अमोघ नारायण झा ‘अमोघ’

अमोघ नारायण झा ‘अमोघ’ की रचनाएँ

एक कली थी खड़ी कली, अधखिली कली, रसभरी कली । जब विहँस पड़ी, तब निखर उठी, आया कोई मधु का लोभी । गुन-गुन करता मधु… Read More »अमोघ नारायण झा ‘अमोघ’ की रचनाएँ