अनिता ललित की रचनाएँ

मन्नत का धागा

प्रेम का धागा
लपेट दिया है मैनें
तुम्हारे चारों ओर.…
तुम्हारा नाम पढ़ते हुए…
तुमसे ही छुपा कर!
और बाँध दी अपनी साँसें…
मज़बूती से सभी गाँठों में!
अब मन्नत पूरी होने के पहले…
तुम चाहो तो भी उसे खोल नहीं पाओगे…
बिना मेरी साँसों को काटे …!

अमृत

छलक उठी जब… आँसू बनकर…
असहनीय पीड़ा… प्यार की,
खोने ही वाली थी… अस्तित्व अपना…
कि बढ़ा दिए तुमने अपने हाथ…
भर लिया उसे… अँजुरी में…
और लगा लिया… माथे से अपने!
बन गई उसी क्षण वो…
खारे पानी से… अमृत,
और हो गया…
अमर… हमारा प्यार…!

आईना 

आईना तो हर दिल में होता है,
फिर क्यों भटक जाती है नज़र…
इधर उधर…
लिए हाथ में…
कोई न कोई पत्थर…?

जियो तो ऐसे जियो

चढ़ो… तो आसमाँ में चाँद की तरह…
कि आँखों में सबकी… बस सको…
ढलो… तो सागर में सूरज की तरह…
कि नज़र में सबकी टिक सको…!

हाइकु 

1

नवजीवन
सृजन से वो पाती
माँ कहलाती!

2

बहना प्यारी,
स्नेह-धागे में सजी,
भाई कलाई!

3

विदा हो बेटी,
रोये घर आँगन,
कचोटे मन!

4

पूनम चाँद
यादें सौगात लाया
खो जाये दिल!

5

आज की रात,
केसरिया है चाँद ,
प्यारा सलोना!

6

जीवन धूप,
गुलमोहर छाँव
साथ तुम्हारा!

7

अमलतास,
जब बाहें फैलाये
धरा मुस्काये!

8

सूने दिल में ,
तुम खिलते हो, ज्यों
अमलतास!

9

यादों के रेले
उदासी के मेले में
कैसे मुस्कायें?

10

कैसी ये हवा
जो उड़ा दे, सुखाए
रिश्तों की नमी

पिता

पिता…
हार्डबाउंड कवर में.… बंद जैसे इतिहास मिले!
अपने माथे पर जो
धूप, ठण्ड , बरसात…
सबकी मार लिखे.…!
सहे ख़ामोशी से सब… .
मगर कभी भी… न पीछे वो हटे!

पिता… ढलती साँझ में
जैसे एक दीया हो रौशन!
जिसके आने से … घर में
आ जाए रौनक …!
ख़ामोश दीवारें फुसफुसाएँ ,
कोना-कोना महके, बस जाए।
घर को सिर पर उठाते बच्चे,…
सिर किताबों में छुपाएँ।
बिखरा घर हो जाता संयत….
हर चीज़ सही जगह पे आए…
वो रौबीली आवाज़…
जब घर की देहरी पर गूँजे!

पिता… चिलचिलाती धूप में
जैसे, सुक़ून की ठण्डी, छाया…!
हर मुसीबत में सम्बल वो,
अव्यक्त प्रेम का समन्दर वो,
हर मुश्किल का हल है वो,
वो कवच… है पूरे घर का.…
महफ़ूज़ जिसमें… उसकी औलाद रहे…!

पिता… टूटते तारे में है…
मुक़म्मल हर ख्वाहिश जैसे…!
बच्चे की आँखों में पलते सपनों को
पिता… एक विस्तृत आकाश दे ।
दुनियादारी की… टेढ़ी-मेढ़ी राहों पर … .
पिता… अनुशासन का पाठ पढ़ाए…!
पिता… उँगली थामे, चलना सिखाए…
और… दुनिया की पहचान लिखे!

है जन्मदाता, है पालनहार,
पिता… हर जीवन का.… है आधार!
रातों को जो जाग-जागकर…
नींदें अपनी देता वार ,
वो पिता है …उसका जीवन…
है हर बच्चे पर उधार!
पिता… मान, अभिमान है …
वो वरदान, सम्मान है,
घर की शान, माँ की मुस्कान है,
पिता… धरती पर सृष्टि का आह्वान है।

कली से फूल, फूल से फल… .
क्यों… ये सफ़र कभी न याद रहे ?
हाथों से छूटे… जैसे ही हाथ.…
बस… वक़्त औ उम्र मात मिले!
इन उम्रदराज़ आँखों में अब
क्यों भीगे अपमान मिले ?
क्यों बेबसी बेहिसाब मिले ?
पिता की आँखों में कभी झाँककर तो देखो
इन आँखों में…
दफ़्न कई ख़्वाब मिले…!

