‘अना’ क़ासमी की रचनाएँ

बाजुओ पर दिये परवाजे़ अना दी है मुझे

बाजुओं-पर दिये परवाजे़ ‘अना दी है मुझे
फिर ख़लाओं में नयी राह दिखा दी है मुझ

अपनी हस्ती से वो दरवेश तो बेगाना रहा
मेरी रूदाद मगर उसने सुना दी है मुझे

फिर ज़रा ग़ार के दरवाजे़ से पत्थर सरका
ऐसा लगता है कि फिर माँ ने दुआ दी है मुझे

क़र्ज़ बोता रहूँ और ब्याज में फसलें काटूँ
मेरे अजदाद1 ने मीरास2 भी क्या दी है मुझे

ये तो होना ही था इस रोज़ रहे-उल्फ़त में
जुर्म उसका था मगर उसने सज़ा दी है मुझे

जैसे सीने में सिमट आई हो दुनिया सारी
शायरी तूने ही बुस्अत3 ये अता की है मुझे

कभी हां कुछ मिरे भी शेर के पैकर में रहते हैं 

कभी हाँ कुछ, मेरे भी शेर पैकर[1] में रहते हैं
वही जो रंग, तितली के सुनहरे पर में रहते हैं ।

निकल पड़ते हैं जब बाहर, तो कितना ख़ौफ़ लगता है,
वही कीड़े, जो अक्सर आदमी के सर में रहते हैं ।

यही तो एक दुनिया है, ख़्यालों की या ख़्वाबों की,
हैं जितने भी ग़ज़ल वाले, इसी चक्कर में रहते हैं ।

जिधर देखो वहीं नफ़रत के आसेबाँ[2] का साया है,
मुहब्बत के फ़रिश्ते अब कहाँ किस घर में रहते हैं ।

वो जिस दम भर के उसने आह, मुझको थामना चाहा,
यक़ीं उस दम हुआ, के दिल भी कुछ पत्थर में रहते हैं ।

