डी. एम. मिश्र की रचनाएँ

किसी ने पूछा

किसी ने पूछा
जीवन क्या है
पत्थर पर उगी
दूब बोली मैं हूँ

किसी ने पूछा
मृत्यु क्या है
पंछी ने कहा
बिना पिंजरा खेाले
देखना
एक दिन
उड़ जाऊँगा

किसी ने पूछा
मंजिल क्या है
थका मुसाफ़िर बोला
दिन भर एड़िया घिसकर
घर वापस आ गया
और सफ़र जारी है

किसी ने पूछा
कविता क्या है
तृष्णा ने कहा
एक सुन्दरी
पानी का गिलास
लेकर आयी
और शीशें उतर गयी

उत्तर देने वाले
फिर एक साथ बोले
जीवन का प्रवाह
उन्नत पहाड़ में नहीं
दौड़ती लहरों में है
जो गुनगुनाते हुए
टूटती और बनती हैं

ईमानदारी बोलती है

ईमानदारी बोलती है
उसे अलग से
ज़बान की ज़रूरत नहीं होती

कवि‍ता अपना काम करती है
उसे अलग से
तीर-कमान की जरूरत नहीं होती

बैसाखियाँ हैं
क्योंकि पैर हैं
पंछी पंख विहीन होकर उड़ नहीं सकते
पर, जो गगन विहारी है
उसे अलग से
यान की जरूरत नहीं होती

दूसरों पर असुविधाएँ डाल देना
अपने हक़ में भी ज़िल्लत है
जब एक हवा
अधिक देर तक नहीं टिकती
क्षेाभ की ज़मीन में कभी भी
उग आते हैं बेशुमार कुकुरमुत्ते
तब दुविधा के सिवा
हाथ में कुछ नहीं आता
आदमी होने की खुशबू
जिसमें बाकी है
उसे अलग से
गुलदान की ज़रूरत नहीं होती

बच्चों की कोई वास्तविक
उम्र नहीं होती
होशोहवास दुरूस्त होने तक
कोई भी औज़ार से खेलते समय
वह काट लेते हैं ख़ुद की उँगलियाँ
जिद्दी बच्चे मानते नहीं
बाद में पछताते हैं
चिन्ता की चिता पर जो बैठा है
उसे अलग से
मसान की ज़रूरत नहीं होती

इस कविता के सामने वह नहीं
जिसे आप सोचते हैं
मुड़कर देखिये
भेड़ियों की लम्बी क़तार
कुटिल मुस्कान के साथ
लोगों को खिन्न देखने की
अबोध चतुराई में पीछे पड़ी है
यह भूलकर कि विषवेल
नीचे से ऊपर तक जाती है
और फैल जाती है
जबकि अमरता संकल्प में होती है
उसे अलग से
वरदान की ज़रूरत नहीं होती

जॉगर का सुवरन

बेाझ धान का लेकर
वो जब
हौले-हौले चलती है
धान की बाली-कान की बाली
दोनों सँग- सँग बजती है
मिट्टी-धूल-पसीने में
चम्पा गुलाब-सी लगती है

लाँग लगाये लूगे की
ऑचल का फेटा बाँधे
श्रृंगार, वीर रस एक साथ
जब दोनों आधे-आधे
पॉव में कीचड़ की पायल
मेड़ पे घास की मखमल
छम्म-छम्म की मधुर तान
नूपुर की घंटी बजती है

लुढ़क -लुढ़क कर गिरे पसीना
जेा श्रम का संवाद लगे
भीगा वसन मचलता भार
यैावन का अनुवाद लगे
कन्त साथ तो कहाँ थकन
रात प्रीत की चाँदी हो
दिन जाँगर का सुवरन
खड़ी दुपहरी में भी निखरी
इठलाती-बलखाती वो
धूप की लाली-रूप की लाली
दोनों गालों पे सजती है

बाज़ार

क्या आप इन्सान हैं
यदि हाँ तो
फिर आप क्या हैं
कोई खू़बसूरत चीज़
जिसकी मार्केट वैल्यू है
या मालदार
मार्केट जिसकी जेब में
यदि दोनों नहीं तो
फिर आप
तीसरे कौन है

एक दिन मैं
गेाश्त के बाज़ार से
गुज़र रहा था
देखा कुछ लूले-लँगड़े
थके हारे बूढे भी
बिक रहे थे
लेकिन वो बकरे थे

कुछ रंगीन चर्बी वाले
ज़िस्म भी
बाज़ार में मौजूद थे
वो बाहर से ओके
और भीतर
बर्ड -फलू और
एड्स से पीले थे
लेकिन वो मुर्गियाँ
और मुर्गे थे

मैंने पूरा बाजार
घूम कर देखा
पैसा अंधा तो नहीं, पर
पैसा बड़ा बेफिक्र होता है
घटिया से घटिया विकल्प
उसकी मुट्ठी में होता है
जहाँ खरीदने और
बेचने वालों का ज़ोर है
बाक़ी भौंकने वालों का शोर है

माँस भी
हड्डी भी
ख़ून भी
लेकिन किस काम का
यह देसी कुत्ता
जेा बार-बार
मीट शाप के सामने
आ खड़ा होता है
उठे गड़ासे को देखकर
डरता नहीं
और दुम हिलाता है

गाँधी

गाँधी है एक लफ्ज
जिसे कुछ गैर गाँधियों ने
पहले इस्तेमाल किया
फिर शुरू हुआ गाँधी का चलन
सिक्के की तरह
इस हाथ से-उस हाथ
उस हाथ से-उस हाथ