मेरी समाधि 

उठी थी एक मौज…
मेरे मन में भी कभी…
मचल कर चली थी…
भिगोने तुझे भी…!
न जाने क्या सूझी तुझे…
उछाल फेंके कुछ पत्थर… उसकी तरफ…!
तिरस्कृत सी… .घायल हुई,
सहम गई , थम गई …
और फिर सिमट गई वो मौज…
मेरे अंतस् में ही…!
वक़्त बहे जा रहा था… अपनी धुन में…
और… गुमसुम सी मैं…
बाँधती गई हर उस मौज को…
जो… उठती तेरी तरफ…!
और यूँ… अनजाने ही…
बनते गए कई बाँध…
मुझमें में ही अंदर…!
बहती हूँ अब मैं…
खामोश दरिया जैसे…
अपने ही किनारों के दायरे में…!
देखती हूँ… तुम्हें भी…किनारे पर बैठे…
पुकारते उस मतवाली मौज को…
अपने हाथों को डुबो कर…
उसकी खामोश धारा में…!
कभी कभी मगर… अब भी…
फेंक ही देते हो कंकड़ उसमें…!
आदत से मजबूर जो ठहरे…!
हलचल तो होती है… पानी में…
मगर उस मौज तक… पहुँच पाती नहीं…!
शायद…
सिमटते सिमटते मुझमें… ,
डूबती गईं मौजें…
बनकर भँवर… मुझ ही में भीतर!
ढूँढ़ती हूँ कभी… खुद को…
पूछती हूँ…
कौन हूँ मैं, कहाँ हूँ, किसलिए हूँ…?
पर कोई जवाब नहीं मिलता…
मैं भी शायद…
डूब गई, खो गई… उसी मौज के संग…!
मुझे पता भी न चला…
और बन गई… मेरी एक समाधि… …
मुझमें में ही कहीं अंदर…!!!

आँखों से जब झरता जल 

आँखों से बहता जब जल
भीगें आँखें, सुलगे मन ,
जैसे सुलगे गीली लकड़ी…
होती धुआँ-धुआँ
दिन रैन!
किस क़दर जलता है जल…
यह निर्झर का जल ही जाने…
झरता है जब झर झर अंतस्
जलता जाता है ये जीवन…!
नदिया के दो छोर बने हम
संग चलें…पर मिल न पाएँ।
हम दोनों के बीच खड़ा पुल
आधा जलता… आधा जल में
न सजल को आँच मिले
न जलते की ही प्यास बुझे!
क्यों भीगे हम झरते जल में
जला- जलाकर रिश्ता अपना
याद रहे क्यों तीर नदी के.
याद न क्यों गहराई उसकी…?
दूर चाँद नदिया से जितना
उतना उसके भीतर पैठा
दो छोरों का रिश्ता गहरा
गहरे जल में जाकर ठहरा
जल में जलते चाँद- सा बैठा…!!!