शब्दार्थ
  1. ऊपर जायें साचाँ
  2. ऊपर जायें भूत

माने जो कोई बात तो इक बात बहुत है 

माने जो कोई बात, तो इक बात बहुत है,
सदियों के लिए पल की मुलाक़ात बहुत है ।

दिन भीड़ के पर्दे में छुपा लेगा हर इक बात,
ऐसे में न जाओ, कि अभी रात बहुत है ।

महिने में किसी रोज़, कहीं चाय के दो कप,
इतना है अगर साथ, तो फिर साथ बहुत है ।

रसमन ही सही, तुमने चलो ख़ैरियत पूछी,
इस दौर में अब इतनी मदारात[1] बहुत है ।

दुनिया के मुक़द्दर की लक़ीरों को पढ़ें हम,
कहते है कि मज़दूर का बस हाथ बहुत है ।

फिर तुमको पुकारूँगा कभी कोहे ‘अना’[2]से,
अय दोस्त अभी गर्मी-ए- हालात बहुत है ।

शब्दार्थ
  1. ऊपर जायें हमदर्दी
  2. ऊपर जायें स्वाभिमान

वो आसमाँ मिज़ाज कहां आसमाँ से था

वो आस्माँ मिज़ाज कहां आस्माँ से था
उसका वजूद भी तो इसी ख़ाकदाँ1 से था

उसके हरेक ज़ुल्म को कहता था अ़द्ल2 मैं
साया मिरे भी सर पे उसी सायबाँ से था

इक साहिरा3 ने मोम से पत्थर किया जिसे
वो क़िस्स-ए-लतीफ़ मिरी दास्ताँ से था

गरदान4 कर मैं आया हूँ मीज़ाने-फ़ायलात5
अबके हमारा सामना उस नुक्तादाँ6 से था

ये मुफ़लिसी की आँच में झुलसी हुई ग़ज़ल
रिश्ता ये किस ग़रीब का उर्दू ज़बाँ से था

1. धरती 2. न्याय 3. जादूगरनी 4. पुनरावृत्ति 5. छंद मापन विधि 6. श्रेष्ठ

रहता है मशग़ला जहां बस वाह वाह का

रहता है मशग़ला जहाँ बस वाह-वाह का
मैं भी हूँ इस फ़कीर उसी ख़ानक़ाह का

सद शुक्र हुस्न और शबे-बेपनाह का
वैसे इरादा कुछ भी नहीं है गुनाह का

मुझसे मिल बग़ैर कहाँ जाइयेगा आप
इक संगे-मील हूँ मैं मोहब्बत की राह का

या रब हर इक को इतनी मुसीबत ज़रूर दे
मतलब समझ सके वो ग़रीबों की आह का

मुन्सिफ़ की बात और है हक़ का मिज़ाज और
दावा हो ख़ुद दलील तो फिर क्या गवाह का

तुमको भी फुरसतें मिलीं मुझको भी थोड़ा वक्त
सोचेंगे कोई रास्ता फिर से निबाह का

उम्मीद है के कोई नया गुल खिलायेगा
ये सिलसिला बढ़े तो तिरी रस्मो-राह का

मजबूरो-नातवाँ1 कोई इंसाँ नज़र न आये
गुज़रेगा यां से क़ाफिला आलमपनाह का

बहुत वीरान लगता है तेरी चिलमन का सन्नाटा

बहुत वीरान लगता है, तिरी चिलमन का सन्नाटा,
नया हंगामा माँगे है, ये शहरे-फ़न का सन्नाटा ।

कोई पूछे तो इस सूखे हुए तुलसी के पौधे से,
कि उस पर किस तरह बीता खुले आँगन का सन्नाटा ।

तिरी महफ़िल की रूदादें बहुत सी सुन रखीं हैं पर,
तिरी आँखों में देखा है, अधूरेपन का सन्नाटा ।

सयानी मुफ़लिसी फुटपाथ पर बेख़ौफ़ बिखरी है,
कि दस तालों में रहता है बिचारे धन का सन्नाटा ।

ख़ुदाया इस ज़मीं पर तो तिरे बंदों का क़ब्ज़ा है,
तू इन तारों से पुर कर दे मिरे दामन का सन्नाटा ।

मिरी उससे कई दिन से लडा़ई भी नहीं फिर भी,
अ़जब ख़ुशबू बिखेरे है, ये अपनेपन का सन्नाटा ।

तुम्हें ये नींद कुछ यूँ ही नहीं आती ‘अना ‘ साहिब,
दिलों को लोरियाँ देता है हर धड़कन का सन्नाटा ।

क़तआत

अब्र बेताब होके चीख़ पड़ा
बर्क़ अँगड़ाई लेके जाग उठी
क़तरा-क़तरा जिगर से खूँ टपका
रात तनहाई लेके जाग उठी

किससे पूछूं ऐ फ़लक़ हालात का सूरज है कौन

किससे पूछूँ ऐ फ़लक हालात का सूरज है कौन
तिलमिलाता क्यों उठा है, बात का सूरज है कौन

दे गया आँखों को सपने, ले गया आँखों का नूर
तू ज़मीं की तह में डूबा, रात का सूरज है कौन

तेरे जाते ही ये ज़र्रे आसमां पैमा हुए
सब से कहते हैं बता जुल्मात[1] का सूरज है कौन

है कहाँ अब मशरिक़ो-मग़रिब[2] का तो ताबिन्दागर[3]
इन घटाओं के तले बरसात का सूरज है कौन

आखि़रश उसका भी सर ख़ू शफ़क़[4] रंग जायेगा
ये जहाँगीरी है किसकी ज़ात का सूरज है कौन

रौशनी के पर समेटे शाम की दहलीज़ पर
ज़िन्दगी के आख़री लम्हात का सूरज है कौन

कच्ची फ़सलों का लहू बरसों से पी जाता है क्यों
बादलों में छुप के बैठा घात का सूरज है कौन

ये दहकती आग और ये आबला पाई तिरी
ऐ ‘अना’ दिल में तिरे जज़्बात का सूरज है कौन

शब्दार्थ
  1. ऊपर जायेंअंधकार
  2. ऊपर जायेंपूरब-पश्चिम
  3. ऊपर जायेंप्रकाशवान
  4. ऊपर जायेंलालिमा

