साग़र सिद्दीक़ी की रचनाएँ

अज़्मत-ए-ज़िन्दगी को बेच दिया

अज़्मत-ए-ज़िन्दगी को बेच दिया
हम ने अपनी ख़ुशी को बेच दिया

चश्म-ए-साक़ी के इक इशारे पे
उम्र की तिश्नगि को बेच दिया

रिन्द जाम-ओ-सुबू पे हँसते हैं
शैख़ ने बन्दगी को बेच दिया

रहगुज़ारों पे लुट गई राधा
शाम ने बाँसुरी को बेच दिया

जगमगाते हैं वहशतों के दयार
अक़्ल ने आदमी को बेच दिया

लब-ओ-रुख़्सार के इवज़ हम ने
सित्वत-ए-ख़ुस्रवी को बेच दिया

इश्क़ बेहरूपिया है ऐ ‘सागर’
आपने सादगी को बेच दिया

आहन की सुर्ख़ ताल पे हम रक़्स कर गए

आहन की सुर्ख़ ताल पे हम रक़्स कर गए
तक़दीर तेरी चाल पे हम रक़्स कर गए

पंछी बने तो रिफ़अत-ए-अफ़्लाक पर उड़े
अहल-ए-ज़मीं के हाल पे हम रक़्स कर गए

काँटों से एहतिजाज किया है कुछ इस तरह
गुलशन की डाल डाल पे हम रक़्स कर गए

वाइज़ फ़रेब-ए-शौक़ ने हम को लुभा लिया
फ़िरदौस के ख़याल पे हम रक़्स कर गए

हर ए‘तिबार हुस्न-ए-नज़र से गुज़र गए
हर हल्क़ा-हा-ए-जाल पे हम रक़्स कर गए

माँगा भी क्या तो क़तरा-ए-चश्म-ए-तसर्रफ़ात
‘साग़र’ तिरे सवाल पे हम रक़्स कर गए

इस दर्जा इश्क़ मौजिब-ए-रुस्वाई बन गया

इस दर्जा इश्क़ मौजिब-ए-रुस्वाई बन गया
मैं आप-अपने घर का तमाशाई बन गया

दैर ओ हरम की राह से दिल बच गया मगर
तेरी गली के मोड़ पे सौदाई बन गया

बज़्म-ए-वफ़ा में आप से इक पल का सामना
याद आ गया तो अहद-ए-शनासाई बन गया

बे-साख़्ता बिखर गई जल्वों की काएनात
आईना टूट कर तिरी अंगड़ाई बन गया

देखी जो रक़्स करती हुई मौज-ए-ज़िंदगी
मेरा ख़याल वक़्त की शहनाई बन गया

एक नग़्मा इक तारा एक ग़ुंचा एक जाम

एक नग़्मा इक तारा एक ग़ुंचा एक जाम
ऐ ग़म-ए-दौराँ ग़म-ए-दौराँ तुझे मेरा सलाम

ज़ुल्फ़ आवारा गरेबाँ चाक घबराई नज़र
इन दिनों ये है जहाँ में ज़िन्दगानी का निज़ाम

चंद तारे टूट कर दामन में मेरे आ गिरे
मैं ने पूछा था सितारों से तिरे ग़म का मक़ाम

कह रहे हैं चंद बिछड़े रहरवों के नक़्श-ए-पा
हम करेंगे इंक़लाब-ए-जुस्तुजू का एहतिमाम

पड़ गईं पैराहन-ए-सुब्ह-ए-चमन पर सिलवटें
याद आ कर रह गई है बे-ख़ुदी की एक शाम

तेरी इस्मत हो कि हो मेरे हुनर की चाँदनी
वक़्त के बाज़ार में हर चीज़ के लगते हैं दाम

हम बनाएँगे यहाँ ‘साग़र’ नई तस्वीर-ए-शौक़
हम तख़य्युल के मुजद्दिद हम तसव्वुर के इमाम

