वीरू सोनकरकी रचनाएँ

बने रहना

कोई प्रलय अंतिम नहीं,
न ही कोई हार अभिशप्त है जीत में न बदल पाने को

सबसे बड़ी उम्मीद है
कि सबसे निर्मम के उत्थान के बाद भी,
कैसे उदित होता है सहजीवन के लिए दमकता एक सूर्य

हाँ, संकटो में सभी रास्ते धुंधला सकते हैं
और क्षमाभाव विलुप्त प्रायः हो सकता है
हो सकता है कि कविता किसी घिसे हथियार सी
तुम्हारे हाथो में हो,
मान सकता हूँ कि जीवन के सबसे बुरे दौर में भी तुम किसी तरह टिके हुए हो

तो यह सोच कर तुम बने रहना
समय की चाक पर किसी उम्मीद की तरह हथियार घिसना
और
पहचानना, मिटटी पर पड़ती धूप का रंग,
सीखना, खुद की परछाइयों से संवाद की कला
समझना, हवाओ के पृथ्वी भर का चक्कर लगाने की प्रवृत्ति

सबसे बड़ी उम्मीद है
कि बचे रहने की जुगत तुम्हे चीटियाँ बता देंगी
फिर तुम प्रलय पूर्व की आंधियों में यह सोच कर निश्चिन्त होना
और बने रहना,
कि यह किसी नए प्रारम्भ की आहट है!

मैं कौन था

साहस से पहले भय आया
और भय से पहले लोभ
सबसे अंत में मैं आया
और मैंने फैसला किया कौन जायेगा, कौन रुकेगा

फिर जो रुका, उसने तय किया
कि मैं कौन था!

एक बार और परिभाषित

जब युद्धरत होने का भ्रम होगा
थकान की पीड़ाएँ चारो दिशाओ से आ आ कर शरीर को कहेंगी
कि अब विश्राम होना चाहिए

एक सूर्य अपने चिड़चिड़े तापमान के साथ पुनः उदय होगा
इस एक राज के साथ,
कि तुम जिसके खत्म होने की प्रतीक्षा में हो
वह तो अब शुरू होने को है
और दिशाएं सोख रही होगी ठीक उसी समय तुम्हारी पीड़ाएँ
और तुम्हारा भ्रम भी,
कि दिशाओ से चल कर हमेशा लक्ष्य आते है लक्ष्य-भ्रम नहीं

एक नया दिन निकल रहा होगा उसी अनंत आकाश के आलोक में,
और ध्रुवीय छोरो के आर-पार गूंज रहा होगा नाद-स्वर
मनुष्य की सामर्थ्य का!

कुछ प्रार्थनाएँ अपने पैरो में पड़ी गुरुत्व की बेड़ियां
चुपके से खोल रही हैं
और आकाश का वह वर्जित द्वार पार कर जाती हैं

एक पृथ्वी फिर गर्भ से है
एक और सभ्यता का अब जन्म होगा

और विश्राम होगा, प्राचीनता के ठहरे रहने की जिद का
नवीनता का एक और नामकरण होगा
मर चुकी सभ्यता क्षमा कर रही है
नयी सभ्यता के खुद पर उग आने के समस्त पाप

मनुष्यता फिर तैयार है
अब एक बार और परिभाषित होने को!

वे थे

वे थे,
अपने होने की तमाम आपत्तियों के बाद भी
वे थे राजधानियों के गाल पर उग आये किसी चेचक के दाग से,
मॉल में आ गए किसी अवांछनीय वस्तु की दुर्गन्ध से,

वे थे,
अपने घरो में टाट के पर्दो के पीछे खुद को छुपाये हुए
कॉलेज के ज़माने की प्रेमिकाओं के बदल जाने पर
खुद का तालमेल बिठाते हुए

वे थे,
जबकि उन्हें नहीं होना चाहिए था
यह अधिकांश लोगो की राय थी!

