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ब्रजेश कृष्ण की रचनाएँ

इन दिनों वह-1

इन दिनों
अक्सर देखती है वह
पेडों को गुनगुनाते हुए
उसके लिए गुब्बारे की तरह
हल्की हो चुकी है धरती
और आसमान से लगतार आती है
बाजों की गूँज

इन दिनों
उसे सुनाई देती है हर समय
एक धीमी और फूलों के बहुत पास से
आती हुई झिलमिल हँसी

वह सिर्फ़ एक सपना बुनती है इन दिनों

इन दिनों
वह जीवन के
सबसे पवित्र अनुभव से गुज़र रही है
वह माँ बन रही है इन दिनों ।

इन दिनों वह-2

उसने दहलीज पर बनाई है अल्पना
ड्वार पर टाँगा है बन्दनवार
उसने बहुत मन से सजाया है पालना
और छोटे से तकिए पर काढ़े हैं
गुलदाउदी के फूल

सात समुद्र पार अनजानी धरती पर
ख़ुश है वह कि पाने को है
जीवन की अर्थवत्ता

देवताओं को आगाह कर वह उठी है अभी
वह बिछा रही है तारों-नक्षत्रों और
रात के सुनहरे उजास से बना बूटेदार क़ालीन
आने वाले शिशु के लिए

प्रतीक्षारत है वह
वह आतुर हो रही है
वह हँस रही है
वह गा रही है
वह चकित हो रही है
वह बीज से वृक्ष हो रही है।

डायरी से एक पन्ना

आज बैंक से लौटते हुए
रास्ते में मिली एक पहचान की स्त्री
वह अपने घुटनों के दर्द से
इतनी परेशान थी कि रो पड़ी मेरे सामने
मगर मैं दुखी नहीं हुआ उसकी तकलीफ़ से
क्योंकि मेरी जेब भरी थी
और मुझे जल्दी थी घर लौटने की

आज जहाँ खड़े होकर विरोध करना था मुझे
वहीं साथ ली मैंने एक समझदार चुप्पी
खु़द से यह कहते हुए कि हर ग़लत काम को
ठीक करने का ठेका अकेले मेरे पास नहीं है

आज मैंने पूरे शहर को पार किया
और कुछ नहीं देखा
मगर टीवी में देखी एक करुण-कथा
बेचैनी मुझे होने को थी कि मैंने चैनल बदल लिया

आज देखी मैंने अपनी तस्वीर
और खु़द से डरा
आज मैं अपने ही सामने
थोड़ा-सा मरा।

चारपाई की दुकान

मेरे घर के पास नुक्कड़ पर आज एक उदास स्त्री ने
चारपाई बिछा कर खोली है दुकान
चारपाई पर फैला दी हैं उसने
सुइयाँ, बटन, खिलौने, बीड़ी-सिगरेट
या ऐसी ही कुछ थोड़ी सी चीज़ें

पति के मारे जाने के बाद
वह बैठेगी यहाँ आज से सारा दिन
चुटकी भर नमक और मुट्ठी भर चून के इन्तज़ार में

यह क़तई कोई संयोग नहीं कि
इसी शहर में आज खोली गई है एक और दुकान
मैं जानता हूँ कि रिटेल स्टोर्स की
इस भव्य और शनदार कड़ी को दुकन कहना हिमाक़त है
मगर मैं इतना बताना चाहता हूँ
कि हज़ारों चीज़ों के साथ यहाँ बिकेगा नमक और चून भी

सवाल यह है
कि तेज़ भागती हुई सड़क के पास
चारपाई पर बिछी यह दुकान कब तक टिकी रह जायेगी

सवाल यह भी है
कि पत्नी को जन्मदिन पर
ढाई सौ करोड़ का जहाज देने वाले शाहजहाँ की
दुकान का नमक और चून
कब और कैसे पहुँचेगा इस स्त्री के पास
जिसे इसकी सख़्त ज़रूरत है
आज और अभी।

हत्या: एक कला

बाज़ार के इस दौर में
हत्या भी एक कला है
उन्हें न दस्ताने चाहिए
न हथियार न मुखौटे न रात का अँधेरा
वे सिर्फ एक जाल फेंकते हैं अदृश्य
लुभावने दृश्य का
और हम उनकी गिरफ़्त में होते हैं लगातार

बाज़ार के इस दौर में
पहले होती है विचार की हत्या
फिर संवाद मारा जाता है
फिर मारे जाते हैं रिश्ते और हम
हमेंपता ही नहीं चलता
कि कब चौराहों की
आदमक़द मूर्तियों के सिर काट डाले गये
और कब हम पूजने लगे
हत्यारों के बुतों को

बाज़ार के इस दौर में
हममें से कोई नहीं देखता हत्या
और कभी नहीं पकड़ा जाता हत्यारा
क्योंकि हत्या एक कला है
बाज़ार के इस दौर में।

महानायक

आधी रात में नंगे पैर मंदिरों और दरगाहों की ओर
छिप कर जाता हुआ वह काँप रहा है
ग्रह-नक्षत्रों और सितारों के संभावित कोप से
मगर यहाँ गड़ी और गाई जा रही हैं
उसके साहस और शौर्य की पराक्रम-गाथाएँ

सरेआम कितनी सफ़ाई से छिपा रहा है वह
मसीहा के विशाल मुखौटे में अपना लालची चेहरा
मगर यहाँ सुनी और सुनाई जा रही हैं
उसकी महानता और उदारता की किंवदंतियाँ

रंग-बिरंगे काँचों के पीछे
शहर की बसे ऊँची छत पर रच रहा है वह
एक शानदार और मायावी तमाशा
मगर यहाँ देखी और दिखाई जा रही हैं
उसकी अश्रुपूर्ण और भाव-प्रवण करुण-कथाएँ

वह महानायक है इस पाखण्डी समय का

जय-जयकार के शोर के बीच तुम्हारा कुछ भी कहना
बेतुका तो है ही
एक ख़तरनाक गुस्ताख़ी भी।

देशहित

देश के लिए हमने बनाये
अनेक राजनीतिक दल
देशहित में दल अ ने ब से
समर्थन वापस लेकर
स को दिया ही था कि
द ने स से वापस लेकर अ को दे दिया

देश की परिस्थितियाँ बदल गईं
और अब
अ ने स से वापस ले
उसे ब को दिया
कि देशहित में
द ने स को
ब ने अ को
अ ब ने स द को
अ ब स द ने अ ब स द को समर्थन दिया

बच्चो! डरो मत,
दलों की कुल संख्या
और समर्थन की कुल मात्रा के बारे में
यह गणित का पेचीदा सवाल नहीं है
क्योंकि बड़े और सयाने
यह जानते हैं कि
इस तरह के सवाल देशहित में नहीं हैं।

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