अज़ीज़ क़ैसी की रचनाएँ

अल्फ़-लैला की आख़िरी सुब्ह

फ़साना कैसे बढ़े
न कोई साहिर-ए-पज़मुर्दा सिन न सौदागर
न चीन से कोई आए न बाख़्तर से कोई
बलख़ के शहर में और क़ाफ़ के परिस्ताँ में
कोई परी न परी-ज़ाद कौन आएगा
फ़साना कैसे बढ़े

विलायतों के फ़रिस्ताद-गान-ए-इश्क़ तो क्या
कनार-ए-बहर पे कज़्ज़ाक भी नहीं कोई
अज़ा-कुनिंदा-ए-शब है न है पयामी-ए-सुब्ह
न दश्त-ए-रह-ज़दगाँ में है सब्ज़-पोश कोई
न देवता है न अवतार है न पैग़म्बर
फ़साना कैसे बढ़े
हज़ारों रातों की वो दास्ताँ तमाम हुई
हज़ारों क़िस्सों की वो रात ख़त्म पर आई
बहाना कोई नहीं
बस अब माल-ए-शिकस्त-ए-बयाँ की बारी है
फ़साना कोई नहीं अब तो जाँ की बारी है

अज़ल-अबद 

अपना तो अबद है कुंज-ए-मरक़द
जब जिस्म सुपुर्द-ए-ख़ाक हो जाए
मरक़द भी नहीं वो आख़िरी साँस
जब क़िस्सा-ए-ज़ीस्त पाक हो जाए
वो साँस नहीं शिकस्त-ए-उम्मीद
जब दामन-ए-दिल ही चाक हो जाए
उम्मीद नहीं बस एक लम्हा
जो आतिश-ए-ग़म से ख़ाक हो जाए
हस्ती की अबद-गह में क़ज़ा में
कुछ फ़र्क़ नहीं फ़ना बक़ा में
ख़ाकिस्तर-ए-ख़्वाब शोला-ए-ख़्वाब
ये अपना अज़ल है वो अबद है
वो शोला तो कब का मर चुका है
ये जिस्म इक नाश-ए-बे-लहद है
मरती है हयात लम्हा लम्हा
हर साँस इक ज़िंदगी की हद है

रूहों को दवाम देने वालो
जिस्मों की सबील कुछ निकालो
शोला कोई मुस्तआर दे दो
या लाश को अब मज़ार दे दो

ब-नाम-ए-इब्न-ए-आदम 

अब तक तुम से कहा गया है
इंसाँ फ़ानी मौत अटल है
जीवन जल है
जिस की धार कभी न टूटे
जो आता है मर जाता है
जो आएगा मर जाएगा

मैं तुम से कहने आया हूँ
इंसाँ ला-फ़ानी है अमर है
मौत तग़य्यगुर का इक पल है
जीवन जल है
जिस का कोई अंत नहीं है
रह जाए तो ये सागर है
और मर जाए तो बादल है

दाद-गर 

मैं जानता हूँ कि आँसू फ़ना का लम्हा है
उसे तिरी निगह-ए-जावेदाँ से रब्त नहीं
मैं जानता हूँ कि तू भी शिकार-ए-दौराँ है
मता-ए-जाँ के सिवा इस क़िमार ख़ाने में
हर एक नक़्द-ए-नफ़्स हार का पशीमाँ है

मगर ये रब्त है कैसा ये क्या तअल्लुक़ है
कि जब भी हार के उट्ठा जहाँ की महफ़िल से
उमंग हँस के कलेजे पे चोट खाने की
हुजूम-ए-दुश्ना-ओ-ख़ंजर में मुस्कुराने की
उमंद दाओ पे जान-ए-हज़ीं लगाने की
न जाने क्यूँ मिरे दिल में ख़याल आया है
कि जा के तुझ से शिकायत करूँ ज़माने की

