‘अदीम’ हाशमी की रचनाएँ

आया हूँ संग ओ ख़िश्त के अम्बार देख कर 

आया हूँ संग ओ ख़िश्त के अम्बार देख कर
ख़ौफ़ आ रहा है साया-ए-दीवार देख कर

आँखें खुली रही हैं मेरी इंतिज़ार में
आए न ख़्वाब दीद-ए-बे-दार देख कर

ग़म की दुकान खोल के बैठा हुआ था मैं
आँसू निकल पड़े हैं ख़रीदार देख कर

क्या इल्म था फिसलने लगेंगे मेरे क़दम
मैं तो चला था राह को हम-वार देख कर

हर कोई पार-साई की उम्दा मिसाल था
दिल ख़ुश हुआ है एक गुनह-गार देख कर.

बड़ा वीरान मौसम है कभी मिलने चले आओ

बड़ा वीरान मौसम है कभी मिलने चले आओ
हर इक जानिब तेरा ग़म है कभी मिलने चले आओ

हमारा दिल किसी गहरी जुदाई के भँवर में है
हमारी आँख भी नम है कभी मिलने चले आओ

मेरे हम-राह अगरचे दूर तक लोगों की रौनक़ है
मगर जैसे कोई कम है कभी मिलने चले आओ

तुम्हें तो इल्म है मेरे दिल-ए-वहशी के ज़ख़्मों को
तुम्हारा वस्ल मरहम है कभी मिलने चले आओ

अँधेरी रात की गहरी ख़मोशी और तनहा दिल
दिए की लौ भी मद्धम है कभी मिलने चले आओ

तुम्हारे रूठ के जाने से हम को ऐसा लगता है
मुक़द्दर हम से बरहम है कभी मिलने चले आओ

हवाओं और फूलों की नई ख़ुश-बू बताती है
तेरे आने का मौसम है कभी मिलने चले आओ

 

बस कोई ऐसी कमी सारे सफ़र में रह गई

बस कोई ऐसी कमी सारे सफ़र में रह गई
जैसे कोई चीज़ चलते वक़्त घर में रह गई

कौन ये चलता है मेरे साथ बे-जिस्म-ओ-सदा
चाप ये किस की मेरी हर रह-गुज़र में रह गई

गूँजते रहते हैं तनहाई में भी दीवार ओ दर
क्या सदा उस ने मुझे दी थी के घर में रह गई

और तो मौसम गुज़र कर जा चुका वादी के पार
बस ज़रा सी बर्फ़ हर सूखे शजर में रह गई

रात दरिया में फिर इक शोला सा चकराता रहा
फिर कोई जलती हुई कश्ती भँवर में रह गई

रात भर होता रहा है किन ख़ज़ानों का नुज़ूल
मोतियों की सी झलक हर बर्ग-ए-तर में रह गई

लौट कर आए न क्यूँ जाते हुए लम्हे ‘अदीम’
क्या कमी मेरी सदा-ए-बे-असर में रह गई

 

फ़ासले ऐसे भी होंगे ये कभी सोचा भी न था

फ़ासले ऐसे भी होंगे ये कभी सोचा भी न था
सामने बैठा था मेरे और वो मेरा न था

वो के ख़ुश-बू की तरह फैला था चार सू
मैं उसे महसूस कर सकता था छू सकता न था

रात भर पिछली ही आहट कान में आती रही
झाँक कर देखा गली में कोई भी आया न था

मैं तेरी सूरत लिए सारे ज़माने में फिरा
सारी दुनिया में मगर कोई तेरे जैसा न था

ये भी सब वीरानियाँ उस के जुदा होने से थीं
आँख धुँधलाई हुई थी शहर धुंदलाया न था

सैंकड़ों तूफ़ान लफ़्ज़ों में दबे थे ज़ेर-ए-लब
एक पत्थर था ख़ेमोशी का के जो हटता न था