गाँधी है एक खद्दर
यानी हाथ का बुना कपड़ा
जुलाहे के पसीना का रेशा
आस्थाओं का इतना बड़ा तहखाना निकला
जिसमें छुप गये एक से एक
भारी-भरकम पेट वाले लोग

गाँधी है एक चरखा
जो अंगरेजों के बाद भी
देश में चलता रहा
डेमोक्रेसी में चुनाव चिन्ह के रूप में
और ब्यूरोक्रेसी में विकास के नाम पर पंडाल में
आलम यह हुआ कि चरखा हो गया गाँव-गाँव
और अब बुधिराम की समझ में आ गया
गाँधी का ‘हरिजन’ शब्द उसे नहीं चाहिए

गाँधी है एक सत्य
जो राजघाट से लेकर इजलासों तक
बदस्तूर रोज़-बा-रोज़ बोला जाता है
और पच जाते हैं हज़ारों झूठ

गाँधी है एक अहिंसा
जिसके सीने पर लगे गोलियों के निशान
बराबर फैलते जा रहे हैं

गाँधी है दो अक्तूबर
यानी दफ़तरों में मनाया जाने वाला
सरकारी त्योहार
यानी पूरे देश में
पूरे एक दिन की छुट्टी

अजी गाँधी
दो का पिता बनने में खीस निपुर आती है
पूरे राष्ट्र का पिता बनने में
तुम्हें क्या सूझा था
गाँधी मुझे तुमसे पूरी हमदर्दी है
तुम एक अच्छे इन्सान थे-और महात्मा भी
लेकिन सूझ-बूझ से तुम्हें
काम लेना नहीं आया

गाँधी जब तुम दुनिया से जाने लगे थे
तो अपने साथ अपना नाम क्यों नहीं ले गये
क्यों छोड़ दिया इस बेचारे को यहाँ
गाँधी, तुम गाँधी होकर
उतने गाँधी नहीं बने
जितने गैर गाँधी
गाँधी हो गये

बड़ा बिगौना दिल्ली मा

लखनऊ मा तौ छोट-छोट मुल बड़ा बिगौना दिल्ली मा
पूरे मुलुक के ऊपर होवे काम घिनैाना दिल्ली मा

गउँआ के हमरे सेकरेटरी झंखैं पावर थेारै बा
दुइ मूठी कै घूस-कमीशन जोगवैं कथरी-गुदरी मा
मुल दिल्ली वाले सेकरेटरी उनकै पंजा बहुत बड़ा
पूरे मुलुक कै खाल खींचि कै रक्खैं काली सदरी मा
घपला और धेाटाला वाला बड़ी बिछौना दिल्ली मा

यहर-वहर केव चितै कै केऊ माल तरै तर काट रहा
मुलुक-मुलुक मा घूमि-घूमि कै आपन यान उड़ाय रहा
मन्दिर-मस्जिद का उठाय कै हिन्दू-मुस्लिम बाँट रहा
भेाली जनता का पटाय कै आपन जाल बिछाय रहा
लखनऊ मा तौ ऐंचाताना, मूलमुलौना दिल्ली मा

मंत्री लोगै खाय रहें गोरू का चारा नाय बचा
अफ़सर सारे परमामिन्ट चापैं मुडियाये भर हीक
ग़ज़ब होइ गवा हज़म हवाला कोरट सबका किहिस बरी
बन्द एक ताबूत मा सब भी अब के दोखी, अब के नीक
भगत बना बा सैा-सैा चूहा खाय बिलौना दिल्ली मा

सर पै साफा बाँधि कै बन्दा आँखि मूँदि कै बइठल बा
केतना डाकू पहुँच गये संसद के रस्ते दिल्ली मा
लोकतंत्र के नाम पे देश मा लूटतंत्र कै राज चलै
चम्बल मा जौ रहत रहे अब ऊ हैं बसते दिल्ली मा
बहन-बेटियाँ नाय सुरक्षित बनीं खिलौना दिल्ली मा

त्रिलोचन: धरती का हरसिंगार

भले त्रिलोचन कवियों का सिरमौर नहीं
मगर त्रिलोचन जैसा कोई और नहीं
संस्कार अंकुरित हुआ जब मिट्टी में
हरसिंगार खिल गया चिरानेपट्टी में।

जहाँ गाँव की माटी से कविता फूटे
परंपरा, परिपाटी से कविता फूटे
बात-बात में जिसकी कविता होती है
मीठी भाषा अद्भुत भाव पिरोती है।

पढ़ो त्रिलोचन को तो ऐसा लगता है
कड़ी धूप में कोई झरना झरता है
कविता का आस्वाद नया हो उठता है
मंद-मंद जैसे अलगोजा बजता है।

जो-जो लिखा त्रिलोचन ने वो याद करो
आम आदमी की अब पहले बात करो
महल छोड़कर कविता कुटियों में पहुँची
राजमार्ग से चलकर गलियों में पहुँची।

कविता ठाट नहीं है अब सामन्तों का
केवल वो यशगान नहीं श्रीमन्तों का
कविता सीमाओं के बन्धन तोड़ चुकी
घिसी-पिटी वो लीक पुरानी छोड़ चुकी।

खेतों की हरियाली में अब कविता हो
मजदूरों की थाली में अब कविता हो
टूटी-फूटी भाषा भी अब कविता हो
छोटी-मोटी आशा भी अब कविता हो।

