अनामिका अनु

अनामिका अनु की रचनाएँ

लोकतन्त्र  खरगोश बाघों को बेचता था, फिर अपना पेट भरता था । बिके बाघ ख़रीदारों को खा गए, फिर बिकने…

3 months ago