‘अख्तर’ शीरानी की रचनाएँ

ऐ दिल वो आशिक़ी के

ऐ दिल वो आशिक़ी के फ़साने किधर गए
वो उम्र क्या हुई वो ज़माने किधर गए

वीराँ हैं सहन-ओ-बाग़ बहारों को क्या हुआ
वो बुलबुलें कहाँ वो तराने किधर गए

है नज्द में सुकूत हवाओं को क्या हुआ
लैलाएँ हैं ख़मोश दिवाने किधर गए

उजड़े पड़े हैं दश्त ग़ज़ालों पे क्या बनी
सूने हैं कोहसार दिवाने किधर गए

वो हिज्र में विसाल की उम्मीद क्या हुई
वो रंज में ख़ुशी के बहाने किधर गए

दिन रात मैकदे में गुज़रती थी ज़िन्दगी
‘अख़्तर’ वो बेख़ुदी के ज़माने किधर गए

झूम कर बदली उठी और छा गई

झूम कर बदली उठी और छा गई
सारी दुनिया पर जवानी आ गई

आह वो उस की निगाह-ए-मय-फ़रोश
जब भी उट्ठी मस्तियाँ बरसा गई

गेसू-ए-मुश्कीं में वो रू-ए-हसीं
अब्र में बिजली सी इक लहरा गई

आलम-ए-मस्ती की तौबा अल-अमाँ
पारसाई नश्शा बन कर छा गई

आह उस की बे-नियाज़ी की नज़र
आरज़ू क्या फूल सी कुम्हला गई

साज़-ए-दिल को गुदगुदाया इश्क़ ने
मौत को ले कर जवानी आ गई

पारसाई की जवाँ-मर्गी न पूछ
तौबा करनी थी के बदली छा गई

‘अख़्तर’ उस जान-ए-तमन्ना की अदा
जब कभी याद आ गई तड़पा गई

किस को देखा है ये हुआ क्या है

किस को देखा है ये हुआ क्या है
दिल धड़कता है माजरा क्या है

इक मोहब्बत थी मिट चुकी या रब
तेरी दुनिया में अब धरा क्या है

दिल में लेता है चुटकियाँ कोई
है इस दर्द की दवा क्या है

हूरें नेकों में बँट चुकी होंगी
बाग़-ए-रिज़वाँ में अब रखा क्या है

उस के अहद-ए-शबाब में जीना
जीने वालो तुम्हें हुआ क्या है

अब दवा कैसी है दुआ का वक़्त
तेरे बीमार में रहा क्या है

याद आता है लखनऊ ‘अख़्तर’
ख़ुल्द हो आएँ तो बुरा क्या है.

कुछ तो तंहाई की रातों में 

कुछ तो तन्हाई की रातों में सहारा होता
तुम न होते न सही ज़िक्र तुम्हारा होता

तर्क-ए-दुनिया का ये दावा है फ़ुज़ूल ऐ ज़ाहिद
बार-ए-हस्ती तो ज़रा सर से उतारा होता

वो अगर आ न सके मौत ही आई होती
हिज्र में कोई तो ग़म-ख़्वार हमारा होता

ज़िन्दगी कितनी मुसर्रत से गुज़रती या रब
ऐश की तरह अगर ग़म भी गवारा होता

अज़मत-ए-गिर्या को कोताह-नज़र क्या समझें
अश्क अगर अश्क न होता तो सितारा होता

लब-ए-ज़ाहिद पे है अफ़साना-ए-हूर-ए-जन्नत
काश इस वक़्त मेरा अंजुमन-आरा होता

ग़म-ए-उल्फ़त जो न मिलता ग़म-ए-हस्ती मिलता
किसी सूरत तो ज़माने में गुज़ारा होता

किस को फ़ुर्सत थी ज़माने के सितम सहने की
गर न उस शोख़ की आँखों का इशारा होता

कोई हम-दर्द ज़माने में न पाया ‘अख़्तर’
दिल को हसरत ही रही कोई हमारा होता.