नगई महरा मिल जाये तो कविता हो
भेारई केवट मुस्काये तो कविता हो
गॉवों की चौपाल लगे तो कवि‍ता हो
हरचरना का हाल मिले तो कविता हो।

घनी बदरिया छाई हो तो कविता हो
पुरवा ठंडक लाई हो तो कविता हो
शाम ढले पंछी लौटें तो कविता हो
मिल जुल कर सुख-दुख बाँटें तो कविता हो।

जहाँ ओज है वहाँ त्रिलोचन को देखो
नया जोश है वहाँ त्रिलोचन को देखेा
जहाँ शब्द है वहाँ त्रिलोचन को देखो
नया छंद है वहाँ त्रिलोचन को देखों।

है प्रणाम मेरा उस कवि तेजस्वी को
सौ-सौ धन्यवाद है अटल तपस्वी को
कहाँ महामानव वो, कहाँ अकिंचन मैं
श्रद्धा के दो सुमन कर रहा अर्पन मैं।

वही व्यक्ति शिव होता है

माटी को जो सोना बोले उस पर क्या कविता लिखना
बालू को चाँदी से तौले उस पर क्या कविता लिखना
सबसे ऊपर गाँव को रक्खे उस पर क्या कविता लिखना
गाँव के ही जो सपने देखे उस पर क्या कविता लिखना।

पाथर को ‘शिवमूरत’ समझे उस पर क्या कविता लिखना
सब में उसी की सूरत देखे उस पर क्या कविता लिखना
अंदर -बाहर एक तरह हो उस पर क्या कविता लिखना
समतल -समतल एक सतह हो उस पर क्या कविता लिखना।

धरती -सा जो अति विनम्र हो उस पर क्या कविता लिखना
अपने आप में जो समग्र हो उस पर क्या कविता लिखना
अम्बर -सा जो समद्रष्टा हो उस पर क्या कविता लिखना
इतना बड़ा जो खुद स्रष्टा हो उस पर क्या कविता लिखना।

कविता लिखो महीपतियों पर दुनिया वाले कहते हैं
या सुरलोक के अधिपतियों पर दुनिया वाले कहते हैं
या फिर किसी बड़ी हस्ती पर दुनिया वाले कहते हैं
या फिर छलक रही मस्ती पर दुनिया वाले कहते हैं।

पर,वो शायद भूल रहे हैं उलटी गंगा नहीं बहे
रचनाकार हमेशा ऐसे दरबारों से दूर रहे
कलम शस्त्र बनकर उठता है तब वो अच्छा लगता है
अस्त्र की तरह जब चलता है तब वो अच्छा लगता है।

लेखक का किरदार बड़ा हो तब वो अच्छा लगता है
देवदार की तरह खड़ा हो तब वो अच्छा लगता है
सिंधु की तरह लहराता हो तब वो अच्छा लगता है
व्योम की तरह छा जाता हो तब वो अच्छा लगता है।

भाषा का वो जादूगर हो तब वो अच्छा लगता है
भावों का गहरा सागर हो तब वो अच्छा लगता है
पर, वो इक आईना -सा हो तब वो अच्छा लगता है
बिल्कुल ‘शिवमूरत’ जैसा हो तब वो अच्छा लगता है।

‘शिवमूरत’ का कलम उठे तों सोया हुआ किसान उठे
दो धुर भूमि नहीं जिसके उसका भी सकल जहान उठे
‘शिवमूरत’ का कलम उठे तो सामन्तों का दुर्ग ढहे
‘विमली’ और ‘शनीचरी’ की आँखों से कभी न नीर बहे।

‘शिवमूरत’ का कलम उठे ‘केशर -कस्तूरी’ महक उठे
‘लालू की माई’ की जीवन बगिया फिर से लहक उठे
‘सुरजी’ के उर की पीड़ा को ‘शिवमूरत’ ने शब्द दिया
‘पहलवान’ की असह्य ग्लानि भी मन ही मन में सहन किया।

‘शिवमूरत’ का कलम उठे तों ‘रजपतिया’ को शक्ति मिले
व्यथित ‘पियारे’ को भी मानो ‘तर्पण’ करके मुक्ति मिले
शीश उठाकर जीना है तो असुरों से लड़ना होगा
कर में, धारणकर ‘त्रिशूल’ हम सबको शिव बनना होगा।

शिवमूरत’ का कलम उठे तो श्रमिकों का सम्मान बढ़े
‘कुच्ची का कानून ’ बने तो महिलाओं की शान बढे
सत्ता के गलियारे में लहराये ‘जग्गू’ का परचम
जो था कभी ‘कसाई ठाकुर’ अब उसमें रह गया न दम।

‘शिवमूरत’ का कलम उठे तो ‘ज्ञान’ न यों ठोकर खाये
जो समाज का दुश्मन है मैदान छोड़कर हट जाये
‘शिवमूरत’ का कलम उठे तो एक नया परिवर्तन हो
आपस का सद्भाव बढे, खुशहाल सभी का जीवन हो।

‘शिवमूरत’ की रचनाएँ इसलिए सराही जाती हैं
वर्तमान के साथ-साथ वो कल के स्वप्न सजाती हैं
बोली – बानी की भाषा अद्भुत मिठास से भर देती
मस्त हवा भी अपना आँचल खुशबू से तर कर लेती।

