अजय पाठक की रचनाएँ

बंधक सुबहें 

बंधक सुबहें
गिरवी अपनी
साँझ दुपहरी है ।

बड़ी देर तक रात व्यथा से
कर सोये संवाद,
रोटी की चिंता ने छीना
प्रातः का अवसाद,
भूख मीत है जिससे
अपनी छनती गहरी है ।

रक़म सैकड़ा लिया कभी था
की उसकी भरपाई,
सात महीने किया मज़ूरी
तब जाकर हो पाई,
कुछ बोलें तो अपने हिस्से
कोर्ट कचहरी है ।

टूटी मड़ई जिसको अपना
घर कह लेते हैं,
किसी तरह कुछ ओढ़-बिछाकर
हम रह लेते हैं,
जीवन जैसे टूटी-फूटी
एक मसहरी है ।

मालिक लोगों के कहने पर
देते रहे अँगूठा,
वक़्त पड़ा तो हम ही साबित
हो जाते हैं झूठा,
निरर्थक है फ़रियाद
व्यवस्था अंधी-बहरी है ।

बूढ़े हुए कबीर

बूढ़े हुए कबीर
आजकल
ऊँचा सुनते हैं।

आंखो से है साफ झलकती
भीतर की बेचैनी
हुए अकारथ साखी-दोहे
बिरथा गई रमैनी।
खांस-खांस कर
समरसता की
चादर बुनते हैं।

रह जाते हैं कोलाहल में
शब्द सभी खोए
दुखिया दास कबीर अहर्निश
जागे औ´ रोए
आडंबर के
लेकिन जब-तब
रेशे धुनते हैं।

मगहर का माहौल सियासी
पहले जैसा है
माया ठगिनी की बस्ती में
सब कुछ पैसा है
पंडित, मुल्ला
अब भी
कांकर-पाथर चुनते हैं।

बात-बात पर उन्हें चिढ़ा कर
बालक हैं हंसते
बड़े सयाने जब तक उन पर
ताने हैं कसते
धरम-धजा के
वाहक उनसे
जलते- भुनते हैं।

कुछ तेरे, कुछ मेरे

अंतर्मन के भोज पत्र पर,
गीत लिखे बहुतेरे
सजनी, कुछ तेरे, कुछ मेरे. . .

जब-जब सूरज को देखूँ मैं,
अंजानी-सी लगन लगे।
तेरे पथ की रखवाली में,
रात-रात भर नयन जगे।
दुविधाओं में घिरे हुए दिन,
चिंताओं के फेरे
सजनी, कुछ तेरे, कुछ मेरे. . .

मुझको देख विहँसता चंदा
जब-जब आधी रात का,
पात-पात बिखरा जाता है
मौसम झंझावात का।
इन लम्हों ने मटमैले-से
कितने चित्र उकेरे।
सजनी, कुछ तेरे, कुछ मेरे. . .

अलकों पर सपनों के मोती,
झरते धीरे-धीरे।
भीतर संचित है कितने ही,
माणिक-मुक्ता-हीरे।
मुझको बाँध लिया करते हैं,
इंद्र धनुष के घेरे
सजनी, कुछ तेरे, कुछ मेरे. . .

अंतर्मन के भोज पत्र पर,
गीत लिखे बहुतेरे
सजनी, कुछ तेरे, कुछ मेरे . . .

गाँव 

पगडंडी पर छाँवों जैसा कुछ भी नही दिखा,
गाँवों में अब गाँवों जैसा कुछ भी नहीं दिखा।

कथनी सबकी कड़वी-कड़वी, करनी टेढ़ी-टेढ़ी,
बरकत और दुआओं जैसा कुछ भी नहीं दिखा।

बिछुआ, पैरी, लाल महावर, रुनझुन करती पायल,
गोरे-गोरे पाँवों जैसा कुछ भी नहीं दिखा।

राधा, मुनिया, धनिया, सीता जींस पहनती है,
उनमें शोख अदायों जैसा कुछ भी नहीं दिखा।

बरगद, इमली, महुआ, पीपल, शीशम लुप्त हुए,
शीतल मंद हवाओं जैसा कुछ भी नहीं दिखा।

पंचायत में राजनीति की गहरी पैठ हुई,
तब से ग्राम-सभाओं जैसा कुछ भी नहीं दिखा।

सफलता खोज लूँगा

तुम मुझे दुख-दर्द की सारी विकलता सौंप देना,
मैं घने अवसाद में अपनी सफलता खोज लूँगा!

