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विनोद पाराशर की रचनाएँ

कहां से चले थे, कहां जा रहे हो?

क्यों?
बहुत खुश नजर आ रहे हो
स्वतंत्रता की वर्ष-गांठ मना रहे हो
लेकिन-
जरा ये भी तो सोचो
कहां से चले थे, कहां जा रहे हो?
झोंपडी की जगह-
आलीशान बंगला बना लिया
दाल-रोटी छोड दी
फ़ास्ट-फूड खा लिय़ा
कुर्ता-पाजामा छोडकर
फांसी वाला फंदा
गले में लगा रहे हो.
क्यों? बहुत………………जा रहे हो?
दो-चार कदम चलना भी
मुश्किल हो गया हॆ
किसी को ’यामहा’
तो किसी को ’मारुती’ से
प्यार हो गया हॆ.
बॆल-गाडी छोडकर
हवाई-जहाज उडा रहे हो.
क्यों?बहुत………………जा रहे हो?
बाप को डॆड
मां को मम्मी
चाचा,फूफा,मांमा को -अंकल
चाची,फूफी,मांमी को-आंटी
कहकर-
रिश्तों को उलझा रहे हो.
क्यों? बहुत……………..जा रहे हो?
सोने के समय जगना
जगने के समय सोना
सेहत हुई खराब-
तो फिर-
डाक्टर के आगे रोना.
खुशहाल जिंदगी को
गमगीन बना रहे हो.
क्यों?बहुत………………जा रहे हो?
स्वतंत्रता को अर्थ-
तुम कुछ ऒर-
वो कुछ ऒर लगा रहे हॆं
शायद इसलिए-
लोकतंत्र के मंदिर में
असुर उत्पात मचा रहे हॆं.
असुर-संग्राम के लिए-
किसी भगतसिंह को बुला रहे हो.
क्यों?बहुत……………..जा रहे हो?

मजबूत सीढी

मॆं-भी
अपनी-बंद मुट्ठियों में
भर सकता हूं
सफलता का सम्पूर्ण इतिहास
बन सकता हूं
कोई चमकता सितारा
या फिर-आकाश
कोई मजबूत-सी
सीढी मिल जाये
काश!

दोस्ती

मेरे पास नहीं हॆं-
जिन्दगी की वो रंगीन तस्वीरें
जिनसे तुम्हें रिझा सकूं।
मेरे पास नहीं हॆं-
वो मखमली हाथ
जिनसे तुम्हें सहला सकूं।
मेरे पास नहीं हॆं-
वो लोरियां
जिनसे तुम्हें सुला सकूं।
मेरे पास हॆ-
कूडे के ढेर से
रोटी का टुकडा ढूंढते
एक अधनंगे बच्चे की
काली ऒर सफेद तस्वीर
देखोगे ?
मेरे पास हॆं-
एक मजदूर के
खुरदुरे हाथ
जो वक्त आने पर
हथॊडा बन सकते हॆं
अजमाओगे ?
मेरे पास हॆ-
सत्य की कर्कश बोली
जॆसे ’कुनॆन’ की कडवी गोली
खाओगे ?
यदि नहीं
तो माफ करना-
मॆं
आपकी दोस्ती के काबिल नहीं

सुख ऒर दु:ख

हम-
यह जानकर
बहुत सुखी हॆं
कि-दुनिया के ज्यादातर लोग
हमसे भी ज्यादा दु:खी हॆं.
पिता-
इसलिए दु:खी हॆ-
कि बेटा कहना ही नहीं मानता.
बेटे का दु:ख-
कॆसा बाप हॆ?
बेटे के जज्बात ही नहीं जानता.
मां-
इसलिए दु:खी हॆ-
कि जवान बेटी
रात को देर से घर आती हॆ.
बेटी का दु:ख-
शक की सुई-
हमेशा उसी के सामने आकर
क्यों रूक जाती हॆ?
पति-
इसलिए दु:खी हॆ-
कि-उसकी पत्नि
स्वयं को समझदार
ऒर उसे बेवकूफ मानती हॆ
उसकी मां को-
उससे ज्यादा वह जानती हॆ.
पत्नी का दु:ख-
उसका पति-
अभी तक भी-
अपनी कमाई-
अपने मां-बाप पर लुटा रहा हॆ
उसे अपने बच्चों का भविष्य
अंधकारमय नजर आ रहा हॆ.
मालिक –
इसलिए दु:खी हॆ-
कि-नॊकर
हराम की खा रहा हॆ.
नॊकर का दु:ख-
जी-तोड मेहनत के बाद भी
घर नहीं चल पा रहा हॆ.
ये भी दु:खी हॆं
वो भी दु:खी हॆं
ऒर हम-
यह जानकर-बहुत सुखी हॆं
कि-दुनिया के ज्यादातर लोग
हमसे भी ज्यादा दु:खी हॆ.