एक मंज़र एक आलम

दिन ढले
मंदिरों के कलस मस्जिदों के मनारे की छतें
सोने चाँदी के पानी से धुलने लगे
क़ुल्ला-ए-कोह से चश्म-ए-नज़्ज़ारा लेकिन बड़ी दूर तक
पिघले सोने की चादर के नीचे तड़पता हुआ
गहरी ज़ुल्मत का एक बहर-ए-ज़ख़्खारा भी
देखती रह गई
कैसा मंज़र है ये
मैं अभी उम्र के ढलते सूरज की दुनिया नहीं
फिर भी मेरे सुनहरे दोपहरे तबस्सुम के नीचे कहीं
आँसुओं का समुंदर न बेचैन हो
नीचे आओ ज़रा रिफ़अत-ए-बाम से
और देखो कभी
कैसा आलम है ये

फ़स्ल-ए-राएगाँ 

हर बरस इन दिनों मैं कहीं भी रहूँ
सिलसिले अब्र के
सुस्त-रौ तेज़-रौ क़ाफ़िले अब्र के
यूँही आते हैं क़ुलज़ुम लुटाते हुए
यूँही जाते हैं ये उन का दस्तूर है
लेकिन अब के बरस
मैं अकेला सर-ए-दश्त तिश्ना खड़ा
उन को रह रह के आवाज़ देता रहा
मुझ को भी साथ लेते चलो
क़ाफ़िला छुट गया है मिरा

सिलसिले अब्र के
क़ाफ़िले अब्र के
यूँही आते रहे
यूँही जाते रहे
कब से आँखों को हसरत है बरसात ही

कावाक

सब आँखें टाँगों में जड़ी है
रीढ़ की हड्डी के मनकों में कान लगे हैं
नाफ़ के ऊपर रोएँ रोएँ में एक ज़बाँ है
पतलूनें सारी आवाज़ें सुन लेती हैं
दो पतलूनें सारी आवाज़ें सुन लेती हैं
दो पतलूनें झगड़ रही हैं
‘‘इतनी क़ीमत क्यूँ लेती हो तुम में ऐसी क्या ख़ूबी है’’
‘‘कैसे गाह हो तुम आख़िर मोल बदन का दे सकते हो
पति-व्रता को मोल तुम्हारे पास नहीं है
चुस्त नुकीला ब्रज़िअर ये चीख़ रहा है
शर्म नहीं आते कुत्तों को चर्च के आगे खड़े हुए हैं
रूस्तम ठर्रा पिए खड़ा है बस-स्टॉप की छत के नीचे
और सोहराब से पूछ रहा है
‘‘बेटा माल कहाँ मिलता है’’
मंदिर की चौखट पर बैठी अंधी आँखें
आते जाते औतारों की ख़ुफ़िया जेबें ताक रही हैं
हस्पताल के ऊँचे नीचे ज़ीनों पर इक इक मुर्दे को
गाँधी जी दोनों हाथों से इंजेक्शन देते फिरते हैं
वॉशिंगटन वियतनाम में बैठा ब्रह्म-पुत्र के पानी को व्हिस्की के जाम में घोल रहा है
लंदन लंका की सड़कों पे सर निव्ढ़ाए घूम रहा है
काँगों आवार फिरता है पैरिस के गंदे चकलों में
बुध के टूटे फूटे बुत के सर पर बूढ़ा कर्गस
मुर्दों की मज्लिस में बैठा अपनी बिपता सुना रहा है
मस्जिद के साए में बैठा कम-सिन गीदड़
उस की गवाही में कहता है
बेचारा कम-सिन है उस की चोंच से अब तक
दूध की ख़ुश्बू सी आती है’’
ऊपर नीले खुले गगन में
एक कबूतर अपनी चोंच में इक ज़ैतून की शाख़ लिए उड़ता फिरता है
और उस शाख़ के दोनों जानिब
एटम बम के पात लगे हैं
इंसाँ का दाया बाज़ूँ इक बर्ग-ए-ख़िज़ाँ की तरह लरज़ कर टूट रहा है
और उस के बाएँ बाज़ू पर कोह-ए-हिमालया धरा हुआ है
जाने फिर भी वो तल्वार की धार पे कैसे चल सकता हूँ
मैं इस भीड़ में चौराहे पर तन्हा बैठा सोच रहा हूँ
दुनिया इस्राफ़ील के पहले सूर के बाद यूँही लगती है
‘‘गैस के कमरे’’ में शायद यूँही होता है
पोप पाल की टोपी मेरे भेजे में धँसती जाती है

मैं !

