अंबर खरबंदा की रचनाएँ

मुश्किल को समझने का वसीला निकल आता

मुश्किल को समझने का वसीला निकल आता
तुम बात तो करते कोई रस्ता निकल आता

घर से जो मिरे सोना या पैसा निकल आता
किस किस से मिरा ख़ून का रिश्ता निकल आता

मेरे लिए ऐ दोस्त बस इतना ही बहुत था
जैसा तुझे सोचा था तू वैसा निकल आता

मैं जोड़ तो देता तिरी तस्वीर के टुकड़े
मुश्किल था कि वो पहला सा चेहरा निकल आता

बस और तो क्या होना था दुख-दर्द सुना कर
यारों के लिए एक तमाशा निकल आता

ऐसा हूँ मैं इस वास्ते चुभता हूँ नज़र में
सोचो तो अगर मैं कहीं वैसा निकल आता

अच्छा हुआ परखा नहीं ‘अम्बर’ को किसी ने
क्या जानिए क्या शख़्स था कैसा निकल आता

जहाँ में हर बशर मजबूर हो ऐसा नहीं होता

जहाँ में हर बशर मजबूर हो ऐसा नहीं होता
हर इक राही से मंज़िल दूर हो ऐसा नहीं होता

तअ’ल्लुक़ टूटने का ग़म कभी हम से भी पूछो तुम
तुम्हारा ज़ख़्म ही नासूर हो ऐसा नहीं होता

गवाहों को तो बिक जाने की मजबूरी रही होगी
हमें भी फ़ैसला मंज़ूर हो ऐसा नहीं होता

मोहब्बत जुर्म है तो फिर सज़ा भी एक जैसी हो
कोई रुस्वा कोई मशहूर हो ऐसा नहीं होता

किताबों की हैं ये बातें किताबों ही में रहने दो
कोई मुफ़्लिस कभी मसरूर हो ऐसा नहीं होता

कोई मिस्रा अगर दिल में उतर जाए ग़नीमत है
तग़ज़्ज़ुल से ग़ज़ल भरपूर हो ऐसा नहीं होता

कभी पीता है ‘अम्बर’ ज़िंदगी के ग़म भुलाने को
वो हर शब ही नशे में चूर हो ऐसा नहीं होता

ज़माने-भर से जुदा और बा-कमाल कोई 

ज़माने-भर से जुदा और बा-कमाल कोई
मिरे ख़यालों में रहता है बे-मिसाल कोई

न जाने कितनी ही रातों का जागना ठहरा
मिरे वजूद से उलझा है जब ख़याल कोई

तुम्हीं बताओ कि फिर गुफ़्तुगू से क्या हासिल
जवाब होने की ज़िद कर ले जब सवाल कोई

करम के बख़्श दिया तू ने मुश्किलों का पहाड़
अब इस पहाड़ से रस्ता मगर निकाल कोई

गुज़ारने थे यही चार दिन गुज़ार दिए
न कोई रंज न शिकवा न अब मलाल कोई

हमारे साथ दुआएँ बहुत थीं अपनों की
कभी सुकून से गुज़रा मगर न साल कोई

हर इक रिश्ता बिखरा बिखरा क्यूँ लगता है 

हर इक रिश्ता बिखरा बिखरा क्यूँ लगता है
इस दुनिया में सब कुछ झूटा क्यूँ लगता है

मेरा दिल क्यूँ समझ न पाया उन बातों को
जो वैसा होता है ऐसा क्यूँ लगता है

जो यादें अक्सर तड़पाती है इस दिल को
उन यादों का दिल में मेला क्यूँ लगता है

उस को फ़िक्र वो सब से बड़ा कैसे हो जाए
मैं सोचूँ वो इतना छोटा क्यूँ लगता है

दुनियावी रिश्ते तो सच्चे कब थे लेकिन
रूहों का मिलना भी झूटा क्यूँ लगता है

मेरे हिस्से में आई मय का हर क़तरा
उस की आँखों ही से छलका क्यूँ लगता है

‘अम्बर’ जी तुम शे’र तो कह लेते हो लेकिन
हर इक मिस्रा टूटा-फूटा क्यूँ लगता है

इच्छाओं पर प्रश्नचिन्ह हैं अरमानों पर पहरे हैं

इच्छाओं पर प्रश्नचिन्ह हैं अरमानों पर पहरे हैं
संबंधों से हमें मिले जो घाव बहुत ही गहरे हैं

सहमत जो न हुआ राज्य से दंड मृत्यु का उसे मिला
राजमहल की नींव के पत्थर नरमुंडों पर ठहरे हैं

नई क्रांति की आज घोषणा कर दी है कुछ गूंगों ने
सुनकर जो दौड़े आये वे सब के सब ही बहरे हैं

सर्दी बहुत है दोस्तो ! हालत ख़राब है 

सर्दी बहुत है दोस्तो ! हालत ख़राब है
बाज़ार चल के ढूंढ लें इसका कोई जवाब
माँ के लिए खरीद लें सस्ती-सी एक शाल
ले आएं अपने वास्ते मँहगी कोई शराब

मोम सा दिल, रेत जैसी प्यास, सब कुछ मिल गया 

मोम सा दिल, रेत जैसी प्यास, सब कुछ मिल गया
आप हैं जब से हमारे पास, सब कुछ मिल गया

प्रेम उत्सव, प्रीत का मधुमास सब कुछ मिल गया
है ह्रदय में आपका आवास, सब कुछ मिल गया

