अंजना संधीर की रचनाएँ

प्रयत्न

सर झुकाने की बारी आये
ऐसा मैं कभी नहीं करूँगा
पर्वत की तरह अचल रहूँ
व नदी के बहाव सा निर्मल

शृंगारित शब्द नहीं मेरे
नाभि से प्रकटी वाणी हूँ

मेरे एक एक कर्म के पीछे
ईश्वर का हो आशीर्वाद

तस्वीर के उस पार

तुम मुझे मेरी तस्वीर या पोस्टर में
ढूढ़ने की व्यर्थ कोशिश मत करो
मैं तो पद्मासन की मुद्रा में बैठा हूँ
अपने आत्मविश्वास में
अपनी वाणी और कर्मक्षेत्र में।
तुम मुझे मेरे काम से ही जानो

तुम मुझे छवि में नहीं
लेकिन पसीने की महक में पाओ
योजना के विस्तार की महक में ठहरो
मेरी आवाज की गूँज से पहचानो
मेरी आँख में तुम्हारा ही प्रतिबिम्ब है

सनातन मौसम 

अभी तो मुझे आश्चर्य होता है
कि कहाँ से फूटता है यह शब्दों का झरना
कभी अन्याय के सामने
मेरी आवाज की आँख ऊँची होती है
तो कभी शब्दों की शांत नदी
शांति से बहती है

इतने सारे शब्दों के बीच
मैं बचाता हूँ अपना एकांत
तथा मौन के गर्भ में प्रवेश कर
लेता हूँ आनंद किसी सनातन मौसम का।

प्रेम में अंधी लड़की

टैगोर की कविता दे कर
उसने चिन्हित किया था शब्दों को
कि वो उस रानी का माली बनना चाहता है
सख़्त लड़की ने पढ़ा
सोचा कि मेरे बाग का माली बनकर
वो मेरे लिए
क्या-क्या करेगा…
खो गई सपनों में लड़की
कविता पढ़ते-पढ़ते
कि ठाकुर ने कितने रंग बिछाए हैं
जीवन में तरंगों के लिए
वो देखने लगी
माली के शब्द कि जब वो चलेगी
तो रास्तों में फ़ूल बिछा देगा …ये माली
नौकर बन जाऐगा रानी का
रोज रंगीन दुनिया में घुमाऐगा
हो गई प्रेम में अंधी लड़की!

प्रेम में अंधी लड़की ने
आर देखा न पार
तोड़ डालीं सारी दीवारें, भूल गई अपना आपा
मज़बूर कर दिया घर- परिवार को
संगी- सहेलियों को
एकदम, अचानक कर दिया अचंभित
किसी को भी समझ आए
उससे पहले उड़ चली सात समुन्दर पार
बनने रानी
उस माली की
लेकिन भूल गई कि माली के हाथ में
कैंची भी होती है
पर कतरने की।

अब रोज़ माली उसके पर
थोड़े-थोड़े काटता है
घायल होती, अपने मुल्क के , घर के
एक एक चेहरे को
आँसू भरी आँखों से देखती है
प्रेम में अंधी लड़की
डरती रहती है जाने कल कौन सा पर
वो काटे…

रानी का सर्वेंट नहीं
सर्वेंट की रानी परकटी
कोसती है अपने आप को
तड़पती, छटपटाती है
काश!

वो कविता प्रेम भरी
उसने पढ़ी न होती
अंधी न बनी होती, कुछ होता या न होता
पर तो सलामत रहते ।

वे चाहती हैं लौटना 

ये गयाना की साँवली-सलोनी ,
काले-लम्बे बालों वाली
तीखे-तीखे नैन-नक्श, काली-काली आँखों वाली
भरी-भरी , गदराई लड़कियाँ
अपने पूर्वजों के घर, भारत
वापस जाना चाहती हैं।

इतने कष्टों के बावजूद,
भूली नहीं हैं अपने संस्कार।
सुनती हैं हिन्दी फ़िल्मी गाने
देखती हैं , हिन्दी फ़िल्में अंग्रेजी सबटाइटिल्स के साथ
जाती हैं मन्दिरों में
बुलाती हैं पुजारियों को हवन करने अपने घरों में।
और, कराती हैं हवन संस्कृत और अंग्रेजी में।