‘शिवमूरत’ नें शुष्क विटप में भी चेतनता लायी है
‘शिवमूरत’ नें आँधी को भी लेकिन दिशा दिखायी है
मजलूमों के हक में उनकी जंग निरन्तर जारी है
एक मोरचा फतह हुआ तो अगले की तैयारी है।

कवि ‘कुरंग’ की उर्बरता के आगे शीश झुकाता है
सृजन जहाँ अॅगडाई ले साहित्य-धाम बन जाता है
कवि उसको ही नमन करे जो सबको राह दिखाता है
करता है आसान सफर जो मंजिल तक ले जाता है।

कालजयी जो होता है उसका अवसान नहीं होता
राज दिलों पर करता है जो उसका अंत कहीं होता
कोई पुष्प बिछाता चलता, कोई काँटे बोता है
बढ़कर गरल उठा लेता जो व्यक्ति वही शिव होता है।

वो मानबहादुर होता है

कितने ही पहरे बैठा लो सौ – सौ टुकड़े भी कर डालो
कोई भी जु़ल्म सितम ढालो जितना भी चाहो तड़पा लो
प्रतिकूल परिस्थितयों में जो सरपत -सा अक्षुण्ण होता हे
फिर – फिर जो उगता- बढ़ता है वो मानबहादुर होता है।

आँखेां में भरकर अंगारे जो मौत को अपनी ललकारे
मैं स्वाभिमान हूँ जन -जन का छू भी न सकेंगे हत्यारे
सिर खड्ग के नीचे रखकर भी आपा न कभी जो खेाता है
रिपुदल से तन्हा लड़ता है वो मानबहादुर होता है।

मरकर जो जिंदा रहता है यादों में चलता फिरता है
अवसान कहाँ उसका होता उर में जो नित्य धड़कता है
पीढियाँ उसी को याद करें जो कल के स्वप्न सँजोता है
स्मृतियों में जो बसता है वो मानबहादुर होता है।

नज़रें न कभी झुकतीं जिसकी, हिम्मत न कभी मरती जिसकी
तूफ़ानों, झंझावातों में कश्ती न कभी रुकती जिसकी
काँटों के बीहड़ बन से चुन शब्दों के सुमन पिरोता है
पतझर में भी जो खिलता है वो मानबहादुर होता है।

जो ज्ञान बाँटता चलता है गुरुपद का मान बढ़ाता है
जो अंधकार से लड़कर खुद जलकर प्रकाश बन जाता है
जो सत्य,न्याय, कर्मठता का ही बीज अनवरत बोता है
पथ से न कभी जो डिगता है वो मानबहादुर होता है।

कविता में जिसका जन्म हुआ, कविता में पलकर बड़ा हुआ
कविता से शक्ति ग्रहण करके पाँवों पर अपने खड़ा हुआ
कविता के गंगाजल से जो नित कलुष हृदय के धोता है
जग जिसको ‘जनकवि’ कहता है वो मानबहादुर होता है।

अफ़सोस मगर था ज्ञात किसे वह काला दिन भी आयेगा
साहित्य- जगत का वह सूरज दोपहरी में ढल जायेगा
पलक झपकते भर में देखा वहाँ ख़ू़न की नदी बही थी
और हज़ारों नामर्दों की भीड़ तमाशा देख रही थी।

मुरदों की ऐसी बस्ती में कायरता भी थर्राती थी
जो दृश्य वहाँ पर प्रस्तुत था लज्जा भी देख लजाती थी
कैसे कहकर बच पाओगे वह कौन शख़्स हत्यारा था
आकलन करो इसका भी तो कितना अपराध तुम्हारा था।

जो रही मूकदर्शक बनकर वह जनता भी तो क़ातिल थी
मानवता की उस हत्या में उसकी भी चुप्पी शामिल थी
जब याद करो वह बर्बरता रोंगटे खड़े हो जाते हैं
तन जाती हैं त्योरियाँ और भुजदण्ड कडे़ हो जाते हैं।

दिन हफ़्ते पखवारे बीते लेकिन क़ातिल घूम रहा था
कैसे वह पकड़ा जाता जब पुलिस का चौखट चूम रहा था
‘कमलनयन‘ की अगुआई में कवि, लेखक जब आगे आये
खुलीं प्रशासन की तब आँखें तब अपराधी पकड़ में आये।

छलक रही थीं आँखें सबकी सब असहाय बिलखते थे
अवरुद्ध सभी की वाणी थी सब खोये – खोये लगते थे
हर तरफ़ सिर्फ़ सन्नाटा था दहशत से सब घबराये थे
तब बडे़ – बडे़ साहित्यकार भी बरुआरी पुर आये थे।

उनकी कविता का पाठ हुआ, उनकी कविता पर शेाध हुआ
उनकी कविता के अध्ययन से निज दायित्वों का बोध हुआ
उसमें विचारधारा है तो बेहतर मनुष्य की भाषा है
यदि वर्तमान की चिंता है तो स्वप्न और अभिलाषा है।

मानबहादुर की कविता में जीवन की सच्चाई होती
अंबर -सा विस्तार दिखे तो सागर की गहराई होती
नहीं है कोई धटाटोप पर कण – कण की बातें हैं उसमें
त्रैलोक्य हो भले नहीं पर जन – जन की बातें है उसमें।

फूलों की ही बात नहीं है काँटों से भी प्यार वहाँ है
सुख का ही सम्मान नहीं है दुख का भी श्रृंगार वहाँ है
ज्ञान और विज्ञान वहाँ तो आडम्बर का धब्बा भी है
वहाँ ‘रामफल की कंठी’, ‘ठकुराइन का पनडब्बा’ भी है।

