस कदर गुज़र गए हैं
हम खुद एक वाक़या बन के रह गए हैं

जो तरन्नुम में बात करते थे
वो लब हिलाने से डर रहे हैं

जो छाया था हम पे सैलाब की तरह
हम उसके लिए एक तस्वीर बन के रह गए हैं

अब बादल औ’ बारिश की क्या औकात
हम टूट के बह चुके हैं वो टूट के बरस चुके हैं

अपने आईने में भी उनकी सूरत नज़र आती है
हर चीज़ पे वो अपना अक्स छोड़ गए हैं

लाज़मी है एक उम्मीद पे ज़िन्दगी गुज़र जाए
वो सरमाया है मेरा, हम उनके दर पे आ गए हैं

जला दूँ…!!
ता-ज़िन्दगी जलने के लिए ।

 

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