संस्कृत और अंग्रेजी के बीच बचाए हुए हैं
अपनी संस्कृति।
सजाती हैं आरती के थाल, पहनती हैं भारतीय
पोशाकें तीज-त्योहारों पर।
पकाती हैं भारतीय खाने , परोसती हैं अतिथियों को
पढ़ती रहती हैं अपनी बिछुड़ी संस्कृति के बारे में

और चाहती हैं लौटना
उन्हीं संस्कारों में जिनसे बिछुड़ गईं थीं
बरसों पहले उनकी पीढ़ियाँ।

संवाद चलना चाहिए 

“तुम एक ग्लोबल पर्सन हो
वापस जा कर बस गई हो
पूर्वी देश भारत में फ़िर से
लेकिन तुम्हारी विचार धारा
अब भी यहाँ बसी है , ऐसे नहीं छोड सकतीं तुम हमें…
बहुत याद आती है तुम्हारी…”

ढलती हुई शाम के देश से
उगते हुए सूरज के देश में , सुबह- सवेरे
सात समुन्दरों को पार करती
आवाज ने अपनेपन में लपेट लिया।

अमरीका और भारत में दूरी
कहाँ है!
ईश्वर कहाँ है, उसके विचार ही चलते हैं सर्वत्र
आदमी को आदमी की तलाश होनी चाहिए
ईश्वर तो मिल ही जायेंगे

ग्लोबल पर्सन में बदल गई
ग्लोबल वूमेन।
झूल गई झूले में स्मृतियाँ
मिठास बातों की, जज्बातों की
घोल गई मिश्री
मैं यहाँ रहूँ, वहाँ रहूँ, क्या फ़र्क पड़ता है?

फ़र्क पड़ता है कर्म का
स्वभाव का , मेलमिलाप का, अपेक्षा का
रिश्तों का, संवाद का

संवाद चलना ही जीवन है
यहाँ रहो या वहाँ
संवाद चलना चाहिए।

स्वाभिमानिनी 

स्वाभिमानिनी
उसने कहा
द्रौपदी शरीर से स्त्री
लेकिन मन से पुरूष है
इसीलिए पाँच-पाँच पुरुषों के साथ
निष्ठापूर्ण निर्वाह किया।

नरसंहार में भी विचलित नहीं हुई
ख़ून से सींचकर अपने बाल
तृप्ति पाई
फ़िर भूल गई इस राक्षसी अत्याचार को भी
क्या सचमुच?

मन से पुरुष स्त्रियों का यही हाल होता है
हर जगह अपमानित होना होता है
हमेशा निशाना बनना होता है।
मन से स्त्री बने पुरुष को भी

क्यों नहीं स्वीकारते सब?
सत्य ये है कि पुरुष और प्रकृति का भेद स्वीकार्य है
पुरुष समान स्त्री आकर्षित करती है
अच्छी लगती है लेकिन स्वीकार्य नहीं
क्योंकि आदमी का बौनापन जाहिर हो जाता है
मजबूत स्वाभिमानिनी स्त्री के सामने।

इसीलिए…
पहले उसका स्वाभिमान तोड़ा जाता है
फ़िर स्त्रीत्व… फ़िर कुछ और…
स्वाभिमानिनी, कौन सहेगा तुम्हारा स्वाभिमान !

किताबे-शौक में क्या क्या निशानियाँ रख दीं 

किताबे-शौक़ में क्या-क्या निशानियाँ रख दीं
कहीं पे फूल, कहीं हमने तितलियाँ रख दीं।

