गर्मियाँ
गुमसुम से इस मौसम में
जब नहीं आती हवाएँ
सूखे होंठों वाली पत्तियाँ
बार-बार चोंचें खोलती चिड़ियाएँ
हरियाली पर लगी फफूँद
कोई भी नहीं आता
खिड़कियों के सामने
पंख फड़फड़ाता
उदास गुज़र जाती हैं
लड़कियाँ
और टहनियाँ
खींचती हैं साँसें
प्यास है चारों तरफ़
हाथ फैलाए
हो गया है
सोने का वक़्त
उड़ गई है नींद !
भीतर-बाहर
मैं हरियाली के भीतर हूँ
बाहर एक हरियाली है
लताओं से सीखा है
हर हाल में झूमना
मुसीबतों में उन्हें
बाकायदा झुकते भी देखा है
उनके हिलने-डुलने में
भीतर भी हिलते हैं कुछ पेड़
इस रंग में एक तृप्ति है
उन्हें दीवार पर चढ़ते और खिलखिलाते देखा है
मैंने सूरजमुखी
अपने बचपन की तरह
उसे भी गुज़री है बेकरार सबा
हरी यादों से गच्छ
लताओं से
मिली हैं हिदायतें-
जैसे मिट्टी से नाता कभी नहीं तोड़ना चाहिए
तृप्ति आख़िरी सच है
जैसे आँधी-तूफ़ान से अपनी रक्षा करना आना चाहिए
उदासी में उजास रहना चाहिए
जब मैं गिरते देखता हूँ पीले पत्ते
मुझे अपने बेहिसाब हिलते दाँतों की याद
आती है
पर तभी बूढ़ी लता की जड़ पर
मुस्कुरा उठती है कोंपल
जीने को बेचैन
और तब मुझे और भी लगता है
मैं हरियाली के भीतर हूँ
मेरे बाहर एक हरियाली है !
कभी-कभी
कभी-कभी
चुपचाप
खो जाती हैं चीजें
जैसे आज़ादी
कभी-कभी बेहिसाब
आ जाता है गुस्सा
जैसे अंधड़
कभी-कभी चुपचाप
आ जाती है रुलाई
जैसे बुढ़ापा
कभी-कभी यों ही
गिर पड़ता है
आदमी
जैसे पुरानी दिल्ली की कोई इमारत
कभी-कभी
अकसर हो जाता है इलहाम
सीधे चलना ठीक नहीं
गिरते-पड़ते ही चलो
कभी-कभी
ऎंठकर चलता है जो
हो उठता है तानाशाह
अकसर कभी-कभी
मैं कहता हूँ
जब हमें कहीं पहुँचना ही नहीं है
तो धीरे-धीरे क्यों नहीं सीख लेते
चलना
कभी-कभी
झिलमिल
निपट अँधेरे में
चारों ओर
गिरती-पड़ती हैं हवाएँ
और पगडंडियाँ
संगीत के स्वरों में
छप-छप बजती हैं साँसें
स्वर से स्वर तक
धमक-गमक रहे हैं सुरों के पाँव
चारों ओर शीतल चाँदनी का मद्धिम विस्तार
अभेद छिटकी है
झरने रास्तों पर जाते हैं चलकर
नीलेपन तक भीतर ही भीतर
एक लय / रवाँ होती है
दूधिया भी हो सकता है समाजवाद
धरती पर तारों की तरह छिटके हैं-
अभाव और अपमान
और सिकुड़ कर सिसकतीं गुर्बत की बस्तियाँ
बहलाता-थपथपाता सरक रहा है संगीत
अन्न के कुछ दानों की तरह
टिमटिमाती हैं अनुगूँजें
सुर से सुर तक
झिलमिलाती है एक मरीचिका
महानगर
भैय्या
महानगर मत आना
बहुत तंग करती हैं दो चीज़ें-
संविधान और पुलिस
और ख़ुद वह बेशुमार चौराहों में
भटका देने वाला शहर
जाते हुए
यह
छायाओं का जुलूस है
सिर झुकाए
एक ओर जाता है
समय
कसमसाती रात में
ब्याहती कुतियों की चीखें
और सुबह की ओर जाते
हवा के काफ़िले
एक जगमगाते खालीपन में
कुछ दूधिया लकीरें
और अचेत लेटी स्त्री का सपना
ये तख्तियाँ लिए स्मृतियाँ
मौन छायाओं के जुलूस में
एक भी नारा नहीं लगातीं
यह डर है शायद
इक्कीसवीं सदी में जाता हुआ
शुभ रात्रि !
