अक्षर अनन्य की रचनाएँ

जाकी शक्ति पाइ ब्रह्मा, विष्णु औ महेश रवै

कवित्त (घनाक्षरी)

जाकी शक्ति पाइ ब्रह्मा, विष्णु औ महेश रवै,
जाकी शक्ति पाइ शेष धरनी धरत है ।
जाकी शक्ति पाइ अवतार करतूत करै,
जाकी शक्ति पाइ भानु तम को हरत है ।
जाकी शक्ति पाइ शारादाहु गणपति गुणी,
जाकी शक्ति पाइ जक्त जीवत मरत है ।
अच्छिरनिंन आन अमर-उपास छांड़ि,
ताही आदिसह्क्ति को प्रणाम ही करत है ।।१।।

दोहा

कर प्रणाम श्रीमातु को, ग्यान सुमति उर पाय,
प्रेमदीपिका हरिकथा, कहौं प्रेम समुझाय ।।२।।

कुण्डलिया

माधौजू इक दिन कहो मधिकुर सों सतिभाव ।
गोपो-गोप-प्रबोध कौं, तुम ब्रजमण्डल जाव ।।
तुम ब्रजमण्डल जाव, प्रेम अतिही उन कीन्हों ।
जब तैं भयो विछोह, सोध हम कबहुँ न लीन्हों ।।
तुम मम मति दरसाई हरयो दुख सिन्धु अगाधौ ।
कहियो सब सौं यहै दूर तुम तें नहिं माधौ ।।३।।

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