सूरज निकल रहा है

सूरज निकल रहा हॆ
ऒर तुम
सो रहे हो.
स्वपनों की दुनिया में
कहां खो रहे हो.
स्वपन सिर्फ स्वपन होते हे.
सुनहरे स्वपन
रुपहले स्वपन
मीठे-मीठे
जहरीले स्वपन.
ओ भईया! कपडा बनाने वाले
ओ भईया! अनाज उपजाने वाले
अरे ओ बाबू! दफ्तर को जाने वाले
जरा आंखें खोलो तो
ये खिडकी,दरवाजे खोलो तो
देखो बाहर-
लाल-लाल सूरज
कॆसे निकल रहा हॆ?
पहाडियों के पीछे से
वह धीरे-धीरे
हमारी ओर बढ रहा हॆ.
झरनों की कल-कल
पंछियों का कलरव
कॆसे तत्पर हॆं-
उगते हुए सूर्य का
स्वागत करने को.
उठो! तुंम भी उठो!
ऎ मेरे कवि-मित्र!
सूर्य की रोशनी
देहली पर दस्तक दे रही हॆ
ओर तुंम-
अभी तक
सो रहे हो.
न जाने –
कल्पना की
किस दुनिया में
खो रहे हो.
तुमसे तो नहीं थी
ऎसी उम्मीद
आओ! मेरे साथ आओ
यथार्थ के घरातल पर आओ
नव-जागरण के गीत गाओ.

ख्वाब

ख्वाब
तुम भी देखते हो
हम भी देखते हॆ।
तुम्हारे-ख्वाबों में हॆ-
दूघ पीता/अलसेशियन
पालतू कुत्ता,
दिन में-दस बार
साडियां बदलती
देशी जिस्म में
विदेशी बीबी
ऒर-
हमारी कब्र पर
एक के बाद एक
खडी होती
ऊंची अट्टालिकाएं।
हमारे ख्वाबों में हॆं-
मां के-
सूखे स्तन चिचोडता
बच्चा।
फटी धोती में
पूरे जिस्म को
ढापने की कोशिश करती
-एक युवती।
ऒर-घर बनाते-
बेघर
खुले आसमान के नीचे
रहने को मजबूर
कुछ मजदूर।

खूबसूरत कविता 

मॆं/जब भी
लिखना चाहता हूं
कोई खूबसूरत कविता
अभावों की कॆंची
कतर देती हॆ
मेरे आदर्शों के पंख.
कानों में-
गूंजती हॆं-
आतंकित आवाजें
न अजान,न शंख.
मॆं/जब भी
लिखना चाहता हूं
कोई खूबसूरत कविता
भ्रष्टाचारी रावण
चुरा ले जाता हे
ईमानदारी की सीता.
मॆं/जब भी
लिखना चाहता हूं
कोई खूबसूरत कविता
बेटा-
खींच लेता हॆ
हाथ से कलम
ऒर कहता हॆ
इस कागज पर बनाओ
शेर,भालू या चीता.
मॆं/जब भी
लिखना चाहता हूं
कोई खूबसूरत कविता
चुपके से-
गोदी में आकर
बॆठ जाती हॆ बिटिया
पूछती हॆ-
पापा!आज क्या लाये हो ?
सेब,केला या फिर पपीता.
ऒर-
मॆं/जब भी
लिखना चाहता हूं
कॊई खूबसूरत कविता
पत्नी!
दिखाती हॆ-
अपनी निस्तेज आंखें
मुर्झाया चेहरा
मेरा फटा हुआ कोट
आटे का पीपा-एकदम रीता.
मॆं/जब भी
लिखना चाहता हूं
कोई खूबसूरत कविता.

मैं ऒर तुम 

मॆं-नहीं चाहता
कि तुम
ऒपचारिकता का लिबास पहनकर
मेरे नजदीक आओ.
अपने होठों पर
झूठ की लिपिस्टिक लगाकर
सच को झुठलाओ
या देह-यष्टि चमकाने के लिए
कोई सुगंधित साबुन
या इत्र लगाओ.
मॆं-चाहता हूं
कि तुम
अपनी असली झिलमिलाहट के साथ
मुझसे लिपट जाओ.
मेरे सुसुप्त भावों को
कामदेव-सा जगाओ
ओर फिर-
दो डालें
हवा में लहराने लगें
होती हुई एकाकार.

