‘अनवर’ साबरी की रचनाएँ

हर साँस में ख़ुद अपने न होने 

हर साँस में ख़ुद अपने न होने का गुमाँ था
वो सामने आए तो मुझे होश कहाँ था

करती हैं उलट-फेर यूँही उन की निगाहें
काबा है वहीं आज सनम-ख़ाना जहाँ था

तक़सीर-ए-नज़र देखने वालों की है वर्ना
उन का कोई जल्वा न अयाँ था न निहाँ था

बदली जो ज़रा चश्म-ए-मशीयत कोई दम को
हर सम्त बपा महशर-ए-फ़रियाद-ओ-फ़ुग़ाँ था

लपका है बगूला सा अभी उन की तरफ़ को
शायद किसी मजबूर की आहों का धुवाँ था

‘अनवर’ मेरे काम आई क़यामत में नदामत
रहमत का तक़ाज़ा मेरा हर अश्क-ए-रवाँ था.

इश्क़ मुकम्मल ख़्वाब-ए-परेशाँ 

इश्क़ मुकम्मल ख़्वाब-ए-परेशाँ
हुस्न हमा ताबीर-ए-गुरेज़ाँ

क़तरे में दरिया की समाई
दर्द-ए-दो-आलम इक दिल-ए-इंसाँ

इश्क़ बहर अंदाज़-ए-तजल्ली
लरज़ाँ लरज़ाँ रक़्साँ रक़्साँ

इश्क़ ब-रंग-ए-शोला-ओ-शबनम
सोज़िश-ए-पिंहाँ अश्क नुमायाँ

मेरी निगाह-ए-फ़िक्र में ‘अनवर’
इश्क़ फ़साना हुस्न है उर्यां

लब पे काँटों के है फ़रियाद-ओ-बुका 

लब पे काँटों के है फ़रियाद-ओ-बुका मेरे बाद
कोई आया ही नहीं आबला-पा मेरे बाद

मेरे दम तक ही रहा रब्त-ए-नसीम ओ रुख़-ए-गुल
निकहत-आमेज़ नहीं मौज-ए-सबा मेरे बाद

अब न वो रंग-ए-जबीं है न बहार-ए-आरिज़
लाला-रूयों का अजब हाल हुआ मेरे बाद

चंद सूखे हुए पत्ते हैं चमन में रक़्साँ
हाए बेगानगी-ए-आब-ओ-हवा मेरे बाद

मुँह धुलाती नहीं ग़ुँचों का उरूस-ए-शबनम
गर्द-आलूद है कलियों की क़बा मेरे बाद

आदमिय्यत-शिकनी भी तो नहीं कम ‘अनवर’
डर है कुछ और न हो इस के सिवा मेरे बाद

मुद्दतों से कोई पैग़ाम नहीं आता है 

मुद्दतों से कोई पैग़ाम नहीं आता है
जज़्बा-ए-दिल भी मेरे काम नहीं आता है

है अंदाज़-ए-तग़ाफ़ुल के दम-ए-ज़िक्र-ए-वफ़ा
याद उन को भी मेरा नाम नहीं आता है

उफ़ वो मासूम ओ हया-रेज़ निगाहें जिन पर
क़त्ल के बाद भी इल्ज़ाम नहीं आता है

काम कुछ मेरी तबाही के सिवा दुनिया में
तुझ को ऐ गर्दिश-ए-अय्याम नहीं आता है

मेहर-बाँ दीदा-ए-साक़ी को उसी पर देखा
जिस को तर्ज़-ए-तलब-ए-जाम नहीं आता है

अब है ये आलम-ए-मायूस-ए-मोहब्बत ‘अनवर’
उन के जलवों से भी आराम नहीं आता है

रहते हुए क़रीब जुदा हो गए हो तुम

रहते हुए क़रीब जुदा हो गए हो तुम
बंदा-नवाज़ जैसे ख़ुदा हो गए हो तुम

मजबूरियों को देख के अहल-ए-नियाज़ की
शायान-ए-ऐतबार-ए-जफ़ा हो गए हो तुम

होता नहीं है कोई किसी का जहाँ रफ़ीक़
उन मंज़िलों में राह-नुमा हो गए हो तुम

