अनवर मिर्जापुरी की रचनाएँ

इस वास्ते दामन चाक किया शायद ये जुनूँ काम आ जाए 

इस वास्ते दामन चाक किया शायद ये जुनूँ काम आ जाए
दीवाना समझ कर ही उन के होंटों पे मेरा नाम आ जाए

मैं ख़ुश हूँ अगर गुलशन के लिए कुछ लहू काम आ जाए
लेकिन मुझ को डर है इस गुल-चीं पे न इल्ज़ाम आ जाए

ऐ काश हमारी क़िस्मत में ऐसी भी कोई शाम आ जाए
इक चाँद फलक पर निकला हो इक चाँद सर-ए-शाम आ जाए

मय-ख़ाना सलामत रह जाए इस की तो किसी को फ़िक्र नहीं
मय-ख़्वार हैं बस इस ख़्वाहिश में साक़ी पे कुछ इल्ज़ाम आ जाए

पीने का सलीका कुछ भी नहीं इस पर है ये ख़्वाहिश है रिंदों की
जिस जाम पे हक़ है साकी का हाथों में वही जाम आ जाए

इस वास्ते ख़ाक-ए-परवाना पर शमा बहाती है आँसू
मुमकिन है वफ़ा के क़िस्से में उस का भी कहीं नाम आ जाए

अफ़्साना मुकम्मल है लेकिन अफ़्साने का उनवाँ कुछ भी नहीं
ऐ मौत बस इतनी मोहलत दे उन का कोई पैग़ाम आ जाए

किसी सूरत भी नींद आती नहीं मैं कैसे सो जाऊँ

किसी सूरत भी नींद आती नहीं मैं कैसे सो जाऊँ
कोई शय दिल को बहलाती नहीं मैं कैसे सो जाऊँ

अकेला पा के मुझ को याद उन की आ तो जाती जै
मगर फिर लौट कर जाती नहीं मैं कैसे सो जाऊँ

जो ख़्वाबों में मेरे आ कर तसल्ली मुझ को देती थी
वो-सूरत अब नज़र आती नहीं मैं कैसे सो जाऊँ

तुम्हीं तो हो शब-ए-ग़म में जो मेरा साथ देते हो
सितारों तुम को नींद आती नहीं मैं कैसे सो जाऊँ

जिसे अपना समझना था वो आँख अब अपनी दुश्मन है
कि ये रोने से बाज़ आती नहीं मैं कैसे सो जाऊँ

तेरी तस्वीर जो टूटे हुए दिल का सहारा थी
नज़र वो साफ़ अब आती नहीं मैं कैसे सो जाऊँ

घटा जो दिल से उठती है मिज़ा तक तो आ जाती है
मगर आँख उस को बरसाती नहीं मैं कैसे सो जाऊँ

सितारे ये ख़बर लाए की अब वो भी परीशाँ हैं
सुना है उन को नींद आती नहीं मैं कैसे सो जाऊँ

मैं नज़र से पी रहा हूँ से सामाँ बदल न जाए

मैं नज़र से पी रहा हूँ से सामाँ बदल न जाए
नु झकाओ तुम निगाहों को कहीं रात ढल न जाए

मेरे अश्क भीं है इस में ये शराब उबल न जाए
मेरा जाम छूने वाले तेरा हाथ जल न जाए

अभी रात कुछ है बाक़ी न उठा नक़ाब साक़ी
तेरा रिंद गिरते गिरते कहीं फिर सँभल न जाए

मेरी ज़िंदगी के मालिक मेरे दिल पे हाथ रखना
तेरे आने की ख़ुशी में मेरा दम निकल न जाए

मुझे फूँकने से पहले मेरा दिल निकाल लेना
ये किसी की है अमानत मेरे साथ जल न जाए

मैं तो समझा था जिस वक़्त मुझ को वो मिलेंगे तो जन्नत मिलेगी

मैं तो समझा था जिस वक़्त मुझ को वो मिलेंगे तो जन्नत मिलेगी
क्या ख़बर थी रह-ए-आशिक़ी में साथ उन के क़यामत मिलेगी

मैं नहीं जानता था कि मुझ को ये मोहब्बत की क़ीमत मिलेगी
आँसुओं का ख़ज़ाना मिलेगा चाक़-दामन की दौलत मिलेगी

फूल समझे ने थे ज़िंदगानी इस क़दर ख़ूब-सूरत मिलेगी
अश्क़ बन कर तबस्सुम मिलेगा दर्द बन कर मसर्रत मिलेगी

मेरी रूसवाइयों पे न ख़ुश हो मेरी दीवानगी को दुआ दो
तुम को जितनी भी शोहरत मिलेगी सिर्फ़ मेरी बदौलत मिलेगी

दिल हमारा न तोड़ो ख़ुदा-रा वरना खो दोगे अपना सहारा
ज़र्रे ज़र्रे में इन आईने के तुम को अपनी ही सूरत मिलेगी

उन के रूख़ से नक़ाब आज उट्ठेगी अब नज़ारों की मेराज होगी
एक मुद्दत से आज अहल-ए-ग़म को मुस्कराने की मोहलत मिलेगी

कैसे साबित क़दम वो रहेगा उस की तौबा का क्या हल होगा
जिस को सुनते हैं शैख़-ए-हरम से मय-कशीं की इजाज़त मिलेगी

