शाहिद माहुली की रचनाएँ

हाशिये पर कुछ हक़ीक़त कुछ फ़साना ख़्वाब का

हाशिये[1] पर कुछ हक़ीक़त कुछ फ़साना ख़्वाब का
एक अधूरा-सा है ख़ाका[2] ज़िंदगी के बाब का

रंग सब धुँधला गए हैं सब लकीरें मिट गईं
अक़्स है बे-पैरहन[3] इस पैकर-ए-नायाब[4] का

ज़र्रा-ज़र्रा दश्त[5] का माँगे है अब भी खूँ-बहा[6]
मुँह छुपाये रो रहा है क़तरा क़तरा आब[7] का

सांप बन कर डस रही हैं सब तमन्नाएँ यहाँ
कारवाँ आकर कहाँ ठहरा दिल ए बेताब का

कोह-ए-तन्हाई[8] का शाहिद ज़र्रा-ज़र्रा टूटना
पारा-पारा हो गया है अब जिगर सीमाब का

जिन्स-ए-गिराँ थी ख़ूबी-ए-क़िस्मत नहीं मिली

जिन्स-ए-गिराँ थी ख़ूबी-ए-क़िस्मत नहीं मिली
बिकने को हम भी आये थे क़ीमत नहीं मिली

हंगाम-ए-रोज़-ओ-शब के मशागिल थे और भी
कुछ कारोबार-ए-ज़ीस्त से फ़ुर्सत नहीं मिली

कुछ दूर हम भी साथ चले थे कि यूँ हुआ
कुछ मसअलों पे उनसे तबीयत नहीं मिली

इक आँच थी कि जिससे सुलगता रहा वजूद
शोला सा जाग उट्ठे वो शिद्दत नहीं मिली

वो बेहिसी थी ख़ुश्क हुआ सब्ज़ा-ए-उम्मीद
बरसे जो सुबह-ओ- शाम वो चाहत नहीं मिली

ख़्वाहिश थी जुस्तजू भी थी दीवानगी न थी
सहरा-नवर्द बनके भी वहशत नहीं मिली

वह रोशनी थी साए भी तहलील हो गए
आईनाघर में अपनी भी सूरत नहीं मिली

हकीक़तों से उलझता रहा फ़साना मेरा

हकीक़तों से उलझता रहा फ़साना मेरा
गुज़र गया है मुझे रौंद के ज़माना मेरा

समन्दरों में कभी तिश्नगी के सहरा में
कहाँ-कहाँ न फिरा लेके आब-ओ-दाना मेरा

तमाम शहर से लड़ता रहा मेरी ख़ातिर
मगर उसी ने कभी हाल-ए-दिल सुना न मेरा

जो कुछ दिया भी तो महरूमियों का ज़हर दिया
वो सांप बन के छुपाये रहा खज़ाना मेरा

वो और लोग थे जो मांग ले गए सब कुछ
यहाँ तो शर्म थी दस्त-ए-तलब उठा न मेरा

मुझे तबाह किया इल्तिफ़ात ने उसके
उसे भी आ न सका रास दोस्ताना मेरा

किसे क़बूल करें और किसको ठुकराएँ
इन्हीं सवालों में उलझा है ताना-बाना मेरा

हाशिये पर कुछ हक़ीक़त कुछ फ़साना ख़्वाब का

हाशिये[1] पर कुछ हक़ीक़त कुछ फ़साना ख़्वाब का
एक अधूरा-सा है ख़ाका[2] ज़िंदगी के बाब का

रंग सब धुँधला गए हैं सब लकीरें मिट गईं
अक़्स है बे-पैरहन[3] इस पैकर-ए-नायाब[4] का

ज़र्रा-ज़र्रा दश्त[5] का माँगे है अब भी खूँ-बहा[6]
मुँह छुपाये रो रहा है क़तरा क़तरा आब[7] का

सांप बन कर डस रही हैं सब तमन्नाएँ यहाँ
कारवाँ आकर कहाँ ठहरा दिल ए बेताब का

कोह-ए-तन्हाई[8] का शाहिद ज़र्रा-ज़र्रा टूटना
पारा-पारा हो गया है अब जिगर सीमाब का

जिन्स-ए-गिराँ थी ख़ूबी-ए-क़िस्मत नहीं मिली

जिन्स-ए-गिराँ थी ख़ूबी-ए-क़िस्मत नहीं मिली
बिकने को हम भी आये थे क़ीमत नहीं मिली

हंगाम-ए-रोज़-ओ-शब के मशागिल थे और भी
कुछ कारोबार-ए-ज़ीस्त से फ़ुर्सत नहीं मिली

कुछ दूर हम भी साथ चले थे कि यूँ हुआ
कुछ मसअलों पे उनसे तबीयत नहीं मिली

इक आँच थी कि जिससे सुलगता रहा वजूद
शोला सा जाग उट्ठे वो शिद्दत नहीं मिली

वो बेहिसी थी ख़ुश्क हुआ सब्ज़ा-ए-उम्मीद
बरसे जो सुबह-ओ- शाम वो चाहत नहीं मिली

ख़्वाहिश थी जुस्तजू भी थी दीवानगी न थी
सहरा-नवर्द बनके भी वहशत नहीं मिली

वह रोशनी थी साए भी तहलील हो गए
आईनाघर में अपनी भी सूरत नहीं मिली

हकीक़तों से उलझता रहा फ़साना मेरा

हकीक़तों से उलझता रहा फ़साना मेरा
गुज़र गया है मुझे रौंद के ज़माना मेरा

समन्दरों में कभी तिश्नगी के सहरा में
कहाँ-कहाँ न फिरा लेके आब-ओ-दाना मेरा

तमाम शहर से लड़ता रहा मेरी ख़ातिर
मगर उसी ने कभी हाल-ए-दिल सुना न मेरा

जो कुछ दिया भी तो महरूमियों का ज़हर दिया
वो सांप बन के छुपाये रहा खज़ाना मेरा

वो और लोग थे जो मांग ले गए सब कुछ
यहाँ तो शर्म थी दस्त-ए-तलब उठा न मेरा

मुझे तबाह किया इल्तिफ़ात ने उसके
उसे भी आ न सका रास दोस्ताना मेरा

किसे क़बूल करें और किसको ठुकराएँ
इन्हीं सवालों में उलझा है ताना-बाना मेरा

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