कजकुलाही से न मतलब रेशमी शालों से है

कजकुलाही[1] से, न मतलब रेशमी शालों से है
दोस्ताना यार मेरा सिर्फ़ मतवालों से है

शायरी का शौक़ तो ताज़ा है लेकिन दोस्तो
सिलसिला तो हुस्नवालों से मिरा सालों से है

उड़ के जायेगा भला वो जंगली पंछी कहाँ
जिसकी सिरयानों [2] में खुशबू आम की डालों से है

परकटे पंछी चमन में रेंगते से देखकर
जाने क्यों इक ख़ौफ़ सा हरदम तिरे बालों से है

हम के तज दें ज़िन्दगी तक उस परी पैकर के नाम
फिर भी उसको बैर सा हम चाहने वालों से है

शब्दार्थ
  1. ऊपर जायेंगर्व से टोपी को सीधा धारण करना
  2. ऊपर जायेंधमनी

मसलहत खे़ज़ ये रियाकारी

मसलहत ख़ेज़[1] ये रियाकारी[2]
ज़िन्दगानी की नाज़ बरदारी

कै़सरी[3] तेरी मेरा दश्ते-नज्द[4]
अपने-अपने जहाँ की सरदारी

कैसे नादाँ हो काट बैठे हो
एक ही रौ में ज़िन्दगी सारी

हो जो ईमाँ तो बैठता है मियाँ
एक इन्साँ हज़ार पर भारी

कारोबारे जहाँ से घबराकर
कर रहा हूँ जुनूँ की तैयारी

ज़हनो-दिल में चुभन सी रहती है
शायरी है अजीब बीमारी

मुस्कुरा क्या गई वो शोख़ अदा
दिल पे गोया चला गयी आरी

शब्दार्थ
  1. ऊपर जायेंस्वार्थपूर्ण
  2. ऊपर जायेंदिखावा
  3. ऊपर जायेंबादशाही
  4. ऊपर जायेंवो जंगल जिसमें मजनूं भटकता 

खिल उठा फूल सा बदन उसका

खिल उठा फूल सा बदन उसका
उफ़ वो बारीक पैरहन उसका

लाल-ओ-गुल[1]तमाम अपने है
मानता हूँ के है चमन उसका

दिल के बेआब तपते सहरा में
सर्द झोंका है बांकपन उसका

ख़ुशबुएँ घोलता है लहज़े में
पंखड़ी-पंखड़ी दहन उसका

ये जो अशअ़ार हैं उसी के हैं
मेरा लहजा है सारा फ़न उसका

जुफ़्त[2] वो था में ताक़[3] बन के रहा
एक सन मेरा एक सन उसका

एक चादर है कुल मताए फ़कीर
वो ही बिस्तर वही क़फ़न उसका

शब्दार्थ
  1. ऊपर जायें फूल-फुलवारी
  2. ऊपर जायें सम संख्या
  3. ऊपर जायें विसम संख्या

कौन बातों में आता है पगले 

कौन बातों में आता है पगले
किसको दुखड़ा सुनाता है पगले

क्या बचाया है मैने तेरे सिवा
तू मुझे आजमाता है पगले

ज़ख़्म भी खिलखिला के हँसते हैं
दर्द भी मुस्कुराता है पगले

अपनी कुटिया सुधारने की सोच
चाँद पर घर बनाता है पगले

बिक चुके हैं वो दश्तो-सहरा[1]सब
अब कहाँ पर तू जाता है पगले

उस परी रूख[2]के उलटे पाँव भी देख
ये कहाँ दिल लगाता है पगले

शब्दार्थ
  1. ऊपर जायेंवन और रेगिस्तान
  2. ऊपर जायेंपरी मुख

आँखों में पढ़ रहा है मुहब्बत के बाब को

आँखों में पढ़ रहा है मोहब्बत के बाब[1] को
पानी में देखता है कोई आफताब को

बस यूँ समझिये शौके़-तलब के इताब[2] को
शोलों पे रख दिया है शगुफ़्ता गुलाब को

जोबन को, बांकपन को, हया को, शबाब को
आँखों से पी रहा हूँ छलकती शराब को

शरमा रहा है छूके तिरा जिस्म किस तरह
नज़रे उठा के देख ज़रा माहताब को

इक उम्र तेरी राह में बरबाद कर चुका
इक उम्र रह गई है हिसाबो-किताब को

फानी[3] हूँ मैं हकीर[4] हूँ कुछ भी नहीं हूँ मैं
मैं क्या करूँगा ले के अज़ाबो-सवाब[5] को

