अनवर सुहैल की रचनाएँ

दुआ

अक़्ल वालों को
अक़्ल दे मौला

इल्म वालों को
इल्म दे मौला

धर्म वालों को
धर्म दे मौला

और थोड़ी सी
शर्म दे मौला!

बम और अनाज

अफ़गानिस्तान पर अमेरिकी हमला

ये है हमारा
ताज़ातरीन
नमूना-ए-इन्साफ़

बाग़ियों के लिए बम
और वहाँ की अवाम के लिए अनाज
वाह! भई वाह!

उसने अपनी बात कही तो 

उसने अपनी बात कही तो
भड़क उठे शोले
गरज उठी बन्दूकें
चमचमाने लगीं तलवारें
निकलने लगी गालियाँ…

चारों तरफ़ उठने लगा शोर
पहचानो…पहचानो
कौन हैं ये
क्या उसे नही मालूम
हमारी दया पर टिका है उसका वजूद
बता दो सम्भल जाए वरना
च्यूँटी की तरह मसल दिया जाएगा उसे…

वो सहम गया
वो सम्भल गया
वो बदल गया
जान गया कि
उसका पाला संगठित अपराधियों से है…

सबूत

कर रहा हूँ इकट्ठा
वो सारे सबूत
वो सारे आँकडे…

जो सरासर झूठे हैं
और
जिन्‍हें बडी ख़ूबसूरती से
तुमने सच का जामा पहनाया है
कितना बडा़ छलावा है
मेरे भोले-भाले मासूम जन
ब-आसानी आ जाते हैं झाँसे में

ओ जादूगरो !
ओ हाथ की सफाई के माहिर लोगो !
तुम्हारा तिलस्म है ऐसा
कि सम्मोहित से लोग
कर लेते यक़ीन
अपने मौजूदा हालात के लिए
ख़ुद को मान लेते कुसूरवार
ख़ुद को भाग्यहीन…

प्रेम कविता

उसने मुझसे कहा
ये क्या लिखते रहते हो
ग़रीबी के बारे में
अभावों, असुविधाओं,
तन और मन पर लगे घावों के बारे में
रईसों, सुविधा-भोगियों के ख़िलाफ़
उगलते रहते हो ज़हर
निश-दिन, चारों पहर
तुम्हे अपने आस-पास
क्या सिर्फ़ दिखलाई देता है
अन्याय, अत्याचार
आतंक, भ्रष्टाचार!!
और कभी विषय बदलते भी हो
तो अपनी भूमिगत कोयला खदान के दर्द का
उड़ेल देते हो
कविताओं में
कहानियों में
क्या तुम मेरे लिए
सिर्फ़ मेरे लिए
नहीं लिख सकते प्रेम-कविताएँ…

मैं तुम्हे कैसे बताऊँ प्रिये
कि बेशक मैं लिख सकता हूँ
कविताएँ सावन की फुहारों की
रिमझिम बौछारों की
उत्सव-त्योहारों की कविताएँ
कोमल, सांगीतिक छंद-बद्ध कविताएँ
लेकिन तुम मेरी कविताओं को
गौर से देखो तो सही
उसमे तुम कितनी ख़ूबसूरती से छिपी हुई हो
जिन पंक्तियों में
विपरीत परिस्थितियों में भी
जीने की चाह लिए खडा़ दि‍खता हूँ
उसमें तुम्ही तो मेरी प्रेरणा हो…
तुम्ही तो मेरा सम्बल हो…

सिर झुकाना नहीं आता 

इतनी मुश्किलें हैं फिर भी
उसकी महफ़िल में जाकर मुझको
गिडगिडाना नहीं भाता…

वो जो चापलूसों से घिरे रहता है
वो जो नित नए रंग-रूप धरता है
वो जो सिर्फ हुक्म दिया करता है
वो जो यातनाएँ दे के हँसता है
मैंने चुन ली हैं सजा की राहें
क्योंकि मुझको हर इक चौखट पे
सर झुकाना नहीं आता…

उसके दरबार में रौनक रहती
उसके चारों तरफ सिपाही हैं
हर कोई उसकी इक नज़र का मुरीद
उसके नज़दीक पहुँचने के लिए
हर तरफ होड मची रहती है
और हम दूर दूर रहते हैं
लोगों को आगाह किया करते हैं
क्या करें,
इतनी ठोकरें खाकर भी मुझको
दुनियादारी निभाना नहीं आता…