मानबहादुर की कविता में लोकचेतना का स्वर फूटे
वर्षों से जो चली आ रही रूढ़वादिता वो भी टूटे
गूँजे माँ की ममता उसमें,बिटिया पतोह की फिक्र्र भी है
जो वंचित, शोषित, पीड़ित है उस जनमानस का जिक्र भी है।

‘बीड़ी बुझने के करीब में’ गाँव विहँसता देखा है
मानबहादुर की कविता या गाँव की जीवन -रेखा है
छोटी -छोटी कविताओं में अनुभव का संसार बडा है
कहीं -कहीं नफ़रत भी होगी किन्तु मूल में प्यार भरा है।

पथ प्रशस्त करती जन – जन का वह कविता जो सच्ची होती
स्वयं शारदे – माँ आ जाती जहाँ भावना अच्छी होती
अंधकार से जो लड़ती है उस कविता का स्वागत होता
जो मशाल बनकर चलती है उस कविता का स्वागत होता।

तो अजमल को समझे

जैसे कोई पुण्य आत्मा गंगाजल को समझे
जैसे कोई तालतलैया झील कमल को समझे
जैसे कोई आने वाले अपने कल को समझे
वैसे कोई कमलनयन हो तो अजमल को समझे।

सही परख हीरे की जैसे एक जौहरी करता
शंख-सीप के बीच से जैसे कोई मोती चुनता
कारीगर ईंटो से जैसे महल खड़ा कर देता
छोटे- छोटे अणु को छूकर बहुत बड़ा कर देता।

साथ हवा का पाकर ज़र्रे गगन को छूने लगते
सुस्त पड़े रहते हैं जो वो वेग से उड़ने लगते
अहंकार से कौन बढ़ा है कोई मुझे बता दे
छोटी -सी पतवार एक तरणी को पार लगा दे।

जहाँ सृजन की थेाड़ी भी उम्मीद नजर आती है
‘युगतेवर’ की दृष्टि वहाँ पर शीघ्र पहुँच जाती है
‘युगतेवर’ ने लोकनिष्ठ कवियों का मान बढ़ाया
भाषा के विस्तार के लिए ऊँचा मंच बनाया।

मानबहादुर की कविता, उन्मत्त की अवधी बानी
प्रथम बार जो पढ़े गये वो कवि रफ़ीक़ सादानी
‘युगतेवर’ ने ताबिश पर, मजरूह पे अंक निकाला
कभी त्रिलोचन, कभी जायसी का भी काव्य खॅगाला।

इसी श्रृंखला में आयी है अब अजमल की बारी
बड़े- बड़े रचनाकारों पर जो पड़ते हैं भारी
यों तो अजमल की दीवानी इक जमात है पूरी
पर, ‘युगतेवर’ को लगती कुछ बात जो अभी अधूरी।

अजमल जैसा कवि-शायर तो युगों में पैदा होता
भावभूमि पर जो भाषा के बीज अनोखे बोता
हरी – भरी हो उठती है जिसके नग़मों से धरती
सेाने -चाँदी की फ़सलों से पट जाती है परती।

कद्रदान जो अभी तलक मंचों से उनको जानें
उनके मीठे सुर सेउनके जादू को पहचानें
दो नज़्में सुनकर उनकी संतोष कर लिया करते
‘ताजमहल’ या ‘मेरा हिन्दुस्तान’ पे जान छिड़कते।

महफ़िल की सीमाओं में जो बाँध रहे अजमल को
या मुशायरों का शायर जो आँक रहे अजमल को
उन्हें चाहिए वो उनके पूरे कलाम को देखें
बड़ी-बड़ी ग़ज़लें उनकी ऊँचे कलाम को देखें।

देखें ‘नग़माते अजमल’, ‘जज़बाते अजमल’ देखें
‘खुर्शीदे’, ‘मेहमाने अर्श’, कि ‘नूरे मुजस्सिम’ देखें
देखें ‘ रूहे कायनात’, ‘परचमे नूर’ और ‘झुरमुट’भी
देखें और क़िताबें उनकी कुछ ग़ज़लें छिटपुट भी।

‘लवें’ पढ़ेंगे तो देखेंगे अल्फ़ाजों की दौलत
तब समझेंगे क्या होती है एहसासों की क़ीमत
लिखने-पढ़ने वालों से है मेरी एक गुज़ारिश
उन्हें समग्रता में देखें बस इतनी मेरी ख़्वाहिश।

उनकी ग़ज़लों, नग़मों का मेयार देखिये पहले
नर्म-नर्म लफ़्जों की तीखी धार देखिये पहले
हुस्न-इश्क तक सीमित नहीं हैं बहुत बड़ी हैं ग़ज़लें
सूफ़ीवाद और दर्शन से भी भरी पड़ी हैं ग़ज़लें।

यों लगता है ख़ुदा ने उनको अलग से न्यामत दी है
महफ़िल पर छा जाने की जो अद्भुत ताक़त दी है
हर कवि-शायर यही सोचता अजमल कैसे लिखते
शब्द हथेली पर ही क्या सब क्रम से रक्खे रहते।

हिन्दी हो या उर्दू हो पर, कौन है उनका सानी
भेाजपुरी हो या देहाती या हो अवधी बानी
हिन्दी के मर्मज्ञ हैं तो उर्दू ज़बान के आलिम
ख़ुद को मगर मानते हैं वो इक मामूली ख़ादिम।