मैं सफ़र में चल पड़ा हूँ,
दूर जाऊँगा समझ लो।
व्यर्थ है आवाज़ देना,
आ न पाऊँगा समझ लो।
जोगियों से मन लगाना,
छोड़ दो मुझको बुलाना।
राह में दुश्वारियाँ हो. . . मैं सरलता खोज लूँगा,
मैं घने अवसाद में अपनी सफलता खोज लूँगा!

एक रचनाकार हूँ,
निर्माण करने में लगा हूँ।
मैं व्यथा का सोलहों-
सिंगार करने में लगा हूँ।
यह कठिन है काम लेकिन,
श्रम अथक अविराम लेकिन।
इस थकन में ही सृजन की मैं सबलता खोज लूँगा।
मैं घने अवसाद में अपनी सफलता खोज लूँगा!

फूल की पंखुड़ियों पर,
चैन से तुम सो न पाए।
जग तुम्हारा हो गया पर,
तुम किसी के हो न पाए।
तुम अधर की प्यास दे दो,
या सुलगती आस दे दो।
मैं हृदय की फाँस में अपनी तरलता खोज लूँगा,
मैं घने अवसाद में अपनी सफलता खोज लूँगा!

रात काली है मगर यह,
और गहरी हो न जाए।
फिर तुम्हारी चेतनायें,
शून्य होकर खो न जाए।
इसलिए मैं फिर खड़ा हूँ,
स्याह रातों से लड़ा हूँ।
मैं तिमिर में ही कहीं, सूरज निकलता खोज लूँगा।
मैं घने अवसाद में अपनी सफलता खोज लूँगा!

अनुबंध

रिश्तों ने बाँधा है जब से अनुबंध में,
रंग नए दिखते हैं, गीतों में छंद में।

शब्द सभी अनुभव के अनुगामी लगते हैं
अनचाहे उन्मन से अधरों पर सजते हैं।
सब कुछ ही कह जाते अपने संबंध में,
रंग नए दिखते हैं गीतों में छंद में।

अंतर के भावों में सागर लहराता है,
सुधियों के बंधन से आकर टकराता है।
धीरज रुक जाता है अपने तटबंध में
रंग नए दिखते गीतों में छंद में।

नयनों में सतरंगे सपनों की डोली है,
साँसों में सरगम की भाषा है बोली है।
जीवन की उर्जा है परिचित-सी गंध में,
रंग नए दिखते हैं गीतों में छंद में।

नेहों की निधियों का संचय कर लेने को,
सुधियों में स्नेहिल-सी बातें भर लेने को।
आतुर मन रहता है इसके प्रबंध में,
रंग नए दिखते हैं गीतों में छंद में।

कबिरा तेरी चादरिया

कबिरा तेरी चादरिया का, जर्जर ताना बाना देखा।
मंदिर की हठधर्मी देखी, मस्जिद का ढह जाना देखा।

अलगू के हाथों में लाठी, जुम्मन की आँखों में शोले।
मज़हब के हाथों से, पावन रिश्तों का मर जाना देखा।

स्वारथ और सियासत चढ़कर सब के सिर पर बोल रही।
और लहू का धार-धार हो पानी-सा बह जाना देखा।

आदर्शों की हत्या करते, विश्वासी प्रतिमान दिखे।
मुंसिफ़ का मुल्ज़िम के घर तक, अक्सर आना जाना देखा।

सजी दुकानें ज्ञान-ध्यान की मठाधीश भौतिकवादी
अवतारी पुरुषों का, निरथक बातों से शरमाना देखा।

शील हरण से व्यथित द्रौपदी फूट-फूट कर रोती है।
पापी दुर्योधन के सम्मुख, अर्जुन का डर जाना देखा।

