रोहित ठाकुर की रचनाएँ

गोली चलाने से पलाश के फूल नहीं खिलते

गोली चलाने से पलाश के फूल नहीं खिलते
बस सन्नाटा टूटता है
या कोई मरता है

तुम पतंग क्यों नहीं उड़ाते
आकाश का मन कब से उचटा हुआ-सा है
तुम मेरे लिए ऐसा घर क्यों नहीं ढूंढ़ देते
जिसके आंगन में सांझ घिरती हो
बरामदे पर मार्च में पेड़ का पीला पत्ता गिरता हो

तुम नदियों के नाम याद करो
फिर हम अपनी बेटियों के नाम किसी अनजान नदी के नाम पर रखेंगे
तुम कभी धोती-कुर्ता पहनकर तेज कदमों से चलो
अनायास ही भ्रम होगा दादाजी के लौटने का

तुम बाजार से चने लाना और
ठोंगे पर लिखी कोई कविता सुनाना

बसें

कितनी बसें हैं जो छूटती है
इस देश में
कितने लोग इन बसों में चढ़ कर
अपने स्थान को छोड़ जाते हैं
हवा भी इन बसों के अंदर पसीने में बदल जाती है
इन बसों में चढ़ कर जाते लोग
जेल से रिहा हुए लोगों की तरह भाग्यशाली नहीं होते
ये लोग मनुष्य की तरह नहीं सामान की तरह यात्रा में हैं
ये लोग एक जैसे होते हैं
मामूली से चेहरे / कपड़े / उम्मीद के साथ
जिस शहर में ये लोग जाते हैं
वह शहर इनका नाम नहीं पुकारता
भरी हुई बसों में सफर करता सर्वहारा
नाम के लिए नहीं मामूली सी नौकरी के लिए शहर आता है
ये बसें यंत्रवत चलती है
जिसके अंदर बैठे हुए लोगों के भीतर कुछ भींगता रहता है
कुछ दरकता सा रहता है

चाँद पर गुरुत्वाकर्षण बल कम है

इस धरती पर देखो
कितना गुरुत्वाकर्षण बल है
इसे तुम विज्ञान की भाषा में
नहीं समझ सकते
कितने लोग हैं जिनकी चप्पलें
इस धरती पर घिसती है
कितने लोग हैं जो पछाड़ खा कर
इसी घरती पर गिरते हैं
कितने लोग हैं जिनके बदन से छीजता
पसीना इस धरती का नमक है
कितने लोग हैं जो थक कर चूर हैं
और इस धरती पर लेटे हुए हैं
कितने लोग हैं जो इस धरती
पर गहरी चिंता में डूबे हैं
वे जो प्रेम में हैं
और वे जो घृणा में हैं
इसी धरती पर हैं
कितने लोग हैं जो
आशाओं से बंधे हैं
कितने लोग हैं जो
किसी की प्रतीक्षा में हैं
इस धरती का जो
गुरुत्वाकर्षण बल है
यह इन सबका ही
सम्मिलित प्रभाव है

धूप में औरत

धूप सबकी होती है
धूप में खड़ी औरत
बस यही सोचती है
पर उसे तो जीवन – काल में
संतुलन बनाए रखना है
अपनी इच्छाओं और वृहत्तर संसार के बीच
इस लिये औरत धूप में
बिल्कुल सीधी खड़ी होती है
मार्क्स की व्याख्या में
औरत सर्वहारा होती है
इस युग की धूप औरत के लिये नहीं है
पर धूप में खड़ी औरत यह नहीं जानती है
वह तो सीधी खड़ी होकर
किसी और के हिस्से की
धूप को बचाना चाहती है
किसी और के हिस्से की धूप को बचाती औरत
की परछाई दिवार पर सीधी पड़ती है
दिवार पर औरत की सीधी पड़ती परछाई
दूर से घंटाघर की घड़ी की सुई की तरह लगती है
और पास से सारस की गर्दन की तरह
पर धूप में खड़ी औरत यह नहीं जानती है ।।

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