याद कर के और भी तकलीफ़ होती थी ‘अदीम’
भूल जाने के सिवा अब कोई भे चारा न था

मस्लेहत ने अजनबी हम को बनाया था ‘अदीम’
वरना कब इक दूसरे को हम ने पहचाना न था

 

हम बहर-हाल दिल ओ जाँ से तुम्हारे होते 

हम बहर-हाल दिल ओ जाँ से तुम्हारे होते
तुम भी इक आध घड़ी काश हमारे होते

अक्स पानी में मोहब्बत के उतारे होते
हम जो बैठे हुए दरिया के किनारे होते

जो मह ओ साल गुज़ारे हैं बिछड़ कर हम ने
वो मह ओ साल अगर साथ गुज़ारे होते

क्या अभी बीच में दीवार कोई बाक़ी है
कौन सा ग़म है भला तुम को हमारे होते

आप तो आप हैं ख़ालिक़ भी हमारा होता
हम ज़रूरत में किसी को न पुकारे होते

साथ अहबाब के हासिद भी ज़रूरी हैं ‘अदीम’
हम सुख़न अपना सुनाते जहाँ सारे होते.

 

इक खिलौना टूट जाएगा नया मिल जाएगा

इक खिलौना टूट जाएगा नया मिल जाएगा
मैं नहीं तो कोई तुझ को दूसरा मिल जाएगा

भागता हूँ हर तरफ़ ऐसे हवा के साथ साथ
जिस तरह सच मुच मुझे उस का पता मिल जाएगा

किस तरह रोकोगे अश्कों को पस-ए-दीवार-ए-चश्म
ये तो पानी है इसे तो रास्ता मिल जाएगा

एक दिन तो ख़त्म होगी लफ़्ज़ ओ मानी की तलाश
एक दिन तो मुझ को मेरा मुद्दआ मिल जाएगा

छोड़ ख़ाली घर को आ बाहर चलें घर से ‘अदीम’
कुछ नहीं तो कोई चेहरा चाँद सा मिल जाएगा.

 

तेरे लिए चलते थे हम तेरे लिए ठहर गए

तेरे लिए चलते थे हम तेरे लिए ठहर गए
तू ने कहा तो जी उठे तू ने कहा तो मर गए

वक़्त ही जुदाई का इतना तवील हो गया
दिल में तेरे विसाल के जितने थे ज़ख़्म भर गए

होता रहा मुक़ाबला पानी का और प्यास का
सहरा उमड़ उमड़ पड़े दरिया बिफर बिफर गए

वो भी ग़ुबार-ए-ख़्वाब था हम ग़ुबार-ए-ख़्वाब थे
वो भी कहीं बिखर गया हम भी कहीं बिखर गए

कोई किनार-ए-आब-जू बैठा हुआ है सर-निगूँ
कश्ती किधर चली गई जाने किधर भँवर गए

आज भी इंतिज़ार का वक़्त हुनूत हो गया
ऐसा लगा के हश्र तक सारे ही पल ठहर गए

बारिश-ए-वस्ल वो हुई सारा ग़ुबार धुल गया
वो भी निखर निखर गया हम भी निखर निखर गए

आब मुहीत-ए-इश्क़ का बहर अजीब बहर है
तेरे तो ग़र्क़ हो गए डूबे तो पार कर गए

इतने क़रीब हो गए अपने रक़ीब हो गए
वो भी ‘अदीम’ डर गया हम भी ‘अदीम’ डर गए

उस के सुलूक पर ‘अदीम’ अपनी हयात ओ मौत है
वो जो मिला तो जी उठे वो न मिला तो मर गए.