कभी मिलेंगी जो तनहाइयाँ तो पढ़ लेंगे
छुपाके हमने कुछ ऐसी कहानियाँ रख दीं।

यही कि हाथ हमारे भी हो गए ज़ख़्मी
गुलों के शौक में काँटों पे उंगलियाँ रख दीं।

बताओ मरियम औ’ सीता की बेटियों की कसम
ये किसने आग के शोलों में लड़कियाँ रख दीं।

कोई लकीर तुम्हारी तरफ़ नहीं जाती
तुम्हारे सामने हमने हथेलियाँ रख दीं।

ग़ज़ल कुछ और भी मांगे है अंजना हमसे
ये क्या कि आरिज ओ गेसू की शोख़ियाँ रख दीं।

हम से जाओ न बचाकर आँखें

हम से जाओ न बचाकर आँखें
यूँ गिराओ न उठाकर आँखें

ख़ामोशी दूर तलक फैली है
बोलिए कुछ तो उठाकर आँखें

अब हमें कोई तमन्ना ही नहीं
चैन से हैं उन्हें पाकर आँखें

मुझको जीने का सलीका आया
ज़िन्दगी ! तुझसे मिलाकर आँखें।

खयाल उसका हरएक लम्हा मन में रहता है 

ख़याल उसका हर एक लम्हा मन में रहता है
वो शमअ बनके मेरी अंजुमन में रहता है।

कभी दिमाग में रहता है ख़्वाब की मानिंद
कभी वो चाँद की सूरत , गगन में रहता है।

वो बह रहा है मेरे जिस्म में लहू बनकर
वो आग बनके मेरे तन-बदन में रहता है।

मैं तेरे पास हूँ, परदेस में हूँ,ख़ुश भी हूँ
मगर ख़याल तो हरदम वतन में रहता है।

ये बात सच है चमन से निकल के प्यार मिला
मगर वो फूल जो खिल कर चमन में रहता है।

अमरीका हड्डियों में जम जाता है

वे ऊँचे-ऊँचे खूबसूरत “हाइवे”
जिन पर चलती हैं कारें–
तेज रफ़्तार से,कतारबद्ध, चलती कार में चाय पीते-पीते,
टेलीफ़ोन करते, ‘टू -डॊर’ कारों में,रोमांस करते-करते,
अमरीका धीरे-धीरे सांसों में उतरने लगता है।

मूँगफ़ली और पिस्ते का एक भाव
पेट्रोल और शराब पानी के भाव,
इतना सस्ता लगता है सब्जियों से ज्यादा मांस
कि ईमान डोलने लगता है।
मँहगी घास खाने से तो अच्छा है सस्ता मांस ही खाना
और अमरीका धीरे-धीरे स्वाद में बसने लगता है।

गर्म पानी के शावर
टेलीविजन के चैनल, सेक्स के मुक्त दृश्य,
किशोरावस्था से ‘वीकेन्ड’ में गायब रहने की स्वतंत्रता
‘डिस्को’ की मस्ती, अपनी मनमानी का जीवन,
कहीं भी, कभी भी, किसी के भी साथ
उठने- बैठने की आजादी……
धीरे-धीरे हड्डियों में उतरने लगता है अमरीका।

अमरीका जब साँसों में बसने लगा
तो अच्छा लगा, क्योंकि साँसों को पंखों की
उड़ान का अंदाजा हुआ।
और जब स्वाद में बसने लगा अमरीका
तो सोचा खाओ, इतना सस्ता कहाँ मिलेगा ?
लेकिन अब जब हड्डियों में बसने लगा है अमरीका,
तो परेशान हूँ।

बच्चे हाथ से निकल गए,वतन छूट गया!
संस्कृति का मिश्रण हो गया ।
जवानी बुढ़ा गई,सुविधाएँ हड्डियों में समा गईं
अमरीका सुविधाएँ देकर हड्डियों में समा जाता है!!

व्यक्ति वतन को भूल जाता है
और सोचता रहता है–
मैं अपने वतन को जाना चाहता हूँ।
मगर, इन सुखॊं की गुलामी तो मेरी हड्डियों में
बस गई है।
इसीलिए कहता हूँ कि
तुम नए हो,
अमरीका जब साँसों में बसने लगे,
तुम उड़ने लगो, तो सात समुंदर पार
अपनों के चेहरे याद रखना।
जब स्वाद में बसने लगे अमरीका,
तब अपने घर के खाने और माँ की रसोई याद करना ।
सुविधाओं में असुविधाएँ याद रखना।
यहीं से जाग जाना…..
संस्कृति की मशाल जलाए रखना
अमरीका को हड्डियों में मत बसने देना ।
अमरीका सुविधाएँ देकर हड्डियों में जम जाता है!

तुम अपनी बेटियों को…

तुम अपनी बेटियों को
इन्सान भी नहीं समझते
क्यों बेच देते हो अमरीका के नाम पर?