जो अ़क्स इसमें आया उतरता चला गया
आखि़र मैं क्या करूँ दिले-खाना ख़राब को

अबके तिरा सनम भी जवाँ हो चला ‘अना’
सरका के झाँकता है ग़ज़ल के हिजाब को

शब्दार्थ
  1. ऊपर जायेंअध्याय
  2. ऊपर जायेंगुस्सा
  3. ऊपर जायेंनश्वर
  4. ऊपर जायेंतुच्छ
  5. ऊपर जायेंपाप-पुण्य

उस शख़्स की अजीब थीं जादू बयानियाँ 

उस शख़्स की अ़जीब थीं जादू बयानियाँ
इमान मेरा ले गई झूठी कहानियाँ

मैं उसको पाके, अब भी हूँ उसकी तलाश में
सोचा था ख़त्म हो गयीं सब जाँ फ़िशानियाँ[1]

ये बात भी बजा के कहा तुमने कुछ न था
फिर भी थी तेरी ज़ात से कुछ ख़ुशगुमानियाँ

रातों को चाँदनी से बदन जल उठा कभी
दिन को महक उठी हैं कभी रात रानियाँ

था पारसा तो मैं भी मगर उसने जब कहा
आती कहाँ हैं लौट के फिर ये जवानियाँ

शब्दार्थ
  1. ऊपर जायेंसंघर्ष

ये भयानक सियाह रात निकाल 

ये भयानक सियाह रात निकाल
दौलते हुस्न की ज़कात[1] निकाल

उसने हाँ कर दी है तो ऐ दुनिया
क़ौम की बात कर, न ज़ात निकाल

हज़रते-ख़िज्र[2] रास्ता न बता
इस अंधेरे में अपना हाथ निकाल

हाथ लग जाए इस फ़साना और
हर कहानी में ऐसी बात निकाल

ज़िक्रे फ़रहादो-क़ैस रहने दे
शाख़े-आहू[3]पे मत बरात निकाल

ख़ुद इबारत वजूद खो बैठे
इतने ज़्यादा न अब नुक़ात निकाल

शब्दार्थ
  1. ऊपर जायेंदान
  2. ऊपर जायेंईश्वरीय अवतार जो जंगल में भटके हुओं का मार्ग प्रशस्त करते हैं
  3. ऊपर जायेंहिरन के सींग (मुहावरा)

उसकी रहमत का इक सहाब उतरे

उसकी रहमत का इक सहाब[1] उतरे
मेरे कांधों से फिर हिसाब उतरे

ख़ुद से पूछो तबाहियों का सबब
आसमानो से क्यों जवाब उतरे

चश्में-इक़रार[2] की चमक मत पूछ
झील में जैसे माहताब उतरे

तेरी पाज़ेब की झनक गूँजी
ताक़े-निसियाँ[3] से फिर रूबाब[4] उतरे

इश्क़ शोला बजां[5] हो सीना[6] पर
मल्क-ए-हुस्न पर किताब उतरे

रौशनी शहरे-जाँ में फैले कुछ
ताल-ए-दिल पे आफ़ताब उतरे

शब्दार्थ
  1. ऊपर जायेंबादल
  2. ऊपर जायेंआँखों की स्वीकृति
  3. ऊपर जायेंभूला बिसरा आला
  4. ऊपर जायेंएक प्रकार का वाद्य
  5. ऊपर जायेंआत्मा का जल उठना
  6. ऊपर जायेंवह पर्वत जहाँ मूसा नवी को ईश्वरीय प्रकाश की अनुभूति हुई