वादा उस माह-रू के आने का

वादा उस माह-रू के आने का
ये नसीबा सियाह-ख़ाने का

कह रही है निगाह-ए-दुज़-दीदा
रुख़ बदलने को है ज़माने का

ज़र्रे ज़र्रे में बे-हिजाब हैं वो
जिन को दावा है मुँह छुपाने का

हासिल-ए-उम्र है शबाब मगर
इक यही वक़्त है गँवाने का

चाँदनी ख़ामोशी और आख़िर शब
आ के है वक़्त दिल लगाने का

है क़यामत तेरे शबाब का रंग
रंग बदलेगा फिर ज़माने का

तेरी आँखों की हो न हो तक़सीर
नाम रुसवा शराब-ख़ाने का

रह गए बन के हम सरापा ग़म
ये नतीजा है दिल लगाने का

जिस का हर लफ़्ज़ है सरापा ग़म
मैं हूँ उनवान उस फ़साने का

उस की बदली हुई नज़र तौबा
यूँ बदलता है रुख़ ज़माने का

देखते हैं हमें वो छुप छुप कर
पर्दा रह जाए मुँह छुपाने का

कर दिया ख़ूगर-ए-सितम ‘अख़्तर’
हम पे एहसान है ज़माने का.

वो कभी मिल जाएँ तो 

वो कभी मिल जाएँ तो क्या कीजिए
रात दिन सूरत को देखा कीजिए

चाँदनी रातों में इक इक फूल को
बे-ख़ुदी कहती है सजदा कीजिए

जो तमन्ना बर न आए उम्र भर
उम्र भर उस की तमन्ना कीजिए

इश्क़ की रंगीनियों में डूब कर
चाँदनी रातों में रोया कीजिए

पूछ बैठे हैं हमारा हाल वो
बे-ख़ुदी तू ही बता क्या कीजिए

हम ही उस के इश्क़ के क़ाबिल न थे
क्यूँ किसी ज़ालिम का शिकवा कीजिए

आप ही ने दर्द-ए-दिल बख़्शा हमें
आप ही इस का मुदावा कीजिए

कहते हैं ‘अख़्तर’ वो सुन कर मेरे शेर
इस तरह हम को न रुसवा कीजिए.

यारो कू-ए-यार की बातें करें

यारो कू-ए-यार की बातें करें
फिर गुल ओ गुल-ज़ार की बातें करें

चाँदनी में ऐ दिल इक इक फूल से
अपने गुल-रुख़्सार की बातें करें

आँखों आँखों में लुटाए मै-कदे
दीदा-ए-सरशार की बातें करें

अब तो मिलिए बस लड़ाई हो चुकी
अब तो चलिए प्यार की बातें करें

फिर महक उट्ठे फ़ज़ा-ए-ज़िंदगी
फिर गुल ओ रुख़सार की बातें करें

महशर-ए-अनवार कर दें बज़्म को
जलवा-ए-दीदार की बातें करें

अपनी आँखों से बहाएँ सैल-ए-अश्क
अब्र-ए-गौहर-बार की बातें करें

उन को उल्फ़त ही सही अग़्यार से
हम से क्यूँ अग़्यार की बातें करें

‘अख़्तर’ उस रंगीं अदा से रात भर
ताला-ए-बीमार की बातें करें.

मेरे पहलू में जो बह निकले तुम्हारे आँसू 

मेरे पहलू में जो बह निकले तुम्हारे आँसू,
बन गए शामे-मोहब्बत के सितारे आँसू ।

देख सकता है, भला, कौन ये प्यारे आँसू,
मेरी आँखों में न आ जाए तुम्हारे आँसू ।

अपना मुँह मेरे गिरेबाँ में छुपाती क्यों हो,
दिल की धड़कन कही सुन ले न तुम्हारे आँसू ।

साफ़ इकरारे-मोहब्बत हो जबाँ से क्योंकर,
आँख में आ गए यूँ शर्म के मारे आँसू ।

हिज्र[1] अभी दूर है, मै पास हूँ, ऐ जाने-वफ़ा,
क्यों हुए जाते है बैचेन तुम्हारे आँसू ।

सुबह-दम[2] देख न ले कोई ये भीगा आँचल,
मेरी चुगली कही खा दें न तुम्हारे आँसू ।

दमे-रुख़सत[3] है क़रीब, ऐ ग़मे-फ़ुर्कत[4] ख़ुश हो,
करने वाले है जुदाई के इशारे आँसू ।

सदके उस जाने-मोहब्बत के मैं ‘अख़्तर’ जिसके,
रात-भर बहते रहे शौक़ के मारे आँसू ।

शब्दार्थ
  1. ऊपर जायें जुदाई
  2. ऊपर जायें सुबह के वक़्त
  3. ऊपर जायें विदाई का समय
  4. ऊपर जायें जुदाई का ग़म