एक मुद्दत हुई एक ज़माना हुआ

एक मुद्दत हुई एक ज़माना हुआ
ख़ाक-ए-गुलशन में जब आशियाना हुआ

ज़ुल्फ़-ए-बरहम की जब से शनासाई हुई
ज़िन्दगी का चलन मुज्रेमाना हुआ

फूल जलते रहे चाँद हँसते रहा
आरज़ू का मुक़म्मल फ़साना हुआ

दाग़ दिल के शहंशाह के सिक्के बने
दिल का मुफ़्लिस-कदा जब ख़ज़ाना हुआ

रहबर ने पलट कर न देखा कभी
रह्र-ओ-रास्ते का निशाना हुआ

हम जहाँ भी गए ज़ौक़-ए-सज्दा लिए
हर जगह आप का आसताना हुआ

देख मिज़राब से ख़ून टपकने लगा
साज़ का तार मर्ग़-ए-तराना हुआ

पहले होती थी कोई वफ़ा-परवरी
अब तो “साग़र” ये क़िस्सा पुराना हुआ

एक वादा है किसी का जो वफ़ा होता नहीं

एक वादा है किसी का जो वफ़ा होता नहीं
वरना इन तारों भरी रातों में क्या होता नहीं

जी में आता है उलट दें उन के चेहरे से नक़ाब
हौसला करते हैं लेकिन हौसला होता नहीं

शमा जिस की आबरू पर जान दे दे झूम कर
वो पतंगा जल तो जाता है फ़ना होता नहीं

ऐ दिल-ए-बे-क़रार चुप हो जा

ऐ दिल-ए-बे-क़रार चुप हो जा
जा चुकी है बहार चुप हो जा

अब न आएँगे रूठने वाले
दीदा-ए-अश्क-बार चुप हो जा

जा चुका कारवान-लाला-ओ-गुल
उड़ रहा है ग़ुबार चुप हो जा

छूट जाती है फूल से ख़ुश्बू
रूठ जाते हैं यार चुप हो जा

हम फ़क़ीरों का इस ज़माने में
कौन है ग़म-गुसार चुप हो जा

हादसों की न आँख खुल जाए
हसरत-ए-सोगवार चुप हो जा

गीत की ज़र्ब से भी ऐ ‘साग़र’
टूट जाते हैं तार चुप हो जा

ऐ हुस्न-ए-लालाफ़ाम ज़रा आँख तो मिला

ऐ हुस्न-ए-लाला-फ़ाम ! ज़रा आँख तो मिला
ख़ाली पड़े हैं जाम! ज़रा आँख तो मिला

कहते हैं आँख आँख से मिलना है बंदगी
दुनिया के छोड़ काम ! ज़रा आँख तो मिला

क्या वो न आज आएँगे तारों के साथ साथ
तन्हाइयों की शाम ! ज़रा आँख तो मिला

ये जाम ये सुबू ये तसव्वुर की चाँदनी
साक़ी कहाँ मुदाम ! ज़रा आँख तो मिला

साक़ी मुझे भी चाहिए इक जाम-ए-आरज़ू
कितने लगेंगे दाम ! ज़रा आँख तो मिला

पामाल हो न जाए सितारों की आबरू
ऐ मेरे ख़ुश-ख़िराम ! ज़रा आँख तो मिला

हैं राह-ए-कहकशाँ में अज़ल से खड़े हुए
‘साग़र’ तिरे ग़ुलाम ! ज़रा आँख तो मिला

कलियों की महक होता तारों की ज़िया होता

कलियों की महक होता तारों की ज़िया होता
मैं भी तिरे गुलशन में फूलों का ख़ुदा होता

हर चीज़ ज़माने की आईना-दिल होती
ख़ामोश मोहब्बत का इतना तो सिला होता

तुम हाल-ए-परेशाँ की पुर्सिश के लिए आते
सहरा-ए-तमन्ना में मेला सा लगा होता

हर गाम पे काम आते ज़ुल्फ़ों के तिरी साए
ये क़ाफ़िला-ए-हस्ती बे-राहनुमा होता

एहसास की डाली पर इक फूल महकता है
ज़ुल्फ़ों के लिए तुम ने इक रोज़ चुना होता

ख़ता-वार-ए-मुरव्वत हो न मरहून-ए-करम हो जा

ख़ता-वार-ए-मुरव्वत हो न मरहून-ए-करम हो जा
मसर्रत सर झुकाएगी परस्तार-ए-अलम हो जा

इन्ही बे-रब्त ख़्वाबों से कोई ताबीर निकलेगी
इन्ही उलझी हुई राहों पे मेरा हम-क़दम हो जा

