अज़ीज़ तमन्नाई की रचनाएँ

हैयूला

मह ओ साल के ताने बाने को
ज़र्रीं शुआओं की गुल-कारियाँ
मेरी नज़रों ने बख़्शी हैं
आफ़ाक़ के ख़द्द-ओ-ख़ाल-ए-बहार-आफ़रीं में
मिरे ख़ूँ की सौग़ात शामिल है
हर वुसअत-ए-बे-कराँ में
मिरी धड़कनें गूँजती हैं

हर इक लम्हा कोई न कोई बगूला उठा
और मिरे नक़्श-ए-पा को मिटाने की धुन में चला
लेकिन आवाज़-ए-पा की गरजती घटाओं से
टकरा के दश्त-ए-ख़मोशी में
गुम हो गया
हर इक गाम सम्तों ने
संगीं शिकंजों में कसने की
हसरत को रूस्वा किया
मिरी फ़िक्र की लौ
सुमूम ओ सबा की
फ़ुसूँ-कारियों से गुरेज़ाँ
मुसलसल फ़रोज़ाँ रही
ये वो आँच है जिस की हिद्दत से
हर क़ुव्वत-ए-संग-साज़ी पिघलती रही

मगर आज मेरी अना के हैयूला में
ख़ुद-साख़्ता कुछ लकीरें उभर आई हैं
मुझ को डर है
कहीं फैलते फैलते ये लकीरें
मिरी ज़ात को पारा पारा न कर दें
अनासिर को फिर आश्कारा न कर दें

क़िस्सा-ए-दर्द 

चाँद ने मुस्कुरा कर कहा
दोस्तो
क़िस्सा-ए-दर्द छेड़े सर-ए-राह कौन
फिर भी तोर मुसिर थे
कि हम आज की शब सुनेंगे
वही अन-सुनी दास्ताँ
देर तक चाँद सोचा किया
दूर आफ़ाक़ की सम्त देखा किया
और तारों की आँखें छलकती रहीं
रात के दामन-ए-तर को
आहिस्ता आहिस्ता
लम्हों का ठंडा लहू
जज़्ब हो हो के रंगीन करता रहा
ना-गहाँ एक नादीदा ज़र्रीं रक़म
दस्त-ए-सीमीं बढ़ा और उफ़ुक़-ता-उफ़ुक़
एक जुम्बिश में खींचे हज़ारों करोड़ों तलाई ख़ुतूत
डूब कर रह गए थे सारे नुक़ूत
चश्म-ए-आफ़ाक़ से
अव्वलीं क़तरा-ए-दर्द टपका
किसी बर्ग-ए-नौ-ख़ेज़ पर
अक्स-ए-अंजाम रूख़्सार-ए-आग़ाज पर

Share