मैं जीता हूँ आईनों में
आईने ग़म-ख़ाने हैं
मेरा अक्स बना लेते हैं अपनी अपनी मर्ज़ी से
मैं जीता हूँ कुछ सीनों में
सीने आईना-ख़ाने हैं
मेरा नक़्श बना लेते हैं अपनी अपनी मर्ज़ी से
मैं जीता हूँ मिट्टी पर
मिट्टी जिस से घर बनते हैं
जिस से क़ब्रें बनती हैं
जिस का ज़र्रा ज़र्रा औरों का है
उन का जिन में मैं हूँ
जो मुझ में हैं
अक्स कहा करते हैं देखो तुम ऐसे हो
नक़्श कहा करते हैं ऐसे बन सकते हो
ज़र्रे कहते हैं तुम ऐसे बन जाओगे

तुम बतला सकते हो आख़िर मैं क्या हूँ
तुम क्या बतलाओगे
तुम ख़ुद आईना-ख़ाना हो
ग़म-ख़ाना हो
घर हो
क़ब्र हो
तुम ख़ुद मैं हो

रसूल-ए-काज़िब 

रसूल-ए-मस्लूब के दो हज़ार बरसों के बाद ये वाक़िआ हुआ
ये उस ज़माने की बात है जब रसूल-ए-ख़ुर्शीद रास-उल-अफ़्लाक पर चमकता था
वो इक ज़मिस्ताँ की नीम-शब का समाँ था
वो नीम-शब इक रक़ीक़ चादर न जाने कब से ज़मीं के मुरदार कालबद पर
पड़ी हुई है और उस के मस्मूम रौज़नों से गले सडे जिस्म का तअफ़्फ़ुन उबल रहा है
शजर हजर धुँद के कफ़न में छुपी हुई ख़ामोशी के सीने में चुभ रहे थे
अनासिर-ए-वक़्त मुंजमिद थे
तमाम रूहें फ़िशार-ए-मरक़द में मुब्तिला थीं
और ऐसे हंगाम में इक आवाज़-ए-नूर अफ़्गन
ज़ुहूर-ए-ख़ुर्शीद की बशारत से दश्त ओ दर को जला रही थी
हज़ार-हा शब-गज़ीदगाँ के हुजूम से मैं ने उस को देखा
वो ख़ून-ए-आदम में अपनी ज़िंदा ख़िजाँ-ज़दा उँगलियाँ डुबोए खड़ा था

हुजूम से एक इक गुनहगार को बुलाता और उस के माथे पे कलमा-ए-सुब्ह लिख रहा था
तमाम मुर्दे ख़िजाँ-ज़दा उँगलियों के छुने से जागते थे
ग़ुनाहगार-ए-नफ़स था मैं भी
उम्मीद-वार-ए-शफ़ा था मैं भी
फिर उस ज़मिस्ताँ की नीम-शब में हज़ार लम्हात शाक़ गुज़रे
और एक लम्हे ने मेरे ज़ख्म-ए-जिगर को छू कर कहा
मदावा-ए-ग़म की साअत क़रीब है
सज्दा-रेज़ हो जा
ये उस ज़माने की बात है जब ज़मीन के बे-शुमार मुर्दे लहू का बपस्तिमा ले रहे थे
लहू का बपस्तिमा ले रहे हैं
रसूल-ए-ख़ुर्शीद की सदा भी तो मर गई थी कोहर में वो खो गया और
उसी ज़मिस्ताँ की नीम-शब में ख़बर मिली है
उसी शबिस्तान-ए-नूर-ओ-निकहत में बे-कफ़न लाश पर वो बैठा हुआ है
अपने ख़िज़ाँ-ज़दा हाथ से किसी के लहू की तक़्तीर कर रहा है
और अपने कासे का भर रहा है
ख़बर मिली है
लहू वो ख़ुर्शीद का लहू है