नेकांत
बादलों के बीच
आँखों के जोड़े
हंसों की तरह चलते हैं
गिरती है एक बूँद
आँगन में
सिहरते हैं पत्ते
एक लम्बी उदासी के बाद
फिसलती है एक चट्टान
बेहद अँधेरी रात में
झींगुरों की रुनझुन के साथ
आता है गन्ध का एक झोंका
आसमान के उस पार
बिगड़ैल नदी का है शोर
शहर में
बुझ गई हैं
लाल, हरी पीली बत्तियाँ
बादलों के बीच
कड़कती है आवाज़
अकेलेपन में भी बेहद है शोर!
चिट्ठी
चिट्ठी
एक मुश्किल बयान है
चिट्ठी में लिखनी पड़ती है
मन की बात
अल्सुबह, चीं-चीं करती गौरैयों की तरह
ऎसे जैसे हवा का झोंका आता हो
किसी चोटी से
और बहुत देर तक याद रहता हो
दुख-सुख
कैसे करूँ उनका ज़िक्र
कैसे बताऊँ
कि जिस दाँत की मज़बूती से पैदा होता था-
आत्मविश्वास
वह कल ही गिर गया
जबड़े क्वे ऊपर खालीपन की एक स्थाई खन्दक खोदकर
इस ज़िन्दा दाँत की जड़ों का नहीं कोई अता-पता
जोड़ों में फ़ँसते जा रहे दर्द
और सिमटती माँसपेशियों का रूखापन
उँगलियों की हर गाँठ में
उबलती एक जलन
पुतलियों में धुँधला रहे दृश्य
सूखे से दरकी ज़मीन से
सपने
एक थकी हुई भाषा
एक हारा हुआ जीवन
एक खिसियाई अन्तर्दृष्टि
चिट्ठी का सारा मजमून
और डाक-टिकट
कुछ भी तो नहीं है पास में
बारिश में करुणानिधान
रेशम के कीड़े
अब हैं तैयार
गेहूँ अधपीला
पहाड़ पर
मूसलाधार बारिश
किसान
जोतते नहीं हैं खेत
न औरतें चुनतीं शहतूत
श्वेत वेशभूषा में
शान से बैठे हैं
सभागार में
ऊँचाई पर
अमरावतार।
मूल चीनी भाषा से अनुवाद : त्रिनेत्र जोशी
स्वतः स्फूर्त
पूर्वी ढलान पर
एक अकेला बूढ़ा
सफ़ेद केश
झूलते हवा में
मेरा बेटा
प्रसन्न
मेरा सुर्ख़ चेहरा देख कर
मुस्कराता हूँ मैं
यह तो है
मदिरा का असर
मूल चीनी भाषा से अनुवाद : त्रिनेत्र जोशी
यों ही
पाले से
मेरे केश
झूलते हवा में
छोटे से बरामदे में
बीमार-सा लेटा
बेंत की चारपाई पर
वैद्य ने इस वसन्त
बताई है मुझे दिव्य नींद
संभल कर बजाता
ताओ भिक्षु
पांचवे पहर का गजर।
मूल चीनी भाषा से अनुवाद : त्रिनेत्र जोशी
नववर्ष की पहरेदारी
जल्द ही
गुज़र जाएगा साल
साँप की तरह घिसटता बिल की ओर
बस अब उसकी
आधी ही देह
बची रह गई है बाहर
कौन मिटा सकता है
इस आखिरी झलक को
और अगर हम बाँध भी दें उसकी पूँछ
तो भी कुछ नहीं होगा, नहीं हो पाएँगे सफल।
बच्चे जागे रहने का करते हर उपाय
हँसते-खिलखिलाते हैं हम इस रात
आँखों में समेटे
चूज़े नहीं कुकुटाते भोर की बांग
ढोलों को भी करना होगा इस घड़ी का सम्मान
जागते रहें हम
दीये का गुल गिरने तक
उठ कर देखता हूँ उत्तरी सप्तर्षि मंडल को बुझते हुए
अगला साल शायद आख़िरी हो मेरा
डरता हूँ मैं
समय को
बरबाद नहीं कर सकता।
इस रात को जियो भरपूर
जवानी को
अब भी
ख़ूब करता हूँ याद!
मूल चीनी भाषा से अनुवाद : त्रिनेत्र जोशी