क्हने को हिन्दू-मुस्लिम दोनों का प्यार हैं अजमल
फिर क्यों हासिल नहीं हुआ जिसके हक़दार हैं अजमल
छोटी -सी अपनी दुनिया में भी खुशहाल हैं अजमल
धन -दौलत की कभी है फिर भी मालामाल हैं अजमल।

सादा लिबास सर पर पगड़ी पहचान है अजमल की
पर, सच पूछो तो यही सरलता शान है अजमल की
हर पल उनके चेहरे पर मुस्कान खेलती रहती
अगर वो चुप रहते हैं तो भी दुआ बोलती रहती।

लोक लुभावन भले नहीं पर, मनभावन हैं अजमल
भजन – कीर्तन, नात की तरह अति पावन हैं अजमल
ख़ुदा करे उनका यश फैले कायनात में पूरी
बस, अजमल ही अजमल गूँजे कायनात में पूरी।

हर बात रोटी से

हर बात रोटी से चलती है
और रोटी पर खत्म हो जाती है

रोटी वह ‘न्यूक्लियस’ है
जिसके चारों ओर
संसार घूमता है
जैसे ‘इलेक्ट्रान’
बस इसीलिए
रोटी गोलाई लिए होती है

रोटी एक मजबूरी है
जो आदमी को जानवर बना देती है
आज रिक्शे, ताँगों पर
पहिए की जगह रोटी
और रोटी के लिए
घेाड़े की जगह आदमी जुता है

मैंने अक्सर देखा है
रोटी सेंकते
और फुटपाथ पर सोते
मजदूरों को
जिनकी पीठ पर बने
बोझों के ज़ख्म
कभी – कभी चमक उठते हैं
धुआँ छोड़ते
आधे -अधूरे
चूल्हे की रोशनी -सा

चक्रव्यूह

माँ!
मुझ में और अभिमन्यु में
बस इतना अन्तर है-
वह चक्रव्यूह अपनी माँ के पेट में
सीख रहा था और
मैं तेरी पीठ पर बँधी गठरी में

रहमान का मुर्गा
जैसे घड़ी का एलार्म हो
ठीक चार बजे बाँग देता
तू जग जाती
पहले घर का सारा
कामकाज निपटाती
फिर जमींदार के खेतों में
दिन भर कोल्हू का बैल बनी रहती

बरसात में
फटे आँचल की छतरी में
जाड़े में
वर्षों पुरानी कथरी में
गर्मी में
धूप से चिटकती चमड़ी में
सॅभालकर
तू मुझे ऐसे पालती
जैसा गौरेया अपना अंडा सेती है

खाली पेट
पीठ पर भविष्य -सा मुझे
सिर पर वर्तमान -सा बोझ लादे
किलो भर मजूरी लिये
सूरज डूबे तू घर आती
तब चूल्हा फूँकती

पर
उस दिन तवा नहीं गरमाया
चारों ओर सिर्फ था धुआँ धुआँ
आसमान तक फैला हुआ
कसैला धुआँ
माँ
चक्रव्यूह तोड़ना मैं कैसे सीख पाता
जब तू बीच में ही सेा गयी

कन्ता न जाओ शहर

कन्ता न जाओ शहर
गाँव की मजूरी भली।

धान की रोपाई का
और फिर कटाई का
मौसम जब आयेगा
कौन सहारा देगा
किसके बलबूते पर बोझ
उठायेंगे हम

मेड़ से जो फिसलेंगे
और फिर न सँभलेंगे
कौन बाँह थामेगा

कजरी के दिन होंगे
झूलों की ऋतु होगी
किसके सँग पेंग बढ़ायेंगे हम

आधी -टूका खाकर जी लेंगे
लेकिन आषाढ़ की न दूरी भली।

कोल्हू हाँकेगे
रस चूसेंगे
गन्ने का
जाड़ा कट जायेगा
कपड़ा भी कम होगा
तो भी सब चल जायेगा
गेहूँ के पकते ही
डेहरी के भरते ही
दुख सारा कट जायेगा
बिटिया के भाग जगेंगे
पीले हाथ करेगे
अब की साल में
ऊँचे महलों के पावदानों पर सोने से
अपने घर की खटिया टूटी भली।

जूते मजबूत कर लो

पहले अपने जूते मजबूत कर लो
फिर सड़क पर आना
इन सड़कों पर
जिन्दगी की गाड़ी
बेतरतीब बोझों से लदीफँदी
कौन घेाड़ा खींच सकता है
बिना एड़ी में नाल ठुकवाये

इंजीनियरों और ठेकेदारों को छोड़िये
अब तो बेलदार भी
अपनी जानकारी में
सड़कों के साथ न्याय नहीं करता
इन सड़कों के कूबड़ तो देखिये
कौन माई का लाल
नंगे पाँव इन पर
चल सकता है

पगडंडियों पर धूल उड़ती थी
वह ठीक थी
पर, इन राजमार्गों की आँखों से
बहते गर्म अलकतरे पर
नंगे पैर ऐसे पड़ते हैं
जैसे गर्म तवे पर
पानी की बूँदें

पगडंडियों तब भी ठीक थीं
गिरने पर फूटने – फाटने
का भय नहीं था
पर, ये झाँवे और खड़ंजे की सड़कें
पैरों के तलवे
लहूलुहान कर देती हैं