ये अपना मिलन जैसे इक शाम का मंज़र है

ये अपना मिलन जैसे इक शाम का मंज़र है,
मैं डूबता सूरज हूँ तू बहता समन्दर है ।

सोने का सनम था वो, सबने उसे पूजा है,
उसने जिसे चाहा है वो रेत का पैकर है ।

जो दूर से चमके हैं वो रेत के ज़र्रे हैं,
जो अस्ल में मोती है वो सीप के अन्दर है ।

दिल और भी लेता चल पहलू में जो मुमकिन हो,
उस शोख़ के रस्ते में एक और सितमगर है ।

दो दोस्त मयस्सर हैं इस प्यार के रस्ते में,
इक मील का पत्थर है, इक राह का पत्थर है ।

सब भूल गया आख़िर पैराक हुनर अपने,
अब झील-सी आँखों में मरना ही मुक़द्दर है ।

अब कौन उठाएगा इस बोझ को किश्ती पर,
किश्ती के मुसाफ़िर की आँखों में समन्दर है ।

ख़बर है दोनों को दोनों से दिल लगाऊँ मैं

ख़बर है दोनों को दोनों से दिल लगाऊँ मैं,
किसे फ़रेब दूँ, किस से फ़रेब खाऊँ मैं ।

नहीं है छत न सही आसमाँ तो अपना है,
कहो तो चाँद के पहलू में लेट जाऊँ मैं ।

यही वो शय है कहीं भी किसी भी काम में लो,
उजाला कम हो तो बोलो कि दिल जलाऊँ मैं ।

नहीं नहीं ये तिरी ज़िद नहीं है चलने की,
अभी-अभी तो वो सोया है फिर जगाऊँ मैं ।

बिछड़ के उससे दुआ कर रहा हूँ अय मौला,
कभी किसी की मुहब्बत न आज़माऊँ मैं ।

हर एक लम्हा नयापन हमारी फ़ितरत है,
जो तुम कहो तो पुरानी ग़ज़ल सुनाऊँ मैं ।

दिल की हर धड़कन है बत्तिस मील में

दिल की हर धड़कन है बत्तिस मील में ।
वो ज़िले में और हम तहसील में ।

उसकी आराइश[1] की क़ीमत कैसे दूँ,
दिल को तोला नाक की इक कील में ।

कुछ रहीने मय[2] नहीं मस्ते ख़राम,
सब नशा है सैण्डिल की हील में ।

यक-ब-यक लहरों में दम-सी आ गई,
लड़कियों ने पाँव डाले झील में ।

यार कह कर मेरी सिगरेट खींच ली
किसक़दर बिगड़े हैं बच्चे ढील मैं

उम्र अदाकारी में सारी कट गई,
इक ज़रा से झूठ की तावील[3] में ।

आप कहकर देखिएगा तो हुज़ूर,
सर है ह़ाज़िर हुक्म की तामील में ।

सैकड़ों ग़ज़लें मुकम्मल हो गईं,
इक अधूरे शेर की तकमील[4] में ।

शब्दार्थ
  1. ऊपर जायें शृंगार
  2. ऊपर जायें शराब की अहसानमंद
  3. ऊपर जायें बात घुमाना
  4. ऊपर जायें पूरा करने की कोशिश

गुल जो दामन में समेटे हैं शरर देख लिया 

गुल जो दामन में समेटे हैं शरर[1] देख लिया
लाख रंगों ने छुपाया भी मगर देख लिया

मेरी आँखें, के लिए फिरती हैं बादल में हवा
सीप के होंठ हुए वा[2]के गुहर देख लिया

मेरी पलकों पे निदामत[3] के फिर आँसू न थमे
मेरे क़ातिल ने मिरा दामने-तर देख लिया

ख़ौफ़ सा है मिरे पहलू की हर इक शय पे मुहीत[4]
दिल का ग़म भी है मगर चोर ने घर देख लिया

उसने ग़ज़लें मिरी तारों की ज़बानी सुन लीं
मैं था हैराँ के कहाँ ताबे हुनर देख लिया