चारों धाम नहीं 

रिश्तों में अब आदर्शों का कोई काम नहीं
वह भी राधा नहीं रही और हम भी श्याम नहीं।
सीतायें बंदी हैं अब तक उसके महलों में
रावण से जाकर टकरायें अब वो राम नहीं।

गोपालों से मिली गोपियाँ रास रचाती है
उन्मादों के इन रिश्तों का कोई नाम नहीं।
पंचाली को जकड़ रखा पापी दुर्योधन ने
अर्जुन का पुरुषत्व दिखाता कोई काम नहीं।

झूठ इबादत, बदी बंदगी धोखा अर्चन है
काबा-काशी इसके आगे चारो धाम नहीं।

चिरैया धीरे धीरे बोल

चिरइया, धीरे-धीरे बोल!

अंतर्मन के अध्यायों के पन्नों को मत खोल।
अभी-अभी तो अपनी आँखें प्राची ने खोला है,
मलयानल है, मन का तरुवर अभी नहीं डोला है।
अरी निर्दयी! अभी हृदय में पीड़ा तो मत घोल।
चिरइया, धीरे-धीरे बोल!

विरह-वेदना में ही गुंफित तेरा गुंजित स्वर है,
सत्य सनातन यह भी लेकिन, सुख भी तो नश्वर है।
क्षण भर का जीवन है अपनी! बातों में रस घोल।
चिरइया, धीरे-धीरे बोल!

उगते सूरज को अंबर में थोड़ा तो चढ़ने दे,
पीडा की लंबी परछाई बढ़ती है बढ़ने दे,
धूप-छाँव के चलते क्रम को अनुभव से ही तोल।
चिरइया, धीरे-धीरे बोल!

तेरा यह आलाप हृदय को बेकल कर जाता है,
मन के सूखे अंतःसर में सागर भर जाता है,
महाप्रलय के द्वार-अबूझे-शब्दों से मत खोल।
चिरइया, धीरे-धीरे बोल!

झरते वन का सूखा तरुवर अपना ठौर-ठिकाना,
ऊपर से तेरा यह निष्ठुर विरही तान सुनाना,
नयन-कोर से झर जाते हैं रतन कई अनमोल।
चिरइया, धीरे-धीरे बोल!

पुरुषार्थ 

मानवता के आदर्शों का जो सम्मान करें
पुरुष वही जो दानवता का, मर्दन-मान करें।

धरती पर वैसे तो कितने आते हैं, जाते हैं,
बिरले ही अपने जीवन को धन्य बना पाते हैं,
नर होने का अर्थ नहीं है अपयश में खो जाना,
नर तो वह है, दुश्मन मन भी जिसका गुणगान करे।

जीवन का उद्देश्य नहीं है केवल पीना-खाना,
साँसों पर अवलंबित होकर ऐसे ही मर जाना,
धर्म-नीति का अलख जगाते चले निरंतर पथ में,
सच्चा नर है वह जो, पौरुष का अवदान करे।

त्याग, धर्म की राह खड़ी थी कौरव सेना सारी,
किंतु अकेला अर्जुन ही था, उन पुरुषों पर भारी,
दिया सत्य का साथ ईश ने अर्जुन का उस रण में,
नर होने का अर्थ, सत्य का जो संधान करें।

लंका नगरी के उन्नायक अत्याचारी नर थे,
पुरुषोत्तम थे उनके सम्मुख रीछ और वानर थे,
उखड़ गया रावण का पौरुष, आदर्शों के आगे,
ऐसा नर भी क्या जो ताक़त पर अभिमान करे।

मानवता के आदर्शों का जो सम्मान करे,
पुरुष वही जो दानवता का, मर्दन-मान करे।

बादल का पानी 

बरस गया बादल का पानी!
बिजली चमकी दूर गगन में,

कंपन होते प्राण भवन में,
तरल-तरल कर गई हृदय को,
निष्ठुर मौसम की मनमानी।
बरस गया बादल का पानी!

धुली आस कोमल अंतर की,
बही संपदा जीवन भर की,
फिर भी लेती रहीं लहरियाँ
हमसे निधियों की कुरबानी।
बरस गया बादल का पानी!

