मनीषा जैन

मनीषा जैन की रचनाएँ

भेद रहा है चक्रव्यूह रोज वह ढ़ोता रहा दिनभर पीठ पर तारों के बड़ल जैसे कोल्हू का बैल होती रही…

6 days ago