खरीददार अपने मुल्क में क्या कम हैं कि…
बीच में सात समुंदर पार डाल देते हो?
जहाँ से सिसकियाँ भी सुनाई न दे सकें
डबडबाई आँखें दिखाई न दे सकें
न जहाँ तुम मिलने जा सको
न कोई तुम्हें कुछ बता सके

कभी वापस आएँ भी तो
लाशें बने शरीर… जिन पर गहने और
मंहगे कपड़े पड़े हों…!
तुम्हारी शान बढ़ाएँ और तुम्हारे पास भी
बिना रोये लौट जाएँ

उसी सोने के पिंजरे में
जहाँ अमरीका की कीमत
मज़दूरी से भी चुकता नहीं होती !

कैसे जलेंगे अलाव

ठंडे मौसम और
ठडे खानों का यह देश
धीर-धीर मानसिक और शारीरिक रूप से भी
कर देता है ठंडा।

कुछ भी छूता नहीं है तब
कँपकँपाता नहीं है तन
धड़कता नहीं है मन
मर जाता है यहाँ , मान, सम्मान और स्वाभिमान।

बन जातीं हैं आदतें दुम हिलाने की
अपने ही बच्चों से डरने की
प्रार्थनाएँ करने की
छूट जाते हैं सारे रिश्तेदार
भल जाती है खुशबू अपनी मिट्टी की
बुलाता नहीं है तब वहाँ भी कोई।
आती नहीं है चिट्टी किसी की
जिनकी खातिर मार डाला अपने स्वाभिमान को।

उड़ जाते हैं वे बच्चे भी
पहले पढ़ाई की खातिर
फ़िर नौकरी, फ़िर ढूँढ़ लेते हैं साथी भी वहीं ।
बड़ी मुश्किलों से बनाए अपने घर में भी
लगने लगता है डर
अकेले रहते।

सरकारी नर्सें आती हैं, कामकाज कर जाती हैं।
फ़ोन कर लेते हैं कभी
आते नहीं हैं बच्चे ।
उनके अपने जीवन हैं
अपने माँ-बाप, भाई-बन्धु और देश तो
पहले ही छॊड़ आये थे वो
अब ये भी छूट गए
माया मिली न राम!

सोचते हैं
धोबी के कुत्ते बने, घर के न घाट के।
घंटों सोचते रहते हैं।
खिड़की से पड़ती बर्फ़ धीरे-धीरे
हड्डियों पर भी
पड़ने लगती है।
काम की वजह से मजबूरी में
खाया बासी खाना उम्र भर
रहे ठंडे मौसम में
अब सब कुछ ठंडा-ठंडा है
मन पर पड़ी ठंडक में
भला सोचिए, कैसे जलेंगे अलाव?

सभ्य मानव 

ईसा!
मैं मानव हूँ।
तुम्हें इस तरह सूली से नीचे नहीं देख सकता!
नहीं तो तुममें और मुझमें क्या अंतर?

बच्चों ने आज
कीलें निकाल कर तुम्हें मुक्त कर दिया
क्योंकि नादान हैं वे
तुम्हारा स्थान कहाँ है
वे नहीं जानते
वे तो हैरान हैं
तुम्हें इस तरह कीलों पर गड़ा देखकर
मौका पाते ही,
तुम्हारी मूर्ति क्रास से अलग कर दी उन्होंने

पर मैं…
मैं सभ्य मानव हूँ
दुनिया में प्रेम, ममत्व, वात्सल्य, उपदेश,
सूली पर टँगा ही उचित है

अत: आओ,
बच्चों की भूल मैं सुधार दूँ
तुम्हें फ़िर कीलों से गाड़ दूँ
क्रास पर लटका दूँ
ताकि, तुम ईसा ही बने रहो।

ओवरकोट 

काले-लम्बे
घेरदार ,सीधे
विभिन्न नमूनों के ओवर कोट की भीड़ में
मैं भी शामिल हो गई हूँ।

सुबह हो या शाम, दोपहर हो या रात
बर्फ़ीली हड्डियों में घुसती ठंडी हवाओं को
घुटने तक रोकते हैं ये ओवरकोट।

बसों में,सब वे स्टेशनों पर इधर-उधर दौड़ते
तेज कदमों से चलते ये कोट,
बर्फ़ीले वातावरण में अजब-सी सुंदरता के
चित्र खींचते हैं।

चाँदी सी बर्फ़ की चादरें जब चारों ओर बिछती हैं
उन्हें चीर कर जब गुजरते हैं ये कोट
तब श्वेत-श्याम से मनोहारी दृश्य
ऐसे लगते हैं
मानों किसी गोरी ने
बर्फ़ीली चादरों को नजर से बचाने के लिए
ओवरकोट रूपी तिल लगा लिया हो!