पुलिस,बच्चे ऒर लुच्चे-लफंगे

पहले-
पुलिस को देखकर
बच्चे घरों में दुबक जाते थे.
लुच्चे,लफंगे ऒर बदमाश
सामने आने से घबराते थे.
अब-
पुलिसवाला
बच्चों से घबराता हॆ,
लुच्चे,लफंगे,बदमाशों को देखकर
चुपचाप निकल जाता हॆ.
अरे !
मॆनें तो यहां तक सुना हॆ
कि आजकल-
हर बदमाश
पुलिसवाले को ’बडा भाई’
कहकर बुलाता हॆ.
पुलिसवाला भी-
बडे भाई का दायित्व
पूरी तरह से निभाता हॆ
य़ह बात अलग हॆ
कि कुछ कमीशन खाता हॆ.

दौड़ो ! दौड़ो !! दौड़ो !!!

दॊडो ! दॊडो !! दॊडो !!!
ऎ नालायक घोडी-घोडो
देश के लिए दॊडो
दॊडॊ ! दॊडो !! दोडो !!!

कभी गांधी के लिए दॊडो
कभी नेहरू के लिए दॊडो
अपनी टांगे तोडो
दॊडो ! दॊडो !! दॊडो !!!

चोरों के लिए दॊडो
रिश्वतखोरों के लिए दॊडो
आपस में सिर फोडों
दॊडो ! दॊडो !! दॊडो !!!

बिरला के लिए दॊडो
टाटा के लिए दॊडो
ऎ भूखे-नंगे निगोडो
दॊडो ! दॊडो !!दॊडो !!!

व्यभिचारी के लिए दॊडो
आत्याचारी के लिए दॊडो
बेकारी से मुंह मोडो
दॊडो ! दॊडो !! दॊडो !!!

राजा के लिए दॊडो
रानी के लिए दॊडो
जनता की बातें छोडो
दॊडो ! दॊडो !! दॊडो !!!

मुर्दों के लिए दॊडो
खुदगर्जॊं के लिए दॊडो
शहीदों से नाता तोडो
दॊडो ! दॊडो !! दॊडो !!!

दॊड हर सवाल का हल
गरीबी पुर्वजन्मों का फल
अपनी-अपनी किस्मत फोडो
दॊडो! दॊडो !! दॊडो !!!

हॆ शरीर में जब तक रक्त
ठहर न जाये जब तक वक्त
ऎ ठोकर खाये पथ के रोडो
दॊडो ! दोडो !! दोडो !!!

अंग्रेज चले गये ?

’अंग्रेज चले गये’
’अब हम आजाद हॆं’
-दादाजी ने कहा
-पिता ने भी कहा
– मां ने समझाया
– भाई ने फटकारा
लेकिन वह-
चुप रहा।
दादाजी ने-
घर पर/ दिन-भर
अंग्रेजी का अखबार पढा।
पिता ने-
दफ्तर में/चपरासी को
अंग्रेजी में फटकारा।
मां ने-
स्कूल में/भारत का इतिहास
अंग्रेजी में पढाया।
भाई ने-
खादी-भंडार के
उदघाटन-समारोह में
विलायती सूट पहनकर
खादी का महत्व समझाया।
ऒर-उसने कहा-’थूं’
सब बकवास हॆ।

हिन्दी पखवाडा 

साहब ने-
चपरासी को
हिन्दी में फटकारा
’हिन्दी-स्टॆनों’ को
पुचकारा
ऒर-कलर्क को
अंग्रेजी टिप्पणी के लिए
लताडा.
क्या करें ?
मजबूरी हॆ-
वो आजकल मना रहे हॆं
’हिन्दी-पखवाडा’.