ज़िन्दगी ने मुझे बस इतनी ही मोहलत दी है
शाम की शाम तुझे एक नज़र देख लिया

कौन रक्खेगा यहाँ कै़द भला मेरी ‘अना’
अबकी ऐ ज़ुल्फ़े-दुता[5] तेरा भी सर देख लिया

शब्दार्थ
  1. ऊपर जायेंचिंगारी
  2. ऊपर जायेंखुलना
  3. ऊपर जायेंपश्चाताप
  4. ऊपर जायेंव्याप्त
  5. ऊपर जायेंदोहरे केश चिंगारी

उस क़ादरे-मुतलक़ से बग़ावत भी बहुत की 

उस क़ादरे-मुतलक़ से बग़ावत भी बहुत की
इस ख़ाक के पुतले ने जसारत भी बहुत की

इस दिल ने अदा कर दिया हक़ होने का अपने
नफ़रत भी बहुत की है मुहब्बत भी बहुत की

काग़ज़ पे तो अपना ही क़लम बोल रहा है
मंचों पे लतीफ़ों ने सियासत भी बहुत की

नादान सा दिखता था वो हुशियार बहुत था
साधा सा बना रह के शरारत भी बहुत की

मस्जिद में इबादत के लिए रोक रहा था
आलिम था मगर उसने जहालत भी बहुत की

इंसां की न की क़द्र तो लानत में पड़ा है
करने को तो शैतां ने इबादत भी बहुत की

मैं ही न सुधरने पे बज़िद था मेरे मौला
तूने तो मिरे साथ रियायत भी बहुत की

हमारे बस का नहीं है मौला ये रोज़े महशर हिसाब देना

हमारे बस का नहीं है मौला ये रोज़े महशर हिसाब देना
तिरा मुसलसल सवाल करना मेरा मुसलसल जवाब देना

क्लास में भी हैं जलने बाले बहुत से अपनी मुहब्बतों के
मिरे ख़तों को निकाल लेना अगर किसी को किताब देना

ये हुस्न वालों का खेल है या मज़ाक़ समझा है अ़ाशिक़ी को
कभी इशारों में डाँट देना कभी बुलाकर गुलाब देना

ये कैसी हाँ हूँ लगा रखी है सुनो अब अपना ये फोन रख दो
तुम्हें गवारा अगर नहीं है ज़बाँ हिला कर जवाब देना

बहक गया गर तो फिर न कहना ख़ता हमारी नहीं है कोई
तुम्हें ये बोला था बन्द कर दो नज़र को अपनी शराब देना

तेरी इन आंखों के इशारे पागल हैं 

तेरी इन आंखों के इशारे पागल हैं
इन झीलों की मौजें, धारे पागल है

चाँद तो कुहनी मार के अक्सर गुज़रा है
अपनी ही क़िस्मत के सितारे पागल हैं

कमरों से तितली का गुज़र कब होता है
गमलों के ये फूल बेचारे पागल हैं

अक़्लो खि़रद का काम नहीं है साहिल पर
नज़रें घायल और नज़ारे पागल हैं

कोई न कोई पागलपन है सबपे सवार
जितने हैं फ़नकार वो सारे पागल हैं

शेरो सुखन की बात इन्हीं के बस की है
‘अना’ वना जो दर्द के मारे पागल ह

उसको नम्बर देके मेरी और उलझन बढ़ गई 

उसको नम्बर देके मेरी और उलझन बढ़ गई
फोन की घंटी बजी और दिल की धड़कन बढ़ गई

इस तरफ़ भी शायरी में कुछ वज़न सा आ गया
उस तरफ़ भी चूड़ियों की और खन खन बढ़ गई

हम ग़रीबों के घरों की वुसअतें मत पूछिए
गिर गई दीवार जितनी उतनी आँगन बढ़ गई

मशवरा औरों से लेना इश्क़ में मंहगा पड़ा
चाहतें क्या ख़ाक बढ़तीं और अनबन बढ़ गई

आप तो नाज़ुक इशारे करके बस चलते बने
दिल के शोलों पर इधर तो और छन छन बढ़ गई

बर्थ पर लेट के हम सो गये आसानी से

बर्थ पर लेट के हम सो गये आसानी से
फ़ायदा कुछ तो हुआ बे सरो सामानी से

माँ ने स्कूल को जाती हुई बेटी से कहा
तेरी बिंदिया न गिरे देखना पेशानी[1] से

मुफ़्त में नेकियाँ मिलती थीं शजर[2] था घर में
अब हैं महरूम3 परिंदों की भी मेहमानी से