कभी रुक कर ज़रूर देखना 

पतझड़ के सूखे पत्तों पर
चलते हुए जो संगीत सुनाई पड़ता है
पत्तों की चरमराहट का
ठीक वैसी ही धुनें सुनाई पड़ती हैं
भारी भरकम कपड़ों से लदे शरीर
जब चलते हैं ध्यान से
बिखरी हुई स्नो पर जो बन जाती है
बर्फ़
कहीं ढीली होती है ये बर्फ़
तो छपाक-छपाक की ध्वनि उपजती है
मानों बारिश के पानी में
नहाता हुआ कोई बच्चा
लगाता है छलाँगे जमा हुए पानी में
साइड़ वाक पर एक के बाद एक
पड़ते कदमों से
बर्फ़ के बीचों-बीच बन जाती है पगडंडी
सर से पाँव तक ढके, बस्ते लटकाए
छोटे-छोटे बच्चे
पगडंडी पर चलते-चलते कूद पड़ते हैं
पास पड़े बर्फ़ के ढेर पर
तो चरवाहे की तरह ज़ोर से
हाँक लगाते हैं अभिभावक
सीधे चलो, पगडंडी पर
वरना फिसल जाओगे
स्नो तो नटखट बना देती है
फिर ये बच्चे तो खुद नटखट होते हैं
फिर ज़ोर-ज़ोर से
बर्फ़ को चरमराते हुए चलते हैं
कभी गोले उठाते हैं फेंकते हैं
फिसलते हैं लेटते हैं और कभी कूदते हैं
लाख हिदायतों के बावजूद
चरमराहट, छपाक. . .श. . .श. . .
की मधुर लहरों के साथ-साथ दृश्य भी
चलते हैं. . .
संगीत और चित्रण का कैसा
संगम है ये स्नो
कभी रुक कर ज़रूर देखना

चलो, फिर एक बार

चलो
फिर एक बार
चलते हैं
हक़ीक़त में
खिलते हैं फूल जहाँ
महकता है केसर जहाँ
सरसों के फूल और लहलहाती हैं फसलें
हँसते हैं रंग-बिरंगे फूल
मंड़राती हैं तितलियाँ
छेड़ते हैं भँवरें
झूलती हैं झूलों में धड़कनें
घेर लेती हैं सतरंगी दुप्पटों से
सावन की फुहारों में
चूमती है मन को
देती है जीवन
जहाँ जीवन लगता है सपना
आओ
फिर एक बार, चलते हैं।

उलाहनों से दूर
करते हैं अनदेखा ख़ामियों को
भूलते हैं एक दूसरे के फेंके हुए
दर्द भरे, चुभते आग से तीरों को
क्योंकि जीवन
जीने का नाम है
गुज़ारने का नहीं, बहुत गुज़ार लिया

आओ फिर से जिएँ
सपने को जीवन में बदलने
और जीवन को सपने में
चलो
फिर एक बार लिखें
खुशबू से भरे भीगे ख़त
जिन्हें पढ़ते-पढ़ते भीग जाते थे हम
इंतज़ार करते थे डाकिये का
बंद कर के दरवाज़ा
पढ़ते थे चुपके-चुपके
वे भीगे ख़त तकिए पर सिर रख कर
चौंकते थे आहट पर
धड़कते थे दिल टेलिफोन की घंटी पर
कुछ कहते न बनता था
झूमता रहता था तन और मन
मिलते न थे पर जीते थे, एक दूसरे के लिए
जीने मरने का जज़्बा था जहाँ दोनों तरफ़
प्यार मरता नहीं है कभी
अहसास मरते नहीं कभी
तभी तो चलता है मुश्किलों में भी रास्ता बनाता
हुआ जीवन
हालात बदलते नहीं अपने आप
बसंत आता नहीं अपने आप
लाना पड़ता है वरना क़ुदरत तो बदलती रहती है रंग
अपने समय पर
कोई देखे या न देखे उसकी सुंदरता