राजमाता ’हिन्दी’ की सवारी

होशियार ! खबरदार !!
आ रहे हॆं
राजमाता ’हिन्दी’ के शुभचिंतक
मॆडम ’अंग्रेजी’ के पहरेदार !
हर वर्ष की भांति
इस बार भी
ठीक 14 सितंबर को
राजमाता हिन्दी की सवारी
धूम-धाम से निकाली जायेगी
कुछ अंग्रेज-भक्त अफसरों की टोली
’हिन्दी-राग’ गायेगी।
दरबारियों से हॆ अनुरोध
उस दिन ’सेंडविच’ या ’हाट-डाग’
राजदरबार में लेकर न आयें।
’खीर-पकवान’ या ’रस-मलाई’ जॆसी
भारतीय स्वीट-डिश ही खायें।
आम जनता
खबरदार !
वॆसे तो हमने
चप्पे-चप्पे पर
बॆठा रखे हॆं-पहरेदार ।
फिर भी-
हो सकता हॆ
कोई सिरफिरा
उस दिन
अपने आप को
’हिन्दी-भक्त’ बताये
हमारे निस्वार्थ ’हिन्दी-प्रेम’ को
छल-प्रपंच या ढकोसला बताये।
कृपया-
ऎसी अनावश्यक बातों पर
अपने कान न लगायें
भूखे आयें-
नंगे आयें-
आखों वाले अंधे आयें
राजमाता ’हिन्दी’ का
गुणगान गायें।

ताजा-अखबार 

लूट-पाट
भ्रष्टाचार
बलात्कार
बासी खबरे
ताजा अखबार

चुप्पी

उन्हें-
कहने दीजिये
हमें
चुप्प रहने दीजिये.
उनका-
कुछ भी कहना-
व्यर्थ हॆ
जब तक आदमी
सतर्क हॆ.
हमारी चुप्पी का भी
एक विशेष अर्थ हॆ.

जांच-आयोग

हमने-
एक खद्दर-धारी नेता से पूछा
बन्धु !
यह जांच आयोग क्या बला हॆ?
वो मुस्कराकर बोले-
उठे हुए मामले को
दबाने की-
आधुनिक कला हॆ।

तब ऒर अब

तब तुम थे
लगता-
मॆं हूं
तुम हो
ऒर कुछ भी नहीं।
साक्षी हॆ-
गांव के बहार खडा
वह बरगद का पेड
हमारी मलाकातों का
जिसके नीचे बॆठ
तपती दोपहरी में
भविष्य के सुनहरे स्वपन बुनते थे।
तुम!चले गये
दुःख हुआ।
लेकिन-
तुम्हारे जाने के बाद
आ गया कोई ऒर
अब लगता हॆ-
मॆं हूं
वो हॆ
ऒर कुछ भी नहीं।
नाटक का सिर्फ
एक पात्र बदला हॆ
बाकि-
वही-मॆं
गांव, बरगद का पेड
तपती दोपहरी
ऒर-
भविष्य के सुनहरे सपने।

तॊलिया,इजिचेअर ऒर वेटिंग-रूम

मॆं-खूंटी पर टंगा
कोई तॊलिया तो नहीं
कि-
हर कोई आये
ऒर फिर चला जाये
अपने जिस्म को
मेरे जिस्म से रगडकर
छॊड जाये
अपने जिस्म के गंदे किटाणु
मेरे जिस्म पर।
मॆं-घर के कॊने में पडी
कोई ईजी-चेअर तो नहीं
कि-
हर कोई आये
ऒर फिर चला जाये
अपने भारी-भरकम शरीर को
कुछ देर
मुझ पर पटकर
यह भी न देखे
कि मेरी टांगें लडखडा रही हॆ।
मॆं-रेलवे-स्टेशन का
वेटिंग-रुम तो नहीं
कि-हर मुसाफिर
ट्रेन से उतरकर
मुझमें कुछ देर ठहरे
ऒर-फिर
चला जाये
नयी ट्रेन आने पर।

संबंध

मुश्किल होता हॆ-
आंधियों के बीच
दीपक की लॊ को बचाये रखना।
या फिर-
काजल की कोठरी से
गुजरते हुए-
अपने चेहरे को
साफ-सफेद बनाये रखना।
’लॊ’ को बचाने की कॊशिश में
हाथ झुलस जाते हॆं
लेकिन-
हाथ झुलसने की पीडा
’दीपक’ या ’लॊ’
कहां समझ पाते हॆ।
चेहरे की सफेदी
बनाये रखने की कॊशिश में
पूरा अन्तर्मन छिल जाता हॆ
कोठरी का काजल
अन्तर्मन की पीडा
कहां समझ पाता हॆ।
सच !
बहुत मुश्किल होता हे-
किसी को-
अपनी आंखों में बसाये रखना
या फिर-
संबंधों को बनाये रखना।

तीन किस्म के जानवर

इस जंगल में
तीन किस्म के जानवर हॆं
पहले-
रॆंगते हॆं
दूसरे-
चलते हॆं
तीसरे-
दॊडते हॆं।
रॆंगने वाले-
चलना चाहते हॆं
चलने वाले-
दॊडना चाहते हॆं
लेकिन-
दॊडने वाले !
स्वयं नहीं जानते
कि वे
क्या चाहते हॆं?