निकहते-ज़ुल्फ़ से नीन्दों को बसा दे आकर

निकहते-ज़ुल्फ़ से नीन्दों को बसा दे आकर ।
मेरी जागी हुई रातों को सुला दे आकर ।

किस क़दर तीरओ-तारीक है दुनिया मेरी,
जल्वए-हुस्न की इक शमअ जला दे आकर ।

इश्क़ की चान्दनी रातें मुझे याद आती हैं,
उम्रे-रफ़्ता को मेरी मुझसे मिला दे आकर ।

जौके-नादीद में लज्ज़त है मगर नाज़ नहीं
आ मेरे इश्क़ को मग़रूर बना दे आकर ।

मस्ताना पिए जा यूँ ही मस्ताना पिए जा

मस्ताना पिए जा यूँ ही मस्ताना पिए जा ।
पैमाना तो क्या चीज़ है मयखाना पिए जा ।

कर गर्क मयो-जाम गमे-गर्दिशे अयियाम,
अब ए दिले नाकाम तू रिन्दाना पिए जा ।

मयनोशी के आदाब से आगाह नहीं तू,
जिया तरह कहे साक़िए-मयखाना पिए जा ।

इस बस्ती में है वहशते-मस्ती ही से हस्ती,
दीवाना बन औ बादिले दीवाना पिए जा ।

मयखाने के हँगामे हैं कुछ देर के मेहमाँ,
है सुब्ह क़रीब अख़्तरे-दीवाना पिए जा ।

बस्ती की लड़कियों में बदनाम हो रहा हूं

फ़र्यादी-ए-जफ़ा-ए-अय्याम हो रहा हूँ
पामाल-ए-जौर-ए-बख़्त-ए-नाकाम हो रहा हूँ
सरगश्ता-ए-ख़याल-ए-अंजाम हो रहा हूँ
बस्ती की लड़कियों में बदनाम हो रहा हूँ
बद-नाम हो रहा हूँ
सलमा से दिल लगा कर
बस्ती की लड़कियों में बदनाम हो रहा हूँ
सलमा से दिल लगा कर सलमा से दिल लगा कर

उस हूर-वश के ग़म में दुनिया-ओ-दीं गँवा कर
होश-ओ-हवास खो कर सब्र-ओ-सुकूँ लुटा कर
बैठे बिठाए दिल में ग़म की ख़लिश बसा कर
हर चीज़ को भुला कर
सलमा से दिल लगा कर
बस्ती की लड़कियों में बदनाम हो रहा हूँ

कहती हैं सब ये किस की तड़पा गई है सूरत
सलमा की शायद इस के मन भा गई है सूरत
और उस के ग़म में इतनी मुरझा गई है सूरत
मुरझा गई है सूरत कुम्हला गई है सूरत
सँवला गई है सूरत
सलमा से दिल लगा कर
बस्ती की लड़कियों में बदनाम हो रहा हूँ

पनघट पे जब कि सारी होती हैं जम्अ’ आ कर
गागर को अपनी रख कर, घुँघट उठा उठा कर
ये क़िस्सा छेड़ती हैं मुझ को बता बता कर
सलमा से बातें करते देखा है इस को जा कर
हम ने नज़र बचा कर
सलमा से दिल लगा कर
बस्ती की लड़कियों में बदनाम हो रहा हूँ

रातों को गीत गाने जब मिल कर आती हैं सब
तालाब के किनारे धूमें मचाती हैं सब
जंगल की चाँदनी में मंगल मनाती हैं सब
तो मेरे और सलमा के गीत गाती हैं सब
और हँसती जाती हैं सब
सलमा से दिल लगा कर
बस्ती की लड़कियों में बदनाम हो रहा हूँ

खेतों से लौटती हैं जब दिन छुपे मकाँ को
तब रास्ते में बाहम वो मेरी दास्ताँ को
दोहरा के छेड़ती हैं सलमा को मेरी जाँ को
और वो हया की मारी सी लेती है ज़बाँ को
कि छेड़े इस बयाँ को
सलमा से दिल लगा कर
बस्ती की लड़कियों में बदनाम हो रहा हूँ

कहती है रहम खा कर यूँ एक माह-ए-तलअत
ये शहरी नौजवाँ था किस दर्जा ख़ूबसूरत
आँखों में बस रही है अब भी वो पहली रंगत
दो दिन में आह क्या है क्या हो गई है हालत
अल्लाह तेरी क़ुदरत
सलमा से दिल लगा कर
बस्ती की लड़कियों में बदनाम हो रहा हूँ

