अज़ीज़ ‘नबील’ की रचनाएँ

आँखों के ग़म-कदों में उजाले

आँखों के ग़म-कदों में उजाले हुए तो हैं
बुनियाद एक ख़्वाब की डाले हुए तो हैं

तलवार गिर गई है ज़मीं पर तो क्या हुआ
दस्तार अपने सर पे सँभाले हुए तो हैं

अब देखना है आते हैं किस सम्त से जवाब
हम ने कई सवाल उछाले हुए तो हैं

ज़ख़्मी हुई है रूह तो कुछ ग़म नहीं हमें
हम अपने दोस्तों के हवाले हुए तो हैं

गो इंतिज़ार-ए-यार में आँखें सुलग उठीं
राहों में दूर दूर उजाले हुए तो हैं

हम क़ाफ़िले से बिछड़े हुए हैं मगर ‘नबील’
इक रास्ता अलग से निकाले हुए तो हैं

अज़ाब-ए-ख़्वाहिश-ए-तामीर ले

अज़ाब-ए-ख़्वाहिश-ए-तामीर ले के उतरा है
वो मेरे ख़्वाब में ताबीर ले के उतरा है

मैं ख़ाली हाथ हूँ और देखता हूँ मेरे ख़िलाफ़
मेरा अदू मेरी शमशीर ले के उतरा है

सफ़र के बोझ तले ख़ुद को खींचता हुआ दिन
मेरी हथेली पे ताख़ीर ले के उतरा है

ये कैसा दश्त है जिस की जड़ों का सन्नाटा
तमाम शहर पे ताज़ीर ले के उतरा है

लहू जमी हुई आँखों में वक़्त का पंछी
जो खो गई थी वो तस्वीर ले के उतरा है

हम तेरे ज़िक्र की मेहराब में खो

हम तेरे ज़िक्र की मेहराब में खो जाते हैं
यानी इक नश्शा-ए-नायाब में खो जाते हैं

अब समंदर भी हमें देख के डरते हैं के हम
मुस्कुराते हुए गर्दाब में खो जाते हैं

खींच लेते हैं हवाओं की रगों से पानी
जब किसी वादी-ए-बे-आब में खो जाते हैं

चंद लम्हे जो मुलाक़ात के मिलते हैं कभी
वो भी अक्सर अदब आदाब में खो जाते हैं

कोई ताबीर बता दे तो ये उक़दा खुल जाए
क्यूँ मेरे रास्ते हर ख़्वाब में खो जाते हैं

इस तरह गुम हुए हम उन की तमन्ना में ‘नबील’
जैसे कंकर किसी तालाब में खो जाते हैं

जिस तरफ़ चाहूँ पहुँच जाऊँ मसाफ़त 

जिस तरफ़ चाहूँ पहुँच जाऊँ मसाफ़त कैसी
मैं तो आवाज़ हूँ आवाज़ की हिजरत कैसी

सुनने वालों की समाअत गई गोयाई भी
क़िस्सा-गो तू ने सुनाई थी हिकायत कैसी

हम जुनूँ वाले हैं हम से कभी पूछो प्यारे
दश्त कहते हैं किसे दश्त की वहशत कैसी

आप के ख़ौफ़ से कुछ हाथ बढ़े हैं लेकिन
दस्त-ए-मजबूर की सहमी हुई बैअत कैसी

फिर नए साल की सरहद पे खड़े हैं हम लोग
राख हो जाएगा ये साल भी हैरत कैसी

और कुछ ज़ख़्म मेरे दिल के हवाले मेरी जाँ
ये मोहब्बत है मोहब्बत में शिकायत कैसी

मैं किसी आँख से छलका हुआ आँसू हूँ ‘नबील’
मेरी ताईद ही क्या मेरी बग़ावत कैसी

ख़ाक चेहरे पे मल रहा हूँ मैं

ख़ाक चेहरे पे मल रहा हूँ मैं
आसमाँ से निकल रहा हूँ मैं

चुपके चुपके वो पढ़ रहा है मुझे
धीरे धीरे बदल रहा हूँ मैं

मैं ने सूरज से दोस्ती की है
शाम होते ही ढल रहा हूँ मैं

एक आतिश-कदा है ये दुनिया
जिस में सदियों से जल रहा हूँ मैं

रास्तों ने क़बाएँ सी ली हैं
अब सफ़र को मचल रहा हूँ मैं

अब मेरी जुस्तुजू करे सहरा
अब समंदर पे चल रहा हूँ मैं

ख़्वाब आँखों में चुभ रहे थे ‘नबील’
सो ये आँखें बदल रहा हूँ मैं

मैं दस्त-रस से तुम्हारी निकल

मैं दस्त-रस से तुम्हारी निकल भी सकता हूँ
ये सोच लो के मैं रस्ता बदल भी सकता हूँ

तुम्हारे बाद ये जाना के मैं जो पत्थर था
तुम्हारे बाद किसी दम पिघल भी सकता हूँ

क़लम है हाथ में किरदार भी मेरे बस में
अगर मैं चाहूँ कहानी बदल भी सकता हूँ

मेरी सरिश्त में वैसे तो ख़ुश्क दरिया है
अगर पुकार ले सहरा उबल भी सकता हूँ

उसे कहो के गुरेज़ाँ न यूँ रहे मुझ से
मैं एहतियात की बारिश में जल भी सकता हूँ

न जाने कैसी महरूमी पस-ए-रफ़्तार

न जाने कैसी महरूमी पस-ए-रफ़्तार चलती है
हमेशा मेरे आगे आगे इक दीवार चलती है

वो इक हैरत के मैं जिस का तआक़ुब रोज़ करता हूँ
वो इक वहशत मेरे हम-राह जो हर बार चलती है

निकल कर मुझ से बाहर लौट आती है मेरी जानिब
मेरी दीवानगी अब सूरत-ए-परकार चलती है

अजब अंदाज़-ए-हम-सफ़री है ये भी क़ाफ़िले वालो
हमारे दरमियाँ इक आहिनी दीवार चलती है

ग़ज़ल कहना भी अब इक कार-ए-बे-मसरफ़ सा लगता
नया कुछ भी नहीं होता बस इक तकरार चलती है

‘नबील’ इस इश्क़ में तुम जीत भी जाओ तो क्या होगा
ये ऐसी जीत है पहलू में जिस के हार चलती है

सुब्ह और शाम के सब रंग हटाए 

सुब्ह और शाम के सब रंग हटाए हुए हैं
अपनी आवाज़ को तस्वीर बनाए हुए हैं

अब हमें चाक पे रख या ख़स-ओ-ख़ाशाक समझ
कूज़ा-गर हम तेरी आवाज़ पे आए हुए हैं

हम नहीं इतने तही-चश्म के रो भी न सकें
चंद आँसू अभी आँखों में बचाए हुए हैं

हम ने ख़ुद अपनी अदालत से सज़ा पाई है
ज़ख़्म जितने भी हैं अपने ही कमाए हुए हैं

ऐ ख़ुदा भेज दे उम्मीद की इक ताज़ा किरन
हम सर-ए-दस्त-ए-दुआ हाथ उठाए हुए हैं

हर नया लम्हा हमें रौंद के जाता है के हम
अपनी मुट्ठी में गया वक़्त छुपाए हुए हैं

एक मुद्दत हुई तुम आए न पैग़ाम कोई
फिर भी कुछ यूँ है के हम आस लगाए हुए हैं

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