नींद की एकान्त सड़कों पर भागते हुए आवारा सपने ।
सेकेण्ड-शो से लौटती हुई बीमार टैक्सियाँ,
भोथरी छुरी जैसी चीख़ें
बेहोश औरत की ठहरी हुई आँखों की तरह रात ।
बिजली के लगातार खम्भे पीछा करते हैं;
साए बहुत दूर छूट जाते हैं
साए टूट जाते हैं ।

मैं अकेला हूँ ।
मैं टैक्सियों में अकारण खिलखिलाता हूँ,
मैं चुपचाप फुटपाथ पर अन्धेरे में अकारण खड़ा हूँ ।
भोथरी छुरी जैसी चीख़ें
और आँधी में टूटते हुए खुले दरवाज़ों की तरह ठहाके
एक साथ
मेरे कलेजे से उभरते हैं
मैं अन्धेरे में हूँ और चुपचाप हूँ ।
सतमी के चाँद की नोक मेरी पीठ में धँस जाती है ।
मेरे लहू से भीग जाते हैं टैक्सियों के आरामदेह गद्दे
फुटपाथ पर रेंगते रहते हैं सुर्ख़-सुर्ख़ दाग़ ।
किसी भी ऊँचे मकान की खिड़की से
नींद में बोझिल-बोझिल पलकें
नहीं झाँकती हैं ।
किसी हरे पौधे की कोमल, नन्हीं शाखें,
शाखें और फूल,
फूल और सुगन्धियाँ
मेरी आत्मा में नहीं फैलती हैं ।

टैक्सी में भी हूँ और फुटपाथ पर खड़ा भी हूँ।
मैं
सोए हुए शहर की नस-नस में
किसी मासूम बच्चे की तरह, जिसकी माँ खो गई है,
भटकता रहता हूँ;
(मेरी नई आज़ादी और मेरी नई मुसीबतें… उफ़ !)
चीख़ और ठहाके
एक साथ मेरे कलेजे से उभरते हैं।

रात्रिदग्ध एकालाप

एक

बारूद के कोहरे में डूब गए हैं पहाड़,
नदी, मकान, शहर के शहर ।
बीवी से छिपाकर बैंक में पैसे डालने
का मतलब नहीं रह गया है
अब ।

दो

मुझे चुप रहकर इन्तज़ार करना
चाहिए । मुझे इन्तज़ार करते हुए चुप
रहना चाहिए। मुझे चुप रहते हुए,
इन्तज़ार करते हुए, रहना चाहिए । (किसलिए ?)

तीन

तुम लोगों से छुटकारा नहीं चाहता
हूँ। ग़ुलामी में भी इतनी स्वाधीनता
तो मैंने प्राप्त कर ली है, कि किसी
को ग़ुलाम कह सकता हूँ ।

चार

उसके लम्बे पत्र में ईमानदारी का
सवाल हर तीसरे शब्द के बाद । हर
तीसरे शब्द के बाद ईमानदारी
का सवाल अठारह पुराणों में ।

पाँच

मैं टेबुल पर घूमते हुए ग्लोब में उस
शहर को ढूँढ़ने लगा, जहाँ कोई
पुरुष और कोई स्त्री एक-दूसरे की पीठ
से लगकर रोए नहीं हों ।

छह

मेरी क़मीज़ के अन्दर अपना बायाँ
हाथ डालकर, वह बूढ़ी औरत एक
अरसे से अपनी लिपिस्टिक की खोई
हुई डिबिया तलाश रही है ।

ऑडिट रिपोर्ट

सात हज़ार बरसों में एक आदमी ने बनाए
हैं साढ़े तीन सौ करोड़ परिवार । परिवारों
की रक्षा के लिए मकान । मकानों
की रक्षा के लिए दीवारें । सात हज़ार
बरसों में एक आदमी ने बनाई हैं साढ़े
तीन सौ करोड़ दीवारें ।