धार-धार में तेज़ लहर है,
लहरों में भी तेज़ भँवर है,
सपनों का हो गया विसर्जन,
घेरे आशंका अनजानी।
बरस गया बादल का पानी!

भोर तक

एक आशा जगाती रही भोर तक,
चाँदनी मुस्कुराती रही भोर तक।

माधुरी-सी महकती रही यामिनी,
और मन को जलाती रही भोर तक।

आगमन की प्रतीक्षा किए रात भर,
चौंकते ही रहे बात ही बात पर,
भावना की लहर ने बहाया वहीं
डूबते ही रहे घात-प्रतिघात पर,
शब्द उन्मन अधर से निकलते रहे,
वेदनायें सताती रहीं भोर तक।

प्रेम की पूर्णता के हवन के लिए,
अनकहे नेह के दो वचन के लिए,
प्राण करता रहा है जतन पे जतन,
वेग उद्वेग ही के शमन के लिए,
एक तिनके-सा मन कंपकंपाता रहा,
प्रीत उसको बहाती रही भोर तक।

धूप-सी उम्र चढ़ती उतरती रही,
ज़िंदगी में कई रंग भरती रही,
और निष्फल हुई हार कर कामना
एक अंधे डगर से गुज़रती रही
जो हृदय में सुलगती रही आँच-सी
वो तृषा ही जलाती रही भोर तक।

मौन हो गए

अक्षर-अक्षर मौन हो गए, मौन हुआ संगीत
परदेसी के साथ गया है, जब से मन का मीत।

चलता है सूरज वैसे ही दुनिया भी चलती है
और तिरोहित होकर संध्या वैसे ही ढलती है
किंतु गहनतम निशा अकेली मन को ही छलती है
अधरों पर सजने लगता है, अनजाना-सा गीत।

डाल-डाल पर खिले सुमन को ॠतुओं ने घेरा है
अपने अंतर में पतझड़ का ही केवल डेरा है
स्मृतियों के ओर छोर तक उसका ही फेरा है
उधर खिला मधुबन हँसता है रोता इधर अगीत।

दूर गगन में उगे सितारे अपनों से लगते हैं
लिए किरण की आस भोर तक वह भी तो जगते हैं
अनबोले शब्दों की भाषा में सब कुछ कहते हैं
एक सुखद जो वर्तमान था, वह भी हुआ अतीत।

सपनों के झुरमुट में उतरा कालिख-सा अँधियारा
हमने उसको रात-रात भर खोजा उसे पुकारा
खड़ा रहा बनकर निर्मोही निरर्थक रहा इशारा
जलती-बुझती रही निशा भर अनुभव की परतीत

अक्षर-अक्षर मौन हो गए, मौन हुआ संगीत
परदेसी के साथ गया है, जब से मन का मीत।

यामिनी गाती है

प्रिय सुनो! यामिनी गाती है।

तारों का झिलमिल पहन वसन
नीरवता लेकर गहन-गहन
कोमल-सी मधुमय वाणी में, कुछ अनबोला कह जाती है।
प्रिय सुनो! यामिनी गाती है।

कोमल किसलय के मंजुल स्वर
नव गीत सुनाते झर-झर-झर
पल्लव के कोमल गातों को, लो देखो वह सहलाती है।
प्रिय सुनो! यामिनी गाती है।

जब मौन हृदय होकर उन्मन
जलता बुझता जैसे उड्गन
नेहों के आतुर प्राणों को, नवजातक-सा बहलाती है।
प्रिय सुनो! यामिनी गाती है।

धरती की सुंदर डोली में,
चकवों की विरही टोली में,
किरणों से अठखेली करती, आशायें भरकर जाती है।
प्रिय सुनो! यामिनी गाती है।

निश्चिंत मगन जब सोता है,
एकांत भुवन में होता है,
उनींदी अँखियों में सपनों के रंगों को बरसाती है।
प्रिय सुनो! यामिनी गाती है।