अपने रंगों में रंगती रहती है वह
देखो तो बहार है
न देखो तो पतझड़-वीरान
आओ
चलें फिर एक बार देखने
अंदर से बाहर की बहार
जीवन बहारों का नाम है
बहारें जीवन जगमगाती हैं
कुंठाएँ जीवन बुझाती है
अंगों को भी रोगों की परतों में
सुलाने लगती हैं

बीमारी में डूबाने लगती हैं
करने लगती हैं नब्ज़ें भी ठंडी
लगा देती हैं दवाओं के अंबार
कर देती हैं स्वाद भी कसैला
भिगा देती हैं आँखें, कर देती हैं अकेला
आओ
चलो फिर एक बार
इन कुंठाओं भरे अँधेरे से दूर
अपेक्षाओं की दुनिया से दूर
कुछ करने, कुछ सहने की
उसी तैयारी के क्षणों में जब करते थे घंटों इंतज़ार
माँगते थे माफ़ी तुरंत
कर भी देते थे माफ़ डूबे हुए प्रेम में
जहाँ सिर्फ़ प्रेम ही रह जाता था
घुल जाते थे सारे अहम, अभिमान
आओ
चलें फिर एक बार
भूलने, छोड़ने की दुनिया में
सिर्फ़ देने और सहने के जज़्बे में
क्योंकि सुनना, सहना, देना और भूलना ही
प्रेम की परिभाषा है
इसीलिए प्रेम कभी मरता नहीं
मरते हैं शरीर
ज़िंदा रहते हैं, रखते हैं अहसास
प्रेम और अहसास का नाम ही
जीवन है
और जीवन तभी चलता है
आओ
फिर एक बार चलें
जीवन की ओर

ज़िंदगी अहसास का नाम है

याद आते हैं
गर्मियों में उड़ते हुए रेत के कण
हवा चलते ही अचानक उड़कर, पड़ते थे आँख में
और कस के बंद हो जाती थी
अपने आप आँखें
पहुँच जाते थे हाथ अपने आप आँखों पर
धूल से आँखों को बचाने के लिए
कभी पड़ जाता था कोई कण
तो चुभने लगता था आँख में, बहने लगता था पानी
हो जाती थी लाल आँखें मसलने से
कभी फूँक मार, कभी कपड़े को अँगुली से लगा देखता था कोई
खोल कर आँखें
करता था चेष्टा आँख में पड़े कणों को बाहर निकालने की
लेकिन यहाँ
जब सूखी बर्फ़ के कण
उड़ते हैं सफ़ेद ढ़ेरों से
चमकती धूप में, सर्दी की चिलचिलाती लहर के साथ
और पड़ते हैं आँख में
तो आँख क्षणभर के लिए बंद हो जाती हैं
ठीक वैसे ही अपने आप
मगर. . .मगर किसी ठंडक का अहसास
भर देते हैं आँख में
चुभते नहीं हैं ये कण
हिमपात की समाप्ति पर रुई के ढ़ेरों या नमक के मैदानों में
बदल जाने और जम कर बर्फ़ बनने से पहले
उड़ती है रेत की तरह जो बर्फ़
पड़ती है कपड़ों पर, आँखों में
तब हाथ तो उठते हैं
आँखों को बचाने, बंद भी होती हैं आँखें अपने आप
पड़ भी जाते हैं बर्फ़ के कण
तो ठंडक देकर बन जाते हैं पानी
आँखें तो आँखें होती हैं
उन्हें रेत भी चुभती है
बर्फ़ के कण भी चुभते हैं क्षण भर के लिए
हो जाती हैं कस कर बंद
तब याद आते हैं
रेत के कणों के साथ जुड़े
अपने वतन के
कितने ही स्पर्श
जो भर देते हैं अहसास का आग
इस ठंडे देश में
ज़िंदा रहने के लिए
ज़िंदगी अहसास का ही तो नाम है।