मेरे दोस्त
अब वह ज़माना भूल जाओ
जब हमारे-तुम्हारे दादा -परदादा
अपनी ससुराल जाते हुए
पनही लाठी में टाँग कर ले जाते थे
गाँव की चौहद्दी में पहुँचते थे
तब कहीं पहनते थे पनही
उस समय पनही
दिखावटी होती थी
पर, आज के युग में
छोटा -सा – छोटा काम भी बनाने के लिए
हाथ में जूता लेना पड़ता है

यह है हमारी चौहद्दी

कभी बाढ़ की चोट
कभी सूखे की मार
कभी पाला -पाथर की वृष्टि
कभी रोगों की भरमार।

बँटाई पर खेत
लोगों का तगादा
सिंचाई और पोत
जिलेदार का
जेल की हवा खिलाने का वादा।

डेहरी का सफाया
पड़ोसी का इन्कार
बनिये का बकाया
बन्द सारे द्वार।

चूता छप्पर
दरकी दीवार
ठिठुरे मवेशी
सहमा परि‍वार।
भाई की पढ़ाई
बीमार मा‍ँ की दवाई
जवान बहन की सगाई
फटे कपडों में लुगाई।

अ‍ँटकी मजूरी
कर्ज में जि‍न्दगी
तबाही ही तबाही
बरबादी ही बरबादी
यह है हमारी चौहद्दी!

गीत

अनुभूति होनी चाहिए 

क्या किसी का दर्द कोई बाँट लेगा
क्या किसी की पीर कोई सह सकेगा
पर, सभी के दर्द की अनुभूति होनी चााहिए
हर किसी को पीड़ितों से प्रीति होनी चाहिए

बाँसुरी में छेद हैं कुछ, कुछ हवा है
बस इसी का नाम ही जीवन हुआ है
उस घड़े के मर्म को है कौन सुनता
जो किसी की मृत्यु पर है घंट बनता

इस सफ़र का ध्येय क्या है
लक्ष्य का उद्देश्य क्या है
जो मिले सन्दर्भ ढूँढे
सबके सब सम्बन्ध झूठे

ज़िन्दगी भर कौन किसका साथ देगा
कौन बाँहें उम्र भर थामे रहेगा
व्यक्ति में पर व्यक्ति की अनुरक्ति होनी चाहिए

मानते हैं हम कि कविता की कुछ न देगी
ज़िन्दगी भी आखि़री पल कुछ न लेगी
राज है यह आज केवल कल नहीं है
इस मुसीबत का कहीं भी हल नहीं है

लोक यह किसके लिए है
कौन कितने दिन जिए है
लोग पायेंगे यहाँ क्या
कुछ नहीं दिखता कहाँ क्या

गीत गाने से न कोई ग़म घटेगा
इस सभा से हल न मसला हो सकेगा
पर, ज़माने के लिए अभिव्यक्ति होनी चाहिए

आदमी गर आदमी को दे सहारा
दूर हो जाये पलों में कष्ट सारा
सब चतुर हैं इसलिए जाते ठगे सब
एक ही अपराध में जैसे लगे सब

लेाग कुछ उपदेश में हैं
कुछ छिपे परिवेश में हैं
भावना सब की धनी है
पर व्यथा से अनसुनी है

थाल अपनी दूसरे को कौन देगा
कौन है जो ऐश अपना कम करेगा
पर, समन्वय की दया की नीति होनी चाहिए

स्वप्न के लोक में 

स्वप्न के लोक में पास तुम आ गयीं
एक पल ही सही उम्र तो जी लिए।

मखमली सेज पर वस्त्र की ओट से
प्राण देखा तुम्हें साध हर कोण से,
देख तुमको जगी स्वर्ग की कल्पना
सुगबुगाई हृदय में प्रथम कामना,
वृत्त दो भाग में जो बँटा था कभी
यूँ लगा,फिर जुड़ा चाहता है अभी,

दूर होंगे न अब, एक निर्णय लिए
शून्य थीं, अंक में सब समर्पित किए।

साज -श्रृंगार से तन सजाये हुए
निधि हमारे लिए सब बचाये हुए,
श्वास की बह रही थी नदी मौज में
तिर रहा एक था दीप इस सोच में,
हम कहाँ से दरस का मुहूरत करें
स्नेह की गंध से भावना को भरें,

हाथ भी सोचकर यह तनिक रुक गये
तुम मिलीं सिद्धि -सी और क्या चाहिए।

रेंगती उँगलियाँ सिहरते तन युगल
कौंधती बिजलियाँ सुलगते मन तरल,
पाँव से भाल तक गुदगुदाता रहा
प्यार के अक्षरों को बनाता रहा,
केश में थे जड़े चुम्बनों के सुमन
जिस तरह तारकों से भरा हो गगन,

जिंदगी में कहीं अब अँधेरा न था
यूँ लगा, जल उठे हैं हजारों दिए।

वक्ष पर शीश आँचल कहीं था उड़ा
विश्व देखा प्रथम बार इतना बड़ा,
खेा गये हम कहाँ घूमते-घूमते
क्षीर के सिन्धु में डूबते -डूबते,
साथ देती रहीं पर, ये कहती रहीं
हो गया अब बहुत अब नहीं, अब नहीं,

