Poetry

अनिता अग्रवाल की रचनाएँ

नींद टूटने तक

भाग्य छलता है
आकांक्षाएँ
छलती है
आदमी की नींद
उजाले को छलती है
उजाला
आदमी की नींद को
नींद टूटने तक

अभ्यास

रिक्शे वाला
आता है
रिक्शे में बैठकर
धूप से पीछा छुड़ाती हूं
बैठते हुए भी
बैठने से कतराती हूं
सोचती हूं
रिक्शे वाले के बारे में
उसे धूप से बचने का
एक अभ्यास सा बन गया है।

एक बार फिर

एक बार फिर वह
सोच रही है
अपनी जिंदगी के बारे में
झुग्गी में
बर्तन मांजने से
सुबह की शुरूआत करती हुई
और
टूटी खाट की
लटकती रस्स्यिों के
झूले में
रात को करवट बदलने के बीीच
जीवित होने का
अहसास दिलाने के लिये
क्या कुछ है शेष

जिजीविषा

दाना लेकर दीवार पर
चढ़ती हुई चोटीं
गिर जाती है
और कुचली जाती है
दाना
पांच से चिपककर
दूर जा गिरता है
एक दूसरी चींटी आकर
अहसास कराती है,
अपने होने का
जो साथी चींटी को ले जाती है
बिना किसी गिला-शिकवा के
और
मैं देखती रह जाती हूं
मुश्किल से उठाकर
लाये उस दाने को

स्त्रियाँ जानती हैं अपनी देह का रहस्य

दो छोरों पर है जिंदगी
वह जानती है अपनी जगह
सब सुहागिने जानती है अपना पद अपना मान
पर कितना कम जानती है
जो धीरे-धीरे घट रहा है
आसपास उनके विरूद्ध
एक वह जो घुट रही है अज्ञात व्याधि से
पति के मन में क्या है वह नहीं जानती
जानती है की वह कुछ भी हो नहीं पायी
अपने पति के लिए
अकेली समूची
सब जमापूँजी के साथ
उधर पति के मन में अब धनी होती जाती है
‘छुटकार’ – वह मचलता है कुछ नया पाने को
कोई नया घर कोई नयी दुनिया
कोई नया देश
स्त्रिायाँ जानती है अपना सब कुछ
अपने देह काा हर रहस्य
वह जे छूट रहा है
वह जो ऊपर ही उतर रहा है फीकेपन में
वह पल भर के लिए सोचती हैं
उस अजानी स्त्री के बारे में
जो भरीपूरी आएगी
देने को देहके अनंत सुख अनंत राग

जाने कब 

जाने कब इतने बड़े-बड़े पंख निकल आए
चिड़िया के
उनके उड़ने की आहत न हुई
और शहर में सन्नाटा पसर गया।

बसंत में बारूद 

बसंत पंचमी आयी
विवाह के लगन चढ़े
आमों पर मंजर फूले
मौसम पर छाई
तरूणाई है
सर्द रात है
पीले बासंती मौसम में
चारों और सन्नाटा
बस गूँज है
बैंड बाजे की
फिल्मी गानों
और
पटाखों की
बगल में कहीं
रोता है कुत्ता
तो बिल्लियाँ कहीं
तापने को अलाव नहीं
पर यहीं कहीं पास में
बारूद भरा है जेहन में
अभी-अभी उठता धुँआ
धुँधलता फिज़ा
बदलता समा
बैंड की तेज धुन के बीच से
ए चीख गूँजती है
सर्द रात बनती
जिंदगी की आखिरी रात
और
अब शुरू होता
मौत का तमाशा
दो खेमों में बाँटती
प्रेमचंद कबीर की धरती
फिराक का शहर था गोरखनाथ की नगरी
काश! हम झांक सकते
अतीत में अपने
लेते संकल्प
बचाए रखने का
गंगा जमननी तहजीब अपनी

बाजार में मैं

बहुत दिनों बाद मैं बाजार निकली
तो लगा
कि चीजें मेरे इंतजार में हैं
इंतजार में है
एक पुरी दुनिया
खासर मेरे लिए
खुलने को बेचैन
यह क्या हुआ
कि मैं बाजार में पहुंची
चीजें सब वहीं थाी
सलीके से लगी हुई
मैं ही नहीं रह गई थी अपनी जगह

प्रसिद्धी

प्रसिद्धी आती है
बताकर
प्रेम आता है
निःशब्द
कभी आँखें भाषा बनती है
कभी भाषा को
आँखें चकित करती है
अन्तस्तल के साथ

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