उस शम्अ’-रू का जब से परवाना बन गया हूँ
बस्ती की लड़कियों में अफ़्साना बिन गया हूँ
हर माह-वश के लब का पैमाना बन गया हूँ
दीवाना हो रहा हूँ दीवाना बन गया हूँ
दीवाना बन गया हूँ
सलमा से दिल लगा कर
बस्ती की लड़कियों में बदनाम हो रहा हूँ

उन की ज़बाँ पे मेरी जितनी कहानियाँ हैं
क्या जानें ये कि दिल की सब मेहरबानियाँ हैं
कम-सिन हैं बे-ख़बर हैं उठती जवानियाँ हैं
क्या समझें ग़म के हाथों क्यूँ सर-गिरानियाँ हैं
क्यूँ ख़ूँ-फ़िशानियाँ हैं
सलमा से दिल लगा कर
बस्ती की लड़कियों में बदनाम हो रहा हूँ

हर इक के रहम का यूँ इज़हार हो रहा है
बेचारे को ये कैसा आज़ार हो रहा है
देखे तो कोई जाने बीमार हो रहा है
किस दर्जा ज़िंदगी से बेज़ार हो रहा है
नाचार हो रहा है
सलमा से दिल लगा कर
बस्ती की लड़कियों में बदनाम हो रहा हूँ

इक पूछती है आ कर तुम बे-क़रार क्यूँ हो
कुछ तो हमें बताओ यूँ दिल-फ़िगार क्यूँ हो
क्या रोग है कहो तो तुम अश्क-बार क्यूँ हो
दीवाने क्यूँ हुए हो दीवाना वार क्यूँ हो
बा-हाल-ए-ज़ार क्यूँ हो
सलमा से दिल लगा कर
बस्ती की लड़कियों में बदनाम हो रहा हूँ

जाऊँ शिकार को गर बा-हमरहान-ए-सहरा
खेतों से घूरती हैं यूँ दुख़्तरान-ए-सहरा
बिजली की रौशनी को जैसे मियान-ए-सहरा
तारीक शब में देखें कुछ आहुवान-ए-सहरा
हैरत कुशान-ए-सहरा
सलमा से दिल लगा कर
बस्ती की लड़कियों में बदनाम हो रहा हूँ

इक शोख़ छेड़ती है इस तरह पास आ कर
देखो वो जा रही है सलमा नज़र बचा कर
शरमा के मुस्कुरा कर आँचल से मुँह छुपा कर
जाओ ना पीछे पीछे दो बातें कर लो जा कर
खेतों में छुप छुपा कर
सलमा से दिल लगा कर
बस्ती की लड़कियों में बदनाम हो रहा हूँ

गोया हमें हसद से कुछ नाज़नीन निगाहें
सलमा की भा गई हैं क्यूँ दिल-नशीं निगाहें
उन से ज़्यादा दिलकश हैं ये हसीं निगाहें
अल-क़िस्सा एक दिल है सौ ख़शमगीं निगाहें
शौक़ आफ़रीं निगाहें
सलमा से दिल लगा कर
बस्ती की लड़कियों में बदनाम हो रहा हूँ

इक शोख़ ताज़ा दारद ससुराल से घर आ कर
सखियों से पूछती है जिस दम मुझे बता कर
ये कौन है तो ज़ालिम कहती हैं मुस्कुरा कर
तुम इस का हाल पूछो सलमा के दिल से जा कर
ये गीत उसे सुना कर
सलमा से दिल लगा कर
बस्ती की लड़कियों में बदनाम हो रहा हूँ

ओ देस से आने वाले बता!

ओ देस से आने वाले बता !
क्‍या अब भी वहाँ के बाग़ों में मस्‍ताना हवाएँ आती हैं ?
क्‍या अब भी वहाँ के परबत पर घनघोर घटाएँ छाती हैं ?
क्‍या अब भी वहाँ की बरखाएँ वैसे ही दिलों को भाती हैं ?

ओ देस से आने वाले बता !
क्‍या अब भी वतन में वैसे ही सरमस्‍त नज़ारे होते हैं ?
क्‍या अब भी सुहानी रातों को वो चान्द-सितारे होते हैं ?
हम खेल जो खेला करते थे अब भी वो सारे होते हैं ?

ओ देस से आने वाले बता !
शादाबो-शिगुफ़्ता[1] फूलों से मा’मूर[2] हैं गुलज़ार[3] अब कि नहीं ?
बाज़ार में मालन लाती है फूलों के गुँथे हार अब कि नहीं ?
और शौक से टूटे पड़ते है नौउम्र ख़रीदार अब कि नहीं ?