समर्पित शब्द की रोली 

समर्पित शब्द की रोली,
विरह के गीत का चंदन।

हमारे साथ ही रहकर,
हमीं को ढो रहा कोई।

नयन के कोर तक जाकर,
घुटन को धो रहा कोई

क्षितिज पर स्वप्न के तारे,
कहीं पर झिलमिलाते हैं,

क्षणिक ही देर में सारे,
अकिंचन डूब जाते हैं।

वियोगी पीर के आगे,
नहीं अब नेह का बंधन।

निशा के साथ ही चलकर,
सुहागन वेदना लौटी।

सृजन को सात रंगों में,
सजाकर चेतना लौटी।

कसकती प्राण की पीड़ा,
अधर पर आ ठहरती है,

तिमिर में दीप को लेकर,
विकल पदचाप धरती है।

हृदय के तार झंकृत हैं,
निरंतर हो रहा मंथन।

नव सुमंगल गीत गाएँ 

रिश्मयों को आज फिर,
आकर अंधेरा छल न जाए,
और सपनों का सवेरा,
व्यर्थ् हो निकल न जाए।
हम अंधेरों का अमंगल,
दूर अंबर से हटाएं,
एक दीपक तुम जलाओे,
एक दीपक हम जलाएं।

आधियां मुखिरत हुई है,
वेदना के हाथ गहकर,
और होता है सबलतम,
वेग उनका साथ बहकर।
झिलमिलाती रिश्मयों की,
अस्मिता को फिर बचाएं,
एक दीपक तुम जलाओे,
एक दीपक हम जलाएं।

अब क्षितिज पर हम उगाएं,
स्वर्ण् से मंडित सवेरा,
और धरती पर बसाएं,
शांति का सुखमय बसेरा।
हम कलह को भूल कर सब,
नव-सुमंगल गीत गाएं,
एक दीपक तुम जलाओे,
एक दीपक हम जलाएं।

महुए की डाली पर उतरा वसंत

संयम के टूटेंगे फिर से अनुबंध,
महुए की डाली पर उतरा बसंत।

मधुबन की बस्ती में,
सरसिज का डेरा है।
सुमनों के अधरों तक,
भँवरों का फेरा है।
फुनगी पर गुंजित है, नेहों के छंद।
महुए की डाली पर उतरा बसंत।

किसलय के अंतर में,
तरुणाई सजती है।
कलियों के तनमन में,
शहनाई बजती है।
बहती, दिशाओं में जीवन की गंध।
महुए की डाली पर उतरा बसंत।

बौरों की मादकता,
बिखरी अमरैया में,
कुहु की लय छेड़ी,
उन्मत कोयलिया ने।
अभिसारी गीतों से, गुंजित दिगंत।
महुए की डाली पर उतरा बसंत।

सरसों के माथे पर,
पीली चुनरिया है।
झूमे है रह रहकर,
बाली उमरिया है।
केसरिया रंगों के, झरते मकरंद।
महुए की डाली पर उतरा बसंत।

बूढ़े से बरगद पर,
यौवन चढ़ आया है।
मन है बासंती पर,
जर्जर-सी काया है।
मधुरस है थोड़ा, पर तृष्णा अनंत।
महुए की डाली पर उतरा बसंत।

हम हैं बहता पानी बाबा

मिलती जुलती बातें अपनी मसला एक रुहानी बाबा
तुम हो रमता जोगी – साधु हम हैं बहता पानी बाबा

कठिन तपस्या है यह जीवन, राग-विराग तपोवन है
तुम साधक हो हम साधन हैं, दुनिया आनी-जानी बाबा

तुमने दुनिया को ठुकराया, हमको दुनिया वालों ने
हम दोनों की राह जुदा है, लेकिन एक कहानी बाबा

धुनी रमाये तुम बैठे हो, हम जलते अंगारों पर
तप कर और निखर जाने की हम दोनों ने ठानी बाबा

हृदय मरुस्थल बना हुआ है, और नयन में पानी है,
मौन साधकर ही झेलेंगे, मौसम की मनमानी बाबा।

रिश्ते नातों के बंधन से मुक्त हुए तुम भी हम भी,
अनुभव की बातें हैं अपनी अधरों पर ज्यों लानी बाबा

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