वे थे,
उनके ड्राइंग रूम में पड़े
अखबार के दूसरे-तीसरे बिना पढ़े छूट गए पन्नों पर,
दरवाजे को ठकठकाते दूधवाले के भेष में,
उनके स्कूल गए बच्चों को समय से घर लाते हुए
वे थे, हर तरह से अपनी अनुपस्थिति को नकारते हुए

और सबसे आश्चर्यजनक बात यह थी कि वे जो थे,
बहुमत की राय से खुद को सहमत पाते थे

भारी उचाट मन से सर को झुकाये
अपने होने की लज्जा के साथ गले तक जमीन में धँसे,
सड़क पर
अचानक से सामने आये
उनकी कार के ब्रेक और हार्न के बीच
किसी भद्दी सी गाली के सम्बोधन-परिचय में
वे थे!

उनका आना

उनका आना
किसी ठन्डे मौसम के आने की आहट नहीं थी

वे आये,
क्योंकि वे कहीं और नहीं जा सकते थे
सड़क पर पड़ी हुई धूल को उड़ाते
असमय आ धमके गर्म मौसम की खबर जैसे

पर वो शहर किसी मछली की चिकनी पीठ में बदल गया था
और टिकने की लाख कोशिशों के बाद भी
वे फिसल गए

वहाँ,
उस अगले शहर में,
जहाँ उन्हें आना तो नहीं था
और जिस शहर को मछली की पीठ में बदलना भी नहीं था

जबकि उन्होंने चाहा था कहीं टिक कर सुस्ताना
और ठन्डे मौसम में बदलना
पर वह फिसलते रहे और देखते रहे
कछुए की पीठ से शहरों को मछली में बदलते

एक चलती हुई सड़क
किसी अनिवार्य यथार्थ की तरह उनके पैरो में बंधी थी
और जो कभी नहीं बदलती थी!

बेहद समझदार

वह क्रोध में थे पर शांत थे
वह असहमत थे,
पर समझाए जाने पर सहमत हो जाते थे!

वह औसत बुद्धि के नहीं
पर यह जाहिर करते थे कि वह समझाने वाले से कम बुद्धि के थे

उन्होंने अपने जीने के तरीके में
इस सामान्य समझ को शामिल किया हुआ था
कि जो ताकतवर थे वही बुद्धिमान थे
वह उन्हें शांत रखने में सफल थे
क्योंकि जानते थे
ताकतवर का क्रोध परिणामोन्मुखी होता है

वह एक हथेली को
दूसरी हथेली पर मार कर कसमसाये लोग थे
जो ऊपर से शांत थे,
जो सब कुछ समझने के बाद भी समझाए जाते थे

वह जो थे,
बेहद समझदार थे!

हर किसी में

अपने समय की भूल-सुधार प्रक्रिया से खिन्न
वह कोई था,
जो चाहता था प्रतीक्षा के ठहरे पलो का और गतिमान होना

और
जो चलते रहना चाहता था
पृथ्वी के घूमने की रफ़्तार से तालमेल बना कर
जो चाहता था कि रात और दिन उसके हिसाब से हो
जो बारिश में भीगे तो मन भर भीगे
जो जीभ फिरा लेने भर से
अपने स्वाद में आम की उपस्थिति चाहता था

जो मांग करता था,
असमंजस से भरे हुए सभी चौराहो से
कि अब हर सड़क एकदम सीधे चलेगी
जो अपने जूतों के तल्लो में
तितलियाँ बाँध हवा से हल्का होना चाहता था

जो गायब तो था
पर हर किसी में मौजूद था!

जिद से भरे हुए लोग

भयानक स्मृतियों के जंगल से
बच-बचा कर
उन्होंने,
एक बीच की राह निकाली थी
सात्वनाओं की एक नदी जहाँ उन्हें छू कर गुजरती थी

वे जीने की जिद से भरे हुए लोग थे
वह नहीं चाहते थे
कि उनकी आँखों में जमा हुआ नमक पानी में बदले
वह भूलना चाहते थे
कि कभी उनकी नस्ल जब-तब पैरो के अँगूठे से
जमीन कुरेदने लगती थी

उन्होंने अपने लिए आग मांगी थी
और वह चाहते थे
दूर कहीं चीखता हुआ स्मृतियों का वह अमिट जंगल
धीरे-धीरे ही सही,
एक दिन पूरा जल जाये!

