भावना मिश्र की रचनाएँ

’कुछ नहीं’

‘कुछ नहीं’
ये दो शब्द नहीं
किसी गहरी नदी के दो पाट हैं
जिनके बीच बाँध रखा है हर औरत ने
अनगिन पीड़ाओं, आँसुओं और त्रास को

इन दो पाटों के बीच वो समेट
लेती है सारे सुख दुःख

बहुत गहरे जब मुस्काती है
या जब असह्य होती है
मन की व्यथा
तब हर सवाल के जवाब में
इतना भर ही
तो कह पाती है
औरत
‘कुछ नहीं’

सुहाग का हर काम सात बार

कितने बरसों से हर बरस
जेठ की अमावस को
कच्चे सूत में लगाकर
प्रेम की हल्दी
बाँध आती हूँ बरगद पर
कितने फेरे लेती हूँ बरगद के
कुछ नहीं रहता याद

गर फ़ोन पर दोहराई कोई गिनती
ज़ेहन में आ गई, तो भली
नहीं तो आठ बरस पहले वाली
वही गिनती
जो माँ ने कराई थी याद
तमाम नसीहतों के साथ,

कि.. सुहाग का हर काम सात बार.
गौर को सुहाग देना पाँच बार
और लेना सात बार

जब सुहाग लो तो सिन्दरौटे से लगा हो आँचल
माँग भरी हो आख़िरी छोर तक
और कलाई भर हों चौबन्दी चूड़ियाँ

सारे सलीके कहे पर ये न कहा माँ ने
कि आँचल के कोर में बँधी इच्छाओं
को कब कह डालना है मूक बरगद से
जो झुका जाता है सुहागिनों की
मनौतियों से,

पति की लम्बी उम्र,
बेहतर नौकरी, सुख समृद्धि
बाल-बच्चे, सात जन्मों का साथ
…… और अपने लिए?

अपने लिए कुछ नहीं, बस उस कोर में
फिर बाँध लाती हैं दो चार नयी इच्छाएँ
घर आती हैं और सहेज के रख देती हैं
आँचल की कोर से निकला सामान
अलमारी के लॉकर में
अगले जेठ की प्रतीक्षा को….

अनुबन्ध

तुम कहते हो
तुम मुझे स्वर्ग दोगे
इस कहने के पीछे
एक अनकहा अनुबन्ध है

कि मैं स्वीकार कर लूँ तुम्हें
इस स्वर्ग का निर्विवाद ईश्वर
तुम मुझे सुरक्षा देने की बात करते हो
और फिर से थमा देते हो मेरे हाथों में
एक मौन अनुबन्ध का लिफ़ाफ़ा
जो सुरक्षा के बदले माँगता है
पूर्ण समर्पण

आज तुम हर मंच पर चढ़कर
चीख़ रहे हो मेरी स्वतन्त्रता के हक में
और तुम्हारी इस चीख़ के पृष्ठ में
मैं सुन रही हूँ एक और अनुबन्ध की अनुगूँज
कि मुझे आजीवन रहना होगा
शतरंज का इक मोहरा

तुम्हारी अदम्य इच्छा है कि
तुम मुझे अपने बराबर का दर्जा दो
और मैं अन्तिम किवाड़ की टेक लिए खड़ी
सूँघ रही हूँ फिर एक घातक अनुबन्ध,
तुम्हारे बराबर आने के लिए
मुझे छोड़नी होगी
अपनी तिर्यक रेखा की प्रवृत्ति
जो काटती है तुम्हारे रास्ते

अपनी कुटिलता की कैंची से
मेरे पंख कतरने वाले
तुम्हारे इन अनुबन्धों को
नकारती हूँ मैं
मेरे पंख सलामत रहे तो
मैं ख़ुद तलाश लूँगी अपना आकाश

सृष्टि की पराधीन इकाई

लो डाल दिए हैं मैंने हथियार
और स्वीकार कर ली है हार
इस युद्ध में

और साथ ही
भविष्य में सम्भावित सभी युद्धों में
मैं पराजित ही हूँ

क्योंकि, मैंने जन्म लिया है
बेटी, बहन, पत्नी और माँ बनने के लिए

मैं हूँ
इस सृष्टि की पराधीन इकाई

मूल और ब्याज

सुन्दर लगती है रसोई में भात पकाती औरत
आँगन में कपड़े धोती
ओसारे पर झाड़ू देती
बच्चों की बहती नाक आँचल से पोछती
ऐसी औरत की छवि पर हम मुग्ध होते हैं बार-बार

रोटियों की गोलाई साधती
जो स्वयं घूमती है किसी अदृश्य अक्ष पर
पसीने की बूँदें फैला देती हैं जब उसके माथे का सिन्दूर
तो वह तस्वीर बनकर छपती है कितनी ही घरेलू पत्रिकाओं के मुखपृष्ठ पर

उसके आँचल में बसा हल्दी का रंग
उसकी उँगलियों के पोरों से रिसती मसालों की गन्ध
ये उतने ही ज़रूरी शृंगार हैं जैसे टिकुली, बिछिया और नाक की लौंग

और अन्तिम लेकिन औरत होने को अनिवार्य,
एक जोड़ी झुकी हुई आँखें
भारतीयता की छवि से लथपथ यह औरत
सपने भी देखती है तो छिपकर

कि इसने गिरवी रखे हैं अपने पंख
और बदले में पाई है
घर की सुख-शान्ति

पसीने की बूँदें जो बहती हैं एक भोर से
दिन के अवसान तक
इनसे मूल अदा नहीं होता
ये तो हैं सिर्फ़ ब्याज

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