‘अज़ीज़’ वारसी की रचनाएँ

आख़िर-ए-शब वो तेरी अँगड़ाई

आख़िर-ए-शब वो तेरी अँगड़ाई
कहकशाँ भी फलक पे शरमाई

आप ने जब तवज्जोह फ़रमाई
गुलशन-ए-ज़ीस्त में बहार आई

दास्ताँ जब भी अपनी दोहराई
ग़म ने की है बड़ी पज़ीराई

सजदा-रेज़ी को कैसे तर्क करूँ
है यही वजह-ए-इज़्ज़त-अफ़ज़ाई

तुम ने अपना नियाज़-मंद कहा
आज मेरी मुराद बर आई

आप फ़रमाइए कहाँ जाऊँ
आप के दर से है शनासाई

उस की तक़दीर में है वस्ल की शब
जिस ने बर्दाश्त की है तन्हाई

रात पहलू में आप थे बे-शक
रात मुझ को भी ख़ूब नींद आई

मैं हूँ यूँ इस्म-ब-मुसम्मा ‘अज़ीज़’
वारिश-ए-पाक का हूँ शैदाई

दिल में हमारे अब कोई अरमाँ नहीं रहा 

दिल में हमारे अब कोई अरमाँ नहीं रहा
वो एहतिमाम-ए-गर्दिश-ए-दौराँ नहीं रहा

पेश-ए-नज़र वो ख़ुस्रव-ए-ख़ूबाँ नहीं रहा
मेरी हयात-ए-शौक़ का सामाँ नहीं रहा

समझा रहा हूँ यूँ दिल-ए-मुज़्तर को हिज्र में
वो कौन है जो ग़म से परेशाँ नहीं रहा

देखा है मैं ने गेसू-ए-काफ़िर का मोजज़ा
तार-ए-नफ़स भी मेरा मुसलमाँ नहीं रहा

अश्कों के साथ साथ कुछ अरमाँ निकल गए
बे-चैनियों का दिल में वो तूफ़ाँ नहीं रहा

ऐ चारा-साज़ सई-ए-मुसलसल फ़ुज़ूल है
तेरा मरीज़ क़ाबिल-ए-दरमाँ नहीं रहा

उस की हयात उस के लिए मौत ऐ ‘अज़ीज़’
जिस पर के उस निगाह का एहसाँ नहीं रहा

हर जगह आप ने मुमताज़ बनाया है मुझे 

हर जगह आप ने मुमताज़ बनाया है मुझे
वाक़ई क़ाबिल-ए-एज़ाज़ बनाया है मुझे

जिस पर मर मिटने की हर एक क़सम खाता है
वही शोख़ी वही अंदाज़ बनाया है मुझे

वाक़ई वाक़िफ़-ए-इदराक-ए-दो-आलम तुम हो
तुम ने ही वाक़िफ़-ए-हर-राज़ बनाया है मुझे

जिस फ़साने का अभी तक कोई अंजाम नहीं
उस फ़साने का ही आग़ाज़ बनाया है मुझे

कभी नग़मा हूँ कभी धुन हूँ कभी लै हूँ ‘अज़ीज़’
आप ने कितना हसीं साज़ बनाया है मुझे