नमक

किसी एक बिंदु से आरम्भ
और वहीँ समाप्त,
एक दुखद यात्रा-स्मृति की उदासियों से परे छिटक
मैं बुन रहा हूँ पुनः वही
सात महासागरों को एक छलांग में पार करता कोई दुस्साहस

कि
अनिर्णीत पहचान की कोई व्यथा मेरी नरम खाल पर नहीं होगी,
और जूतों के तल्लो में छिपा कर
नमक की वह पुड़िया मैं वापस लाऊँगा
उसी कमरे-कम-लायब्रेरी में
जहाँ दीवारो पर ऊगा है ज्वार भाटा से जूझती
और लहरो से टकराती
किसी नाव सा मुँह चिढ़ाता मेरा ही एक चित्र,
कामनाओ के असंख्य सीप जो स्वप्न में दोमुँहा सांपो में बदल जाते है
मेरे बिस्तर पर जहाँ-तहाँ बिखरे है

मेरी तकिया में सोखा हुआ वह नमक बिखरा है पृथ्वी के सभी छोरो तक
और मैं कह रहा अपने जूतों से
कि चलना है
वह पूरा नमक वापस लाने

समय बचा लिया

सब कुछ मिट जाएगा इस बात को सच मान कर
देह के कुँए में साँसे खपा रहा हूँ
पैरो में दूरियाँ बाँध रहा हूँ
और खाल के भीतर जमा कर रहा हूँ आवाजे,

गले तक लील कर रोटी की खुशबू
चाहता हूँ नाभि में कहीं छुप-छुपा कर लिख दूँ
मेरा नाम क्या है और मैं कौन था!

सब कुछ मिट जाएगा,
जोड़ी गयी हर चीज बिखर जाएगी
मिटटी-हवा और पानी बन कर
एक पृथ्वी के चेहरे का तेज़ इससे और बढ़ेगा

धरती के उसी चमकते चेहरे पर रेंगेंगी कभी
भविष्य में कुछ बेचैन परछाइयाँ

ये साँसे तब उनके काम आएँगी
आवाजे तब चीख कर कहेंगी
तुम्हे कितनी दूरियां तय करना अभी भी बाकी है
रोटियां तब एक उपलब्धि नहीं रहेगी

नाभि पर नहीं,
वह किसी पहाड़ के चौड़े सीने पर लिखेंगे
वह सबसे जरुरी बात, जिसका बचना सबसे जरुरी था

वह लिखेंगे, सब कुछ मिट चुकने के बाद भी,
हमने तुम्हारा समय बचा लिया
हमने तुम्हारा नाम नहीं बचाया!

मैं था

मैं तुम्हारे संगीत में नहीं, अपने रुदन में था
रुदन की हिचकियों में
और घुटी अबोली शिकायतों में था

वहाँ था जहाँ सिर्फ मैं था

तुम्हारी इसी दुनिया में जहाँ तुम मानते थे कि मैं था
और मैं तुम्हारे मानने में भी पूरी विनम्रता के साथ
वहाँ नहीं था
मैं उस स्वीकारोक्ति में था
जहाँ मैं ख़ारिज कर रहा था
कि मैं कहीं और नहीं तुम्हारे ही साथ हूँ

तुम्हारे साथ चाय की टेबल पर
और विषाद को झुठलाती हँसी में था,

मैं वहाँ-वहाँ था जहाँ-जहाँ तुम्हारी शंका थी कि मैं नहीं था

मैं तुम्हारे हर्ष में नहीं, अपने विलाप में था

जब मैं कहना चाहता था
तब न कह पाने में था

क्रोध में खुद को समझाते हुए था
अकेले में खुद से की गयी बदतमीजियों में था!