देह -श्री में भरी थी सुधा रूप की
कुछ नयन से पिये, कुछ अधर से पिए।

होंठ तो थे सिले बात आगे बढ़ी
कुछ गगन जब झुका, कुछ धरा भी उठी,
जब कली बावरी के खुले मधु अधर
मस्त होकर भ्रमर ने लगायी मुहर,
फिर नहीं ज्ञात, कब, क्या हुआ किस तरह
स्वप्न साकार था कल्पना की जगह,

पर, अचानक तभी नींद से जग गये
रेशमी डोर से छूटकर गिर गए।

प्यार की एक-दो रात दे दो अगर

प्यार की एक-दो रात दे दो अगर
कुछ सितारे गगन में बढ़ा और दूँ।

साँवली रात भी चमचमाने लगे
सो रही बाँसुरी कुनमुनाने लगे,
मैं बढ़ा दूँ उँगलियाँ जरा-सी अगर
दीप बाती सहित थरथराने लगे,

तुम खुली छूट दो गर मेरे प्यार को
मैं नये लोक भू पर बसा और दूँ।

कुन्तलों की महक रातरानी बने
साँस में साँस घुलकर सुहानी बने,
रूप का रश्मियों की बढ़े तीव्रता
और मेरा हृदय नर्म पानी बने,

तुम मेरे अंक में शून्य बन जाओं तो
मैं धरा पर गगन को झुका और दूँ।

बर्फ को आग बनते दिखा दूँ तुम्हें
पत्थरों को पिघलते दिखा दूँ तुम्हे,
एक पल को अगर बन्द कर लो नयन
स्वर्ग भू पर उतरते दिखा दूँ तुम्हें,

ज़िंदगी में मेरी तुम जो आ जाओ तो
ख़्वाब अपने मैं सारे सजा और दूँ।

रंग घोला है मैंने 

रंग घोला है मैंने भले प्यार का
रंग गाढ़ा किया है मगर आपने।

मैं अकेला रहा आप पूरक बने
मैं भ्रमित जब हुआ आप प्रेरक बने,
जिसको देखो वही मुझ में ढूँढे कमी
आप ही एक मेरे प्रशंसक बने।

आप की ओर मैंने उठायी नज़र
अंक में भर लिया है मगर आपने।

मैं पवन जिसमें खुशबू बसी आपकी
मैं वही फूल जिसमें हँसी आपकी,
हर तरफ आप ही आप दिखते मुझे
हर खुशी अब मेरी, है खुशी आपकी।

हाथ बेशक़ बढ़ाया है मैंने प्रथम
मुझको अवसर दिया है मगर आपने।

आपको देख मौसम बदलने लगा
रंग गुलाबी दिशाओं पे चढ़ने लगा,
बात जो आप में वह किसी में नहीं
आप आये कि फागुन महकने लगा।

स्वप्न देखा था मैंने भले प्यार का
स्वप्न पूरा किया है मगर आपने।

जिस-जिस से प्यार किया मैंने 

जिस-जिस से प्यार किया मैंने, सब बिछुड़ गये
अब नयन मिलाते भी मुझको डर लगता है।

वे बचपन के साथी जिनको था अपनाया
वे खेल- खिलौने जिन से यौवन तक आया,
वे ठौर जहाँ एकान्त क्षणों में मिलते थे
मधु-पुष्प अधर पर गीत प्रेम के लिखते थे,
था व्यस्त कभी बचपन मेरा
था मस्त कभी यौवन मेरा

जिस-जिस का परस किया मैंने सब रूठ गये
अब बाँह बढ़ाते भी मुझको डर लगता है।

मीठी -मीठी बातों की मार सही इतनी
अंतर से ले मन-आँगन तक छलनी-छलनी,
जिस-जिस चौखट पर जाकर शीश झुकाया है
माँगा मैंने कुछ भी पीड़ा ही पाया है,
जो आता प्याले छलकाता
बस केवल मुझको तरसाता

जिस-जिस मधु-घट पर लपका मैं सब विष निकले
अब अधर डुलाते भी मुझको डर लगता है।

मैं चाह रहा था पाषाणों में दिल भरना
मैं चाह रहा था हर दिल की धड़कन बनना,
पर, किसने इन अरमानों का सत्कार किया
किसने मुझसे अपनों जैसा व्यवहार किया,
जो आता अदा दिखा जाता
मैं कोई गीत बना जाता

जिस-जिस पर गीत लिखा मैंने सब गैर हुए
अब गीत बनाते भी मुझको डर लगता है।

आँसुओं को छुपा लें

आँसुओं को छुपा लें नयन में मगर
गीत मेरे छुपा भेद हैं खोलते।

मसि लिए अश्रु की गाल के पत्र पर
नयन संदेश लिखते रहे उम्र भर,
प्यार तुम से किया है बड़ा खेद है
कल तलक था प्रगट अब बना भेद है,

तोड़ सारी गये तुम मिलन की प्रथा
अब कहाँ वह अधर से अमृत घोलते।

तुम छुपे सिंधु में हो लहर की तरह
तुम घुले प्राण में हो रुधिर की तरह,
तुम दिखोगे नहीं दृष्टि से इस तरह
अब तुम्हीं हो हमारे हृदय की जगह,

शब्द घायल, विकल छंद स्वर में लिए
नाम केवल तुम्हारा अधर बोलते।

मीत कोई बने, प्रीत तुम से मगर
सुख किसी से मिले शाँति तुम से मगर,
गीत है यह तुम्हारे भजन के लिए
है नयन जल विकल आचमन के लिए,

कामना से चले, वेदना के नगर
वन्दना तक रहे बन व्रती खेाजते।

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