दुःख सहने के आदी

उनके जीवन में है दुःख ही दुःख
और हम बड़ी आसानी से कह देते
उनको दुःख सहने की आदत है
वे सुनते अभाव का महा-आख्यान
वे गाते अपूरित आकाँक्षाओं के गान
चुपचाप सहते जाते जुल्मो-सितम

और हम बड़ी आसानी से कह देते
अपने जीवन से ये कितने सन्तुष्ट हैं
वे नही जानते कि उनकी बेहतरी लिए
उनकी शिक्षा, स्वास्थ और उन्नति के लिए
कितने चिंतित हैं हम और
सरकारी, गैर-सरकारी संगठन
दुनिया भर में हो रहा है अध्ययन
की जा रही हैं पार-देशीय यात्राएँ
हो रहे हैं सेमीनार, संगोष्ठियाँ…

वे नही जान पाएँगे कि उन्हें
मुख्यधारा में लाने के लिए
तथाकथित तौर पर सभ्य बनाने के लिए
कर चुके हजम हम
कितने बिलियन डालर
और एक डालर की कीमत
आज साठ रुपए है!

इत्ते सारे

इत्ते सारे लोग यहाँ हैं
इत्ती सारी बातें हैं
इत्ते सारे हँसी-ठहाके
इत्ती सारी घातें हैं

बहुतों के दिल चोर छुपे हैं
साँप कई हैं अस्तीनों में
दाँत कई है तेज-नुकीले
बड़े-बड़े नाखून हैं इनके
अक्सर ऐसे लोग अकारण
आपस में ही, इक-दूजे को
गरियाते हैं..लतियाते हैं

इनके बीच हमें रहना है
इनकी बात हमें सुनना है
और इन्हीं से बच रहना है

जो थोड़ें हैं सीधे-सादे
गुप-चुप, गम-सुम
तन्हा-तन्हा से जीते हैं
दुनियादारी से बचते हैं
औ’ अक्सर ये ही पिटते हैं
कायरता को, दुर्बलता को
क़िस्मत का चक्कर कहते हैं
ऐसे लोगों का रहना क्या
ऐसे लोगों का जीना क्या

मियाँ जब्बार

नागपुर के बुनकरों पर एक कविता

खट्-खट्, खटर-खटर
हथकरघे से उठती आवाज़ें निरंतर
एक जादू की तरह
तैयार होती डिज़ाइनों के जादूगर
मियाँ जब्बार…

मियाँ जब्बार का
सात वर्षीय बालक
पढ़ने-लिखने की नाज़ुक उम्र में
रंग-बिरंगे धागों की
बना रहा घिर्रियां

मियाँ जब्बार की बीवी
अठमासा पेट लिए
तैयार साड़ियों के
कुतर रही फालतू धागे

मियाँ जब्बार की
चौदह वर्षीया बेटी
सिर और सीना दुपट्टे से ढाँपे
तैयार कपड़ों को
जतन से तह लगा रही

मियाँ जब्बार हमें
समझाते जा रहे
काम की बारीकियाँ
ये जाने बगैर
कि तफ़़रीहन पूछा था हमने
कि कैसे बन जाती हैं
सुर्ख, चटख़, शोख़ रंगों वाली
जादूभरी नागपुरी साड़ियाँ

मेरा दुनियादार मित्र ऊबकर
कुहनियों से कोंचता है
कहाँ भिड़ गए यार!

इन सबसे बेखबर
मियाँ जब्बार
अपनी रौ में बताते जा रहे
बुनकरी की बारीकियाँ

किस तरह फँसाए जाते
धागों के मकड़जाल
पावरलूम में किस तरह

कारीगर की ज़रा सी चूक
बर्बाद कर सकती कच्चा माल
या तेज़ चलती गिन्नियों से
जख़्मी हो सकतीं
कारीगर की करामाती उँगलियाँ

‘वाकई कितना जोखिम है।’
मित्र का चलताऊ कमेंट
और मियाँ जब्बार की हँसी–
‘रिस्क तो लेना ही पड़ता है सा’ब!’