नृत्य में था तुम्हारे साथ
और तालियों से औपचारिकताओं का भार उतारने में था

उस हर्ष-दृश्य के पीछे धुंधलाये अदृश्य में था
अदृश्य के पर्दो को तालियों की गूंज से चीरते हताश प्रयासों में था
तुम्हारे नृत्य में नहीं था, पर वहीँ था!

मैं पूर्णता में नहीं, अपूर्णता के अहसास में था
जब पूर्णता का तेज़ नाद स्वर मुझे पीछे धकेल रहा था
मैं अपूर्णता के विलाप में रिस रहे जीवन में था

तुम्हारे संगीत में नहीं अपने रुदन में था

हाथ की लकीरो से बाहर
किस्मत की उड़ती गंध को मुट्ठी में भर
दौड़ भागने में नहीं,
उसके पकड़ में आने के किस्से-कहानियों में था!

और जब तुमने सोचा कि मैं सच में नहीं हूँ
अपने होने की अनसुनी धित्तकार को
चुपचाप सुनते हुए
और खुद को अपने न होने की दी गयी दिलसाओं में था

तुम्हारे संगीत में नहीं, अपने रुदन में था!

मैं वहाँ-वहाँ था
जहाँ हो सकने की स्वीकार्यताएं थी
पर मैं अस्वीकार्यता में था,

और था,
विलम्ब से आने में
और शीघ्र चले जाने में
पहचाने जाने की हर हड़बड़ाहट में मैं था

तुम्हारे उत्सव में नहीं था, अपने मातम में था

बोलने की हर वजह में,
हो सकने की तमाम संभावनाओ के बाद
उग आती किसी कायरता में,
जहाँ वीरता उपहास के पर्दो के पीछे धकेल दी जाती थी
अपने चेहरे को किसी पर्दे सा ओढ़े मैं था

और मैं जहाँ भी था
वहाँ हो सकने या न हो सकने की आशंकाओं में बिंधा हुआ था

पर मैं तुम्हारे संगीत में नहीं, अपने रुदन में था

पृथ्वी

हम संवाद करते थे
और आसमान अपना रंग बदल लेता था
हम घर से निकलते थे,
तो चार गाँव आगे खेत की जमीन और उपजाऊ हो जाती थी
हम छूटी जा रही बस को हाथ देते थे
और सड़क नदी के किनारे में बदल जाती थी!

हम ठहर-ठहर पहाड़ चढ़ जाते थे
और नीचे झाँकते थे,
हमारा भय कह उठता था तुम बहुत बड़ी हो पृथ्वी!

पृथ्वी चुपचाप उससे भी बड़ा
एक और पहाड़ खड़ा कर देती थी

ऐतराज

मेरे चलने के तरीके पर, उन्हें ऐतराज है
मैं जिस टोन में बात करता हूँ, उस पर ऐतराज है
मैं यहाँ-वहाँ फिरता हूँ, मेरे कहीं न टिकने पर ऐतराज है
मेरे गंदे जूते, मेरी डिग्रियां और मेरी कविताओ पर भारी ऐतराज है
मैं कहता हूँ आप मित्र है मेरे
उन्हें मेरे मित्र होने पर ऐतराज है,
दरअसल वह सजग रहे और मैं बेपरवाह
उन्हें मेरी बेपरवाही, और खुद के सजग होने पर ऐतराज है

एक पल पहले का पल

हाँ मैं तुम्हे खोजूँगा काले और गोरेपन के मध्य
रहस्यमयी सांवलेपन में
दिन और रात के बीच अनिवार्य संध्या के
उस एक पल में पकड़ लूँगा