तन्हा तुम्हीं हो जिन की मोहब्बत का आसरा
उन बे-कसों के दिल की दुआ हो गए हो तुम

दे कर नवेद-ए-नग़मा-ए-ग़म साज़-ए-इश्क़ को
टूटे हुए दिलों की सदा हो गए हो तुम

‘अनवर’ गुनाह-गार ओ ख़ता-वार ही सही
सर-ताबा-पा अता ही अता हो गए हो तुम

तल्ख़ा ब-ग़म ख़नदा-जबीं हो के पिए 

तल्ख़ा ब-ग़म ख़नदा-जबीं हो के पिए जा
मौहूम उम्मीदों के सहारों पे जिए जा

मायूस न हो बे-रुख़ी-ए-चश्म-ए-जहाँ से
शाइस्ता-ए-एहसास कोई काम किये जा

शिकवा न कर इस दौर-ए-जुनूँ-ज़ाद का कोई
तक़दीर-ए-ख़िरद-सोज़ को इल्ज़ाम दिए जा

औरों को गिरेबाँ की तुझे फ़िक्र ही क्यूँ हो
तू अपनी ही सद-चाकी-ए-दामाँ को सिये जा

हर लम्हा तग़य्युर पे निगाहों को जमाए
तू जाइज़ा-ए-गर्दिश-ए-अय्याम लिए जा

इस जब्र-ए-मशीयत को तो सहना ही पड़ेगा
बे-कैफ़ सही उन के इशारों पे जिए जा

साक़ी की नज़र से कोई निस्बत है तो ‘अनवर’
पीने की अदा ये भी है बे-जाम पिए जा

तसव्वुर के सहारे यूँ शब-ए-ग़म 

तसव्वुर के सहारे यूँ शब-ए-ग़म ख़त्म की मैं ने
जहाँ दिल की ख़लिश उभरी तुम्हें आवाज़ दी मैं ने

तलब की राह में खा कर शिकस्त-ए-आगही मैं ने
जुनूँ की कामयाबी पर मुबारक-बाद दी मैं ने

दम-ए-आख़िर बहुत अच्छा किया तशरीफ़ ले आए
सलाम-ए-रुख़्सताना को पुकारा था अभी मैं ने

ज़बाँ से जब न कुछ यारा-ए-शरह-ए-आरज़ू पाया
निगाहों से हुज़ूर-ए-हुस्न अक्सर बात की मैं ने

नशेमन को भी इक परतव क़फ़स का जान कर ‘अनवर’
बसा-औक़ात की है बिजलियों की रह-बरी मैं ने

उम्र गुज़री है इल्तिजा करते 

उम्र गुज़री है इल्तिजा करते
क़िस्सा-ए-ग़म लब-आशना करते

जीने वाले तेरे बग़ैर ऐ दोस्त
मर न जाते तो और क्या करते

हाए वो क़हर-ए-सादगी-आमेज़
काश हम फिर उन्हें ख़फ़ा करते

रंग होता कुछ और दुनिया का
शैख़ मेरा अगर कहा करते

आप करते जो एहतराम-ए-बुताँ
बुत-कदे ख़ुद ख़ुदा ख़ुदा करते

रिंद होते जो बा-शुऊर ‘अनवर’
क्या बताऊँ तुम्हें वो क्या करते

वक़्त जब करवटें बदलता है 

वक़्त जब करवटें बदलता है
फ़ितना-ए-हश्र साथ चलता है

मौज-ए-ग़म से ही दिल बहलता है
ये चराग़ आँधियों में जलता है

उस को तूफ़ाँ डुबो नहीं सकता
जो किनारों से बच के चलता है

किस को मालूम है जुनून-ए-हयात
साया-ए-आगही में पलता है

उन की महफ़िल में चल ब-होश-ए-तमाम
कौन गिर कर यहाँ सँभलता है

मैं करूँ क्यूँ न उस की क़दर ‘अनवर’
दिल के साँचे में अश्क ढलता है

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