रूख़ से पर्दा उठा दे ज़रा साक़िया बस अभी रंग-ए-महफ़िल बदल जाएगा 

रूख़ से पर्दा उठा दे ज़रा साक़िया बस अभी रंग-ए-महफ़िल बदल जाएगा
है जो बे-होश वो होश में आएगा गिरने वाला है जो वो सँभल जाएगा

तुम तसल्ली न दो सिर्फ़ बैठे रहो वक़्त कुछ मेरे मरने का टल जाएगा
क्या ये कम है मसीहा के रहने ही से मौत का भी इरादा बदल जाएगा

तीर की जाँ है दिल दिल जाँ तीर है तीर को यूँ न खींचो कहा मान लो
तीर खींचा तो दिल भी निकल आएगा दिल जो निकला तो दम भी निकल जाएगा

लोग समझे थे इंक़िलाब आते ही नज़्म-ए-कोहना चमन का बदल जाएगा
ये ख़बर किस को थी आतिश-ए-गुल से ही तिनका तिनका नशेमन का जल जाएगा

एक मुद्दत हुई उस को रोए हुए एक अरसा हुआ मुस्कुराए हुए
ज़ब्त-ए-ग़म का अब और उस से वादा न हो वरना बीमार का दम निकल जाएगा

अपने परदे का रखना है गर कुछ भरम सामने आना जाना मुनासिब नहीं
एक वहशी से ये छेड़ अच्छी नहीं क्या करोगे अगर ये मचल जाएगा

अपने वादे का एहसास है तो मगर देख कर तुम को आँसु उमड़ आए है
और अगर तुम को ये भी गवारा नहीं अब्र बरसे बग़ैर अब निकल जाएगा

मेरा दामन तो जल ही चुका है मगर आँच तुम पर भी आए गवारा नहीं
मेरे आँसुओं न पोंछो ख़ुदा के लिए वरना दामन तुम्हारा भी जल जाएगा

दिल में ताज़ा ग़म-ए-आशियाँ है अभी मेरे नालों से बरहम न सय्याद हो
धीरे धीरे ये आँसू भी थम जाएँगे रफ़्ता रफ़्ता ये दिल भी बहल जाएगा

मेरी फ़रियाद से वो तड़प जाएँगे मेरे दिल का मलाल इस का होगा मगर
क्या ये कम है कि वो बे-नक़ाब आएँगे मरने वाले का अरमाँ निकल जाएगा

फूल कुछ इस तरह तोड़ दे बाग़बाँ शाख़ हिलने न पाए न आवाज़ हो
वरना गुलशन पे रोनक़ न फिर आएगी दिल अगर हर किसी का दहल जाएगा

उस के हँसने में रोने का अंदाज़ है ख़ाक उड़ाने में फ़रियाद का राज़ है
उस को छेड़ों न ‘अनवर’ ख़ुदा के लिए वरना बीमार का दम निकल जाएगा

वादा-ए-शाम-ए-फ़र्दां पे ऐ दिल मुझे गर यक़ीं ही न आए तो मैं क्या करूँ 

वादा-ए-शाम-ए-फ़र्दां पे ऐ दिल मुझे गर यक़ीं ही न आए तो मैं क्या करूँ
उन की झूठी तसल्ली के तूफ़ान में नब्ज़-ए-दिल डूब जाए तो मैं क्या करूँ

मैं ने माँगी थी ये मस्जिदों में दुआ मैं जिसे चाहता हूँ वो मुझ को मिले
जो मेरा फ़र्ज़ था मैं ने पूरा किया अब ख़ुदा भूल जाए तो मैं क्या करूँ

सारे झगड़े अगर मेरे जीने के हैं तो गला घोंट दो मैं भी बे-ज़ार हूँ
मौत आब तक तो दामन बचाती रही तो भी दामन बचाए तो मैं क्या करूँ

तू न समझेगा हरगिज़ मेरे नासेहा मेरी मय-नोशियाँ मेरी बद-मस्तियाँ
मुझ पे तोहमत न रख मैं शराबी नहीं वो नज़र से पिलाए तो मैं क्या करूँ

तुम मुझे बे-वफ़ाई के ताने न दो मेरे महबूब मैं बे-वफ़ा तो नहीं
तुम भी मग़रूर हो मैं भी ख़ुद-दार हूँ आँख ख़ुद ही भर आए तो मैं क्या करूँ

यहाँ काँप जाते हैं फ़लसफ़े ये बड़ा अजीब मक़ाम है

यहाँ काँप जाते हैं फ़लसफ़े ये बड़ा अजीब मक़ाम है
जिसे अपना अपना ख़ुदा कहें उसे सज्दा करना हराम है

मेरी बे-रूख़ी से न हो ख़फ़ा मेरे नासेहा मुझे ये बता
जो नज़र से पीता हूँ मैं यहाँ वो शराब कैसे हराम है

जो पतिंगा लौ पे फ़िदा हुआ तो तड़प के शमा ने ये कहा
इसे मेरे दर्द से क्या ग़रज़ ये तो रौशनी का ग़ुलाम है

शब-ए-इंतिज़ार में बारहा मुझे ‘अनवर’ ऐसा गुमाँ हुआ
जिसे मौत कहता है ये जहाँ वो किसी के वादे का नाम है

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