ओ देस से आने वाले बता !
क्‍या शाम पड़े गलियों में वही दिलचस्‍प अन्धेरा होता है ?
और सड़कों की धुन्दली शम्‍मओं पर सायों का बसेरा होता है ?
बाग़ों की घनेरी शाखों पर जिस तरह सवेरा होता है ?

ओ देस से आने वाले बता !
क्‍या अब भी वहाँ वैसी ही जवाँ और मदभरी रातें होती हैं ?
क्‍या रात भर अब भी गीतों की और प्‍यार की बाते होती हैं ?
वो हुस्‍न के जादू चलते हैं वो इश्‍क़ की घातें होती हैं ?

ओ देस से आने वाले बता !
क्‍या अब भी महकते मन्दिर से नाक़ूस[4] की आवाज़ आती है ?
क्‍या अब भी मुक़द्दस[5] मस्जिद पर मस्‍ताना अज़ाँ[6] थर्राती है ?
और शाम के रँगी सायों पर अ़ज़्मत की[7] झलक छा जाती है ?

ओ देस से आने वाले बता !
क्‍या अब भी वहाँ के पनघट पर पनहारियाँ पानी भरती हैं ?
अँगड़ाई का नक़्शा बन-बन कर सब माथे पे गागर धरती हैं ?
और अपने घरों को जाते हुए हँसती हुई चुहलें करती है ?

ओ देस से आने वाले बता !
क्‍या अब भी वहाँ मेलों में वही बरसात का जोबन होता है ?
फैले हुए बड़ की शाखों में झूलों का निशेमन होता है ?
उमड़े हुए बादल होते हैं छाया हुआ सावन होता है ?

ओ देस से आने वाले बता !
क्‍या शहर के गिर्द अब भी है रवाँ[8] दरिया-ए-हसीं[9] लहराए हुए ?
ज्यूँ गोद में अपने मन[10] को लिए नागन हो कोई थर्राए हुए ?
या नूर[11] की हँसली हूर की गर्दन में हो अ़याँ[12] बल खाए हुए ?

ओ देस से आने वाले बता !
क्‍या अब भी किसी के सीने में बाक़ी है हमारी चाह ? बता
क्‍या याद हमें भी करता है अब यारों में कोई ? आह बता
ओ देश से आने वाले बता लिल्‍लाह[13] बता, लिल्‍लाह बता

ओ देस से आने वाले बता !
क्‍या गाँव में अब भी वैसी ही मस्ती भरी रातें आती हैं ?
देहात में कमसिन माहवशें तालाब की जानिब जाती हैं ?
और चाँद की सादा रोशनी में रंगीन तराने गाती हैं ?

ओ देस से आने वाले बता !
क्‍या अब भी गजर-दम[14] चरवाहे रेवड़ को चराने जाते हैं ?
और शाम के धुन्दले सायों में हमराह घरों को आते हैं ?
और अपनी रँगीली बांसुरियों में इश्‍क़ के नग्‍मे गाते हैं ?

ओ देस से आने वाले बता !
आखिर में ये हसरत है कि बता वो ग़ारते-ईमाँ[15] कैसी है ?
बचपन में जो आफ़त ढाती थी वो आफ़ते-दौराँ[16] कैसी है ?
हम दोनों थे जिसके परवाने वो शम्‍मए-शबिस्‍ताँ[17] कैसी हैं ?

ओ देस से आने वाले बता !
क्‍या अब भी शहाबी आ़रिज़[18] पर गेसू-ए-सियह[19] बल खाते हैं ?
या बहरे-शफ़क़[20] की मौजों पर[21] दो नाग पड़े लहराते हैं ?
और जिनकी झलक से सावन की रातों के से सपने आते हैं ?

ओ देस से आने वाले बता !
अब नामे-खुदा, होगी वो जवाँ मैके में है या ससुराल गई ?
दोशीज़ा है या आफ़त में उसे कमबख़्त जवानी डाल गई ?
घर पर ही रही या घर से गई, ख़ुशहाल रही ख़ुशहाल गई ?
ओ देस से आने वाले बता !