हिमपात नहीं हिम का छिड़काव हुआ है

कोलंबिया की सीढ़ियों से उतरते हुए
शाम के नज़ारों ने
रोक दिए कदम
ठंडी हवा के झोंके ने सरसराहट
पैदा की बदन में
और आँखों को भा गई
पक्के रास्तों के आसपास बनी
मिट्टी की खेतनुमाँ घास की तराशी हुई क्यारियाँ
जिन की हरी-हरी घास पर
कुदरत ने किया है हिम का छिड़काव
पक्के रास्ते गीले हैं पानी से
और ये क्यारियाँ जिन में लेटते हैं कभी विद्यार्थी
आज हरी सफ़ेद, हरी सफ़ेद
झिलमिला रही हैं
जैसे इन्हें ज़िंदा रखने के लिए
डाली है खाद हिम-सा सफ़ेद
याद आते हैं
खेत जब उनमें ऐसी ही खांड-सी, सफ़ेद दानों वाली
विलायती खाद डलती थी मेरे देश में
खाद के सफ़ेद छोटे दानों से लगते हैं ये हिमकण
आज कुदरत ने हिमपात ज़ोरदार नहीं किया
बस किया है हिम का छिड़कान
खाद के छिड़काव की तरह
रास्ते गीले हैं हल्की-हल्की लकीरों-सी सफ़ेदी है
पेड़ों पर, पत्तों पर जैसे कोई चित्रकार
हल्के-हल्के सफ़ेद रंग करते-करते
सो गया हो. . .

मैं एक व्यक्ति हूं

मैं एक व्यक्ति हूं
मेरी मर्जी है, जिस से चाहूं
इच्छा से मिलूं
मां बनूं या गर्भपात करवा लूं
बच्चे को पिता का नाम दूं या न दूं
मुझे अधिकार है अपना जीवन खुद जियूं
किसी की मर्जी मुझ पर थोपी नहीं जा सकती
मैंने यह इस धरती पर आकर जाना है
इसीलिये मैं अब अपने मुल्क वापस नहीं जाना चाहती
वहां पशु और औरत की
कोई मर्ज़ी नहीं होती
मैं औरत ही नहीं एक व्यक्ति भी हूं
मैं एक व्यक्ति की तरह जीना चाहती हूं!

अमरीका में ब्याहने की कीमत अदा करने 

रसीले दागी आम को भी
टोकरी से बाहर निकाल देते हैं
लेकिन दागी आदमी जिसके पीछे लगा हो अमरीका
सारे दाग मिटा देता है
बूढ़ों को मिल जाती हैं कमसिन कुंवारी कलियां
मसलने को,
खुद को चरित्रवान खानदानी और
महान संस्कृति के वारिस
कहलाने वाले
बच्चों वाली तलाकशुदा,
बड़ी या कम उम्र की
औरतों से ब्याह करते हैं
दे देते हैं उन्हें बच्चे
उनके मन और तन से खेलते हैं
उनके घरों में गुलाम बनकर रहते
जब उन औरतों को इन गुलामों की आदत पड़ जाती है
तब गुलामों को देश में
रहने का परमिट ‘ग्रीनकार्ड’ दिखनेवाली औरतें
इनके यहां रहने के रास्ते खोलती औरतें
इन मरदों को लगने लगती हैं बुरी
फिर ये उन्हें पीटते हैं ले लेते हैं तलाक
उसके बाद, अपने मुल्क की कुंआरी कमसिन लड़कियों को
मिट्टी के बर्तन की तरह ठोक बजाकर देखते हैं
रोज़ किसी घर में मिठाई खाते हैं, लड़की से बातें करते हैं
पर नहीं आती पसन्द उन्हें कोई लड़की
छुट्टी का बहाना बनाक वापस आ जाते हैं
फिर ऐश यहां आकर
वे जानते हैं शादी अपने वतन में ही करनी है
क्योंकि अमरीका बुलाने की कीमत,
उन्हीं से वसूल हो सकती है
वही चुपचाप घर-बाहरकर करेगी काम
किसी से कुछ न कहेगी
उसे ही वापस जाने का डर होगा
समाज की शर्म होगी
यहां की लड़की
बिस्तर से लेकर बच्चों की जिम्मेदारी तक में
बराबर का हक मांगती है
उसे मालूम है यहां के कानून
मुल्क की गाय तो सिर हिलाने में भी
काफी वक़्त लगायेगी…

बंद करो इन दाग़दार लोगों को अपनी कमसिन
लड़कियां देना
चौबीसों घंटे जो यहां पिसती हैं
समय से पहले बूढ़ी हो जाती हैं
तुम्हारे घर भी आती हैं
सौगातें लाती हैं
लेकिन खुद खाली-खाली रहती हैं
कुछ दिन हंसती हैं,
बोलती हैं
और वापस चली आती हैं
अमरीका में ब्याहने की कीमत अदा करने!

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