Poetry

बोधा की रचनाएँ

हिलि मिलि जानै तासोँ मिलिकै जनावै हेत

हिलि मिलि जानै तासोँ मिलिकै जनावै हेत ,
हित को न जानै ताको हितू न बिसाहिये ।
होय मगरूर तापै दूनी मगरूरी कीजै ,
लघु ह्वै चलै जो तासोँ लघुता निबाहिये ।
बोधा कवि नीति को निबेरो यही भाँति यहै ,
आपको सराहै ताहि आपहूँ सराहिये ।
दाता कहा सूम कहा सुँदर सुजान कहा ,
आपको न चाहै ताके बाप को न चाहिये ।

काँपत गात सकात बतात है साँकरी खोरि निशा अँधियारी

काँपत गात सकात बतात है साँकरी खोरि निशा अँधियारी ।
पातहू के खरके छरकै धरकै उर लाय रहै सुकुमारी ।
बीच मे बोधा रचै रस रीति मनौ जग जीति चुक्यो तेँहि बारी ।
योँ दुरि केलि करै जग मेँ नर धन्य वहै धनि है वह नारी ।

बोधा का यह दुर्लभ छन्द श्री राजुल मेहरोत्रा के संग्रह से उपलब्ध हुआ है।

अति छीन मृनाल के तारहु ते

अति छीन मृनाल के तारहु ते, तेहि ऊपर पाँव दै आवनो है।
सुई बेह ते द्वार सकीन तहाँ, परतीति को हाँड़ो दावनो है॥
‘कवि बोधा’ अनी घनी जेजहु ते, चढ़ि तापै न चित्त डरावनो है।
यह प्रेम को पंथ कराल महा, तरवारि की धार पै धावनो है॥

वह प्रीति की रीति को जानत थो

वह प्रीति की रीति को जानत थो, तबहीं तो बच्यो गिरि ढाहन तैं।
गजराज चिकारि कै प्रान तज्यो, न जरयो सँग होलिका दाहन तैं॥

‘कवि बोधा कछू न अनोखी यहै, का बनै नहीं प्रीति निबाहन तैं।
प्रह्लाद की ऐसी प्रतीति करै, तब क्यों न कप्रभु पाहन तैं॥

लोक की लाज औ सोच प्रलोक को

लोक की लाज औ सोच प्रलोक को, वारिये प्रीति के ऊपर दोऊ।
गाँव को गेह को देह को नातो, सनेह मैं हाँ तो करै पुनि सोऊ ॥

‘बोध सु नीति निबाह करै, धर ऊपर जाके नहीं सिर होऊ ।
लोक की भीति डेरात जो मीत, तौ प्रीति के पैपरै जनि कोऊ ॥

कहिबे को ब्यथा सुनिबे को हँसी

कहिबे को ब्यथा सुनिबे को हँसी, को दया सुनि कै उर आनतु है।
अरु पीर घटै तजि धीर सखी, दु:ख को नहीं का पै बखानतु है॥

‘कवि बोधा कहै में सवाद कहा, को हमारी कही पुनि मानतु है।
हमैं पूरी लगी कै अधूरी लगी, यह जीव हमारोई जानतु है॥

कूर मिले मगरूर मिले

कूर मिले मगरूर मिले, रनसूर मिले धरे सूर प्रभा को।
ज्ञानी मिले औ गुमानी मिले, सनमानी मिले छबिदार पता को॥

राजा मिले अरु रंक मिले, ‘कवि बोधा मिले निरसंक महा को।
और अनेक मिले तौ कहा, नर सो न मिल्यो मन चाहत जाको॥

खरी सासु घरी न छमा करिहैं

खरी सासु घरी न छमा करिहैं, निसिबासर त्रासन हीं मरबी।
सदा भौंहे चरहै ननदी, यों जेठानी की तीखी सुनै जरबी॥

‘कवि बोधा न संग तिहारो चहैं, यह नाहक नेक फँदा परबी।
बऑंखें तिहारी लगैं ये लली, लगि जैहें कँ तो कहा करबी॥

कबँ मिलिबो कबँ मिलिबो

कबहूँ मिलिबो, कबहूँ मिलिबो, यह धीरज ही मैं धरैबो करै।
उर ते कढ़ि आवै गरै तें फिरै, मन की मनहीं मैं सिरैबो करै॥
‘कवि बोधा’ न चाउसरी कबहूँ, नित की हरवा सो हिरैबो करै।
सहते ही बनै, कहते न बनै, मन ही मन पीर पिरैबो करै॥

कूक न मारु कोइलिया

कूक न मारु कोइलिया, करि-करि तेह ।
लागि जाति बिरहिनि कै, दुबरी देह॥

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