शब्दार्थ
  1. ऊपर जायें प्रफुल्‍ल-स्‍फुटित
  2. ऊपर जायें परिपूर्ण
  3. ऊपर जायें बाग़
  4. ऊपर जायें शँख
  5. ऊपर जायें पवित्र
  6. ऊपर जायें अज़ान
  7. ऊपर जायें महानता की
  8. ऊपर जायें बहती है
  9. ऊपर जायें सुन्‍दर नदी
  10. ऊपर जायें मणि
  11. ऊपर जायें प्रकाश
  12. ऊपर जायें प्रकट
  13. ऊपर जायें भगवान के लिए
  14. ऊपर जायें सुबह-सवेरे
  15. ऊपर जायें धर्म नष्‍ट करने वाली
  16. ऊपर जायें संसार के लिए मुसीबत यानीअति सुन्‍दर
  17. ऊपर जायें शयनागार का दीपक
  18. ऊपर जायें गुलाबी कपोल
  19. ऊपर जायें काले केश
  20. ऊपर जायें ऊषा का सागर
  21. ऊपर जायें लहरों पर

ऐ इश्क़, न छेड़ आ-आ के हमें 

ऐ इश्क़, न छेड़ आ-आ के हमें
हम भूले हुओं को याद न कर
पहले ही बहुत नाशाद[1] हैं हम
तू और हमें नाशाद न कर
क़िस्मत का सितम ही कम नहीं कुछ
ये ताज़ा सितम ईजाद न कर

यूँ ज़ुल्म न कर बेदाद[2] न कर
ऐ इश्क़, हमें बर्बाद न कर ।

जिस दिन से मिले हैं दोनों का
सब चैन गया आराम गया
चेहरों से बहार-ए-सुब्ह गई
आँखों से फ़रोग़-ए-शाम[3] गया
हाथों से ख़ुशी का जाम छुटा
होंटों से हँसी का नाम गया

ग़मगीं न बना नाशाद न कर
ऐ इश्क़, हमें बर्बाद न कर ।

हम रातों को उठ कर रोते हैं
रो-रो के दुआएँ करते हैं
आँखों में तसव्वुर[4] दिल में ख़लिश[5]
सर धुनते हैं, आहें भरते हैं
ऐ इश्क़, ये कैसा रोग लगा
जीते हैं न ज़ालिम मरते हैं

ये ज़ुल्म तू ऐ जल्लाद न कर
ऐ इश्क़, हमें बर्बाद न कर ।

ये रोग लगा है जब से हमें
रँजीदा[6] हूँ मैं बीमार है वो
हर वक़्त तपिश हर वक़्त ख़लिश
बे-ख़्वाब हूँ मैं बेदार है वो
जीने पे इधर बेज़ार[7] हूँ मैं
मरने पे उधर तयार है वो

और ज़ब्त[8] कहे फ़रियाद न कर
ऐ इश्क़, हमें बर्बाद न कर ।

जिस दिन से बँधा है ध्यान तिरा
घबराए हुए से रहते हैं
हर वक़्त तसव्वुर कर-कर के
शरमाए हुए से रहते हैं
कुम्हलाए हुए फूलों की तरह
कुम्हलाए हुए से रहते हैं

पामाल[9] न कर बर्बाद न कर
ऐ इश्क़, हमें बर्बाद न कर ।

बेदर्द ! ज़रा इनसाफ़ तो कर
इस उम्र में और मग़्मूम[10] है वो
फूलों की तरह नाज़ुक है अभी
तारों की तरह मासूम है वो
ये हुस्न सितम ! ये रंज ग़ज़ब !
मजबूर हूँ मैं, मज़लूम[11] है वो

मज़लूम पे यूँ बे-दाद न कर
ऐ इश्क़, हमें बर्बाद न कर ।

ऐ इश्क़, ख़ुदारा[12] देख कहीं
वो शोख़-ए-हज़ीं[13] बदनाम न हो
वो माह-लक़ा[14] बदनाम न हो
वो ज़ोहरा-जबीं[15] बदनाम न हो
नामूस का उस के पास रहे
वो पर्दानशीं बदनाम न हो

उस पर्दानशीं को याद न कर
ऐ इश्क़, हमें बर्बाद न कर ।

शब्दार्थ
  1. ऊपर जायें दुखी
  2. ऊपर जायें ज़ुल्म
  3. ऊपर जायें शाम की रौनक
  4. ऊपर जायें कल्पना
  5. ऊपर जायें फ़िक्र
  6. ऊपर जायें सन्तप्त
  7. ऊपर जायें थके हुए
  8. ऊपर जायें आत्म-नियन्त्रण
  9. ऊपर जायें पैरों से कुचलना
  10. ऊपर जायें दुखी
  11. ऊपर जायें उत्पीड़ित
  12. ऊपर जायें ईश्वर के लिए
  13. ऊपर जायें हास्यास्पद दुख
  14. ऊपर जायें चन्द्रमुखी
  15. ऊपर जायें सौन्दर्य और प्रेम की देवी