इक हम के उन के वास्ते महव-ए-फ़ुग़ाँ रहे 

इक हम के उन के वास्ते महव-ए-फ़ुग़ाँ रहे
इक वो के दस्त-ए-शौक़ से दामन-कशाँ रहे

दिल में यही ख़लिश रहे सोज़-ए-निहाँ रहे
लेकिन मज़ाक़-ए-इश्क़-ओ-मोहब्बत जवाँ रहे

इक वक़्त था के दिल को सुकूँ की तलाश थी
और अब ये आरज़ू है के दर्द-ए-निहाँ रहे

अहल-ए-वफ़ा पर आईं हज़ारों मुसीबतें
ये सब रहीन-ए-गर्दिश-ए-हफ़्त-आसमाँ रहे

उन का शबाब हर गुल-ए-नौरस से फट पड़ा
छुपने के बा-वजूद वो हर-सू अयाँ रहे

हम ने हज़ार तरह किया उन को मुतमइन
हर बात पर वो हम से मगर बद-गुमाँ रहे

अल्लाह रे तल्ख़-कामी-ए-उल्फ़त की इंतिहा
मुझ से मेरे ‘अज़ीज़’ भी दामन-कशाँ रहे

इतने नज़दीक से आईने को देखा न करो 

इतने नज़दीक से आईने को देखा न करो
रुख़-ए-ज़ेबा की लताफ़त को बढाया न करो

दर्द ओ आज़ार का तुम मेरे मुदावा न करो
रहने दो अपनी मसीहाई का दावा न करो

हुस्न के सामने इज़हार-ए-तमन्ना न करो
इश्क़ इक राज़ है इस राज़ को इफ़्शा न करो

अपनी महफ़िल में मुझे ग़ौर से देखा न करो
मैं तमाशा हूँ मगर तुम तो तमाशा न करो

सारी दुनिया तुम्हें कह देगी तुम्हीं हो क़ातिल
देखो मुझ को ग़लत अंदाज़ से देखा न करो

कैसे मुमकिन है के हम दोनों बिछड़ जाएँगे
इतनी गहराई से हर बात को सोचा न करो

तुम पे इल्ज़ाम न आ जाए सफ़र में कोई
रास्ता कितना ही दुश्वार हो ठहरा न करो

वो कोई शाख़ हो मिज़राब हो या दिल हो ‘अज़ीज़’
टूटने वाली किसी शै का भरोसा न करो

जहाँ में हम जिसे भी प्यार के क़ाबिल समझते हैं 

जहाँ में हम जिसे भी प्यार के क़ाबिल समझते हैं
हक़ीक़त में उसी को ज़ीस्त का हासिल समझते हैं

मिला करता है दस्त-ए-ग़ैब से मख़्सूस बंदों को
किसी के दर्द को हम काएनात-ए-दिल समझते हैं

जिन्हें शौक़-ए-तलब ने क़ुव्वत-ए-बाज़ू अता की है
तलातुम-ख़ेज़ तुग़्यानी को वो साहिल समझते हैं

सितम ऐसे किये तमसील जिन की मिल नहीं सकती
मगर वो इस जफ़ा को अव्वलीं मंज़िल समझते हैं

मोहब्बत लफ़्ज़ तो सादा सा है लेकिन ‘अज़ीज़’ इस को
मता-ए-दिल समझते थे मता-ए-दिल समझते हैं

ख़ुशी महसूस करता हूँ न ग़म महसूस करता हूँ 

ख़ुशी महसूस करता हूँ न ग़म महसूस करता हूँ
बहर-आलम तुम्हारा ही करम महसूस करता हूँ

अलम अपना तो दुनिया में सभी महसूस करते हैं
मगर मैं हूँ के दुनिया का अलम महसूस करता हूँ

बस इतनी बात पर मोमिन मुझे काफ़िर समझते हैं
दर-ए-जानाँ को मेहराब-ए-हरम महसूस करता हूँ

अभी साक़ी का फ़ैज़-ए-आम शायद ना-मुकम्मल है
अभी कुछ इम्तियाज़-ए-बेश-ओ-कम महसूस करता हूँ

हरम वालों को अहल-ए-बुत-कदा कुछ भी समझते हों
मगर मैं बुत-कदे को भी हरम महसूस करता हूँ

मेरी तक़दीर से पहले संवारना जिन का मुश्किल है
तेरी ज़ुल्फ़ों में कुछ ऐसे भी ख़म महसूस करता हूँ

‘अज़ीज़’-ए-वारसी ये भी किसी का मुझ पे एहसान है
के हर महफ़िल में अब अपना भरम महसूस करता हूँ

शीशा लब से जुदा नहीं होता

शीशा लब से जुदा नहीं होता
नश्शा फिर भी सिवा नहीं होता

दर्द-ए-दिल जब सिवा नहीं होता
इश्क़ में कुछ मज़ा नहीं होता

हर नज़र सुर्मगीं तो होती है
हर हसीं दिल-रुबा नहीं होता

हाँ ये दुनिया बुरा बनाती है
वरना इंसाँ बुरा नहीं होता

असर-ए-हाज़िर है जब क़यामत-ख़ेज़
हश्र फिर क्यूँ बपा नहीं होता

पारसा रिंद हो तो सकता है
रिंद क्यूँ पारसा नहीं होता

शेर के फ़न में और बयाँ में ‘अज़ीज़’
मोमिन अब दूसरा नहीं होता

सोज़िश-ए-ग़म के सिवा काहिश-ए-फ़ुर्क़त के सिवा

सोज़िश-ए-ग़म के सिवा काहिश-ए-फ़ुर्क़त के सिवा
इश्क़ में कुछ भी नहीं दर्द की लज़्ज़त के सिवा