नख से शिख तक एक अनुपम शिल्प का प्रारूप तुम
और उस पर रूप का अनुप्रास, सब कुछ मिल गया

आपने कुछ भी न पाया प्रेम में लेकिन हमें
दाह, पीड़ा, वेदना, संत्रास, सब कुछ मिल गया

प्रेम में सब कुछ लुटा देने का साहस हो जिन्हें
उनको रहता है यही विश्वास सब कुछ मिल गया

यही इक जुर्म है ऐ मेरे हमदम

यही इक जुर्म है ऐ मेरे हमदम
के मैं खुशबू को खुशबू बोलता हूँ
तेरी आँखों को देखा था किसी दिन
उसी दिन से मैं उर्दू बोलता हूँ

यह भी सुनते हैं के ख़ालिक़ का पता कोई नहीं

यह भी सुनते हैं के ख़ालिक़ का पता कोई नहीं
येह भी सच है उसको दिल से ढूँढता कोई नहीं

किरचियाँ ही किरचियाँ बिखरी हैं रिश्तों की यहाँ
ग़मज़दा आँखों में लेकिन झाँकता कोई नहीं

दोस्ती, ईसार, उल्फ़त, कारे-ला-हासिल हैं सब
लाख समझाया है लेकिन मानता कोई नहीं

दिल्लगी, दिल की लगी बन जाए हो सकता तो है
दिल लगाते वक़्त लेकिन सोचता कोई नहीं

अब तो सजती हैं यहाँ बस मस्लहत की मंडियाँ
अब यहाँ इल्मो-हुनर को पूछता कोई नहीं

बेहिसी इस शहर पर ऐसे मुसल्लत हो गयी
हादिसा दर हादिसा हो चौंकता कोई नहीं

ग़म तो ‘अंबर’ जी मिलेंगे हर क़दम पर, हाँ मगर
जैसे तुम टूटे हो ऐसे टूटता कोई नहीं

मौसम की तब्दीली कहिये या पतझड़ का बहाना था

 मौसम की तब्दीली कहिये या पतझड़ का बहाना था
पेड़ को तो बस पीले पत्तों से छुटकारा पाना था

तेरी सूरत पढ़ कर मुझको सोच लिया करते थे लोग
वो भी था इक वक़्त कभी ऐसा भी एक ज़माना था

रेशा-रेशा होकर अब बिखरी है मेरे आँगन में
रिश्तों की वो चादर जिसका वो ताना, मैं बाना था

बादल, बरखा, जाम, सुराही, उनकी यादें, तन्हाई
तुझको तो ऐ मेरी तौबा! शाम ढले मर जाना था

उन गलियों में भी अब तो बेगानेपन के डेरे हैं
जिन गलियों में ‘अंबर’ जी अक्सर आना जाना था

आप कह लीजिये हज़रत, के ज़माना बदला 

आप कह लीजिये हज़रत, के ज़माना बदला
हमने किरदार ही बदला है न लहजा बदला

हाँ, ख़राशें भी रहीं अपनी जगह ख़ूब मगर
आईना बदला न हमने कभी चेहरा बदला

मुश्किलों ने तो बहुत सोच के काँटे बोए
हमने रोके न क़दम और न रस्ता बदला

वो भी रिश्तों में नया ढूँढ रहा है मतलब
हमने जिसके लिए हर एक से रिश्ता बदला

तेरे होने का न एहसास ही मिट जाए कहीं
बस यही सोच के कमरे का न नक़्शा बदला

एक पल की क़लील मुद्दत में ज़िन्दगी भर के राज़ डूब गए 

एक पल की क़लील मुद्दत में ज़िन्दगी भर के राज़ डूब गए
वक़्त के बे-करां समंदर में कैसे-कैसे जहाज़ डूब गए

जिस्म के मौसिमों का क्या कहना, आती-जाती रुतों की बात ही क्या
आशिक़ों में भी वो तड़प न रही, नाज़नीनों के नाज़ डूब गए

काविशें भी तो कम न थीं अपनी, अज़्म भी क्या बुलन्द था लेकिन
वक़्त के आगे ज़िन्दगानी के सब नशेबो-फ़राज़ डूब गए

ज़िन्दगानी के बहते दरिया में सख़्त हालात के भँवर उट्ठे
मैंने नग़्मे तो कुछ बचा ही लिए हाँ मगर सारे साज़ डूब गए

जाने कितने ही देखने निकले जामो-मीना की क्या है गहराई
कुछ तो डूबे ‘फ़िराक़’ ‘शाद’ ‘जिगर’ कुछ ‘शकील’-ओ-‘मजाज़’ डूब गए

ये भी लिक्खा हुआ था क़िस्मत में या फ़क़त इत्तेफ़ाक़ था ‘अंबर’
सारे बन्दे तो पार जा उतरे सिर्फ़ बन्दानवाज़ डूब गए

काश कहीं ऐसा हो जाता

काश कहीं ऐसा हो जाता
क़तरा भी दरिया हो जाता

क़तरा भी दरिया हो जाता!
मैं भी उस जैसा हो जाता

मैं भी उस जैसा हो जाता!
हंगामा बरपा हो जाता

हंगामा बरपा हो जाता!
मेरा भी चर्चा हो जाता

मेरा भी चर्चा हो जाता!
लोगों को क्या-क्या हो जाता

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