लौटने के बाद पकडूँगा,
लौटने के ठीक एक पल पहले का पल
जहाँ हमेशा से एक संभावना साँस लेती है कि
तुम्हे रोका जा सकता था
उस मोड़ पर जहाँ से हमारे रास्ते अलग हुए
खुद को खड़ा रखूंगा उस मोड़ से पहले
और एक अथक प्रतीक्षा में जिद सा पकड़ रखूँगा खुद को
प्रेम होने से पहले का वह प्रथम परिचय
पकड़ कर चलूँगा तुम्हारी ओर
जहाँ प्रेम ने अनायास हमारी ऊँगली पकड़ी थी
और हम अपने-अपने पतों पर बने रहते हुए भी विलुप्त हुए थे

मैं स्तब्ध नहीं होऊँगा कि रात से पहले का वह सांवलापन कहाँ गया
मैं वहीँ रहूँगा मेरे प्रेम, तुम जहाँ से अलग हुए थे
ठीक उससे एक पल पहले
एक कदम पहले
एक पहर पहले
हमारे प्रेम से पहले,

उस प्रथम परिचय की ऊँगली पकड़ चलता रहूँगा तुम्हारी ओर
मैंने देखा था वहीँ कहीं रास्ते में प्रेम ने पकड़ा था हमे
मैं वहीँ खोजूंगा उसी रास्ते में मिले सांवले रहस्य को
जिसका एक हिस्सा किसी रेखाचित्र सा मुझमे अभी भी जीवित है

उस रेखाचित्र के रंग पकडूँगा
जो एक हँसी से बिखर दौड़ते थे और एक ब्लैक एंड व्हाइट दुनिया
अचानक से कलरफुल हो जाती थी
मैं वहाँ फिर से खुद में रंग भरूँगा

ठीक जगह

उसने पानी को
पहली बार सामने आये किसी अजूबे सा देखा
उसमे घुलते रंग को देखा
और
देखी आग
छुआ, और कहा “ओह तो तुम मेरा छूटा हुआ हिस्सा थी”

पैरो के नीचे की भुरभुरी मिटटी को सूंघा,
तप्त सूर्य की तेज़ आँच के बाद भी
वहाँ घास की एक कोंपल निकल आयी थी

उसने नदी में एक पत्थर उठा कर फेंका,
भंवर में बनी-बिगड़ी लहरें गिनी

फिर वह आकाश की ओर मुँह उठा कर शुक्राने में हँसा,
गुजरती हवा के कान में कहा
सुनो,
मैं बिलकुल ठीक जगह पर हूँ

निशाचर

[१]

तुम्हारी जादुई अँधेरी रात पर
थर-थर काँपता वासना का पत्ता नहीं,
न ही वह मौन उदास संगीत
जिसे सुनने की चाह में तुम
सन्नाटी रातो की मौज अकेले काट रहे हो,

तुम तक बादलो सा छाया,
तुम तक किसी जिद सा आया
प्रेम की पहली आहट सा
हल्का-हल्का महकता हुआ
आत्मा में घुल रहे एक शरीर का गुप्त प्रत्यक्षदर्शी

दिन के सभी रंगो की
छिटकी चित्तियों के पीछे से झाँकता,
स्वरों में चुप
पर मौन-संवाद में एकदम मुंहलगा
मैं तुम्हारी आत्मा की गर्भनाल की गाँठ नहीं

मैं तुम्हारा निशाचर हूँ!

[२]

दिन की खींची उबासी का उगलदान नहीं
न ही तारों की बेपरवाह गिनी गयी गिनतियों के भूलने का किस्सा,
तुम्हे अचेतन प्रतीक्षा के अनमने अस्वाद से अटे पड़े
दिन के विराट मरुस्थल से
आहिस्ता-आहिस्ता साँझ के दरवाजे तक बुला कर लाया
मैं रात के दरवाजे की पहली दस्तक हूँ!

एकदम ठीक-ठाक घंटो में गुजरे दिन का चेहरा नहीं,
अँधेरी सड़को पर
बेपरवाह बेमक़सद गुजरता और ठिठकता

मैं तुम्हारा निशाचर हूँ!