दिल-ओ-दिमाग को रो लूँगा

दिल-ओ-दिमाग़ को रो लूँगा, आह कर लूँगा
तुम्हारे इश्क़ में सबकुछ तबाह कर लूँगा
अगर मुझे न मिलीं तुम, तुम्हारे सर की क़सम
मैं अपनी सारी जवानी तबाह कर लूँगा

मुझे जो दैर-ओ-हरम[1] में कहीं जगह न मिली
तिरे ख़याल ही को सज्दा-गाह[2] कर लूँगा
जो तुमसे कर दिया महरूम आसमाँ ने मुझे
मैं अपनी ज़िन्दगी सर्फ़-ए-गुनाह कर लूँगा

रक़ीब से भी मिलूँगा तुम्हारे हुक्म पे मैं
जो अब तलक न किया था अब आह कर लूँगा
तुम्हारी याद में मैं काट दूँगा हश्र से दिन
तुम्हारे हिज्र में रातें सियाह कर लूँगा

सवाब के लिए हो जो गुनह वो ऐन सवाब
ख़ुदा के नाम पे भी इक गुनाह कर लूँगा
हरीम-ए-हज़रत-ए-सलमा[3] की सम्त जाता हूँ
हुआ न ज़ब्त[4] तो चुपके से आह कर लूँगा

ये नौ-बहार[5] ये अबरू[6] , हवा ये रँग शराब
चलो जो हो सो हो अब तो गुनाह कर लूँगा
किसी हसीने के मासूम इश्क़ में ‘अख़्तर’
जवानी क्या है मैं सब कुछ तबाह कर लूँगा

शब्दार्थ
  1. ऊपर जायें मन्दिर-मस्जिद
  2. ऊपर जायें इबादत की जगह
  3. ऊपर जायें हज़रत सलमा के घर
  4. ऊपर जायें ख़ुद पर काबू
  5. ऊपर जायें वसन्त
  6. ऊपर जायें भौंह

तमन्नाओं को ज़िन्दा आरज़ूओं को जवाँ कर लूँ

तमन्नाओं को ज़िन्दा आरज़ूओं को जवाँ कर लूँ
ये शर्मीली नज़र कह दे तो कुछ गुस्ताख़ियाँ कर लूँ

बहार आई है बुलबुल दर्द-ए-दिल कहती है फूलों से
कहो तो मैं भी अपना दर्द-ए-दिल तुम से बयाँ कर लूँ

हज़ारों शोख़ अरमाँ ले रहे हैं चुटकियाँ दिल में
हया उन की इजाज़त दे तो कुछ बेबाकियाँ कर लूँ

कोई सूरत तो हो दुनिया-ए-फ़ानी[1] में बहलने की
ठहर जा ऐ जवानी मातम-ए-उम्र-ए-रवाँ[2] कर लूँ

चमन में हैं बहम[3] परवाना ओ शम्अ ओ गुल ओ बुलबुल
इजाज़त हो तो मैं भी हाल-ए-दिल अपना बयाँ कर लूँ

किसे मालूम कब किस वक़्त किस पर गिर पड़े बिजली
अभी से मैं चमन में चल कर आबाद आशियाँ कर लूँ

बर आएँ हसरतें क्या क्या अगर मौत इतनी फ़ुर्सत दे
कि इक बार और ज़िन्दा शेवा[4]-ए-इश्क़-ए-जवाँ कर लूँ

मुझे दोनों जहाँ में एक वो मिल जाएँ गर ‘अख़्तर’
तो अपनी हसरतों को बे-नियाज़-ए-दो-जहाँ[5] कर लूँ

शब्दार्थ
  1. ऊपर जायें नश्वर दुनिया
  2. ऊपर जायें गुज़रती जा रही उम्र का अफ़सोस
  3. ऊपर जायें मिले हुए
  4. ऊपर जायें आदत
  5. ऊपर जायें दोनो लोकों की इच्छाओं से मुक्त

मख़्मूर अपने दिल में, तकब्बुर न लाइए

मख़्मूर[1] अपने दिल में, तकब्बुर[2] न लाइए,
दुनिया में हर उरूज[3] का एक दिन ज़वाल[4] है ।

मचलता होगा इन्हीं गालों पर शबाब कभी,
उबलती होगी इन्हीं आँखो से शराब कभी ।

मगर अब इनमें वह पहली-सी कोई बात नहीं
जहाँ में आह किसी चीज की सबात[5] नहीं ।

शब्दार्थ
  1. ऊपर जायें नशे में चूर, उन्मत्त
  2. ऊपर जायें अभिमान
  3. ऊपर जायें बुलन्दी
  4. ऊपर जायें पतन
  5. ऊपर जायें स्थायित्व