नकाब

मॆंने-
सिलवाकर रखे हॆं
कई नकाब।
जॆसे भी
माहॊल में जाता हूं
वॆसा ही-
नकाबपोश हो जाता हूं।
तब लोग-मुझे नहीं
मेरे नकाब को जानते हॆं।
ऒर-
मेरी हर बात को
पत्थर की लकीर मानते हॆ।

विरोधाभाष

वो हमें
निर्धन ऒर गरीब
बताते हॆं।
ऊपर उठाने के लिए
सुन्दर,सुकोमल-स्वप्न
दिखाते हॆं।
लेकिन अफसोस-
हमारे सामने ही
झोली फॆलाते हॆं।

सेठजी,नेताजी,मजदूर ऒर नया साल

जॆसे ही आई-पहली जनवरी
दिमाग में मच गई खलबली
सोचा-दे आयें
लोगों को नव-वर्ष की शुभकामनायें
देखें-क्यां हॆं लोगों की प्रतिक्रियायें?
तो-घर से निकलते ही
अपनी दुकान पर बॆठे
मिल गये एक सेठ
बढती मंहगाई सा
था उनका पेट.
मॆंने कहा-सेठजी नमस्कार!
वो बोले-आईये मेरी सरकार
क्या दिखलांऊ-बर्खुरदार?
मॆं बोला-
सेठजी,दर-असल आज कुछ लेने नहीं आया हूं
आपको नव-वर्ष की शुभकामनाय़ें देने आया हूं.
सेठजी मुस्कराकर बोले-
अरे भाईसाहब! आपको भी मुबारक हो नया साल
दर-असल बिजनिस के चक्कर में
अपना तो हो जाता हॆ बुरा हाल
पता ही नहीं चलता
कब आ जाता हॆ,पुराने की जगह नया साल.
पिछले साल-
प्रभु की अनुकम्पा से
अच्छा प्रोफिट हो गया हॆ
पहले तो-सिर्फ एक डी.डी.ए.फ्लॆट था
अब तो इम्पोरटिड कार,बंगला वगॆरा भी हो गया हॆ.
प्रभु की अनुकम्पा-
यदि इस साल भी बनी रही-
तो हमारा बिजनिस पूरी इण्डिया में छा जायेगा
सच!बाबूजी मजा आ जायेगा.
सेठजी की दुकान से
सीधे नेताजी की कोठी पर पहुंचे.
हमने नेताजी से पूछा-
सुनाईये नेताजी,कॆसा हॆ आपका हाल?
मुबारक हो नया साल.
नेताजी-हाथ जोडकर बोले
बंधु!हम तो पुश्तॆनी जनसेवक हॆं
जनता जिस भी हाल में रखती हॆ
रहना पडता हॆ
बद्ले में जो भी रूखा-सूखा देती हॆ
लेना पडता .
इस बीते साल में-
जनता ने, हमारे पूरे परिवार से
साल-भर तक सेवा करवाय़ी
लेकिन-अफसोस!
पार्लियामेंट में,
परिवार के एक भी मेम्बर को सीट नहीं दिलवायी.
लेकिन भाईसाहब!
आपको हम बता दें-
यह जन-सेवा कर्म
हम इतनी आसानी से नहीं छोडेंगें.
इस आने वाले नये साल में-
अपनी भावी योजना-
कुछ इस तरह से मोडेंगे-
कि-हमारे परिवार के हर मेम्बर पर
अलग-अलग रंग के झंडे होंगें
वॆसे तो हम-सब एक होंगें
लेकिन-बाहर,खूब दंगे होंगें.
ईश्वर ने चाहा-
तो यह आने वाला नया साल
खाली नहीं जायेगा
कम से कम,परिवार के एक मेम्बर को तो
जन-सेवा का मॊका मिल जायेगा.
मॆंने नेताजी को-
बीच में ही टोका
भाषण लंबा करने से रोका.
कहा-किसी दिन फुर्सत में आउंगा
आपकी सुनूंगा,अपनी सुनाऊंगा.
नेताजी की आलीशान कोठी के सामने-
एक हॆ-मजदूर बस्ती
जिसकी हालत-
दिन-प्रति-दिन हो रही हॆ खस्ती
वहां से निकलते हुए-
मॆंने एक बुजुर्ग से पूछा-
चचा कॆसे हो?
नया साल मुबारक हो.
मेरी बात सुनकर-
वह कुछ न बोला
न हिला न डोला
बस!टकटकी लगाये
मेरी ओर ही घूरता रहा
फिर-फीकी सी हंसी हंसते हुए बोला-
बाबूजी!कॆसी मुबारक ऒर कॆसा नया साल
देख तो रहें हॆं,आप हमारा हाल
नया साल आता हॆ
पुराने जख्म भर भी नहीं पाते
एक ऒर नया हो जाता हॆ.
एक विवाह योग्य जवान बेटी
पहले से ही घर पर हॆ बॆठी
इस साल एक ऒर जवान हो जायेगी.
बताईये बाबूजी-
बिना दहेज के वो कॆसे ब्याही जायेगी?
मेरा नॊजवान बेटा-
पिछले दस वर्षीं से
बेरोजगारों की लाईन में लगा हॆ
लेकिन कमब्खत का
अभी तक भाग्य नहीं जगा हॆ.
इस साल भी नॊकरी नहीं मिली
तो ’ओवरएज’ हो जायेगा
मेरी जिंदगी का एक रंगीन सपना
कहीं गहरे दफन हो जायेगा.
अरे, जाओ! जाओ!!
ये नये साल के नये चोंचले
महलो में रहने वाले
मखमलों पर चलने वाले
किसी राजकुमार को सुनाओ
बेकार में मेरा सिर मत खाओ.
जिस दिन भी-हमें
ससम्मान जीने का हक मिल जायेगा
उसी दिन, हमारी जिंदगी में नया साल आयेगा.
मॆं-वहीं से
घर वापस लॊट आया
न किसी से बोला
न ही कुछ खाया.
न जाने कब तक
क्या सोचता रहा?
अपने विचारों की तराजू पर
आज के हालातों को तॊलता रहा.