[३]

दिन के चमकीले शोर में किसी अँधेरे सा गुम
पर रात को तुम पर ओस सा टप-टप टपकता
मैं तुम्हारा कोई अधूरा हिस्सा नहीं,
अल्जाइमर की चोट से घायल
तुम्हारा भूला हुआ कोई अपराधबोध नहीं

आत्माए जहाँ चीखती है
और प्रेम झिझोड़ कर जगा देता है
सिगरेट के कश में उड़ता
मैं कोई वक्त का कोई बेकार हिस्सा नहीं,

तुम्हारे नायकत्व को
हर रात किसी ताजा खिले फूल सा लौटाता
मैं तुम्हारा निशाचर हूँ!

एकदम ठीक

कॉलेज के नाम पर
खुद के आवारापन से,
घर के उबाऊ रोजमर्रा के कामो से
और डींगबाज दोस्तों से,
ताखे पर आ बैठती चिड़चिड़ी गौरैयाँ के
टोह लेते सवालो से

मैं फरार हुआ,

और किसी पार्क के कोने में थोड़ा घबराया मिला
खुद को ढूंढता मिला!

मैं एग्जाम में
पेन की रिफिल से गायब हुआ
तो पन्नों पर मुँह बाये फैली
किसी कहानी सा मिला

उसका शीर्षक न ढूंढ पाने की कुंठा में मिला!

और प्रेम से भागा,
तो कविता में आये किसी नए बिंब सा मिला
उन पहेलियों में
अपना चेहरा छुपाते मिला!

मैं भागा,

शताब्दियों/विभिन्न कालक्रमों में
मनुष्य में हुए विकासक्रम से सबकुछ समझ जाने के भ्रम से,
तो मुझे मनुष्य से मनुष्य तक आने की जद्दोजहद में
एक और मनुष्य मिला

फिर मैं खुद को एकदम ठीक मिला!

भाषा

वह जीत का स्वांग है
जब मैंने तुमसे किसी दूसरी भाषा में बात की
और जब चिंता की
तो सामने तप रही सड़क के एक हिस्से को
अपनी परछाई से सहला दिया

मैं अपना भय,
बह रही उस नदी से बताता हूँ
नदी भय पी कर
ठन्डे पत्थरो को तट पर पटक
आगे बढ़ जाती है

मैं घर लौट आता हूँ
और दीवारो के कान,
आइनों के मुँह साफ़ करता हूँ

एक्वेरियम में धैर्य उगल रहे नदी से आये
उन नवागंतुकों पत्थरो के स्वागत में
मछलियाँ,
उनका मुँह चाट रही है

असंवाद के संवाद में बदलने के उसी शोर में
फिर हमारी बहस मातृभाषा में थी!

ग़ैरवाजिब सी बात

सन्नाटे के शोर में
कहीं कोई हड़बड़ाहट है
कि मैं जब सुनता हूँ कि कहीं कोई शोर नहीं है
तो चौंकता हूँ

और,

एक खेत देखता हूँ
एक सड़क देखता हूँ
बगल से गुजरती उदास हवा को महसूस करता हूँ
कि उस हवा में जो हलकी नमी के साथ घुली हुई ठण्ड है
वह नहीं है

कि उस सड़क पर जो वाजिब चहल-पहल है वह भी नहीं है
कि वह खेत,
जो अपने सीने पर उगती कोपलों पर मुग्ध है
और मैं उनके फलदार होने तक सहमत नहीं हूँ

कि मैं बस कुछ संभल कर चल रहा हूँ
और समझता हूँ कि मैं एक सतर्क समय में हूँ
कि अपने साथ-साथ चलते उस आकाश में आर-पार फैली
किसी धुंधली नीली चादर में लिपटी एक संभावना को
हो मुग्ध बेतरह देखता हूँ

तो सहमत होता हूँ
कि एक समय आएगा
जहाँ सतर्क होना कोई ग़ैरवाजिब सी बात होगी

Share