किसी ज़रदार से जिंस-ए-तबस्सुम माँगने वाले
किसी बेकस के लाशे पर शरीक-ए-चश्म-ए-नम हो जा

किसी दिन इन अँधेरों में चराग़ाँ हो ही जाएगा
जला कर दाग़-ए-दिल कोई ज़िया-ए-शाम-ए-ग़म हो जा

तुझे सुलझाएगा अब इंक़िलाब-ए-वक़्त का शाना
तक़ाज़ा-ए-जुनूँ है गेसु-ए-दौरान का ख़म हो जा

तजस्सुस मरकज़-ए-तक़दीर का क़ाइल नहीं होता
शुऊर-ए-बंदगी! बेगान-ए-दैर-ओ-हरम हो जा

ये मंज़िल और गर्द-ए-कारवाँ ‘साग़र’ कहाँ अपने
सिमट कर रहगुज़ार-ए-वक़्त पर नक़्श-ए-क़दम हो जा

ग़म के मुजरिम ख़ुशी के मुजरिम हैं

ग़म के मुजरिम ख़ुशी के मुजरिम हैं
लोग अब ज़िन्दगी के मुजरिम हैं

और कोई गुनाह याद नहीं
सज्दा-ए-बे-ख़ुदी के मुजरिम हैं

इस्तिग़ासा है राह ओ मंज़िल का
राहज़न रहबरी के मुजरिम हैं

मय-कदे में ये शोर कैसा है
बादा-कश बन्दगी के मुजरिम हैं

दुश्मनी आप की इनायत है
हम फ़क़त दोस्ती के मुजरिम हैं

हम फ़क़ीरों की सूरतों पे न जा
ख़िदमत-ए-आदमी के मुजरिम हैं

कुछ ग़ज़ालान-ए-आगही ‘साग़र’
नग़्मा-ओ-शाएरी के मुजरिम हैं

चराग़-ए-तूर जलाओ बड़ा अँधेरा है

चराग़-ए-तूर जलाओ बड़ा अँधेरा है
ज़रा नक़ाब उठाओ बड़ा अँधेरा है

अभी तो सुब्ह के माथे का रंग काला है
अभी फ़रेब न खाओ बड़ा अँधेरा है

वो जिन के होते हैं ख़ुर्शीद आस्तीनों में
उन्हें कहीं से बुलाओ बड़ा अँधेरा है

मुझे तुम्हारी निगाहों पे ए’तिमाद नहीं
मिरे क़रीब न आओ बड़ा अँधेरा है

फ़राज़-ए-अर्श से टूटा हुआ कोई तारा
कहीं से ढूँड के लाओ बड़ा अँधेरा है

बसीरतों पे उजालों का ख़ौफ़ तारी है
मुझे यक़ीन दिलाओ बड़ा अँधेरा है

जिसे ज़बान-ए-ख़िरद में शराब कहते हैं
वो रौशनी सी पिलाओ बड़ा अँधेरा है

ब-नाम-ए-ज़ोहरा-जबीनान-ए-ख़ित्ता-ए-फ़िर्दौस
किसी किरन को जगाओ बड़ा अँधेरा है

चाक-ए-दामन को जो देखा तो मिला ईद का चाँद

चाक-ए-दामन को जो देखा तो मिला ईद का चाँद
अपनी तक़दीर कहाँ भूल गया ईद का चाँद

उन के अबरू-ए-ख़मीदा की तरह तीखा है
अपनी आँखों में बड़ी देर छुपा ईद का चाँद

जाने क्यूँ आप के रुख़्सार महक उठते हैं
जब कभी कान में चुपके से कहा ईद का चाँद

दूर वीरान बसेरे में दिया हो जैसे
ग़म की दीवार से देखा तो लगा ईद का चाँद

ले के हालात के सहराओं में आ जाता है
आज भी ख़ुल्द की रंगीन फ़ज़ा ईद का चाँद

तल्ख़ियाँ बढ़ गईं जब ज़ीस्त के पैमाने में
घोल कर दर्द के मारों ने पिया ईद का चाँद

चश्म तो वुसअ’त-ए-अफ़्लाक में खोई ‘साग़र’
दिल ने इक और जगह ढूँड लिया ईद का चाँद

 

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