मुझे सचमुच आष्चर्य है
कि इतना कठिन जीवन
हँस कर गुज़ारते कैसे मियाँ जब्बार

पावरलूम के साथ
पावरलूम का एक पुर्जा बनकर करना काम
जबकि जेहन में हों मौजूद
बाल-बच्चों की ज़रूरतें
लकवाग्रस्त अब्बा की दवाईयाँ
मकान का किराया
कारीगरों की तनख्वाह
महाजनों का सूखा व्यवहार..

सरकार ने तोड़ दी कमर हमारी हुजूर
वरना पहले हम भी
हुआ करते थे सरकारी मुलाजिम
अदा करते थे आयकर
बच्चे हमारे पढ़ते थे पब्लिक स्कूलों में
तब हम भी सुबह पढ़ते थे अख़बार
छुट्टी कि दिन बीवी-बच्चों के संग
सीताबर्डी या इतवारी में करते थे खरीददारी

नाक पोंछती बिटिया को दुलारते मियां जब्बार
समझाते जाते धंधे की ऊँच-नीच
सावन-भादों का महीना
मंदी के कारण कम हुए काम
नतीजतन कारीगर की रोजी कर दी आधी

इतवारी के सेठ-महाजन
मीन-मेख निकाल
औने-पौने खरीदते तैयार माल

क्या करें जनाब
है बहुत बुरा हाल…

सरगुजा

पाँव-पाँव चलते बच्चे-सा
खड़ा होता
गिर पड़ता
डगमग सरगुजा

क्या वंचित रह जाएगा
पैजनिया बजाती
ठुमुक-ठुमुक चाल से भी

क्या सरगुजा
तरसता रहेगा
अपने ही जंगल-नदिया
पर्वत-पठारों से
मिलने-गपियाने से

भयभीत हैं सरगुजिहा,
आँवला, महुआ, चिरौंजी
सब ले जाएँगे व्यापारी
फगुनाहट में बौराए
पलाश वनों का सुलगता खौ़फ़
सदियों तक उन्हें यूँ ही डराता रहेगा

क्या हमेषा की तरह
यहाँ रातों-रात
चमकती रहेंगी आरियाँ
घुरघुराते रहेंगे ट्रक
तब्दील होंगे सागौन के वृक्ष
पलंग-सोफा-दीवान
दरवाज़ों-चौखटों में
मचान बनाने के लिए
या जलावन के लिए

सूखी टहनियाँ बीनते सरगुजिहा
अकारण बेड़ दिये जाएँगे
सरकारी काल-कोठरियों में

सरगुजिहा जानते नहीं
उनकी जन्मभूमि के गर्भ में
छिपा है
कोयला, बाक्साईट, यूरेनियम
जिसे चुरा ले जा रहे परदेसी चोर
विस्फोटकी धमाकों से
थर्रा जाते जंगल, झरने, पठार
अशान्त होते पशु-पक्षी

नाराज़ है वनदेवी
जिसका कोप
भुखमरी, बीमारी और मौत के रूप में
अक्सर झेलते ही हैं सरगुजिहा
कहते हैं
कि कोयले से बनती बिजली
जगमगाते जिससे शहर

अपनी ज़रूरतों से बेखबर
चाँद और जुगनुओं के मद्धम प्रकाश में
ऊँघता सरगुजा
रत्ती भर रोशनी के बदले
मिलती जिसे उपेक्षाएं निरंतर….

प्रेम के भूखे सरगुजिहों से
कभी प्रभु यीषु के भक्ति-गीत गवाती
कभी ‘घर-वापसी’ की कवायद कराती
कभी किसी विचारधारा का दबाव
आदिवासी समाज को
आन्दोलन की राह दिखा
नक्सलबाड़ी में
कर देता तब्दील…

नाटे-काले सरगुजिहा
बित्ते भर कपड़े के बूते
गुज़ारते एक पूरा जीवन

इन्हें देख
अक्सर हंसा करते
अम्बिकापुर-वासी

“सरगुजिहा लोगों की चमड़ी मर जाती है,
न धूप से जलती
न जाड़े से काँपती
न बरखा से खियाती
ऐसी ढीठ होती चमड़ी इनकी…”

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