मैं वही हूँ के मिरी क़द्र न जानी तुमने
अब खड़े देखते क्या हो मुझे हैरानी से

इसमें राँझाओं की नालायक़ियों का क्या है
इश्क़ ज़िंदा है तो बस हुस्न की क़ुर्बानी से

कोई दानाई यहाँ काम नहीं आती ’अना’
शेर कुछ अच्छे निकल आते हैं नादानी से

शब्दार्थ
  1. ऊपर जायेंमाता
  2. ऊपर जायेंपेड

जो ज़बां से लगती है वो कभी नहीं जाती 

जो ज़बां से लगती है वो कभी नहीं जाती
दर्द भी नहीं जाता, चोट भी नहीं जाती

गर तलब हो सादिक़[1] तो ख़र्च-वर्च कर डालो
मुफ़्त की शराबों से तिश्नगी [2] नहीं जाती

अब भी उसके रस्ते में दिल धड़कने लगता है
हौसला तो करता हूं बुज़दिली नहीं जाती

कुछ नहीं है दुनिया में इक सिवा मुहब्बत के
और ये मुहब्बत ही तुमसे की नहीं जाती

तर्के-मय [3] को ऐ वाइज़ तू न कुछ समझ लेना
इतनी पी चुका हूं के और पी नहीं जाती

शाख़ पर लगा है गर उसका क्या बिगड़ना है
फूल सूंघ लेने से ताज़गी नहीं जाती

नाव को किनारा तो वो ख़ुदा ही बख़्शेगा
फिर भी नाख़ुदाओं[4] की बंदगी नहीं जाती

शेरो शायरी क्या है सब उसी का चक्कर है
वो कसक जो सीने से आज भी नहीं जाती

उसको देखना है तो दिल की खिड़कियां खोलो
बंद हों दरीचे तो रौशनी नहीं जाती

तेरी जुस्तजू में अब उसके आगे जाना है
जिन हुदूद के आगे शायरी नहीं जाती

शब्दार्थ
  1. ऊपर जायें सच्ची तडप
  2. ऊपर जायें प्यास
  3. ऊपर जायें पीना छोड़ना
  4. ऊपर जायें मल्लाह

आराइशे-खुर्शीदो-क़मर किसके लिए है

आराइशे-खुर्शीदो-क़मर[1]किसके लिए है
जब कोई नहीं है तो ये घर किसके लिए है

मुझ तक तो कभी चाय की नौबत नहीं आई
होगा भी बड़ा तेरा जिगर किसके लिए है

हैं अपने मरासिम[2]भी मगर ऐसे कहां हैं
इस सम्त इशारा है मगर किसके लिए है

है कौन जिसे ढूंढ़ती फिरतीं हैं निगाहें
आंखों में तेरी गर्दे-सफ़र किसके लिए है

अब रात बहुत हो भी चुकी बज़्म [3]शुरू हो
मैं हूं न यहां दर पे नज़र किसके लिऐ है

अशआर की शोख़ी तो चलो सबके लिए हाँ
लहजे में तेरे ज़ख़्मे-हुनर किसके लिए है

शक़ था तिरे तक़वे[4]पे ‘अना’ पहले से मुझको
वो ज़ोहराजबीं[5]कल से इधर किसके लिए है

शब्दार्थ
  1. ऊपर जायें चाँद तारों की सजावट
  2. ऊपर जायें ताल्लुक़ात
  3. ऊपर जायें प्रोग्राम
  4. ऊपर जायें बे दाग छबि
  5. ऊपर जायें सुंदरी