 

तमाम उम्र की तनहाई की सज़ा दे कर

तमाम उम्र की तनहाई की सज़ा दे कर
तड़प उठा मेरा मुंसिफ़ भी फ़ैसला दे कर

मैं अब मरूँ के जियूँ मुझ को ये ख़ुशी है बहुत
उसे सुकूँ तो मिला मुझ को बद-दुआ दे कर

मैं उस के वास्ते सूरज तलाश करता हूँ
जो सो गया मेरी आँखों को रत-जगा दे कर

वो रात रात का मेहमाँ तो उम्र भर के लिए
चला गया मुझे यादों का सिलसिला दे कर

जो वा किया भी दरीचा तो आज मौसम ने
पहाड़ ढाँप दिया अब्र की रिदा दे कर

कटी हुई है ज़मीं कोह से समंदर तक
मिला है घाव ये दरिया को रास्ता दे कर

चटख़ चटख़ के जली शाख़ शाख़ जंगल की
बहुत शरार मिला आग को हवा दे कर

फिर इस के बाद पहाड़ उस को ख़ुद पुकारेंगे
तू लौट आ उसे वादी में इक सदा दे कर

सुतून-ए-रेग न ठहरा ‘अदीम’ छत के तले
मैं ढह गया हूँ ख़ुद अपने को आसरा दे कर.

 

राहत-ए-जाँ से तो ये दिल का वबाल अच्छा है 

राहत-ए-जाँ से तो ये दिल का वबाल अच्छा है
उस ने पूछा तो है इतना तेरा हाल अच्छा है

माह अच्छा है बहुत ही न ये साल अच्छा है
फिर भी हर एक से कहता हूँ के हाल अच्छा है

तेरे आने से कोई होश रहे या न रहे
अब तलक तो तेरे बीमार का हाल अच्छा है

ये भी मुमकिन है तेरी बात ही बन जाए कोई
उसे दे दे कोई अच्छी सी मिसाल अच्छा है

दाएँ रुख़्सार पे आतिश की चमक वजह-ए-जमाल
बाएँ रुख़्सार की आग़ोश में ख़ाल अच्छा है

आओ फिर दिल के समंदर की तरफ़ लौट चलें
वही पानी वही मछली वही जाल अच्छा है

कोई दीनार न दिरहम न रियाल अच्छा है
जो ज़रूरत में हो मौजूद वो माल अच्छा है

क्यूँ परखते हो सवालों से जवाबों को ‘अदीम’
होंट अच्छे हों तो समझो के सवाल अच्छा है.

 

सर-ए-सहरा मुसाफ़िर को सितारा याद रहता है

सर-ए-सहरा मुसाफ़िर को सितारा याद रहता है
मैं चलता हूँ मुझे चेहरा तुम्हारा याद रहता है

तुम्हारा ज़र्फ़ है तुम को मोहब्बत भूल जाती है
हमें तो जिस ने हँस कर भी पुकारा याद रहता है

मोहब्बत में जो डूबा हो उसे साहिल से क्या लेना
किसे इस बहर में जा कर किनारा याद रहता है

बहुत लहरों को पकड़ा डूबने वाले के हाथों ने
यही बस एक दरिया का नज़ारा याद रहता है

सदाएँ एक सी यकसानियत में डूब जाती हैं
ज़रा सा मुख़तलिफ़ जिस ने पुकारा याद रहता है

मैं किस तेज़ी से ज़िंदा हूँ मैं ये तो भूल जाता हूँ
नहीं आना है दुनिया में दोबारा याद रहता है.

 

कुछ हिज्र के मौसम ने सताया नहीं इतना 

कुछ हिज्र के मौसम ने सताया नहीं इतना
कुछ हम ने तेरा सोग मनाया नहीं इतना

कुछ तेरी जुदाई की अज़िय्यत भी कड़ी थी
कुछ दिल ने भी ग़म तेरा मनाया नहीं इतना

क्यूँ सब की तरह भीग गई हैं तेरी पलकें
हम ने तो तुझे हाल सुनाया नहीं इतना

कुछ रोज़ से दिल ने तेरी राहें नहीं देखीं
क्या बात है तू याद भी आया नहीं इतना

क्या जानिए इस बे-सर-ओ-सामानी-ए-दिल ने
पहले तो कभी हम को रुलाया नहीं इतना.

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