वो रातें याद आती हैं मुझे 

‘आह ! वो रातें, वो रातें याद आती हैं मुझे’
आह, ओ सलमा ! वो रातें याद आती हैं मुझे
वो मुलाक़ातें, वो बातें याद आती हैं मुझे
हुस्न-ओ-उलफ़त की वो घातें याद आती हैं मुझे
आह ! वो रातें वो …

जब तुम्हारी याद में दीवाना-सा रहता था मैं
जब सुकून-ओ-सब्र से बगाना-सा रहता था मैं
बेपिए मदहोश-सा, दीवाना-सा रहता था मैं
आह ! वो रातें वो …

जब तुम्हारी जुस्तुजू बेताब रखती थी मुझे
जब तुम्हारी आरज़ू बेख़्वाब रखती थी मुझे
मिस्ल-ए-मौज-ए-शोला-ओ-सीमाब रखती थी मुझे
आह ! वो रातें वो …

मुनतज़िर मेरी, जब अपने बाग़ में रहती थीं तुम
हर कली से अपने दिल की दास्ताँ कहती थीं तुम
नाज़नीं होकर भी नाज़-ए-आशिक़ी सहती थी तुम
आह ! वो रातें वो …

सरदियों की चान्दनी, शबनम-सी कुमलाती थी जब
शबनम आकर चार सू मोती से बरसाती थी जब
बाग़ पर इक धुन्दली-धुन्दली मस्ती छा जाती थी जब
आह ! वो रातें वो …

जब तुम आ जाती थीं, बज़ुल्फ़-ए-परेशाँ ता कमर
इत्र पैमाँ ता बज़ानू, सुम्बुलिस्ताँ ता कमर
मुश्क आगीं ता बदामाँ, अम्बर अफ़शाँ ता कमर
आह ! वो रातें, वो रातें,
वो रातें याद आती हैं मुझे !

ऐ इश्क़ कहीं ले चल

ऐ इश्क़ कहीं ले चल, इस पाप की बस्ती से,
नफ़रत-गहे-आलम[1] से, लानत-गहे-हस्ती[2] से,
इन नफ़्स-परस्तों[3] से, इस नफ़्स-परस्ती से,
दूर और कहीं ले चल,
ऐ इश्क़ कहीं ले चल !

हम प्रेम-पुजारी हैं तू प्रेम-कन्हैया है !
तू प्रेम-कन्हैया है, यह प्रेम की नय्या है,
यह प्रेम की नय्या है, तू इसका खिवैया है,
कुछ फ़िक्र नहीं, ले चल,
ऐ इश्क़ कहीं ले चल !

बे-रहम ज़माने को अब छोड़ रहे हैं हम,
बे-दर्द अ़ज़ीज़ों[4] से मुँह मोड़ रहे हैं हम,
जो आस थी वो भी अब तोड़ रहे हैं हम,
बस ताब[5] नहीं, ले चल,
ऐ इश्क़ कहीं ले चल !

शब्दार्थ
  1. ऊपर जायें घृणा से भरी हुई दुनिया
  2. ऊपर जायें लानत भरा संसार
  3. ऊपर जायें कामासक्तों
  4. ऊपर जायें प्रिय बन्धुओं
  5. ऊपर जायें सहनशक्ति

देखो ! वह कोई जोगन जँगल में गा रही है 

देखो ! वह कोई जोगन जँगल में गा रही है,
मौसीक़-ए-हज़ीं के दरिया बहा रही है

हर लरज़िशे-सबा में तूफ़ाँ उमड़ रहे हैं,
किस दुख भरी अदा से तानें लगा रही है ।
अठखेलियों का सिन है, हंस-बोलने का दिन है,
लेकिन न जाने क्यों वह आसूँ बहा रही है ।

है एक सितार उसके आग़ोशे-नाज़नीं में
दो नाजुक उँगलियों से जिसको बजा रही है ।

जँगल के जानवर कुछ बैठे हैं उसके आगे
रो-रोके जिनको अपनी बिपता सुना रही है ।
खूँख़्वार शेर भी हैं वहशी ग़ज़ाल भी हैं,
लेकिन वह सबके दिल पर सिक्का जमा रही है ।

कुछ साँप झूमते हैं रह-रह के मस्त होकर
इक मौजे-वज्द उनकी रग-रग पै छा रही है।

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