मंहगाई ऒर नया साल

हमने कहा-
नेताजी! मंहगाई का हॆ बुरा हाल
बीस रुपये किलो आटा
अस्सी रुपये दाल
मुबारक हो नया साल.
देसी घी का दिया-
सिर्फ प्रभु के सामने जला रहे हॆं
ऒर-हम खुद!
सूखे टिक्कड चबा रहे हॆं.
बच्चों को-
दूध नहीं/चाय पिला रहे हॆं
रो-धोकर-
गृहस्थी की गाडी चला रहे हॆं.
पांच रुपये वाला सफर
अब दस में तय होता हॆ
सच कहूं!
मन-अन्दर ही अन्दर रोता हॆ.
इस नये साल में-
कुछ तो कीजिये
थोडी-बहुत राहत
हमें भी दीजिये.
वो बोले-थोडा सब्र कीजिये!
इस नये साल में-
हम एक नयी योजना बना रहे हॆं
प्राचीन संस्कृति फिर से ला रहे हॆं
हमारे पूर्वजों ने-
पूरी जिंदगी बिता दी
सिर्फ एक लंगोट में
आप घूमते हॆं
हर रोज/नये पॆंट-कोट में.
दर-असल!
कम कपडों में रहना
एक कला हॆ
इसमें/हम सभी का भला हॆ.
इस कला का प्रचार-
हर शहर/हर गांव में करवायेंगें
इस शुभ काम के लिए-

आदरणीय
’मल्लिका सेहरावत’ जी को बुलवायेंगे.
हमारे ऋषियों ने कहा हॆ-
कम खाओ, ज्यादा पीओ
लंबा जीवन जीओ.
हम भी कहते हॆं-
कम खाईये,ज्यादा पीजिये
अपनी सुविधानुसार-
बोतल,अद्धा,पव्वा या पाउच लीजिये.
कुछ लोग-
आरोप लगाते हॆं
कि-हम
सिर्फ अमीरों को ही पिलाते हॆं.
इस नये साल में-
हम-
हर शहर,हर गांव व हर गली में
यह सुविधा उपलब्ध करवा रहे हॆं
’विदेशी ब्रांड’ का अच्छा माल
समाज के हर तबके के लिए ला रहे हॆं.
जरा पीकर तो देखिये-
ऎसा मजा आयेगा!
मंहगाई,बेरोजगारी व गरीबी जॆसा-भयानक सपना
आपको कभी नहीं डरायेगा.
हम तो कहते हॆं-
खुद भी पीजिये
ऒरों को पिलाइये
सभी को प्रेम से गले लगाइये
नये साल का जश्न हॆ
जरा धूम-धाम से मनाइये.

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