दिल में अब कुछ भी नहीं उन की मोहब्बत के सिवा
सब फ़साने हैं हक़ीक़त में हक़ीक़त के सिवा

कौन कह सकता है ये अहल-ए-तरीक़त के सिवा
सारे झगड़े हैं जहाँ में तेरी निस्बत के सिवा

कितने चेहरों ने मुझे दावत-ए-जलवा बख़्शी
कोई सूरत न मिली आप की सूरत के सिवा

ग़म-ए-उक़बा ग़म-ए-दौराँ ग़म-ए-हस्ती की क़सम
और भी ग़म हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा

बज़्म-ए-जानाँ में अरे ज़ौक़-ए-फ़रावाँ अब तक
कुछ भी हासिल न हुआ दीदा-ए-हैरत के सिवा

वो शब-ए-हिज्र वो तारीक फ़ज़ा वो वहशत
कोई ग़म-ख़्वार न था दर्द की शिद्दत के सिवा

मोहतसिब आओ चलें आज तो मै-ख़ाने में
एक जन्नत है वहाँ आप की जन्नत के सिवा

जो तही-दस्त भी है और तही-दामन भी
वो कहाँ जाएगा तेरे दर-ए-दौलत के सिवा

जिस ने क़ुदरत के हर इक़दाम से टक्कर ली है
वो पशेमाँ न हुआ जब्र-ए-मशिय्यत के सिवा

मुझ से ये पूछ रहे हैं मेरे अहबाब ‘अज़ीज़’
क्या मिला शहर-ए-सुख़न में तुम्हें शोहरत के सिवा

तेरी महफ़िल में फ़र्क़-ए-कुफ़्र-ओ-ईमाँ कौन देखेगा

तेरी महफ़िल में फ़र्क़-ए-कुफ़्र-ओ-ईमाँ कौन देखेगा
फ़साना ही नहीं कोई तो उनवाँ कौन देखेगा

यहाँ तो एक लैला के न जाने कितने मजनूँ हैं
यहाँ अपना गिरेबाँ अपना दामाँ कौन देखेगा

बहुत निकले हैं लेकिन फिर भी कुछ अरमान हैं दिल में
ब-जुज़ तेरे मेरा ये सोज़-ए-पिन्हाँ कौन देखेगा

अगर परदे की जुम्बिश से लरज़ता है तो फिर ऐ दिल
तजल्ली-ए-जमाल-ए-रू-ए-जानाँ कौन देखेगा

अगर हम से ख़फ़ा होना है तो हो जाइए हज़रत
हमारे बाद फिर अँदाज़-ए-यज़्दाँ कौन देखेगा

मुझे पी कर बहकने में बहुत ही लुत्फ़ आता है
न तुम देखोगे तो फिर मुझ को फ़रहाँ कौन देखेगा

जिसे कहता है इक आलम ‘अज़ीज़’ वारिस-ए-आलम
उसे आलम में हैरान ओ परेशाँ कौन देखेगा

तेरी तलाश में निकले हैं तेरे दीवाने 

तेरी तलाश में निकले हैं तेरे दीवाने
कहाँ सहर हो कहाँ शाम हो ख़ुदा जाने

हरम हमीं से हमीं से हैं आज बुत-ख़ाने
ये और बात है दुनिया हमें न पहचाने

हरम की राह में हाइल नहीं हैं बुत-ख़ाने
हरम से अहल-ए-हरम हो गए हैं बेगाने

ये ग़ौर तू ने किया भी के हश्र क्या होगा
तड़प उट्ठे जो क़यामत में तेरे दीवाने

‘अज़ीज़’ अपना इरादा कभी बदल न सका
हरम की राह में आए हज़ार बुत-ख़ाने

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