माँ

सतरंगी ऊन के गोले जैसी…

नर्म, मुलायम …प्रेम-पगी… ,
समेटे सब को , लिपटाए खुद में,
कोमल स्पर्श… सहलाती माँ!
सहनशीलता और धैर्य की…
नुकीली तेज़ सलाइयों पर…
एक-एक क़दम बढाती हुई…
सपने बच्चों के बुनती माँ!
सीधा-उल्टा , उल्टा-सीधा …
कभी सीधा-सीधा, उल्टा-उल्टा… ,
रातों को भी जाग-जाग कर…
उँगली-कमर… कस, चलती माँ!
चुस्त हाथ… बारीक़ नज़र से…
सपनों का आकार… सजाती माँ!
गिरा फंदा उठाने ख़ातिर…
कभी उल्टे पाँव भी चलती माँ!
गाँठ जो आती …
उधेड़ बुनाई…
नये सिरे से…
फिर सपने चढ़ाती माँ!
प्यार, दुलार ,सेवा ,ममता…
अनुशासन के हर पल्ले पर… ,
जैसे-जैसे जीवन बढ़ता …
जोड़-घटाने करती माँ!
समय बढ़ता, बढ़ते बच्चे ,
सपनों का भी रंग निखरता!
नेह-धागे से पिरो… सँवारती…
बच्चों का तन-मन भरमाती माँ!
रहे ना कोई सपना अधूरा…
बुरी नज़र ना लगे किसी की… ,
आख़िरी टाँका चूम होठों से…
अपने दाँतों से काटती माँ!
यूँ हर पल… बढ़ते सपने उसके…
निकल हाथों से… होते साकार!
वो निहारती, वो इतराती…
बाँहों में उनको भरना चाहती…!
अफ़सोस मगर! वो भूल ही जाती…
‘सपने बुनते-बुनते गुम गया…
ऊन का तो वजूद ही घुल गया…!’
रह गई बनकर एक धागा पतला…
बंद डिब्बे में… सिकुड़ा -सिमटा…!
उत्साह… पर उसका… न हल्का होता…
निग़ाह सपनों से कभी ना हटती!
जब भी होता… कोई सपना आहत…
धागे से मलहम बन जाती…
टूटा सपना फिर-फिर … जोड़ती…!
बिन पैबंद… बस… मुस्काती माँ!
सपनों में अपना जीवन बुन कर…
बन दुआ, सदा महकती माँ…!!!

प्यार

प्यार…
खिलती मुस्कान, आँसू की ज़ुबान भी है!
तन्हाई का साथी, भीड़ में बियाबान भी है!
स्पर्श की मीठी सिहरन, तंज़ से लहूलुहान भी है!
पोखर में कमल, सागर में तूफ़ान भी है!
फूलों की ख़ुश्बू, काँटों का सामान भी है!
सूरज की तपिश, बारिश का वरदान भी है!
अमावस की रात, चाँदनी का अरमान भी है!
विरह की बदरी, पपीहे की तान भी है!
धड़कन की सरगम, जिस्म की जान भी है!
हर जवाब की बुनियाद, हर सवाल का एहतराम भी है!
प्यार…
जीवन का आग़ाज़, जीवन का अंजाम भी है…!!!

ज़िन्दगी-एक कविता 

कुछ हँसते, कुछ गमगीन लम्हे…
लपेट कर चलती है ये ज़िंदगी…!
कभी सातवें आसमान पर खिलखिलाती…
तो कभी किसी गड्ढे में सहमी सी…
अक्सर मिलती है ये ज़िंदगी…!
समय बढ़ता जाता है… .
मगर कभी-कभी थककर…
थम जाती है ये ज़िंदगी…!
कभी सुक़ून-ओ-चैन के संग…
कभी विरोधाभास में…
साँस लेती है ये ज़िंदगी…!
दिल में उमड़ते जज़्बात के,
एहसासों के रेले…
सब झेलती है… ये ज़िंदगी!
कभी हालात का हाथ थामे…
कभी बग़ावत करती है… ये ज़िंदगी…!
जब कभी भी छलकी…
किसी कोरे काग़ज़ पर…
अपने चेहरे की सारी आडी-तिरछी लकीरें खींचकर…
अपना नाम लिख जाती है… ये ज़िंदगी… .
दुनिया उसे कविता समझकर पढ़ती है…
मैं बस जीती जाती हूँ… वो ज़िंदगी…!!!

चाँद के आँसू 

बारहा चाँद से हमने की बातें,
कभी मुस्काए कभी रोए संग,
हमें तो आ गया…
आँसुओं को पीने का हुनर ,
चाँद के चेहरे से मगर…
आँसुओं के निशान पोछूँ कैसे?

आख़िर क्यों 

ज़िन्दगी की सुबह
जिनके हौसलों से आबाद हुई,
शाम ढले क्यों ज़िन्दगी
उनसे ही बेज़ार हुई?

मेरी दुनिया 

कौन से दो जहाँ माँगे मैनें
सिर्फ़ दुनिया ही तो माँगी थी!
तुम्हारी दो बाहों के आगे…
मेरी कोई दुनिया ही कहाँ?

जीवन-सार

प्रेम की बेड़ियाँ…
फूलों का हार,
विरह के अश्रु…
गंगा की धार ,
समझे जो वेदना… प्रिय के मन की
योग यही जीवन का… है यही सार!

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