रोज़ चिकचिक में सर खपायें क्या 

रोज़ चिकचिक में सर खपायें क्या
फैसला ठीक है निभायें क्या

चश्मेनम[1] का अजीब मौसम है
शाम,झीलें,शफ़क़[2],घटायें क्या

बाल बिखरे हुये, ग़रीबां चाक
आ गयीं शहर में बलायें क्या

अश्क़ झूठे हैं,ग़म भी झूठा है
बज़्मेमातम में मुस्कुरायें क्या

हो चुका हो मज़ाक तो बोलो
अपने अब मुद्दआ पे आयें क्या

ख़ाक कर दें जला के महफ़िल को
तेरे बाजू में बैठ जायें क्या

झूठ पर झूठ कब तलक वाइज़[3]
झूठ बातों पे सर हिलायें क्या

शब्दार्थ
  1. ऊपर जायें भीगी आँख
  2. ऊपर जायें लालिमा
  3. ऊपर जायें मौलाना

पैसा तो खुशामद में, मेरे यार बहुत है

पैसा तो ख़ुशामद में, मेरे यार बहुत है
पर क्या करूँ ये दिल मिरा खुद्दार बहुत है

इस खेल में हाँ की भी ज़रूरत नहीं होती
लहजे में लचक हो तो फिर इंकार बहुत है

रस्ते में कहीं जुल्फ़ का साया भी अता हो
ऐ वक़्त तिरे पाँव की रफ़्तार बहुत है

बेताज हुकूमत का मज़ा और है वरना
मसनद[1] के लिए लोगों का इसरार बहुत है

मुश्किल है मगर फिर भी उलझना मिरे दिल का
ऐ हुस्न तिरी जुल्फ़ तो ख़मदार बहुत है

अब दर्द उठा है तो ग़ज़ल भी है ज़रूरी
पहले भी हुआ करता था इस बार बहुत है

सोने के लिए क़द के बराबर ही ज़मीं बस
साए के लिए एक ही दीवार बहुत है

शब्दार्थ
  1. ऊपर जायें सिंहासन

ये फ़ासले भी, सात समन्दर से कम नहीं

ये फ़ासले भी, सात समन्दर से कम नहीं,
उसका ख़ुदा नहीं है, हमारा सनम नहीं ।

कलियाँ थिरक रहीं हैं, हवाओं के साज़ पर,
अफ़सोस मेरे हाथ में काग़ज़-क़लम नहीं ।

पी कर तो देख इसमें ही कुल कायनात है,
जामे-सिफ़ाल[1] गरचे मिरा जामे-जम[2]नहीं ।

तुमको अगर नहीं है शऊरे-वफ़ा तो क्या,
हम भी कोई मुसाफ़िरे-दश्ते-अलम[3] नहीं ।

टूटे तो ये सुकूत[4] का आलम किसी तरह,
गर हाँ नहीं, तो कह दो ख़ुदा की क़सम, नहीं ।

इक तू, कि लाज़वाल[5] तिरी ज़ाते-बेमिसाल,
इक मैं के जिसका कोई वजूदो-अ़दम[6] नहीं ।

शब्दार्थ
  1. ऊपर जायें मिट्टी का प्याला
  2. ऊपर जायें जमशेद बादशाह का, वो प्याला जिसमें वो सारा संसार देखता था
  3. ऊपर जायें मुसीबतों के जंगल का राही
  4. ऊपर जायें ख़ामोशी
  5. ऊपर जायें अमिट
  6. ऊपर जायें अस्तित्व एवं नश्वरता

कुछ चलेगा जनाब, कुछ भी नहीं

कुछ चलेगा जनाब, कुछ भी नहीं
चाय, कॉफी, शराब, कुछ भी नहीं

चुप रहें तो कली लगें वो होंट
हँस पड़ें तो गुलाब कुछ भी नहीं

जो ज़मीं पर है सब हमारा है
सब है अच्छा, ख़राब कुछ भी नहीं

इन अमीरों की सोच तो ये है
हम ग़रीबों के ख़्वाब कुछ भी नहीं

मन की दुनिया में सब ही उरियाँ[1] हैं
दिल के आगे हिजाब कुछ भी नहीं

मीरे-ख़स्ता के शेर के आगे
हम से ख़ानाख़राब कुछ भी नहीं

उम्र अब अपनी अस्ल शक्ल में आ
क्रीम, पोडर, खि़ज़ाब कुछ भी नहीं

ज़िन्दगी भर का लेन देन ‘अना’
और हिसाबो-किताब कुछ भी नहीं

शब्दार्थ
  1. ऊपर जायें नंगे

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