आपको देखकर देखता रह गया

आपको देखकर देखता रह गया
क्या कहूँ और कहने को क्या रह गया

उनकी आँखों में कैसे छलकने लगा
मेरे होंटों पे जो माजरा रह गया

ऐसे बिछड़े सभी राह के मोड़ पर
आख़री हमसफ़र रास्ता रह गया

सोच कर आओ कू-ए-तमन्ना है ये
जानेमन जो यहाँ रह गया रह गया

दर्द के हीले ग़म के बहाने

तेरे देस में जाने क्या हो
रुत कैसी हो कैसी हवा हो
लेकिन मेरे देस में अबके
अब्र बहुत खुल कर बरसा है
जंगल, पर्बत, शहर, बयाँबाँ
वीराने, मयख़ाने, गलियाँ
हर पैरहन भीग चुका है

रातें कितनी बार न जानें
जाम लिए आई थीं लेकिन
जाम ने तेरी बात नहीं की
रात ने तेरे ग़म न जगाए
पलकों पर एक बून्द न आई

पीले-पीले अब्र भी अबके
तेरे गेसू भूल गया था
पीली-पीली सर्द हवाएँ
मेरे दामन जला न सकी थीं

सूरज ने अब्र की चौखट पर
तेरे रूख़सारों की ज़ियाँ को
जाने क्यों आवाज़ नहीं दी
किस धुन में था चाँद न जाने
तेरा माथा याद ना आया

आबादी को तेरी आँखें
वीरानों को तेरा तबस्सुम
अब के कुछ भी याद नहीं है
मैं कुछ इतना ख़ुश तो नहीं था
न जाने क्यूँ अब के बरखा रुत
क्यूँ इतनी अनजान गई है

सोच रहा हूँ शायद दिल को
और भी कुछ जीने के बहाने
दर्द दे जहाँ ने बख़्श दिए हैं
और मैं इस आबाद जहाँ में
तेरा चेहरा भूल गया हूँ

हर शाम जलते जिस्मों का गाढ़ा धुआँ है शहर

हर शाम जलते जिस्मों का गाढ़ा धुआँ है शहर ।
मरघट कहाँ है कोई बताओ कहाँ है यह शहर ।

फुटपाथ पर जो लाश पड़ी है उसी की है,
जिस गाँव को यकीं था की रोज़ी-रसाँ है शहर ।

मर जाइए तो नाम-ओ-नसब पूछता नहीं,
मुर्दों के सिलसिले में बहुत मेहरबाँ है शहर ।

रह-रह कर चीख़ उठते हैं सन्नाटे रात को,
जंगल छुपे हुए हैं वहीं पर जहाँ है शहर ।

भूचाल आते रहते हैं और टूटता नहीं,
हम जैसे मुफ़लिसों की तरह सख़्त जाँ है शहर।

लटका हुआ ट्रेन के डिब्बों में सुबह-ओ-शाम,
लगता है अपनी मौत के मुँह में रवाँ है शहर ।

उलझाव का मज़ा भी तेरी बात ही में था 

उलझाव का मज़ा भी तेरी बात ही में था ।
तेरा जवाब तेरे सवालात ही में था ।

साया किसी यक़ीं का भी जिस पर न पड़ सका,
वो घर भी शहर-ए-दिल के मुज़ाफ़ात (पास में) ही में था ।

इलज़ाम क्या है ये भी न जाना तमाम उम्र,
मुल्ज़िम तमाम उम्र हवालात ही में था ।

अब तो फ़क़त बदन की मुरव्वत है दरमियाँ,
था रब्त (रिश्ता) जान-ओ-दिल का तो शुरूआत ही में था ।

मुझ को तो क़त्ल करके मनाता रहा है जश्न,
वो ज़िलिहाज़ (आदरणीय) शख़्स मेरी ज़ात ही में था ।

उन्हें सवाल ही लगता है 

उन्हें सवाल ही लगता है मेरा रोना भी ।
अजब सज़ा है जहाँ में ग़रीब होना भी ।

ये रात भी है ओढ़ना-बिछौना भी,
इस एक रात में है जागना भी सोना भी ।

अजीब शहर है कि घर भी रास्तों की तरह,
कैसा नसीब है रातों को छुप के रोना भी ।

खुले में सोएँगे मोतिया के फूलों से,
सजा लो ज़ुल्फ़ बसा लो ज़रा बिछौना भी ।

अज़ीज़ कैसी यह सौदागरों की बस्ती है,
गराँ है दिल से यहाँ काठ का खिलौना भी।

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