कुमार विजय गुप्त

कुमार विजय गुप्त की रचनाएँ

एक अकेला अंगूठा एक अकेले अंगूठे ने वसीयत कर दी सारी अंगूठियां उंगलियों के नाम रोका, गालों पे लुढ़कते हुए…

2 months ago